Diary Ke Panne

रविवार, 6 सितंबर 2026

सोलिप्सिज़्म……



आज यूँ ही एकांत के किसी बहुत शांत क्षण में मेरे मन के भीतर एक विचित्र प्रश्न जन्म लेता है, जिस संसार को मैं देख रहा हूँ, क्या वह सचमुच वैसा ही है जैसा मुझे दिखाई देता है? जिन लोगों से मैं प्रेम करता हूँ, जिनसे संवाद करता हूँ, जिनके सुख-दुःख को महसूस करता हूँ, क्या उनका अस्तित्व मेरे अनुभव से स्वतंत्र भी है? यह आकाश, ये वृक्ष, ये रास्ते, यह भीड़, ये संबंध, यह पूरा संसार क्या ये सब मेरे बाहर घट रही वास्तविकताएँ हैं, या मैं केवल अपनी ही चेतना में उपस्थित अनुभवों को संसार का नाम दे रहा हूँ?


ख्याल बहुत गहरे हो गए मैं उतरता चला गया और फिर जैसे ही मैं उस विचार के विशाल भंवर से बाहर निकला मैंने गूगल बाबा से पूछा क्या ये विचार पहले किसी को आया है क्या किसी ने इस तरह पहले चिंतन किया हुआ है यदि हाँ तो उसके बारे में बताओ.. बाबा ही ने उत्तर दिया - “वत्स इस  विचार को solipsism, अर्थात् सोलिप्सिज़्म कहते हैं । इसका मूल आग्रह यह नहीं है कि संसार निश्चित रूप से अस्तित्वहीन है, बल्कि यह है कि जिस एक अस्तित्व के प्रति मैं प्रत्यक्ष रूप से आश्वस्त हो सकता हूँ, वह मेरी अपनी चेतना है। संसार के बारे में मुझे जो कुछ भी ज्ञात है, अंततः वह मेरी चेतना के द्वार से होकर ही मेरे पास आता है। मैंने सूर्य को अपनी दृष्टि से देखा है, संगीत को अपने कानों से सुना है, पीड़ा को अपनी अनुभूति में जाना है और प्रेम को भी अपने भीतर ही अनुभव किया है। यहाँ तक कि किसी दूसरे व्यक्ति की चेतना का अनुमान भी मैं उसके शब्दों, व्यवहार और अभिव्यक्तियों से लगाता हूँ; मैं उसकी चेतना में सीधे प्रवेश नहीं कर सकता।” 


अब मेरे विचार और तीखे होने लगते हैं - मैं सोचता हूँ यदि मेरे प्रत्येक प्रमाण का अंतिम स्थान मेरी चेतना ही है, तो मैं अपनी चेतना के बाहर स्थित किसी वस्तु की स्वतंत्र वास्तविकता को पूर्ण निश्चितता के साथ कैसे प्रमाणित करूँ?


लेकिन यहीं एक सावधानी आवश्यक है। सोलिप्सिज़्म को सीधे भारतीय अद्वैत वेदान्त या उपनिषदों का सिद्धांत मान लेना दार्शनिक रूप से उचित नहीं होगा। दोनों के प्रश्न कभी-कभी एक-दूसरे के बहुत निकट दिखाई देते हैं, पर उनके निष्कर्षों में गहरा अंतर है। पश्चिमी सोलिप्सिज़्म जहाँ कभी-कभी विचार को इस संभावना तक ले जाता है कि “केवल मेरा मन ही निश्चित है”, वहीं उपनिषदों की यात्रा “मेरा” को बचाने की नहीं, बल्कि उसी “मैं” की सीमाओं को तोड़ने की यात्रा है।


उपनिषद पूछते हैं- जिसे तुम “मैं” कहते हो, वह वास्तव में कौन है?


क्या तुम शरीर हो? शरीर तो बचपन से युवावस्था और युवावस्था से वृद्धावस्था तक बदलता रहता है। क्या तुम विचार हो? विचार तो प्रत्येक क्षण आते-जाते रहते हैं। क्या तुम स्मृतियाँ हो? स्मृतियाँ धुँधली पड़ सकती हैं। क्या तुम भावनाएँ हो? क्रोध आता है और चला जाता है, दुःख आता है और चला जाता है, प्रसन्नता आती है और चली जाती है। फिर वह कौन है जो इन सभी परिवर्तनों को जान रहा है? वह कौन है जो कहता है “मेरे भीतर विचार आया”, “मुझे क्रोध आया”, “मैं दुःखी था”, “अब मैं प्रसन्न हूँ”?


उपनिषदों की दृष्टि इसी “जानने वाले” की ओर मुड़ती है। बृहदारण्यक उपनिषद का प्रसिद्ध “नेति, नेति” यह नहीं, यह नहीं मानो मनुष्य से कहता है कि स्वयं को उन वस्तुओं से अलग करके देखो जिन्हें तुम देख सकते हो, जान सकते हो, अनुभव कर सकते हो। जो दिखाई दे रहा है वह दृश्य है; प्रश्न उस द्रष्टा का है जो उसे देख रहा है। जो विचार बनकर उपस्थित हो रहा है वह भी ज्ञेय है; प्रश्न उस ज्ञाता का है जो विचार को जान रहा है।


और तब भारतीय दर्शन एक अद्भुत मोड़ लेता है। साधारण मनुष्य कहता है“मैं संसार को देख रहा हूँ।” सोलिप्सिज़्म पूछता है, “क्या संसार मेरे देखने से स्वतंत्र भी है?” लेकिन उपनिषद पूछते हैं, “पहले यह बताओ कि यह ‘मैं’ कौन है जो संसार को देख रहा है?” यही अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।


छान्दोग्य उपनिषद का महावाक्य “तत्त्वमसि” “तुम वही हो”व्यक्तिगत अहंकार को ब्रह्मांड का स्वामी घोषित नहीं करता। उसका आशय यह नहीं कि “सिर्फ मैं हूँ और बाकी सब मेरी कल्पना है।” इसके विपरीत, वह सीमित व्यक्तिगत पहचान को विस्तृत करता है। वह कहता है कि तुम्हारे अस्तित्व की सबसे गहरी वास्तविकता उस परम वास्तविकता से पृथक नहीं है जो समस्त अस्तित्व का आधार है।


बृहदारण्यक उपनिषद का “अहं ब्रह्मास्मि” मैं ब्रह्म हूँ, भी यदि अहंकार से पढ़ा जाए तो उसका अर्थ पूरी तरह बिगड़ जाता है। यहाँ “अहं” उस सामाजिक व्यक्ति का अहंकार नहीं है जो कहे कि संसार में केवल मैं महत्वपूर्ण हूँ। यहाँ तो जिस क्षण ब्रह्म का बोध होता है, उसी क्षण सीमित अहंकार का सिंहासन टूटने लगता है। बूंद यह घोषणा नहीं करती कि समुद्र केवल मेरी कल्पना है; वह पहचानती है कि उसकी वास्तविक प्रकृति समुद्र से पृथक नहीं।


इसीलिए Solipsism और Advaita Vedanta को एक मान लेना एक आकर्षक किंतु गंभीर भूल होगी। Solipsism का चरम रूप कह सकता है “केवल मेरी चेतना का अस्तित्व सुनिश्चित है।” अद्वैत का बोध कहता है, “जिसे तुम अपनी निजी चेतना समझ रहे हो, उसकी अंतिम वास्तविकता निजी नहीं है।”


एक में “मैं” के बाहर संसार संदिग्ध हो सकता है; दूसरे में “मैं” और “संसार” का अंतिम द्वैत ही प्रश्न के घेरे में आ जाता है।


माण्डूक्य उपनिषद इस चर्चा को और अधिक रहस्यमय गहराई देता है। वह चेतना की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं पर विचार करता है और फिर “तुरीय” की ओर संकेत करता है। जाग्रत अवस्था में हमें बाहरी संसार अत्यंत ठोस लगता है। स्वप्न में भी, जब तक स्वप्न चल रहा होता है, उसका संसार वास्तविक प्रतीत होता है। वहाँ लोग होते हैं, भय होता है, दौड़ना होता है, प्रेम होता है, मृत्यु तक हो सकती है। लेकिन जागने के बाद हमें ज्ञात होता है कि वह पूरा अनुभव चेतना में घट रहा था।


यहीं से भारतीय दर्शन एक असाधारण प्रश्न उठाता है, यदि स्वप्न के भीतर रहते हुए स्वप्न हमें वास्तविक लगता था, तो जाग्रत संसार की वास्तविकता के बारे में हमारी निश्चितता का आधार क्या है?


इसका अर्थ यह नहीं कि उपनिषद सरलता से कह देते हैं कि जाग्रत संसार एक स्वप्न है और उसका कोई अस्तित्व नहीं। प्रश्न अधिक सूक्ष्म है। वे हमारी उस सहज धारणा को चुनौती देते हैं जिसके अनुसार “जो मुझे दिखाई दे रहा है, वही अंतिम सत्य है।”


आदि शंकराचार्य की अद्वैत परंपरा में “माया” की अवधारणा इसी संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। माया का अर्थ केवल जादू या यह कहना नहीं है कि संसार बिल्कुल है ही नहीं। अद्वैत की दृष्टि में अनुभव का संसार व्यवहार के स्तर पर उपस्थित है; हम उसमें चलते हैं, निर्णय लेते हैं, धर्म-अधर्म का विचार करते हैं, पीड़ा अनुभव करते हैं और अपने कर्मों के परिणामों से गुजरते हैं। परंतु यह परम सत्य नहीं है। रस्सी को अंधेरे में साँप समझ लेने का प्रसिद्ध उदाहरण इसी बात को समझाता है। साँप का भय अनुभव के स्तर पर वास्तविक हो सकता है हृदय की गति बढ़ सकती है, शरीर काँप सकता है….लेकिन ज्ञान होने पर पता चलता है कि जिस आधार पर साँप आरोपित था, वह रस्सी थी।


अर्थात् भ्रम पूर्ण शून्यता पर खड़ा नहीं होता; उसके पीछे कोई अधिष्ठान होता है। यहाँ भारतीय अद्वैत और Solipsism के बीच फिर एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। सोलिप्सिज़्म का प्रश्न हो सकता है, “क्या बाहर का संसार मेरे मन का निर्माण है?” अद्वैत पूछता है, “वह कौन-सी अंतिम सत्ता है जिसके कारण मन, जगत और अनुभव तीनों संभव हैं?”


और उत्तर किसी व्यक्तिगत मन में नहीं, ब्रह्म में खोजा जाता है। यह विचार गौड़पाद के माण्डूक्यकारिका में और भी गहरा रूप ग्रहण करता है। उनके अजातीवाद में उत्पत्ति के हमारे सामान्य विचार तक को चुनौती मिलती है। हम संसार को घटनाओं, कारणों, जन्म और विनाश की शृंखला के रूप में देखते हैं; किंतु परम दृष्टि से वास्तविकता को इस परिवर्तनशीलता के भीतर बाँधना पर्याप्त नहीं। यह दर्शन साधारण बुद्धि को असुविधा में डालता है, क्योंकि साधारण बुद्धि वस्तुओं की दुनिया में सहज है; उसे “यह वस्तु कहाँ से आई?” पूछना आता है, पर “अस्तित्व स्वयं क्या है?” पूछना कठिन लगता है।


केन उपनिषद का प्रश्न इसी रहस्य को छूता है मन किसके द्वारा प्रेरित होकर सोचता है? वाणी किसके कारण बोलती है? आँख के देखने के पीछे कौन-सी सत्ता है? यह खोज हमें वस्तुओं से हटाकर उस चेतना की ओर ले जाती है जिसके कारण वस्तुओं का अनुभव संभव होता है।


यहाँ पहुँचकर दर्शन जीवन से जुड़ जाता है। हम सामान्यतः अपने पूरे जीवन को बाहर की वस्तुओं को व्यवस्थित करने में लगा देते हैं। बेहतर घर, बेहतर पद, अधिक प्रतिष्ठा, अधिक प्रशंसा, अधिक नियंत्रण। हमें लगता है कि संसार थोड़ा और हमारे अनुकूल हो जाए तो हम शांत हो जाएँगे। लेकिन उपनिषद दिशा उलट देते हैं। वे पूछते हैं, जिस व्यक्ति के लिए तुम पूरा संसार व्यवस्थित करने में लगे हो, क्या तुमने कभी उस व्यक्ति को जाना है?


यहीं सोलिप्सिज़्म का बौद्धिक संदेह और उपनिषदों का आत्मान्वेषण कुछ क्षणों के लिए एक ही द्वार पर खड़े दिखाई देते हैं। दोनों हमारी सहज निश्चितताओं को हिलाते हैं। दोनों पूछते हैं कि अनुभव और वास्तविकता के बीच संबंध क्या है। दोनों चेतना की केंद्रीयता की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। लेकिन द्वार के बाद दोनों की राह अलग हो जाती है।


सोलिप्सिज़्म में यदि सावधानी न रखी जाए तो व्यक्ति एक दार्शनिक एकांत में पहुँच सकता है, “शायद केवल मैं हूँ।” उपनिषदों में आत्मान्वेषण अपनी पूर्णता पर इसके ठीक विपरीत अनुभव की ओर संकेत करता है, “केवल यह छोटा-सा ‘मैं’ नहीं हूँ।”


वहाँ अलगाव नहीं, अभेद की अनुभूति है। ईशावास्य उपनिषद की दृष्टि में जो व्यक्ति समस्त प्राणियों को आत्मा में और आत्मा को समस्त प्राणियों में देखता है, उसके लिए घृणा और अलगाव का आधार ही बदल जाता है। यह विचार अद्वैत को केवल Metaphysics नहीं रहने देता; उससे Ethics भी निकलती है। यदि दूसरा पूरी तरह “पराया” नहीं है, तो दूसरे को चोट पहुँचाने का अर्थ क्या है? यदि अस्तित्व की गहराई में विभाजन उतना अंतिम नहीं जितना सतह पर दिखाई देता है, तो करुणा केवल नैतिक आदेश नहीं रहती; वह ज्ञान का स्वाभाविक परिणाम बन सकती है।


लेकिन अंतिम सत्य ये है कि यदि एक दिन तुम्हारी सारी उपाधियाँ, सारे संबंध, सारी स्मृतियाँ, सारी उपलब्धियाँ और वे सारी पहचानें जिनसे तुम स्वयं को परिभाषित करते आए हो, एक-एक करके हटा दी जाएँगी और वस्तुतः कुछ भी शेष नहीं बचेगा । और यदि कुछ बचेगा तो वो क्या है ??


अब सर फटने को है, तो यहीं रोकता हूँ इस आलेख को? कुछ सूझे तो कमेंट में लिख कर बताना ।



✍🏻एमजे 

शनिवार, 5 सितंबर 2026

शिष्य हो जाना….


प्यारे साथियों ,


कल शिक्षक दिवस बीता है, सैकड़ों हज़ारों मेसेज और संदेश विभिन्न सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से मुझ तक पहुँचे हैं। आपके शिष्यत्व प्रेम से वशीभूत होकर यह आलेख लिख रहा हूँ.. अंत तक पढ़ना और अपने विचार ज़रूर कमेंट सेक्शन में लिखते जाना… शुरू करते हैं:- 


तो मेरे देखे आज के दौर की सबसे बड़ी विडंबना शायद यह है कि हर व्यक्ति गुरु हो जाना चाहता है, पर शिष्य होने को कोई तैयार नहीं।


हर किसी के पास सलाह है, निष्कर्ष हैं, उत्तर हैं। हर कोई किसी को कुछ सिखाना चाहता है। लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हैं जो शांत होकर कह सकें  “मुझे नहीं पता… मुझे सिखाइए।” और शायद यहीं से वास्तविक ज्ञान की यात्रा शुरू होती है। गुरु होना एक भूमिका हो सकती है, लेकिन शिष्य होना एक भाव है। एक ऐसा भाव जिसमें मनुष्य अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि अपने अज्ञान को स्वीकार करने का साहस करता है।


शिष्य होने का अर्थ किसी व्यक्ति के सामने छोटा हो जाना नहीं है। शिष्य होने का अर्थ है, अपने अहंकार से बड़ा हो जाना। जिस दिन हमें यह भ्रम हो जाता है कि अब हम जान गए हैं, उसी दिन सीखने के सारे दरवाज़े धीरे-धीरे बंद होने लगते हैं। और जिस दिन हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि अभी बहुत कुछ जानना शेष है, उसी दिन पूरी दुनिया हमारी पाठशाला बन जाती है।


फिर शिक्षक केवल किसी आसन पर बैठा व्यक्ति नहीं रहता।

एक बच्चा भी शिक्षक हो सकता है,

एक पराजय भी,

एक आलोचना भी,

एक गलत निर्णय भी,

एक कठिन समय भी,

और कभी-कभी वह व्यक्ति भी जिसे हमने जीवन भर अपने से कमतर समझा।


शिष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि वह गुरु की हर बात मानता है; बल्कि यह है कि वह हर अनुभव से कुछ ग्रहण करना जानता है।


नदी इसलिए समुद्र तक पहुँचती है क्योंकि वह नीचे की ओर बहने में अपना अपमान नहीं समझती। बीज इसलिए वृक्ष बनता है क्योंकि वह पहले मिट्टी में दब जाना स्वीकार करता है। और मनुष्य भी शायद तभी विराट होता है, जब वह कुछ समय के लिए अपने भीतर के “मैं जानता हूँ” को शांत कर देता है।


आज ज्ञान की कमी नहीं है। किताबें हैं, इंटरनेट है, मंच हैं, वक्ता हैं, सूचनाओं का अथाह समुद्र है। कमी यदि किसी चीज़ की है, तो वह है ग्रहणशीलता की।


हम सुनते कम हैं, उत्तर देने की तैयारी अधिक करते हैं। पढ़ते कम हैं, मत अधिक बनाते हैं। समझते कम हैं, निर्णय अधिक सुनाते हैं। ऐसे समय में शिष्य बने रहना अपने आप में एक साधना है।


शिष्य होना झुकना है

पर टूटना नहीं।

प्रश्न करना है

पर अहंकार से नहीं।

असहमति रखना है

पर सीखने के द्वार बंद किए बिना।

ज्ञान प्राप्त करना है

पर ज्ञान का अभिमान प्राप्त किए बिना।


और शायद जीवन की सबसे सुंदर अवस्था वही है जहाँ वर्षों का अनुभव होने के बाद भी मनुष्य के भीतर यह वाक्य जीवित रहे


“मैं अभी भी सीख रहा हूँ।”


क्योंकि जिस व्यक्ति के भीतर शिष्य जीवित है,

उसके भीतर विकास की संभावना जीवित है।


गुरु बनने की आकांक्षा आपको मंच तक पहुँचा सकती है,

लेकिन शिष्य बने रहने की विनम्रता आपको ऊँचाई तक पहुँचाती है। इसलिए जीवन में इतना मत सीख लेना कि सीखना ही भूल जाओ। पद बढ़े, प्रतिष्ठा बढ़े, उम्र बढ़े, अनुभव बढ़े

लेकिन भीतर बैठा वह जिज्ञासु शिष्य कभी बूढ़ा न हो।


क्योंकि अंततः-  जिस दिन मनुष्य के भीतर का शिष्य मर जाता है, उसी दिन उसके भीतर का वास्तविक गुरु भी मरने लगता है।

और जिस व्यक्ति ने जीवन भर शिष्य बने रहने की कला सीख ली,

उसे गुरु बनने की घोषणा कभी करनी ही नहीं पड़ती एक दिन उसका जीवन स्वयं उसकी गुरुता का प्रमाण बन जाता है।


आप अपने भीतर का शिष्य अमर रहे , सफल हो , स्वस्थ रहे और समृद्धि के नित नए सोपानों को पार करते रहें, इन्हीं भावों के साथ शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं :)


✍🏻एमजे 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

क्या है से क्या चाहिए तक….The Great Paradox


                           Pic Courtesy : Google 


कुछ कहानियाँ हम देखते हैं और भूल जाते हैं। कुछ कहानियाँ हमारे भीतर थोड़ी देर ठहरती हैं। और कभी-कभी किसी कहानी में एक छोटा-सा दृश्य, एक वाक्य, एक प्रतीक ऐसा मिल जाता है जो फिल्म समाप्त होने के बाद भी हमारा पीछा नहीं छोड़ता। हाल ही में Odyssey देखते हुए मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ। कहानी आगे बढ़ गई, दृश्य बदल गए, लेकिन Odysseus और सायरंस वाला प्रसंग मेरे भीतर कहीं अटक गया। शायद इसलिए कि मुझे लगा यह समुद्र में भटकते किसी प्राचीन यूनानी योद्धा की कहानी भर नहीं है। कहीं न कहीं यह हम सबकी कहानी है।


Odysseus युद्ध जीत चुका है। लेकिन युद्ध जीत लेना और घर पहुँच जाना दो अलग-अलग बातें हैं। वह अपने साथियों के साथ समुद्र के रास्ते अपने घर लौट रहा है। रास्ते में उसे एक ऐसे समुद्री क्षेत्र से गुजरना है जहाँ सायरंस रहती हैं। Greek mythology में सायरंस का असली हथियार उनकी आवाज़ थी। कहा जाता था कि उनका गीत इतना आकर्षक होता था कि उसे सुनने वाला नाविक अपना विवेक खो बैठता, जहाज और साथियों को भूल जाता और उस आवाज़ की ओर बढ़ते-बढ़ते अपनी मृत्यु तक पहुँच जाता।


इस खतरे से बचने के लिए Odysseus अपने साथियों के कानों में वैक्स लगवा देता है ताकि वे सायरंस की आवाज़ सुन ही न सकें। लेकिन स्वयं वह उस गीत को सुनना चाहता है। शायद मनुष्य के भीतर यह जिज्ञासा हमेशा रही है, जिस चीज से पूरी दुनिया आपको बचने को कह रही हो, एक बार उसे जानने की इच्छा और अधिक तीव्र हो जाती है।


लेकिन यहीं Odysseus एक असाधारण काम करता है। वह अपने साथियों से कहता है, मुझे जहाज के मास्ट से मजबूती से बाँध देना। और जब सायरंस का गीत सुनकर मैं तुमसे मुझे खोलने की प्रार्थना करूँ, चीखूँ, आदेश दूँ, गिड़गिड़ाऊँ, तब भी मुझे मत खोलना।


मुझे इस दृश्य की सबसे खूबसूरत बात यह लगी कि Odysseus को अपने साहस पर भरोसा था, लेकिन उसने अपने भविष्य के विवेक पर भरोसा नहीं किया। वह जानता था कि आज जो व्यक्ति निर्णय ले रहा है, सायरंस का गीत सुनने के बाद शायद वही व्यक्ति नहीं रहेगा। इसलिए उसने टेम्पटेशन आने के बाद उससे लड़ने की योजना नहीं बनाई; उसने पहले ही अपने लिए एक सीमा तय कर दी। यही बात मुझे देर तक सोचने पर मजबूर करती रही।


हम अक्सर अपने जीवन में यह मानकर चलते हैं कि जब कठिन समय आएगा, तब हम सही निर्णय ले लेंगे। जब टेम्टेशंस आएगी, तब खुद को रोक लेंगे। लेकिन शायद मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह अपने कमजोर क्षणों में भी स्वयं को उतना ही समझदार समझता है जितना वह अपने मजबूत क्षणों में होता है।


Odysseus ने ऐसा नहीं किया। उसने अपने मजबूत क्षण में अपने कमजोर क्षण के लिए निर्णय ले लिया। यही इस पूरे प्रसंग का वह अर्थ है जिसने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया।


सायरंस का गीत केवल किसी नई और खूबसूरत चीज का प्रलोभन नहीं है। हमारे जीवन में कई बार सबसे खतरनाक Siren वह होती है जो हमें किसी ऐसी चीज की ओर वापस बुलाती है जिसे हम कभी बहुत चाहते थे, जो कभी हमारी थी, लेकिन अब हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है। कोई बीता हुआ समय। कोई अधूरा सपना। कोई खोया हुआ अवसर। कभी-कभी तो हमारा अपना ही पुराना वर्शन।


मनुष्य केवल भविष्य के पीछे भागते हुए नहीं डूबता। कई बार वह अतीत तक वापस तैरने की कोशिश करते हुए भी डूब जाता है। और शायद इसीलिए सायरंस का रूपक इतना शक्तिशाली है। समुद्र आगे की ओर जा रहा है, जहाज घर की ओर बढ़ रहा है, लेकिन आवाज़ पीछे से बुला रही है।


जीवन में भी कितनी बार ऐसा होता है। हम जानते हैं कि हमें आगे जाना है, लेकिन कोई स्मृति हमें पीछे बुलाती रहती है। हम जानते हैं कि कोई अध्याय समाप्त हो चुका है, फिर भी मन उसके अंतिम पन्ने को बार-बार खोलता है। हम जानते हैं कि कुछ लोग, कुछ जगहें और कुछ समय वापस नहीं आते, लेकिन मन उनके लौट आने की संभावना से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाता।


Odysseus history का पहला आदमी बन जाता है, जिसने सायरंस के गीत सुने और सुनने के बाद भी जिंदा रहा। और बाद में जब वो उन गीतों को अपने लोगों से साझा करता है ना उफ्फ! उसने कहा सायरंस का गीत कहता है - 

“ what you most want is 

what you most can't have and 

what you most can't have 

is what you already had.”


अर्थात् यह कि आप जिस चीज़ को सबसे ज़्यादा चाहते हो वो वही है जो आपको कभी नहीं मिल सकता….. क्यूँकि जो आपको कभी नहीं मिल सकता वो वही चीज़ है जो कभी आपके पास थी….. अहा! कितनी गहरी बात! कितना शानदार रूपक!….  इसका मतलब ये भी है कि जो आपके पास है उसे सम्भालिए, बहुत कुछ बहुमूल्य हम सभी के पास होता है, हमेशा बस देखने के लिए नज़र और नज़रिया चाहिए। 


और यहीं Odysseus हमें एक बहुत साधारण लेकिन गहरी बात सिखाता है, हर मनुष्य को अपने जीवन में कोई न कोई मास्ट चाहिए। कोई ऐसी चीज जिससे वह स्वयं को तब बाँध सके जब उसका अपना मन उसके विरुद्ध हो जाए।


किसी के लिए वह उसका परिवार हो सकता है। किसी के लिए उसका उद्देश्य। किसी के लिए उसका प्रोफेशन, डिसिप्लिन, फेथ, कोई रेस्पोंसिबिलिटी या वर्षों से बनाया हुआ कोई सपना। मेरे लिए हमेशा परिवार, लिखना , अध्ययन और अपने विद्यार्थियों के प्रति मेरी जिम्मेदारी ऐसे ही एंकर्स रहे हैं। जीवन में ऐसे समय भी आए जब मन ने बहुत-सी दिशाओं में जाने को कहा, लेकिन कुछ जिम्मेदारियाँ थीं जिन्होंने मुझे वहीं रोके रखा जहाँ मुझे होना चाहिए था। बाद में समझ आया कि कई बार जिन्हें हम बंधन समझते हैं, वही हमें डूबने से बचा रहे होते हैं।


उम्र के साथ मैंने एक बात और सीखी है- डिसिप्लिन का अर्थ यह नहीं कि आपके भीतर टेम्प्टेशंस समाप्त हो गई है। डिसिप्लिन का अर्थ है कि आपने टेम्प्टेशंस आने से पहले यह तय कर लिया है कि उसके आने पर आप क्या करेंगे।


इसीलिए कुछ निर्णय भावनाओं के बीच नहीं लिए जाने चाहिए। वे पहले लिए जाने चाहिए। जब मन शांत हो, तब तय कर लीजिए कि आपकी सीमाएँ क्या हैं। जब संबंध अच्छे चल रहे हों, तब तय कीजिए कि आपके जीवन मूल्य क्या हैं। जब पैसा पर्याप्त हो, तब तय कीजिए कि आपकी इंटीग्रिटी की कीमत क्या है। जब करियर ठीक चल रहा हो, तब तय कीजिए कि सफलता के लिए आप कौन-सा रास्ता कभी नहीं अपनाएँगे। और जब जीवन शांत हो, तभी तय कर लीजिए कि तूफान आने पर आप किस चीज को पकड़कर खड़े रहेंगे।


क्योंकि तूफान के बीच फिलोसफी याद नहीं आती। उस समय केवल वह मास्ट काम आता है जिससे आपने स्वयं को पहले से बाँध रखा हो।


अब इस प्रश्न का उत्तर खोजिए - जब कभी जीवन में सायरंस मुझे बुलाएँगी, तब मेरा मास्ट क्या होगा?


✍🏻एमजे