Diary Ke Panne

शनिवार, 5 सितंबर 2026

शिष्य हो जाना….


प्यारे साथियों ,


कल शिक्षक दिवस बीता है, सैकड़ों हज़ारों मेसेज और संदेश विभिन्न सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से मुझ तक पहुँचे हैं। आपके शिष्यत्व प्रेम से वशीभूत होकर यह आलेख लिख रहा हूँ.. अंत तक पढ़ना और अपने विचार ज़रूर कमेंट सेक्शन में लिखते जाना… शुरू करते हैं:- 


तो मेरे देखे आज के दौर की सबसे बड़ी विडंबना शायद यह है कि हर व्यक्ति गुरु हो जाना चाहता है, पर शिष्य होने को कोई तैयार नहीं।


हर किसी के पास सलाह है, निष्कर्ष हैं, उत्तर हैं। हर कोई किसी को कुछ सिखाना चाहता है। लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हैं जो शांत होकर कह सकें  “मुझे नहीं पता… मुझे सिखाइए।” और शायद यहीं से वास्तविक ज्ञान की यात्रा शुरू होती है। गुरु होना एक भूमिका हो सकती है, लेकिन शिष्य होना एक भाव है। एक ऐसा भाव जिसमें मनुष्य अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि अपने अज्ञान को स्वीकार करने का साहस करता है।


शिष्य होने का अर्थ किसी व्यक्ति के सामने छोटा हो जाना नहीं है। शिष्य होने का अर्थ है, अपने अहंकार से बड़ा हो जाना। जिस दिन हमें यह भ्रम हो जाता है कि अब हम जान गए हैं, उसी दिन सीखने के सारे दरवाज़े धीरे-धीरे बंद होने लगते हैं। और जिस दिन हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि अभी बहुत कुछ जानना शेष है, उसी दिन पूरी दुनिया हमारी पाठशाला बन जाती है।


फिर शिक्षक केवल किसी आसन पर बैठा व्यक्ति नहीं रहता।

एक बच्चा भी शिक्षक हो सकता है,

एक पराजय भी,

एक आलोचना भी,

एक गलत निर्णय भी,

एक कठिन समय भी,

और कभी-कभी वह व्यक्ति भी जिसे हमने जीवन भर अपने से कमतर समझा।


शिष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि वह गुरु की हर बात मानता है; बल्कि यह है कि वह हर अनुभव से कुछ ग्रहण करना जानता है।


नदी इसलिए समुद्र तक पहुँचती है क्योंकि वह नीचे की ओर बहने में अपना अपमान नहीं समझती। बीज इसलिए वृक्ष बनता है क्योंकि वह पहले मिट्टी में दब जाना स्वीकार करता है। और मनुष्य भी शायद तभी विराट होता है, जब वह कुछ समय के लिए अपने भीतर के “मैं जानता हूँ” को शांत कर देता है।


आज ज्ञान की कमी नहीं है। किताबें हैं, इंटरनेट है, मंच हैं, वक्ता हैं, सूचनाओं का अथाह समुद्र है। कमी यदि किसी चीज़ की है, तो वह है ग्रहणशीलता की।


हम सुनते कम हैं, उत्तर देने की तैयारी अधिक करते हैं। पढ़ते कम हैं, मत अधिक बनाते हैं। समझते कम हैं, निर्णय अधिक सुनाते हैं। ऐसे समय में शिष्य बने रहना अपने आप में एक साधना है।


शिष्य होना झुकना है

पर टूटना नहीं।

प्रश्न करना है

पर अहंकार से नहीं।

असहमति रखना है

पर सीखने के द्वार बंद किए बिना।

ज्ञान प्राप्त करना है

पर ज्ञान का अभिमान प्राप्त किए बिना।


और शायद जीवन की सबसे सुंदर अवस्था वही है जहाँ वर्षों का अनुभव होने के बाद भी मनुष्य के भीतर यह वाक्य जीवित रहे


“मैं अभी भी सीख रहा हूँ।”


क्योंकि जिस व्यक्ति के भीतर शिष्य जीवित है,

उसके भीतर विकास की संभावना जीवित है।


गुरु बनने की आकांक्षा आपको मंच तक पहुँचा सकती है,

लेकिन शिष्य बने रहने की विनम्रता आपको ऊँचाई तक पहुँचाती है। इसलिए जीवन में इतना मत सीख लेना कि सीखना ही भूल जाओ। पद बढ़े, प्रतिष्ठा बढ़े, उम्र बढ़े, अनुभव बढ़े

लेकिन भीतर बैठा वह जिज्ञासु शिष्य कभी बूढ़ा न हो।


क्योंकि अंततः-  जिस दिन मनुष्य के भीतर का शिष्य मर जाता है, उसी दिन उसके भीतर का वास्तविक गुरु भी मरने लगता है।

और जिस व्यक्ति ने जीवन भर शिष्य बने रहने की कला सीख ली,

उसे गुरु बनने की घोषणा कभी करनी ही नहीं पड़ती एक दिन उसका जीवन स्वयं उसकी गुरुता का प्रमाण बन जाता है।


आप अपने भीतर का शिष्य अमर रहे , सफल हो , स्वस्थ रहे और समृद्धि के नित नए सोपानों को पार करते रहें, इन्हीं भावों के साथ शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं :)


✍🏻एमजे 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

क्या है से क्या चाहिए तक….The Great Paradox


                           Pic Courtesy : Google 


कुछ कहानियाँ हम देखते हैं और भूल जाते हैं। कुछ कहानियाँ हमारे भीतर थोड़ी देर ठहरती हैं। और कभी-कभी किसी कहानी में एक छोटा-सा दृश्य, एक वाक्य, एक प्रतीक ऐसा मिल जाता है जो फिल्म समाप्त होने के बाद भी हमारा पीछा नहीं छोड़ता। हाल ही में Odyssey देखते हुए मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ। कहानी आगे बढ़ गई, दृश्य बदल गए, लेकिन Odysseus और सायरंस वाला प्रसंग मेरे भीतर कहीं अटक गया। शायद इसलिए कि मुझे लगा यह समुद्र में भटकते किसी प्राचीन यूनानी योद्धा की कहानी भर नहीं है। कहीं न कहीं यह हम सबकी कहानी है।


Odysseus युद्ध जीत चुका है। लेकिन युद्ध जीत लेना और घर पहुँच जाना दो अलग-अलग बातें हैं। वह अपने साथियों के साथ समुद्र के रास्ते अपने घर लौट रहा है। रास्ते में उसे एक ऐसे समुद्री क्षेत्र से गुजरना है जहाँ सायरंस रहती हैं। Greek mythology में सायरंस का असली हथियार उनकी आवाज़ थी। कहा जाता था कि उनका गीत इतना आकर्षक होता था कि उसे सुनने वाला नाविक अपना विवेक खो बैठता, जहाज और साथियों को भूल जाता और उस आवाज़ की ओर बढ़ते-बढ़ते अपनी मृत्यु तक पहुँच जाता।


इस खतरे से बचने के लिए Odysseus अपने साथियों के कानों में वैक्स लगवा देता है ताकि वे सायरंस की आवाज़ सुन ही न सकें। लेकिन स्वयं वह उस गीत को सुनना चाहता है। शायद मनुष्य के भीतर यह जिज्ञासा हमेशा रही है, जिस चीज से पूरी दुनिया आपको बचने को कह रही हो, एक बार उसे जानने की इच्छा और अधिक तीव्र हो जाती है।


लेकिन यहीं Odysseus एक असाधारण काम करता है। वह अपने साथियों से कहता है, मुझे जहाज के मास्ट से मजबूती से बाँध देना। और जब सायरंस का गीत सुनकर मैं तुमसे मुझे खोलने की प्रार्थना करूँ, चीखूँ, आदेश दूँ, गिड़गिड़ाऊँ, तब भी मुझे मत खोलना।


मुझे इस दृश्य की सबसे खूबसूरत बात यह लगी कि Odysseus को अपने साहस पर भरोसा था, लेकिन उसने अपने भविष्य के विवेक पर भरोसा नहीं किया। वह जानता था कि आज जो व्यक्ति निर्णय ले रहा है, सायरंस का गीत सुनने के बाद शायद वही व्यक्ति नहीं रहेगा। इसलिए उसने टेम्पटेशन आने के बाद उससे लड़ने की योजना नहीं बनाई; उसने पहले ही अपने लिए एक सीमा तय कर दी। यही बात मुझे देर तक सोचने पर मजबूर करती रही।


हम अक्सर अपने जीवन में यह मानकर चलते हैं कि जब कठिन समय आएगा, तब हम सही निर्णय ले लेंगे। जब टेम्टेशंस आएगी, तब खुद को रोक लेंगे। लेकिन शायद मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह अपने कमजोर क्षणों में भी स्वयं को उतना ही समझदार समझता है जितना वह अपने मजबूत क्षणों में होता है।


Odysseus ने ऐसा नहीं किया। उसने अपने मजबूत क्षण में अपने कमजोर क्षण के लिए निर्णय ले लिया। यही इस पूरे प्रसंग का वह अर्थ है जिसने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया।


सायरंस का गीत केवल किसी नई और खूबसूरत चीज का प्रलोभन नहीं है। हमारे जीवन में कई बार सबसे खतरनाक Siren वह होती है जो हमें किसी ऐसी चीज की ओर वापस बुलाती है जिसे हम कभी बहुत चाहते थे, जो कभी हमारी थी, लेकिन अब हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है। कोई बीता हुआ समय। कोई अधूरा सपना। कोई खोया हुआ अवसर। कभी-कभी तो हमारा अपना ही पुराना वर्शन।


मनुष्य केवल भविष्य के पीछे भागते हुए नहीं डूबता। कई बार वह अतीत तक वापस तैरने की कोशिश करते हुए भी डूब जाता है। और शायद इसीलिए सायरंस का रूपक इतना शक्तिशाली है। समुद्र आगे की ओर जा रहा है, जहाज घर की ओर बढ़ रहा है, लेकिन आवाज़ पीछे से बुला रही है।


जीवन में भी कितनी बार ऐसा होता है। हम जानते हैं कि हमें आगे जाना है, लेकिन कोई स्मृति हमें पीछे बुलाती रहती है। हम जानते हैं कि कोई अध्याय समाप्त हो चुका है, फिर भी मन उसके अंतिम पन्ने को बार-बार खोलता है। हम जानते हैं कि कुछ लोग, कुछ जगहें और कुछ समय वापस नहीं आते, लेकिन मन उनके लौट आने की संभावना से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाता।


Odysseus history का पहला आदमी बन जाता है, जिसने सायरंस के गीत सुने और सुनने के बाद भी जिंदा रहा। और बाद में जब वो उन गीतों को अपने लोगों से साझा करता है ना उफ्फ! उसने कहा सायरंस का गीत कहता है - 

“ what you most want is 

what you most can't have and 

what you most can't have 

is what you already had.”


अर्थात् यह कि आप जिस चीज़ को सबसे ज़्यादा चाहते हो वो वही है जो आपको कभी नहीं मिल सकता….. क्यूँकि जो आपको कभी नहीं मिल सकता वो वही चीज़ है जो कभी आपके पास थी….. अहा! कितनी गहरी बात! कितना शानदार रूपक!….  इसका मतलब ये भी है कि जो आपके पास है उसे सम्भालिए, बहुत कुछ बहुमूल्य हम सभी के पास होता है, हमेशा बस देखने के लिए नज़र और नज़रिया चाहिए। 


और यहीं Odysseus हमें एक बहुत साधारण लेकिन गहरी बात सिखाता है, हर मनुष्य को अपने जीवन में कोई न कोई मास्ट चाहिए। कोई ऐसी चीज जिससे वह स्वयं को तब बाँध सके जब उसका अपना मन उसके विरुद्ध हो जाए।


किसी के लिए वह उसका परिवार हो सकता है। किसी के लिए उसका उद्देश्य। किसी के लिए उसका प्रोफेशन, डिसिप्लिन, फेथ, कोई रेस्पोंसिबिलिटी या वर्षों से बनाया हुआ कोई सपना। मेरे लिए हमेशा परिवार, लिखना , अध्ययन और अपने विद्यार्थियों के प्रति मेरी जिम्मेदारी ऐसे ही एंकर्स रहे हैं। जीवन में ऐसे समय भी आए जब मन ने बहुत-सी दिशाओं में जाने को कहा, लेकिन कुछ जिम्मेदारियाँ थीं जिन्होंने मुझे वहीं रोके रखा जहाँ मुझे होना चाहिए था। बाद में समझ आया कि कई बार जिन्हें हम बंधन समझते हैं, वही हमें डूबने से बचा रहे होते हैं।


उम्र के साथ मैंने एक बात और सीखी है- डिसिप्लिन का अर्थ यह नहीं कि आपके भीतर टेम्प्टेशंस समाप्त हो गई है। डिसिप्लिन का अर्थ है कि आपने टेम्प्टेशंस आने से पहले यह तय कर लिया है कि उसके आने पर आप क्या करेंगे।


इसीलिए कुछ निर्णय भावनाओं के बीच नहीं लिए जाने चाहिए। वे पहले लिए जाने चाहिए। जब मन शांत हो, तब तय कर लीजिए कि आपकी सीमाएँ क्या हैं। जब संबंध अच्छे चल रहे हों, तब तय कीजिए कि आपके जीवन मूल्य क्या हैं। जब पैसा पर्याप्त हो, तब तय कीजिए कि आपकी इंटीग्रिटी की कीमत क्या है। जब करियर ठीक चल रहा हो, तब तय कीजिए कि सफलता के लिए आप कौन-सा रास्ता कभी नहीं अपनाएँगे। और जब जीवन शांत हो, तभी तय कर लीजिए कि तूफान आने पर आप किस चीज को पकड़कर खड़े रहेंगे।


क्योंकि तूफान के बीच फिलोसफी याद नहीं आती। उस समय केवल वह मास्ट काम आता है जिससे आपने स्वयं को पहले से बाँध रखा हो।


अब इस प्रश्न का उत्तर खोजिए - जब कभी जीवन में सायरंस मुझे बुलाएँगी, तब मेरा मास्ट क्या होगा?


✍🏻एमजे 








मंगलवार, 4 अगस्त 2026

The hell is other people


सार्त्र से मेरा परिचय बहुत पुराना है। जब मैं शायद क्लास इलेवेंथ में था, हरिवंश राय बच्चन जी ने मेरा परिचय सार्त्र से करवाया था। उनकी रचनाओं में कहीं सार्त्र का ज़िक्र आया और मैं लग गया उसकी खोज में। जो पहली किताब पढ़ी वो थी “बीइंग एंड नथिंगनेस” आज भी उसको समझने की कोशिश कर रहा हूँ, उस पर फिर कभी बात करेंगे । आज बात है सार्त्र की ही एक दूसरी किताब के बारे में जिसका नाम है No Exit । आकार में छोटी, पात्रों में सीमित, मंच पर लगभग स्थिर, किन्तु विचारों में इतनी विशाल कि उसे पढ़ लेने के बाद मनुष्य कुछ समय तक स्वयं से बच नहीं पाता। पहली बार जब यह नाटक मेरे हाथ में आया तो मुझे लगा कि शायद यह किसी साधारण मनोवैज्ञानिक नाटक की तरह होगा। लेकिन कुछ ही पृष्ठों के भीतर यह स्पष्ट हो गया कि यहाँ कहानी कम है, मनुष्य का अनावरण अधिक है। सार्त्र ने इस नाटक में न कोई युद्ध दिखाया, न कोई रक्तपात, न कोई दैत्य। उन्होंने केवल तीन मनुष्यों को एक कमरे में बैठा दिया और संसार के सबसे गहरे नरक की रचना कर दी।


हम बचपन से सुनते आए हैं कि नरक अग्नि से भरा होता है, वहाँ यातनाएँ होती हैं, दंड होता है, चीखें होती हैं। सार्त्र इस पूरी कल्पना को एक झटके में उलट देते हैं। उनके यहाँ न आग है, न शैतान, न लोहे की जंजीरें। केवल एक बंद कमरा है, तीन कुर्सियाँ हैं और तीन ऐसे व्यक्ति हैं जो अपने अतीत से भागना चाहते हैं, किन्तु एक-दूसरे की उपस्थिति उन्हें लगातार उनके वास्तविक स्वरूप का सामना कराती रहती है। यही वह स्थान है जहाँ सार्त्र का प्रसिद्ध वाक्य जन्म लेता है-  “Hell is other people.” पहली दृष्टि में यह वाक्य मनुष्य-विरोधी लगता है, किन्तु थोड़ा ठहरकर देखें तो पता चलता है कि सार्त्र मनुष्यों से नहीं, मनुष्य की उस प्रवृत्ति से संघर्ष कर रहे हैं जिसमें वह स्वयं को दूसरों की आँखों में खोजने लगता है। जब हमारा अस्तित्व हमारे अपने विवेक के स्थान पर दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर हो जाता है, तब हम अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं। वही क्षण नरक का आरंभ है।


मनुष्य का सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं; संकट यह है कि धीरे-धीरे वह स्वयं भी अपने बारे में वही सोचने लगता है जो लोग उसके बारे में सोचते हैं। यही No Exit का सबसे गहरा मनोवैज्ञानिक बिंदु है। हम अपने जीवन में कितने ही निर्णय इसलिए नहीं लेते क्योंकि समाज क्या कहेगा। कितने ही लोग अपनी प्रतिभा का गला घोंट देते हैं क्योंकि परिवार की अपेक्षाएँ अलग हैं। कितने ही संबंध केवल इसलिए ढोए जाते हैं कि लोग क्या सोचेंगे। सार्त्र का कमरा वास्तव में हमारे भीतर का वही कमरा है जहाँ हम हर समय अदृश्य दर्शकों से घिरे रहते हैं।


लेकिन यहीं से भारतीय दर्शन का द्वार खुलता है। उपनिषद् का महावाक्य कहता है- “तत्त्वमसि”। अर्थात् तू वही है। पहली दृष्टि में लगता है कि सार्त्र और उपनिषद् दो विपरीत दिशाओं में खड़े हैं। एक कह रहा है कि दूसरा मनुष्य नरक है, दूसरा कह रहा है कि वही दूसरा तुम स्वयं हो। परंतु दर्शन की सुंदरता इसी में है कि वह विरोध के भीतर भी संवाद खोज लेता है।


उपनिषद् जब कहते हैं “तत्त्वमसि”, तब उनका संकेत शरीर, व्यक्तित्व, नाम, पद, जाति या सामाजिक पहचान की ओर नहीं है। उनका संकेत उस चैतन्य की ओर है जो सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है। वहाँ ‘दूसरा’ वास्तव में दूसरा है ही नहीं। वहाँ द्वैत का अंत हो जाता है। जिस क्षण यह अनुभव हो जाए कि सामने बैठा हुआ व्यक्ति भी उसी चेतना का विस्तार है जिसका मैं हूँ, उसी क्षण ईर्ष्या समाप्त हो जाती है, स्पर्धा समाप्त हो जाती है, भय समाप्त हो जाता है।


सार्त्र के यहाँ समस्या यह है कि मनुष्य स्वयं को केवल बाहरी दृष्टि से पहचानता है। उपनिषद् कहते हैं कि स्वयं को भीतर की दृष्टि से पहचानो। सार्त्र का मनुष्य बाहर की आँखों का कैदी है। उपनिषद् का मनुष्य भीतर के साक्षी का साधक है। यही दोनों परंपराओं का मूल अंतर है।


यदि सार्त्र के पात्रों को किसी ऋषि के आश्रम में बैठा दिया जाए और उनसे केवल इतना कहा जाए कि कुछ क्षण मौन होकर स्वयं को देखो, तो संभव है उनका नरक उसी क्षण टूटने लगे। क्योंकि नरक बाहर के लोगों में नहीं, बाहर पर आधारित पहचान में है। और मुक्ति किसी स्थान विशेष में नहीं, आत्मदर्शन में है।


No Exit हमें यह भी सिखाता है कि मनुष्य अपने कर्मों से अधिक अपने आत्म-प्रवंचनाओं का बंदी होता है। नाटक के तीनों पात्र अपने अपराधों से अधिक उन्हें उचित ठहराने की चेष्टा में उलझे रहते हैं। यह दृश्य किसी अदालत से कम नहीं लगता। अंतर केवल इतना है कि यहाँ न्यायाधीश बाहर नहीं बैठा। अभियुक्त भी वही है, गवाह भी वही है और निर्णय भी उसी को सुनाना है। भारतीय दर्शन में इसे आत्मसाक्षी कहा गया है। मनुष्य संसार को धोखा दे सकता है, अपने परिवार को भी, न्यायालय को भी; किन्तु अपने भीतर बैठे साक्षी को कभी नहीं।


इसीलिए उपनिषद् बार-बार कहते हैं कि सत्य बाहर खोजने की वस्तु नहीं है। जो भीतर है, वही ब्रह्म है। वही आत्मा है। वही वास्तविक अस्तित्व है। जब तक मनुष्य इस सत्य को नहीं पहचानता, तब तक वह हजारों लोगों के बीच रहकर भी अकेला रहेगा। सार्त्र इस अकेलेपन को अस्तित्व की त्रासदी कहते हैं। उपनिषद् उसी अकेलेपन को आत्मबोध की यात्रा बना देते हैं।


मेरे लिए No Exit केवल एक नाटक नहीं, आधुनिक पश्चिमी चिंतन का दर्पण है। और तत्त्वमसि केवल एक वैदिक वाक्य नहीं, मानव सभ्यता के सबसे बड़े उत्तरों में से एक है। एक प्रश्न पूछता है, मैं दूसरों की नज़रों से क्यों जी रहा हूँ? दूसरा उत्तर देता है, क्योंकि अभी तुमने स्वयं को जाना ही नहीं।


शायद इसी कारण इन दोनों को साथ पढ़ना चाहिए। सार्त्र हमें हमारी कैद दिखाते हैं और उपनिषद् उस कैद की चाबी। एक हमें बताता है कि मनुष्य दूसरों की दृष्टि में बंधकर नरक रच लेता है, दूसरा कहता है कि जब तुम सबमें स्वयं को और स्वयं में सबको देख लोगे, तब न कोई दूसरा बचेगा, न कोई नरक।


किताब बंद करने के बाद मेरे मन में केवल एक प्रश्न बचा रहा। यदि वास्तव में “दूसरे लोग ही नरक हैं”, तो फिर ऋषियों ने क्यों कहा कि “तत्त्वमसि”? वर्षों बाद समझ में आया कि दोनों वाक्य अपने-अपने स्तर पर सत्य हैं। जब मैं केवल अहंकार हूँ, तब दूसरा मेरा नरक है। जब मैं आत्मा हूँ, तब दूसरा मैं ही हूँ। मनुष्य का पूरा आध्यात्मिक और दार्शनिक विकास शायद इसी एक यात्रा का नाम है- ‘Hell is other people’ से ‘Tat Tvam Asi’ तक।


✍🏻एमजे 

शनिवार, 1 अगस्त 2026

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं - The Trial


कुछ किताबें धीरे-धीरे हमारे भीतर उतरती हैं और उनके ख़त्म होते होते हमारे ज़हन में उग आता है विचार का एक पौधा , उठता है बेचैनी का एक तूफ़ान और फिर कई दिनों तक आप उस कहानी या विचार सागर में गोता लगाते रहते हैं ।

 फ़्रांज़ काफ्का की “The Trial” मेरे लिए ऐसी ही एक किताब रही। इसे पढ़ते समय कई बार लगा कि मैं किसी उपन्यास के पन्ने नहीं पलट रहा, बल्कि अदालत की एक ऐसी फ़ाइल खोल रहा हूँ जिसमें अभियुक्त का नाम तो लिखा है, पर अपराध का उल्लेख कहीं नहीं है।

मैंने एक वकील के रूप में बहस की है। आरोप तय होते देखे हैं, साक्ष्य प्रस्तुत होते देखे हैं, जिरह सुनी है, निर्णय पढ़े हैं। लेकिन इस किताब ने पहली बार मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि यदि किसी मनुष्य को यह भी न बताया जाए कि उसका अपराध क्या है, तो न्याय का अर्थ क्या रह जाता है?

तो ट्रायल कि कहानी जोसफ नाम के एक आदमी के इर्द गिर्द घूमती है। जोसेफ के. की कहानी एक साधारण सुबह से शुरू होती है। वह जागता है और दो अनजान लोग उसे बताते हैं कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। न हथकड़ी है, न जेल, न कोई एफआईआर, न कोई चार्जशीट। वह अपने दफ़्तर जा सकता है, लोगों से मिल सकता है, अपना काम कर सकता है, लेकिन अब उसका पूरा जीवन एक ऐसे मुक़दमे की छाया में बीतेगा जिसका कारण उसे कभी नहीं बताया जाएगा। यह दृश्य पढ़ते ही मुझे लगा कि शायद काफ्का कहानी नहीं लिख रहे, वे भय का व्याकरण लिख रहे हैं।

कानून का विद्यार्थी इस उपन्यास को पढ़ेगा तो उसे Due Process, Natural Justice, Burden of Proof, Fair Trial और Presumption of Innocence जैसे सिद्धांत बार-बार याद आएँगे। क्योंकि काफ्का का संसार इन्हीं सिद्धांतों की अनुपस्थिति से निर्मित हुआ है। वहाँ अदालत है, लेकिन न्याय नहीं; प्रक्रिया है, लेकिन उद्देश्य नहीं; अधिकारी हैं, लेकिन उत्तरदायित्व नहीं। हर दरवाज़े के पीछे एक और दरवाज़ा है, हर उत्तर के पीछे एक नया प्रश्न।

काफ्का की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पाठक को डराते नहीं हैं। वे केवल एक ऐसी दुनिया बना देते हैं जहाँ धीरे-धीरे साँस लेना कठिन होने लगता है। कोई चीख नहीं सुनाई देती, कोई हिंसा दिखाई नहीं देती, फिर भी एक अदृश्य घुटन हर पन्ने से उठती है। शायद इसी कारण आज “काफ़काई” साहित्यिक विशेषण से ऊपर उठ चुका है। यह उन परिस्थितियों का नाम बन चुका है जहाँ मनुष्य ऐसी व्यवस्था में फँस जाता है जिसकी भाषा वह समझ ही नहीं पाता।

कई बार पुस्तक पढ़ते हुए मुझे भारतीय दर्शन की एक पंक्ति याद आती रही “अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः…”। उपनिषद कहते हैं कि मनुष्य अक्सर उस अज्ञान में जीता है जिसे वह ज्ञान समझ बैठता है….. जोसेफ के. भी लगातार उत्तर खोजता है। वह वकीलों के पास जाता है, अधिकारियों से मिलता है, अदालतों के चक्कर लगाता है, चर्च तक पहुँचता है। उसे लगता है कि अगला दरवाज़ा खुलेगा तो सब स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन हर नया दरवाज़ा उसे और गहरे अँधेरे में ले जाता है। जीवन भी तो कई बार ऐसा ही होता है। हम सोचते हैं कि अगली उपलब्धि, अगला पद, अगली सफलता हमें शांति देगी, लेकिन बेचैनी हमारे साथ ही चलती रहती है।

इस उपन्यास का सबसे मार्मिक पक्ष उसका मौन है। यहाँ संवाद कम हैं, संकेत अधिक हैं। काफ्का पाठक का हाथ पकड़कर निष्कर्ष तक नहीं ले जाते। वे रास्ता दिखाते हैं और फिर अचानक गायब हो जाते हैं। उसके बाद यात्रा आपको अकेले पूरी करनी होती है। यही कारण है कि द ट्रायल हर आयु में अलग अर्थ देती है। बीस वर्ष की उम्र में यह सत्ता के विरुद्ध लिखा उपन्यास लगता है। चालीस की उम्र में यह मनुष्य के भीतर छिपे अपराधबोध की कथा बन जाता है। और जीवन के उत्तरार्ध में यह अस्तित्व के उन प्रश्नों से सामना कराता है जिनका उत्तर शायद किसी न्यायालय के पास भी नहीं है।

काफ्का स्वयं विधि की पढ़ाई कर चुके थे और एक बीमा कार्यालय में कार्यरत थे। उन्होंने नौकरशाही को बहुत निकट से देखा था। शायद इसलिए उनकी कल्पना इतनी विश्वसनीय लगती है। वे जानते थे कि मनुष्य को सबसे अधिक भय उस फ़ाइल से लगता है जो बिना कारण उसके नाम पर खुल जाए।

पुस्तक का अंतिम दृश्य पढ़ते समय भीतर एक अजीब-सी खामोशी उतर आती है। जोसेफ के. का अंत केवल एक पात्र का अंत नहीं है। वह हर उस व्यक्ति की असहायता का प्रतीक है जिसने कभी किसी ऐसी शक्ति के सामने स्वयं को अकेला पाया हो, जिसके सामने तर्क भी छोटे पड़ जाएँ। काफ्का कोई भाषण नहीं देते, कोई क्रांति नहीं कराते, कोई नायक नहीं गढ़ते। वे केवल एक दर्पण सामने रख देते हैं। उस दर्पण में हमें जोसेफ के. दिखाई देता है, लेकिन कुछ देर बाद महसूस होता है कि उसका चेहरा धीरे-धीरे हमारे अपने चेहरे में बदलने लगा है।

शायद महान साहित्य की यही पहचान है। वह पुस्तक समाप्त होने के बाद शुरू होता है। द ट्रायल पढ़कर मेरे मन में सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि क्या हम सब अपने जीवन में भी ऐसे अदृश्य मुक़दमे नहीं लड़ रहे होते, दूसरों की अपेक्षाओं के, समाज की धारणाओं के, अपनी महत्वाकांक्षाओं के और सबसे बढ़कर अपने ही अंतःकरण के? अदालतें उन मुक़दमों का निर्णय सुना सकती हैं जो कानून की पुस्तकों में दर्ज हैं, लेकिन मनुष्य के भीतर चलने वाले मुक़दमों का निर्णय शायद कोई न्यायाधीश कभी नहीं लिख सकता। मेरे देखे काफ्का का द ट्रायल उसी अनलिखे निर्णय का अमर दस्तावेज़ है।

कृष्ण बिहारी याद आते हैं, उनका शेर है -

“ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं ,

और जुर्म क्या है ये पता ही नहीं “


✍🏻एमजे