









प्यारे साथियों ,
कल शिक्षक दिवस बीता है, सैकड़ों हज़ारों मेसेज और संदेश विभिन्न सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से मुझ तक पहुँचे हैं। आपके शिष्यत्व प्रेम से वशीभूत होकर यह आलेख लिख रहा हूँ.. अंत तक पढ़ना और अपने विचार ज़रूर कमेंट सेक्शन में लिखते जाना… शुरू करते हैं:-
तो मेरे देखे आज के दौर की सबसे बड़ी विडंबना शायद यह है कि हर व्यक्ति गुरु हो जाना चाहता है, पर शिष्य होने को कोई तैयार नहीं।
हर किसी के पास सलाह है, निष्कर्ष हैं, उत्तर हैं। हर कोई किसी को कुछ सिखाना चाहता है। लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हैं जो शांत होकर कह सकें “मुझे नहीं पता… मुझे सिखाइए।” और शायद यहीं से वास्तविक ज्ञान की यात्रा शुरू होती है। गुरु होना एक भूमिका हो सकती है, लेकिन शिष्य होना एक भाव है। एक ऐसा भाव जिसमें मनुष्य अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि अपने अज्ञान को स्वीकार करने का साहस करता है।
शिष्य होने का अर्थ किसी व्यक्ति के सामने छोटा हो जाना नहीं है। शिष्य होने का अर्थ है, अपने अहंकार से बड़ा हो जाना। जिस दिन हमें यह भ्रम हो जाता है कि अब हम जान गए हैं, उसी दिन सीखने के सारे दरवाज़े धीरे-धीरे बंद होने लगते हैं। और जिस दिन हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि अभी बहुत कुछ जानना शेष है, उसी दिन पूरी दुनिया हमारी पाठशाला बन जाती है।
फिर शिक्षक केवल किसी आसन पर बैठा व्यक्ति नहीं रहता।
एक बच्चा भी शिक्षक हो सकता है,
एक पराजय भी,
एक आलोचना भी,
एक गलत निर्णय भी,
एक कठिन समय भी,
और कभी-कभी वह व्यक्ति भी जिसे हमने जीवन भर अपने से कमतर समझा।
शिष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि वह गुरु की हर बात मानता है; बल्कि यह है कि वह हर अनुभव से कुछ ग्रहण करना जानता है।
नदी इसलिए समुद्र तक पहुँचती है क्योंकि वह नीचे की ओर बहने में अपना अपमान नहीं समझती। बीज इसलिए वृक्ष बनता है क्योंकि वह पहले मिट्टी में दब जाना स्वीकार करता है। और मनुष्य भी शायद तभी विराट होता है, जब वह कुछ समय के लिए अपने भीतर के “मैं जानता हूँ” को शांत कर देता है।
आज ज्ञान की कमी नहीं है। किताबें हैं, इंटरनेट है, मंच हैं, वक्ता हैं, सूचनाओं का अथाह समुद्र है। कमी यदि किसी चीज़ की है, तो वह है ग्रहणशीलता की।
हम सुनते कम हैं, उत्तर देने की तैयारी अधिक करते हैं। पढ़ते कम हैं, मत अधिक बनाते हैं। समझते कम हैं, निर्णय अधिक सुनाते हैं। ऐसे समय में शिष्य बने रहना अपने आप में एक साधना है।
शिष्य होना झुकना है
पर टूटना नहीं।
प्रश्न करना है
पर अहंकार से नहीं।
असहमति रखना है
पर सीखने के द्वार बंद किए बिना।
ज्ञान प्राप्त करना है
पर ज्ञान का अभिमान प्राप्त किए बिना।
और शायद जीवन की सबसे सुंदर अवस्था वही है जहाँ वर्षों का अनुभव होने के बाद भी मनुष्य के भीतर यह वाक्य जीवित रहे
“मैं अभी भी सीख रहा हूँ।”
क्योंकि जिस व्यक्ति के भीतर शिष्य जीवित है,
उसके भीतर विकास की संभावना जीवित है।
गुरु बनने की आकांक्षा आपको मंच तक पहुँचा सकती है,
लेकिन शिष्य बने रहने की विनम्रता आपको ऊँचाई तक पहुँचाती है। इसलिए जीवन में इतना मत सीख लेना कि सीखना ही भूल जाओ। पद बढ़े, प्रतिष्ठा बढ़े, उम्र बढ़े, अनुभव बढ़े
लेकिन भीतर बैठा वह जिज्ञासु शिष्य कभी बूढ़ा न हो।
क्योंकि अंततः- जिस दिन मनुष्य के भीतर का शिष्य मर जाता है, उसी दिन उसके भीतर का वास्तविक गुरु भी मरने लगता है।
और जिस व्यक्ति ने जीवन भर शिष्य बने रहने की कला सीख ली,
उसे गुरु बनने की घोषणा कभी करनी ही नहीं पड़ती एक दिन उसका जीवन स्वयं उसकी गुरुता का प्रमाण बन जाता है।
आप अपने भीतर का शिष्य अमर रहे , सफल हो , स्वस्थ रहे और समृद्धि के नित नए सोपानों को पार करते रहें, इन्हीं भावों के साथ शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं :)
✍🏻एमजे