
सार्त्र से मेरा परिचय बहुत पुराना है। जब मैं शायद क्लास इलेवेंथ में था, हरिवंश राय बच्चन जी ने मेरा परिचय सार्त्र से करवाया था। उनकी रचनाओं में कहीं सार्त्र का ज़िक्र आया और मैं लग गया उसकी खोज में। जो पहली किताब पढ़ी वो थी “बीइंग एंड नथिंगनेस” आज भी उसको समझने की कोशिश कर रहा हूँ, उस पर फिर कभी बात करेंगे । आज बात है सार्त्र की ही एक दूसरी किताब के बारे में जिसका नाम है No Exit । आकार में छोटी, पात्रों में सीमित, मंच पर लगभग स्थिर, किन्तु विचारों में इतनी विशाल कि उसे पढ़ लेने के बाद मनुष्य कुछ समय तक स्वयं से बच नहीं पाता। पहली बार जब यह नाटक मेरे हाथ में आया तो मुझे लगा कि शायद यह किसी साधारण मनोवैज्ञानिक नाटक की तरह होगा। लेकिन कुछ ही पृष्ठों के भीतर यह स्पष्ट हो गया कि यहाँ कहानी कम है, मनुष्य का अनावरण अधिक है। सार्त्र ने इस नाटक में न कोई युद्ध दिखाया, न कोई रक्तपात, न कोई दैत्य। उन्होंने केवल तीन मनुष्यों को एक कमरे में बैठा दिया और संसार के सबसे गहरे नरक की रचना कर दी।
हम बचपन से सुनते आए हैं कि नरक अग्नि से भरा होता है, वहाँ यातनाएँ होती हैं, दंड होता है, चीखें होती हैं। सार्त्र इस पूरी कल्पना को एक झटके में उलट देते हैं। उनके यहाँ न आग है, न शैतान, न लोहे की जंजीरें। केवल एक बंद कमरा है, तीन कुर्सियाँ हैं और तीन ऐसे व्यक्ति हैं जो अपने अतीत से भागना चाहते हैं, किन्तु एक-दूसरे की उपस्थिति उन्हें लगातार उनके वास्तविक स्वरूप का सामना कराती रहती है। यही वह स्थान है जहाँ सार्त्र का प्रसिद्ध वाक्य जन्म लेता है- “Hell is other people.” पहली दृष्टि में यह वाक्य मनुष्य-विरोधी लगता है, किन्तु थोड़ा ठहरकर देखें तो पता चलता है कि सार्त्र मनुष्यों से नहीं, मनुष्य की उस प्रवृत्ति से संघर्ष कर रहे हैं जिसमें वह स्वयं को दूसरों की आँखों में खोजने लगता है। जब हमारा अस्तित्व हमारे अपने विवेक के स्थान पर दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर हो जाता है, तब हम अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं। वही क्षण नरक का आरंभ है।
मनुष्य का सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं; संकट यह है कि धीरे-धीरे वह स्वयं भी अपने बारे में वही सोचने लगता है जो लोग उसके बारे में सोचते हैं। यही No Exit का सबसे गहरा मनोवैज्ञानिक बिंदु है। हम अपने जीवन में कितने ही निर्णय इसलिए नहीं लेते क्योंकि समाज क्या कहेगा। कितने ही लोग अपनी प्रतिभा का गला घोंट देते हैं क्योंकि परिवार की अपेक्षाएँ अलग हैं। कितने ही संबंध केवल इसलिए ढोए जाते हैं कि लोग क्या सोचेंगे। सार्त्र का कमरा वास्तव में हमारे भीतर का वही कमरा है जहाँ हम हर समय अदृश्य दर्शकों से घिरे रहते हैं।
लेकिन यहीं से भारतीय दर्शन का द्वार खुलता है। उपनिषद् का महावाक्य कहता है- “तत्त्वमसि”। अर्थात् तू वही है। पहली दृष्टि में लगता है कि सार्त्र और उपनिषद् दो विपरीत दिशाओं में खड़े हैं। एक कह रहा है कि दूसरा मनुष्य नरक है, दूसरा कह रहा है कि वही दूसरा तुम स्वयं हो। परंतु दर्शन की सुंदरता इसी में है कि वह विरोध के भीतर भी संवाद खोज लेता है।
उपनिषद् जब कहते हैं “तत्त्वमसि”, तब उनका संकेत शरीर, व्यक्तित्व, नाम, पद, जाति या सामाजिक पहचान की ओर नहीं है। उनका संकेत उस चैतन्य की ओर है जो सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है। वहाँ ‘दूसरा’ वास्तव में दूसरा है ही नहीं। वहाँ द्वैत का अंत हो जाता है। जिस क्षण यह अनुभव हो जाए कि सामने बैठा हुआ व्यक्ति भी उसी चेतना का विस्तार है जिसका मैं हूँ, उसी क्षण ईर्ष्या समाप्त हो जाती है, स्पर्धा समाप्त हो जाती है, भय समाप्त हो जाता है।
सार्त्र के यहाँ समस्या यह है कि मनुष्य स्वयं को केवल बाहरी दृष्टि से पहचानता है। उपनिषद् कहते हैं कि स्वयं को भीतर की दृष्टि से पहचानो। सार्त्र का मनुष्य बाहर की आँखों का कैदी है। उपनिषद् का मनुष्य भीतर के साक्षी का साधक है। यही दोनों परंपराओं का मूल अंतर है।
यदि सार्त्र के पात्रों को किसी ऋषि के आश्रम में बैठा दिया जाए और उनसे केवल इतना कहा जाए कि कुछ क्षण मौन होकर स्वयं को देखो, तो संभव है उनका नरक उसी क्षण टूटने लगे। क्योंकि नरक बाहर के लोगों में नहीं, बाहर पर आधारित पहचान में है। और मुक्ति किसी स्थान विशेष में नहीं, आत्मदर्शन में है।
No Exit हमें यह भी सिखाता है कि मनुष्य अपने कर्मों से अधिक अपने आत्म-प्रवंचनाओं का बंदी होता है। नाटक के तीनों पात्र अपने अपराधों से अधिक उन्हें उचित ठहराने की चेष्टा में उलझे रहते हैं। यह दृश्य किसी अदालत से कम नहीं लगता। अंतर केवल इतना है कि यहाँ न्यायाधीश बाहर नहीं बैठा। अभियुक्त भी वही है, गवाह भी वही है और निर्णय भी उसी को सुनाना है। भारतीय दर्शन में इसे आत्मसाक्षी कहा गया है। मनुष्य संसार को धोखा दे सकता है, अपने परिवार को भी, न्यायालय को भी; किन्तु अपने भीतर बैठे साक्षी को कभी नहीं।
इसीलिए उपनिषद् बार-बार कहते हैं कि सत्य बाहर खोजने की वस्तु नहीं है। जो भीतर है, वही ब्रह्म है। वही आत्मा है। वही वास्तविक अस्तित्व है। जब तक मनुष्य इस सत्य को नहीं पहचानता, तब तक वह हजारों लोगों के बीच रहकर भी अकेला रहेगा। सार्त्र इस अकेलेपन को अस्तित्व की त्रासदी कहते हैं। उपनिषद् उसी अकेलेपन को आत्मबोध की यात्रा बना देते हैं।
मेरे लिए No Exit केवल एक नाटक नहीं, आधुनिक पश्चिमी चिंतन का दर्पण है। और तत्त्वमसि केवल एक वैदिक वाक्य नहीं, मानव सभ्यता के सबसे बड़े उत्तरों में से एक है। एक प्रश्न पूछता है, मैं दूसरों की नज़रों से क्यों जी रहा हूँ? दूसरा उत्तर देता है, क्योंकि अभी तुमने स्वयं को जाना ही नहीं।
शायद इसी कारण इन दोनों को साथ पढ़ना चाहिए। सार्त्र हमें हमारी कैद दिखाते हैं और उपनिषद् उस कैद की चाबी। एक हमें बताता है कि मनुष्य दूसरों की दृष्टि में बंधकर नरक रच लेता है, दूसरा कहता है कि जब तुम सबमें स्वयं को और स्वयं में सबको देख लोगे, तब न कोई दूसरा बचेगा, न कोई नरक।
किताब बंद करने के बाद मेरे मन में केवल एक प्रश्न बचा रहा। यदि वास्तव में “दूसरे लोग ही नरक हैं”, तो फिर ऋषियों ने क्यों कहा कि “तत्त्वमसि”? वर्षों बाद समझ में आया कि दोनों वाक्य अपने-अपने स्तर पर सत्य हैं। जब मैं केवल अहंकार हूँ, तब दूसरा मेरा नरक है। जब मैं आत्मा हूँ, तब दूसरा मैं ही हूँ। मनुष्य का पूरा आध्यात्मिक और दार्शनिक विकास शायद इसी एक यात्रा का नाम है- ‘Hell is other people’ से ‘Tat Tvam Asi’ तक।
✍🏻एमजे



