Diary Ke Panne

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

The hell is other people


सार्त्र से मेरा परिचय बहुत पुराना है। जब मैं शायद क्लास इलेवेंथ में था, हरिवंश राय बच्चन जी ने मेरा परिचय सार्त्र से करवाया था। उनकी रचनाओं में कहीं सार्त्र का ज़िक्र आया और मैं लग गया उसकी खोज में। जो पहली किताब पढ़ी वो थी “बीइंग एंड नथिंगनेस” आज भी उसको समझने की कोशिश कर रहा हूँ, उस पर फिर कभी बात करेंगे । आज बात है सार्त्र की ही एक दूसरी किताब के बारे में जिसका नाम है No Exit । आकार में छोटी, पात्रों में सीमित, मंच पर लगभग स्थिर, किन्तु विचारों में इतनी विशाल कि उसे पढ़ लेने के बाद मनुष्य कुछ समय तक स्वयं से बच नहीं पाता। पहली बार जब यह नाटक मेरे हाथ में आया तो मुझे लगा कि शायद यह किसी साधारण मनोवैज्ञानिक नाटक की तरह होगा। लेकिन कुछ ही पृष्ठों के भीतर यह स्पष्ट हो गया कि यहाँ कहानी कम है, मनुष्य का अनावरण अधिक है। सार्त्र ने इस नाटक में न कोई युद्ध दिखाया, न कोई रक्तपात, न कोई दैत्य। उन्होंने केवल तीन मनुष्यों को एक कमरे में बैठा दिया और संसार के सबसे गहरे नरक की रचना कर दी।


हम बचपन से सुनते आए हैं कि नरक अग्नि से भरा होता है, वहाँ यातनाएँ होती हैं, दंड होता है, चीखें होती हैं। सार्त्र इस पूरी कल्पना को एक झटके में उलट देते हैं। उनके यहाँ न आग है, न शैतान, न लोहे की जंजीरें। केवल एक बंद कमरा है, तीन कुर्सियाँ हैं और तीन ऐसे व्यक्ति हैं जो अपने अतीत से भागना चाहते हैं, किन्तु एक-दूसरे की उपस्थिति उन्हें लगातार उनके वास्तविक स्वरूप का सामना कराती रहती है। यही वह स्थान है जहाँ सार्त्र का प्रसिद्ध वाक्य जन्म लेता है-  “Hell is other people.” पहली दृष्टि में यह वाक्य मनुष्य-विरोधी लगता है, किन्तु थोड़ा ठहरकर देखें तो पता चलता है कि सार्त्र मनुष्यों से नहीं, मनुष्य की उस प्रवृत्ति से संघर्ष कर रहे हैं जिसमें वह स्वयं को दूसरों की आँखों में खोजने लगता है। जब हमारा अस्तित्व हमारे अपने विवेक के स्थान पर दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर हो जाता है, तब हम अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं। वही क्षण नरक का आरंभ है।


मनुष्य का सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं; संकट यह है कि धीरे-धीरे वह स्वयं भी अपने बारे में वही सोचने लगता है जो लोग उसके बारे में सोचते हैं। यही No Exit का सबसे गहरा मनोवैज्ञानिक बिंदु है। हम अपने जीवन में कितने ही निर्णय इसलिए नहीं लेते क्योंकि समाज क्या कहेगा। कितने ही लोग अपनी प्रतिभा का गला घोंट देते हैं क्योंकि परिवार की अपेक्षाएँ अलग हैं। कितने ही संबंध केवल इसलिए ढोए जाते हैं कि लोग क्या सोचेंगे। सार्त्र का कमरा वास्तव में हमारे भीतर का वही कमरा है जहाँ हम हर समय अदृश्य दर्शकों से घिरे रहते हैं।


लेकिन यहीं से भारतीय दर्शन का द्वार खुलता है। उपनिषद् का महावाक्य कहता है- “तत्त्वमसि”। अर्थात् तू वही है। पहली दृष्टि में लगता है कि सार्त्र और उपनिषद् दो विपरीत दिशाओं में खड़े हैं। एक कह रहा है कि दूसरा मनुष्य नरक है, दूसरा कह रहा है कि वही दूसरा तुम स्वयं हो। परंतु दर्शन की सुंदरता इसी में है कि वह विरोध के भीतर भी संवाद खोज लेता है।


उपनिषद् जब कहते हैं “तत्त्वमसि”, तब उनका संकेत शरीर, व्यक्तित्व, नाम, पद, जाति या सामाजिक पहचान की ओर नहीं है। उनका संकेत उस चैतन्य की ओर है जो सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है। वहाँ ‘दूसरा’ वास्तव में दूसरा है ही नहीं। वहाँ द्वैत का अंत हो जाता है। जिस क्षण यह अनुभव हो जाए कि सामने बैठा हुआ व्यक्ति भी उसी चेतना का विस्तार है जिसका मैं हूँ, उसी क्षण ईर्ष्या समाप्त हो जाती है, स्पर्धा समाप्त हो जाती है, भय समाप्त हो जाता है।


सार्त्र के यहाँ समस्या यह है कि मनुष्य स्वयं को केवल बाहरी दृष्टि से पहचानता है। उपनिषद् कहते हैं कि स्वयं को भीतर की दृष्टि से पहचानो। सार्त्र का मनुष्य बाहर की आँखों का कैदी है। उपनिषद् का मनुष्य भीतर के साक्षी का साधक है। यही दोनों परंपराओं का मूल अंतर है।


यदि सार्त्र के पात्रों को किसी ऋषि के आश्रम में बैठा दिया जाए और उनसे केवल इतना कहा जाए कि कुछ क्षण मौन होकर स्वयं को देखो, तो संभव है उनका नरक उसी क्षण टूटने लगे। क्योंकि नरक बाहर के लोगों में नहीं, बाहर पर आधारित पहचान में है। और मुक्ति किसी स्थान विशेष में नहीं, आत्मदर्शन में है।


No Exit हमें यह भी सिखाता है कि मनुष्य अपने कर्मों से अधिक अपने आत्म-प्रवंचनाओं का बंदी होता है। नाटक के तीनों पात्र अपने अपराधों से अधिक उन्हें उचित ठहराने की चेष्टा में उलझे रहते हैं। यह दृश्य किसी अदालत से कम नहीं लगता। अंतर केवल इतना है कि यहाँ न्यायाधीश बाहर नहीं बैठा। अभियुक्त भी वही है, गवाह भी वही है और निर्णय भी उसी को सुनाना है। भारतीय दर्शन में इसे आत्मसाक्षी कहा गया है। मनुष्य संसार को धोखा दे सकता है, अपने परिवार को भी, न्यायालय को भी; किन्तु अपने भीतर बैठे साक्षी को कभी नहीं।


इसीलिए उपनिषद् बार-बार कहते हैं कि सत्य बाहर खोजने की वस्तु नहीं है। जो भीतर है, वही ब्रह्म है। वही आत्मा है। वही वास्तविक अस्तित्व है। जब तक मनुष्य इस सत्य को नहीं पहचानता, तब तक वह हजारों लोगों के बीच रहकर भी अकेला रहेगा। सार्त्र इस अकेलेपन को अस्तित्व की त्रासदी कहते हैं। उपनिषद् उसी अकेलेपन को आत्मबोध की यात्रा बना देते हैं।


मेरे लिए No Exit केवल एक नाटक नहीं, आधुनिक पश्चिमी चिंतन का दर्पण है। और तत्त्वमसि केवल एक वैदिक वाक्य नहीं, मानव सभ्यता के सबसे बड़े उत्तरों में से एक है। एक प्रश्न पूछता है, मैं दूसरों की नज़रों से क्यों जी रहा हूँ? दूसरा उत्तर देता है, क्योंकि अभी तुमने स्वयं को जाना ही नहीं।


शायद इसी कारण इन दोनों को साथ पढ़ना चाहिए। सार्त्र हमें हमारी कैद दिखाते हैं और उपनिषद् उस कैद की चाबी। एक हमें बताता है कि मनुष्य दूसरों की दृष्टि में बंधकर नरक रच लेता है, दूसरा कहता है कि जब तुम सबमें स्वयं को और स्वयं में सबको देख लोगे, तब न कोई दूसरा बचेगा, न कोई नरक।


किताब बंद करने के बाद मेरे मन में केवल एक प्रश्न बचा रहा। यदि वास्तव में “दूसरे लोग ही नरक हैं”, तो फिर ऋषियों ने क्यों कहा कि “तत्त्वमसि”? वर्षों बाद समझ में आया कि दोनों वाक्य अपने-अपने स्तर पर सत्य हैं। जब मैं केवल अहंकार हूँ, तब दूसरा मेरा नरक है। जब मैं आत्मा हूँ, तब दूसरा मैं ही हूँ। मनुष्य का पूरा आध्यात्मिक और दार्शनिक विकास शायद इसी एक यात्रा का नाम है- ‘Hell is other people’ से ‘Tat Tvam Asi’ तक।


✍🏻एमजे 

शनिवार, 1 अगस्त 2026

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं - The Trial


कुछ किताबें धीरे-धीरे हमारे भीतर उतरती हैं और उनके ख़त्म होते होते हमारे ज़हन में उग आता है विचार का एक पौधा , उठता है बेचैनी का एक तूफ़ान और फिर कई दिनों तक आप उस कहानी या विचार सागर में गोता लगाते रहते हैं ।

 फ़्रांज़ काफ्का की “The Trial” मेरे लिए ऐसी ही एक किताब रही। इसे पढ़ते समय कई बार लगा कि मैं किसी उपन्यास के पन्ने नहीं पलट रहा, बल्कि अदालत की एक ऐसी फ़ाइल खोल रहा हूँ जिसमें अभियुक्त का नाम तो लिखा है, पर अपराध का उल्लेख कहीं नहीं है।

मैंने एक वकील के रूप में बहस की है। आरोप तय होते देखे हैं, साक्ष्य प्रस्तुत होते देखे हैं, जिरह सुनी है, निर्णय पढ़े हैं। लेकिन इस किताब ने पहली बार मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि यदि किसी मनुष्य को यह भी न बताया जाए कि उसका अपराध क्या है, तो न्याय का अर्थ क्या रह जाता है?

तो ट्रायल कि कहानी जोसफ नाम के एक आदमी के इर्द गिर्द घूमती है। जोसेफ के. की कहानी एक साधारण सुबह से शुरू होती है। वह जागता है और दो अनजान लोग उसे बताते हैं कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। न हथकड़ी है, न जेल, न कोई एफआईआर, न कोई चार्जशीट। वह अपने दफ़्तर जा सकता है, लोगों से मिल सकता है, अपना काम कर सकता है, लेकिन अब उसका पूरा जीवन एक ऐसे मुक़दमे की छाया में बीतेगा जिसका कारण उसे कभी नहीं बताया जाएगा। यह दृश्य पढ़ते ही मुझे लगा कि शायद काफ्का कहानी नहीं लिख रहे, वे भय का व्याकरण लिख रहे हैं।

कानून का विद्यार्थी इस उपन्यास को पढ़ेगा तो उसे Due Process, Natural Justice, Burden of Proof, Fair Trial और Presumption of Innocence जैसे सिद्धांत बार-बार याद आएँगे। क्योंकि काफ्का का संसार इन्हीं सिद्धांतों की अनुपस्थिति से निर्मित हुआ है। वहाँ अदालत है, लेकिन न्याय नहीं; प्रक्रिया है, लेकिन उद्देश्य नहीं; अधिकारी हैं, लेकिन उत्तरदायित्व नहीं। हर दरवाज़े के पीछे एक और दरवाज़ा है, हर उत्तर के पीछे एक नया प्रश्न।

काफ्का की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पाठक को डराते नहीं हैं। वे केवल एक ऐसी दुनिया बना देते हैं जहाँ धीरे-धीरे साँस लेना कठिन होने लगता है। कोई चीख नहीं सुनाई देती, कोई हिंसा दिखाई नहीं देती, फिर भी एक अदृश्य घुटन हर पन्ने से उठती है। शायद इसी कारण आज “काफ़काई” साहित्यिक विशेषण से ऊपर उठ चुका है। यह उन परिस्थितियों का नाम बन चुका है जहाँ मनुष्य ऐसी व्यवस्था में फँस जाता है जिसकी भाषा वह समझ ही नहीं पाता।

कई बार पुस्तक पढ़ते हुए मुझे भारतीय दर्शन की एक पंक्ति याद आती रही “अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः…”। उपनिषद कहते हैं कि मनुष्य अक्सर उस अज्ञान में जीता है जिसे वह ज्ञान समझ बैठता है….. जोसेफ के. भी लगातार उत्तर खोजता है। वह वकीलों के पास जाता है, अधिकारियों से मिलता है, अदालतों के चक्कर लगाता है, चर्च तक पहुँचता है। उसे लगता है कि अगला दरवाज़ा खुलेगा तो सब स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन हर नया दरवाज़ा उसे और गहरे अँधेरे में ले जाता है। जीवन भी तो कई बार ऐसा ही होता है। हम सोचते हैं कि अगली उपलब्धि, अगला पद, अगली सफलता हमें शांति देगी, लेकिन बेचैनी हमारे साथ ही चलती रहती है।

इस उपन्यास का सबसे मार्मिक पक्ष उसका मौन है। यहाँ संवाद कम हैं, संकेत अधिक हैं। काफ्का पाठक का हाथ पकड़कर निष्कर्ष तक नहीं ले जाते। वे रास्ता दिखाते हैं और फिर अचानक गायब हो जाते हैं। उसके बाद यात्रा आपको अकेले पूरी करनी होती है। यही कारण है कि द ट्रायल हर आयु में अलग अर्थ देती है। बीस वर्ष की उम्र में यह सत्ता के विरुद्ध लिखा उपन्यास लगता है। चालीस की उम्र में यह मनुष्य के भीतर छिपे अपराधबोध की कथा बन जाता है। और जीवन के उत्तरार्ध में यह अस्तित्व के उन प्रश्नों से सामना कराता है जिनका उत्तर शायद किसी न्यायालय के पास भी नहीं है।

काफ्का स्वयं विधि की पढ़ाई कर चुके थे और एक बीमा कार्यालय में कार्यरत थे। उन्होंने नौकरशाही को बहुत निकट से देखा था। शायद इसलिए उनकी कल्पना इतनी विश्वसनीय लगती है। वे जानते थे कि मनुष्य को सबसे अधिक भय उस फ़ाइल से लगता है जो बिना कारण उसके नाम पर खुल जाए।

पुस्तक का अंतिम दृश्य पढ़ते समय भीतर एक अजीब-सी खामोशी उतर आती है। जोसेफ के. का अंत केवल एक पात्र का अंत नहीं है। वह हर उस व्यक्ति की असहायता का प्रतीक है जिसने कभी किसी ऐसी शक्ति के सामने स्वयं को अकेला पाया हो, जिसके सामने तर्क भी छोटे पड़ जाएँ। काफ्का कोई भाषण नहीं देते, कोई क्रांति नहीं कराते, कोई नायक नहीं गढ़ते। वे केवल एक दर्पण सामने रख देते हैं। उस दर्पण में हमें जोसेफ के. दिखाई देता है, लेकिन कुछ देर बाद महसूस होता है कि उसका चेहरा धीरे-धीरे हमारे अपने चेहरे में बदलने लगा है।

शायद महान साहित्य की यही पहचान है। वह पुस्तक समाप्त होने के बाद शुरू होता है। द ट्रायल पढ़कर मेरे मन में सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि क्या हम सब अपने जीवन में भी ऐसे अदृश्य मुक़दमे नहीं लड़ रहे होते, दूसरों की अपेक्षाओं के, समाज की धारणाओं के, अपनी महत्वाकांक्षाओं के और सबसे बढ़कर अपने ही अंतःकरण के? अदालतें उन मुक़दमों का निर्णय सुना सकती हैं जो कानून की पुस्तकों में दर्ज हैं, लेकिन मनुष्य के भीतर चलने वाले मुक़दमों का निर्णय शायद कोई न्यायाधीश कभी नहीं लिख सकता। मेरे देखे काफ्का का द ट्रायल उसी अनलिखे निर्णय का अमर दस्तावेज़ है।

कृष्ण बिहारी याद आते हैं, उनका शेर है -

“ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं ,

और जुर्म क्या है ये पता ही नहीं “


✍🏻एमजे 




सोमवार, 27 जुलाई 2026

Metamorphosis


कुछ किताबें पढ़ी नहीं जातीं, वे भीतर उतर जाती हैं। वे कहानी के रूप में शुरू होती हैं, लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते आपका परिचय आपसे ही करा देती हैं। Franz Kafka की Metamorphosis मेरे लिए ऐसी ही पुस्तक रही है ।


जब मैंने पहली बार यह उपन्यासिका पढ़ी थी, तब मुझे लगा कि यह एक अजीब-सी फैंटेसी है, एक आदमी एक सुबह उठता है और देखता है कि वह एक विशाल कीड़े में बदल चुका है। बस इतनी-सी बात? क्या इसी पर दुनिया भर के विश्वविद्यालय शोध करते हैं? क्या इसी के लिए इसे विश्व साहित्य की महानतम कृतियों में गिना जाता है?


लेकिन मेरे देखे काफ्का को समझने के लिए मौन को पढ़ना पड़ता है। ग्रेगर साम्सा की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं थी कि वह कीड़ा बन गया। सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उसके बदल जाने के बाद सबसे पहले उसके अपने लोग बदल गए।


जब तक वह कमाने वाला बेटा था, घर का देवता था। जिस दिन वह उपयोगी नहीं रहा, उसी दिन वह घर के लिए बोझ बन गया। यह दृश्य पढ़ते हुए मुझे भारतीय दर्शन का एक पुराना वाक्य याद आया- 


“संसार का अधिकांश प्रेम उपयोगिता पर टिका होता है, अस्तित्व पर नहीं।”


काफ्का शायद यही कहना चाहते थे कि मनुष्य की पहचान उसके होने से कम, उसके काम आने से अधिक तय होती है। यहीं मुझे भगवद्गीता का निष्काम कर्म याद आया। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्म करो, किंतु अपनी पहचान कर्मफल से मत जोड़ो। क्योंकि जिस दिन तुम्हारी पहचान केवल उपलब्धियों पर टिक जाएगी, उस दिन उपलब्धियाँ छिनते ही तुम स्वयं भी खो जाओगे।


ग्रेगर की समस्या उसका कीड़ा बनना नहीं थी। उसकी समस्या यह थी कि उसकी पूरी पहचान केवल “कमाने वाले बेटे” की थी। जैसे ही वह भूमिका समाप्त हुई, उसके अस्तित्व का मूल्य भी समाप्त कर दिया गया।


आज सोचिए… यदि किसी दिन आपका पद छिन जाए, व्यवसाय बंद हो जाए, नौकरी चली जाए, सोशल मीडिया के सारे फ़ॉलोअर्स गायब हो जाएँ, क्या तब भी लोग आपको उसी सम्मान से देखेंगे?


शायद उत्तर है नहीं । यदि उत्तर “नहीं” है, तो हम सब कहीं-न-कहीं ग्रेगर साम्सा ही हैं। काफ्का का साहित्य यहीं भयावह हो जाता है। वह किसी राक्षस की कहानी नहीं लिखते। वह आईना लिखते हैं। क्यूँकि ग्रेगर उस माँ को को कहते हुए सुनता है , वो माँ जिसे अपने बेटे से बेहद प्रेम था एक दिन अपने पति और बेटी से कह रही होती है कि हमें कब इस कीड़े से निजात मिलेगी। 


मुझे अल्बेयर कामू का Absurdism याद आता है। कामू कहते थे कि संसार अर्थ देने के लिए बाध्य नहीं है। अर्थ हमें स्वयं गढ़ना पड़ता है। काफ्का इससे भी एक कदम आगे जाते हैं। वे दिखाते हैं कि कई बार संसार आपको अर्थ गढ़ने का अवसर भी नहीं देता; वह पहले ही आपको एक फ़ाइल, एक कर्मचारी, एक नंबर या एक उपयोगिता में बदल चुका होता है।


और यह केवल साहित्य नहीं है। कॉरपोरेट दफ़्तरों में, न्यायालयों में, विश्वविद्यालयों में, राजनीति में, कितने ही लोग अपने नाम से नहीं, अपनी भूमिका से पहचाने जाते हैं।


“वह जज है।” “वह प्रोफेसर है।” “वह सीईओ है।” लेकिन कोई यह नहीं पूछता, “वह इंसान कैसा है?


लेकिन आधुनिक सभ्यता और रोज़ मर्रा की उठापटक ने ने हमें भीतर से इतना व्यस्त बना दिया है कि हम स्वयं से मिल ही नहीं पाते। और जिनके पास फुर्सत है उनको उनका ख़ुद का दिमाग़ ही खाए जा रहा है ।


Metamorphosis केवल एक मनुष्य के कीड़ा बनने की कथा नहीं है। यह हर उस क्षण की कहानी है, जब समाज किसी व्यक्ति को उसकी मानवता से वंचित कर केवल उसकी उपयोगिता से मापने लगता है। 


आज Artificial Intelligence के युग में सबसे बड़ा प्रश्न यही है, यदि मशीनें हमारा अधिकांश काम करने लगें, तो क्या हमारी कीमत भी घट जाएगी? यदि मनुष्य का मूल्य केवल उसकी उत्पादकता है, तो मशीनें जीत जाएँगी। लेकिन यदि मनुष्य का मूल्य उसकी संवेदना, करुणा, कल्पना और आत्मबोध है, तो कोई मशीन कभी मनुष्य का स्थान नहीं ले सकती।


शायद इसी कारण Metamorphosis आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 1915 में थी। 


मुझे याद है किताब पढ़ कर बंद करने के बाद मैं कई दिनों तक ये सोचता रहा था कि हम सब अपने-अपने जीवन में किसी-न-किसी रूपांतरण से गुजरते हैं। उम्र बदलती है, रिश्ते बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं। प्रश्न यह नहीं कि परिवर्तन होगा या नहीं। प्रश्न यह है- जब सब बदल जाएगा, तब भी हमारे आसपास के लोग हमें इंसान ही समझेंगे ? काफ्का ने इस प्रश्न का उत्तर “नहीं” में दिया है।


बेहद डार्क और अब्सर्ड है काफ़्का की ये लेखनी, बिल्कुल जीवन की तरह ।


✍🏻एमजे 

रविवार, 26 जुलाई 2026

होमर की महान रचना - ओडिसी

हाल ही में श्रीमती जी के साथ क्रिस्टोफर नोलन की The Odyssey देखी। क्रिस्टोफर नोलन सिनेमा के महान चित्रकार हैं। उनसे बेहतर इस विधा को कहने वाला मेरी नज़र में कोई दूसरा नहीं। थिएटर से लौटते समय बार-बार एक ही विचार मन में आ रहा था, मनुष्य बदल जाता है, साम्राज्य मिट जाते हैं, भाषाएँ बदल जाती हैं, लेकिन अच्छी कहानियों की उम्र शायद समय से भी अधिक होती है।


लगभग अट्ठाईस सौ वर्ष पहले एजियन सागर के किनारे एक कवि ने एक कहानी कही थी। आज उसी कहानी को IMAX के विशाल पर्दे पर बैठकर दुनिया सुन रही है। यदि यह कला की अमरता नहीं है, तो फिर अमरता किसे कहेंगे?


होमर… इतिहास आज भी उनके बारे में अंतिम निर्णय नहीं दे पाया है। कुछ विद्वान कहते हैं कि वे एक अंधे कवि थे। कुछ कहते हैं कि “होमर” कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों तक चली मौखिक परंपरा का नाम है। लेकिन इससे क्या फ़र्क पड़ता है? शेक्सपियर को भी लेकर विवाद हैं, व्यास को लेकर भी हैं। लेखक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसकी रचना होती है।


माना जाता है कि Odyssey लगभग आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व लिखी गई। सोचिए, जब भारत में उपनिषदों की गूँज आकार ले रही थी, तब भूमध्यसागर के किनारे कोई मनुष्य घर लौटने की सबसे महान कथा लिख रहा था।


मेरे हाथ Odyssey वर्षों पहले लगी थी। कानून की किताबें पढ़ते-पढ़ते आदत बन गई थी कि बीच-बीच में इतिहास, दर्शन और साहित्य भी पढ़ा जाए। एक दिन विश्व साहित्य के खंड में यह पुस्तक मिल गई। मुझे लगा होगा, कोई युद्ध कथा होगी, कोई राजा होगा, तलवारें होंगी, विजय होगी। लेकिन कुछ अध्याय पढ़ने के बाद समझ आया कि यह युद्ध जीतने वाले आदमी की कहानी नहीं है; यह युद्ध के बाद भी इंसान बने रहने वाले आदमी की कहानी है।


उस समय एक बात ने मुझे भीतर तक चौंकाया था। हम बचपन से सीखते हैं कि नायक सबसे शक्तिशाली होता है। लेकिन ओडीसियस की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भुजाएँ नहीं थीं। उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी, धैर्य। वह जानता था कि कब लड़ना है, कब छिपना है, कब चुप रहना है और कब अपना नाम भी नहीं बताना है।


कानून पढ़ने वाले विद्यार्थियों को यह बात विशेष रूप से समझनी चाहिए। हर मुक़दमा अदालत में बहस से नहीं जीता जाता। कई मुक़दमे सही समय की प्रतीक्षा से जीते जाते हैं। यही बात जीवन के हर युद्ध पर लागू होती है।


शायद इसीलिए मुझे Odyssey हमेशा एक महाकाव्य से अधिक मनोविज्ञान की पुस्तक लगी। नोलन ने इस कठिनाई को समझा है। होमर की सबसे बड़ी चुनौती युद्ध नहीं थी; मनुष्य का मन था। और नोलन की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उन्होंने उस मन को दृश्य दे दिया।


फ़िल्म में कई संवाद देर तक साथ रहते हैं। वे ऐसे संवाद नहीं हैं जिन पर लोग सीटियाँ बजाएँ। वे ऐसे संवाद हैं जिन्हें सुनकर कुछ क्षण के लिए मनुष्य अपने भीतर चला जाता है। जैसे ओडिसियस जब अपने बेटे से पहली बार मिलता है तो उसका बेटा पूछता है आप कौन हैं ? आपकी आँखों में देवताओं सी चमक है। ओडिसियस जवाब देते हैं- मनुष्यों में देवताओं को मत ढूँढो निराशा हाथ लगेगी। 


और मेरा फेवरेट दृश्य, जिसकी चर्चा किए बिना यह लेख अधूरा रहेगा, वह है, धनुष परीक्षा।


मैंने वह प्रसंग पुस्तक में पढ़ा था। पढ़ते समय रोमांच हुआ था। लेकिन पर्दे पर उसे देखना एक अलग अनुभव था।


सैकड़ों लोग, एक धनुष, असफल होते योद्धा और भीड़ के बीच एक साधारण-सा दिखने वाला अजनबी।


दृश्य इतना शांत रखा गया है कि आपको लगता है जैसे पूरा सभागार साँस रोककर बैठा है। वह अजनबी बिना किसी प्रदर्शन के धनुष उठाता है। कोई वीरता का भाषण नहीं। कोई अनावश्यक नाटकीयता नहीं। केवल एक सहज गति… प्रत्यंचा चढ़ती है… और तीर अपने नियत मार्ग पर निकल जाता है।


उसी क्षण पहचान लौट आती है। ये तो ओडिसियस है, महान योद्धा। जीवन में हमें भी बार-बार अपना परिचय देना पड़े तो ये एक बेकार और सतही जीवन हुआ लेकिन एक सही क्षण, एक सही कर्म और वर्षों के संदेह समाप्त हो जाएँ तो बात बने। 


नोलन ने इस दृश्य को जितने संयम से रचा है, वही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।


और फिर संगीत… लुडविग गोरानसन  ने क्या कमाल का बैकग्राउंड स्कोर दिया है , जो मन के आकाश में देर तक गुंजायमान होता रहता है। यदि आपने कभी समुद्र को ध्यान से सुना हो, तो आप जानते होंगे कि उसकी आवाज़ में एक साथ भय भी होता है और आकर्षण भी। फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर बार-बार वही अनुभव कराता है। कहीं वह लहरों जैसा लगता है, कहीं किसी सैनिक की धड़कन जैसा और कहीं किसी बूढ़े मनुष्य की स्मृतियों जैसा।


मेरे लिए यह फ़िल्म किसी राजा के घर लौटने की कहानी नहीं रही। यह हर उस मनुष्य की कहानी है जिसने अपने जीवन में कभी लंबा रास्ता तय किया है। जिसने अपने हिस्से का अकेलापन देखा है। जिसने कई बार अपनी पहचान छिपाकर काम किया है। जिसने यह सीखा है कि हर युद्ध तलवार से नहीं जीता जाता।


मुझे अचानक महाभारत का यक्ष-प्रश्न याद आया, जहाँ बुद्धि बल से बड़ी हो जाती है। फिर रामायण का वह वनवास याद आया जिसमें चौदह वर्ष केवल दूरी नहीं थे, चरित्र की परीक्षा थे। और फिर उपनिषदों का वह आग्रह, मनुष्य बाहर जितना चलता है, उससे कहीं अधिक भीतर चलता है।


शायद इसी कारण अलग-अलग सभ्यताओं की महान कथाएँ एक-दूसरे से मिलती-जुलती दिखाई देती हैं। पात्र बदल जाते हैं, भूगोल बदल जाता है, लेकिन मनुष्य का संघर्ष नहीं बदलता।


आज से लगभग तीन हज़ार वर्ष पहले होमर ने जो प्रश्न पूछा था, वही प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है- 


घर क्या है? क्या वह केवल वह स्थान है जहाँ हम रहते हैं? या वह अवस्था है जहाँ पहुँचकर हमें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती?


क्रिस्टोफर नोलन ने इस महान प्रश्न को फिर से जीवित कर दिया। और शायद महान कलाकार का काम उत्तर देना नहीं, सही प्रश्न छोड़ जाना होता है। उत्तर तो हमारे आसपास मंडराते रहते हैं ।


✍🏻एमजे 


सोमवार, 20 जुलाई 2026

लानत है😡


कल CJP के प्रदर्शन में जो कुछ हुआ, उसने लोकतंत्र के कई पुराने प्रश्नों को फिर से जीवित कर दिया। लाठियाँ चलीं, लोग गिरे, पुलिस और प्रदर्शनकारी आमने-सामने खड़े थे। लेकिन इस पूरे दृश्य में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसने पहले धक्का दिया, बल्कि यह है कि लोकतंत्र में असहमति की कीमत आखिर कितनी होनी चाहिए?


यूनानी दार्शनिक सुकरात ने कहा था, Unexamined Life   जीने योग्य नहीं होता। यदि यह बात व्यक्ति पर लागू होती तो लोकतंत्र पर भी लागू होती है। जो लोकतंत्र अपने विरोध की परीक्षा से डर जाए, वह धीरे-धीरे केवल चुनावों का सर्कस रह जाता है, विचारों का लोकतंत्र नहीं।


भारत का संविधान हमें वोट देने का अधिकार देने के साथ ही , सवाल पूछने का भी साहस देता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और अपनी बात सरकार तक पहुँचाने का अधिकार, हर नागरिक की संवैधानिक शक्ति हैं। लेकिन उसी संविधान ने राज्य को यह दायित्व भी दिया है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे। इसलिए हर प्रदर्शन एक कठिन संतुलन की परीक्षा बन जाता है, एक ओर अधिकार, दूसरी ओर व्यवस्था।


यही कारण है कि किसी भी ऐसी घटना पर प्रतिक्रिया देने से पहले हमें पूरे तथ्य जानने चाहिए। प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और अनावश्यक बल प्रयोग हुआ, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर चोट है। लोकतंत्र की कसौटी यही है कि न विरोध हिंसक हो, न शक्ति मनमानी।


इतिहास गवाह है कि लाठी कभी केवल शरीर पर नहीं पड़ती, वह स्मृतियों पर भी पड़ती है। अंग्रेज़ों के समय लाला लाजपत राय पर चली लाठियाँ आज भी इतिहास की किताबों में दर्ज हैं। गांधी ने नमक उठाया था, हथियार नहीं। जयप्रकाश नारायण ने सत्ता से प्रश्न पूछे थे, युद्ध नहीं छेड़ा था। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही रही कि असहमति को देशद्रोह नहीं, लोकतांत्रिक ऊर्जा माना गया।


फ़्रांसीसी दार्शनिक वोल्टेयर का कथन है - मैं तुम्हारी बात से सहमत नहीं हूँ तो भी , उसे कहने के तुम्हारे अधिकार की रक्षा करूँगा।यही किसी भी लोकतांत्रिक समाज की आत्मा है। क्योंकि जिस दिन केवल सहमत लोगों को बोलने की अनुमति रह जाएगी, उस दिन संवाद समाप्त हो जाएगा और केवल प्रतिध्वनि बच जाएगी।


मुझे हमेशा रेल की दो पटरियाँ याद आती हैं। वे कभी एक-दूसरे से मिलती नहीं, फिर भी पूरी ट्रेन उन्हीं के संतुलन पर चलती है। सत्ता और विपक्ष, सरकार और नागरिक, पुलिस और प्रदर्शनकारी इनका रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है। इनका उद्देश्य एक-दूसरे को कुचलना नहीं, बल्कि राष्ट्र को आगे बढ़ाना होना चाहिए। यदि एक पटरी दूसरी पर चढ़ने लगे, तो दुर्घटना तय है।


फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं—


“बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे,

बोल ज़बाँ अब तक तेरी है।”


लेकिन इसके साथ एक और बात भी जोड़नी होगी, बोलना अधिकार है, पर शांति बनाए रखना भी उतना ही बड़ा दायित्व है।लोकतंत्र अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों के सहारे चलता है।


कल की घटना पर अंतिम निर्णय अदालतें, जाँच और प्रमाण देंगे। लेकिन एक समाज के रूप में हमें आज ही यह निर्णय लेना होगा कि हम कैसा लोकतंत्र चाहते हैं, वह जिसमें प्रश्न पूछने वाले नागरिक हों, या वह जिसमें प्रश्न पूछने से पहले लोग अपने सिर पर पड़ने वाली संभावित लाठी का हिसाब लगाने लगें।


क्योंकि इतिहास ने बार-बार सिद्ध किया है कि लाठी से भीड़ को कुछ देर के लिए हटाया जा सकता है, लेकिन विचारों को कभी नहीं। विचारों का उत्तर केवल विचार होते हैं। और शायद इसी का नाम लोकतंत्र है।


देश के युवाओं के प्रश्नो का जवाब ना देने और बदले में लाठियाँ देने वाली सरकारों पर लानत है , हज़ार लानत है । 


✍🏻एमजे