
तो आज बात करेंगे फुटबॉल की, हम सब ने बचपन में शायद पहला खेल जो खेला है वो फुटबॉल ही होगा , अगर किसी खेल ने मेरे बचपन को भी सबसे ज़्यादा रंग दिया है, तो वह फुटबॉल ही है।
आज जब फीफा वर्ल्ड कप 2026 समाप्त हो चुका है, तो उसकी तस्वीरों के साथ अनायास बचपन की वे दोपहरें लौट आती हैं, जब हमारे लिए फुटबॉल स्कूल की छुट्टी मिलते ही शुरू हो जाने वाला उत्सव था।
स्कूल में जब कभी अचानक छुट्टी हो जाती थी, किसी की मृत्यु के कारण, किसी प्रशासनिक वजह से या फिर किसी ऐसी अनूठी परिस्थिति में जिसका हमें पहले से अंदाज़ा नहीं होता था, तो दूसरे बच्चों के लिए वह छुट्टी होती थी, हमारे लिए वह मैच का ऐलान होता था।
बैग क्लास में ही पटक देते थे और सीधे मैदान की ओर भाग जाते थे। बारिश हो रही है, मैदान में पानी भरा है, कपड़े गंदे होंगे या घर पहुँचकर डाँट पड़ेगी, इन बातों का उस समय कोई मतलब नहीं था। बल्कि मैदान में जितना अधिक कीचड़ होता था, खेल उतना ही यादगार बन जाता था।
हमारे पास महँगे स्टड्स, ब्रांडेड जर्सी, घास से चमकते मैदान या प्रशिक्षित कोच नहीं थे। दो ईंटें रखकर गोलपोस्ट बन जाता था। कई बार गेंद की आधी हवा निकली होती थी, फिर भी खेल पूरा होता था ।
कभी गेंद सीमा से बाहर चली गई तो बहस शुरू हो जाती थी कि थ्रो-इन किसे मिलेगा। कभी किसी ने हाथ लगा दिया तो आधे खिलाड़ी हैंडबॉल चिल्लाते थे और बाकी आधे कहते थे, “जानबूझकर थोड़ी लगाया है!” फिर देर तक बहस ।
कई बार गोल हुआ या नहीं, इसका फैसला गेंद से नहीं, आवाज़ की ताकत से होता था। जिस टीम के खिलाड़ी ज़्यादा ज़ोर से चिल्ला दिए, उसका दावा थोड़ा मज़बूत हो जाता था।
घुटने छिलते थे, कपड़े कीचड़ से भर जाते थे, कोई फिसलकर गिरता था तो पहले सब हँसते थे और फिर हाथ पकड़कर उठा देते थे। शायद वहीं फुटबॉल ने जीवन का पहला बड़ा पाठ सिखाया,
गिरना खेल का अंत नहीं होता; पड़े रहना खेल का अंत होता है।
एक बात और थी।
जब गेंद किसी एक खिलाड़ी के पैरों में होती थी, तो पूरे मैदान की निगाह उसी पर टिक जाती थी। तभी शायद पहली बार मुझे ये समझ आया कि ज़िम्मेदारी हमेशा उसी के हिस्से आती है, जिसके पास गेंद होती है।
जीवन भी कुछ ऐसा ही है। अवसर आपके पास हो, तो निर्णय भी आपको ही लेना पड़ेगा। आप गेंद किसी और को पास कर सकते हैं, लेकिन कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब गोलपोस्ट सामने होता है और निर्णय आपके अपने पैर को लेना पड़ता है।
कक्षा नौवीं तक आते-आते फुटबॉल धीरे-धीरे पीछे छूट गया और मैंने बास्केटबॉल को अपना लिया। बास्केटबॉल में गति थी, छलाँग थी, तालमेल था और बहुत तेज़ निर्णय लेने पड़ते थे। फिर ग्यारहवीं के बाद क्रिकेट ने लगभग सारे खेलों की जगह ले ली। उसके बाद फुटबॉल नहीं खेला, लेकिन कीचड़ में खेली गई उस फुटबॉल की मिट्टी शायद मन से कभी नहीं उतरी।
दिलचस्प बात यह है कि मैंने 2026 से पहले कभी फुटबॉल वर्ल्ड कप को गंभीरता से फ़ॉलो नहीं किया। न मैंने माराडोना के दौर को समझकर देखा, न ज़िदान की कला को, न मेस्सी और रोनाल्डो की पूरी प्रतिद्वंद्विता को बैठकर जिया।
घर में भी इन दिनों फुटबॉल का ख़ूब बुखार रहा। मेरे बेटे ने रोनाल्डो की जर्सी मँगवाई। मज़े की बात यह है कि वह मेस्सी का प्रशंसक भी है। रोनाल्डो की टीम फ़ाइनल तक नहीं पहुँची, लेकिन उसे कोई ग़म नहीं था। उसकी खुशी का कारण बिल्कुल साफ़ था “रोनाल्डो नहीं पहुँचा तो क्या हुआ, मेस्सी तो पहुँच गया!”
बच्चों का दिल शायद हमसे अधिक उदार होता है। हम बड़े लोग अक्सर किसी एक महानता को स्वीकार करने के लिए दूसरी महानता को छोटा करना चाहते हैं। बच्चे रोनाल्डो की मेहनत और मेस्सी की कला, दोनों से एक साथ प्रेम कर सकते हैं।
मेस्सी को खेलते हुए देखकर मुझे बार-बार लगता है कि कुछ खिलाड़ी गेंद को केवल आगे बढ़ाते हैं, लेकिन कुछ खिलाड़ी गेंद से बातें करते हैं। मेस्सी की सबसे बड़ी ताक़त केवल उनकी गति नहीं है। उनकी असली कला यह है कि वे गेंद प्राप्त करने से पहले ही अगला दृश्य देख लेते हैं। वे खाली जगह को वहाँ देख लेते हैं, जहाँ सामान्य दर्शक को केवल खिलाड़ियों की भीड़ दिखाई देती है।
सेमीफ़ाइनल में इंग्लैंड के विरुद्ध अर्जेंटीना एक समय पीछे था। खेल के अंतिम हिस्से तक इंग्लैंड 1–0 से आगे चल रहा था, लेकिन अर्जेंटीना ने अंतिम मिनटों में अविश्वसनीय वापसी की। एंज़ो फर्नांडेज़ ने 85वें मिनट में बराबरी का गोल किया और फिर इंजरी टाइम में लाउतारो मार्टिनेज़ के गोल ने अर्जेंटीना को 2–1 की जीत के साथ फ़ाइनल में पहुँचा दिया। मेस्सी उस मैच में गोल करने वाले खिलाड़ी नहीं थे, लेकिन महान खिलाड़ी का प्रभाव हमेशा स्कोरशीट पर ही दर्ज हो, यह ज़रूरी तो नहीं । कई बार उसकी उपस्थिति ही विरोधी टीम की रचना बदल देती है।
दो डिफ़ेंडर उसकी ओर खिंचते हैं और किसी तीसरे खिलाड़ी के लिए जगह बन जाती है। वह गेंद को एक कपल अधिक रोकता है और उसी एक पल में पूरी डिफ़ेंसिव लाइन अपनी जगह खो देती है। मेरे देखे कुछ कलाएँ संख्या में नहीं आतीं।
जैसे किसी अच्छे शिक्षक की भूमिका केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि उसने कितने पन्ने पढ़ाए; कभी-कभी उसने किसी विद्यार्थी के भीतर प्रश्न पूछने का साहस पैदा किया होता है।
फ़ाइनल में अर्जेंटीना के सामने स्पेन था, एक ऐसी टीम जिसने पूरे टूर्नामेंट में गेंद पर नियंत्रण, धैर्य, और अनुशासन अद्भुत प्रदर्शन किया। स्पेन ने फ़ाइनल में अर्जेंटीना को लगातार दबाव में रखा। निर्धारित समय तक कोई गोल नहीं हुआ, इसलिए मुकाबला एक्स्ट्रा टाइम में गया।
फिर 106वें मिनट में वह क्षण आया जिसने पूरा इतिहास बदल दिया। पेद्रो पोरो की ओर से आई गेंद को निको विलियम्स ने आगे पहुँचाया और फेरान टोरेस ने उसे गोल में बदल दिया। स्पेन 1–0 से आगे हो गया। अर्जेंटीना ने आख़िरी प्रयास किए, लेकिन स्पेन का डिफेंस नहीं टूटा । इसी गोल के साथ स्पेन ने दूसरी बार फीफा वर्ल्ड कप जीत लिया और अर्जेंटीना का लगातार दूसरा विश्व खिताब जीतने का सपना अधूरा रह गया।
फ़ाइनल में मेस्सी का जादू वैसा नहीं चल सका, जिसकी उनके प्रशंसकों को उम्मीद थी। स्पेन ने उनको खेलने की जगह ही नहीं दी । जैसे ही गेंद मेस्सी तक पहुँचती, स्पेन के खिलाड़ी उनके विकल्प बंद कर देते। महानतम कलाकार भी तभी चित्र बना सकता है, जब कैनवास पर थोड़ी जगह बची हो। स्पेन ने उस रात मेस्सी को वही जगह नहीं दी।
लेकिन शायद महानता का अर्थ हर कहानी का सुखद अंत होना भी नहीं है। हम अक्सर मान लेते हैं कि महान व्यक्ति की यात्रा का अंत भी महान विजय में होना चाहिए। जबकि जीवन ऐसा कोई वादा नहीं करता।
जीवन और खेल की सबसे कठोर सच्चाई यही है कि हर खिलाड़ी को एक दिन मैदान से बाहर जाना होता है ।
गेंद आपके पास आएगी और चली जाएगी। कभी आपका पास सही होगा, कभी गेंद छिन जाएगी। कभी आपका शॉट गोलपोस्ट से टकराकर भीतर चला जाएगा और कभी वही गेंद एक इंच बाहर निकल जाएगी। जो भी हो आपको सफलता का गोल करने के लिए कभी भी मन माफिक माहौल नहीं मिलेगा आपके आसपास के लोग ही गेंद छीनने का प्रयास करते रहेंगे। बावजूद इसके अगर मैदान में उतरे हो तो खेलना तो होगा।
✍🏻एमजे

