Diary Ke Panne

शनिवार, 18 जुलाई 2026

Free Will ??


कानून पढ़ते-पढ़ाते हुए एक बात मेरे  समझ में आई कि इंसान अपने हर काम के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है। इसलिए अदालतें मेन्स रिया की तलाश करती हैं। लेकिन जैसे-जैसे फिजिक्स पढ़ी, दर्शन पढ़ा और उपनिषदों के कुछ पन्नों में सिर झुकाकर बैठा, एक सवाल भीतर घर करता गया, अगर ब्रह्मांड का हर कण किसी नियम का पालन कर रहा है, तो फिर मेरे निर्णय वास्तव में “मेरे” कैसे हुए?


Einstein का एक वाक्य मुझे हमेशा बेचैन करता है। उन्होंने लिखा था- “Past, present and future is only a stubbornly persistent illusion.”


यदि यह बात सच है, तो हो सकता है कि हम समय में आगे नहीं बढ़ रहे हों; बल्कि समय के भीतर एक-एक दृश्य का अनुभव भर कर रहे हों। जैसे कोई फ़िल्म पहले से पूरी बन चुकी हो और दर्शक उसे एक-एक फ्रेम में देख रहा हो।


जावेद अख़्तर साहब की नज़्म की कुछ पंक्तियां याद आती हैं -


“ ये वक़्त क्या है

ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है

ये जब न गुज़रा था

तब कहाँ था

कहीं तो होगा

गुज़र गया है

तो अब कहाँ है

कहीं तो होगा

कहाँ से आया किधर गया है

ये कब से कब तक का सिलसिला है

ये वक़्त क्या है


वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचल

तमाम एहसास

सारे जज़्बे

ये जैसे पत्ते हैं

बहते पानी की सतह पर

जैसे तैरते हैं

अभी यहाँ हैं

अभी वहाँ हैं

और अब हैं ओझल

दिखाई देता नहीं है लेकिन

ये कुछ तो है

जो कि बह रहा है

ये कैसा दरिया है

किन पहाड़ों से आ रहा है

ये किस समुंदर को जा रहा है

ये वक़्त क्या है


कभी कभी मैं ये सोचता हूँ

कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो

तो ऐसा लगता है

दूसरी सम्त जा रहे हैं

मगर हक़ीक़त में

पेड़ अपनी जगह खड़े हैं

तो क्या ये मुमकिन है

सारी सदियाँ

क़तार-अंदर-क़तार अपनी जगह खड़ी हों

ये वक़्त साकित हो

और हम ही गुज़र रहे हों”


यूनानी दार्शनिक Epictetus ने कहा था- “Some things are up to us, and some things are not.” यानी कुछ चीज़ें हमारे अधिकार में हैं, कुछ बिल्कुल नहीं। शायद जीवन का सारा संघर्ष इन्हीं दोनों के बीच की महीन रेखा को पहचानने का नाम है।


Spinoza इससे भी एक कदम आगे चले गए। उनका मानना था कि मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र इसलिए समझता है क्योंकि वह अपने निर्णयों को तो जानता है, लेकिन उन कारणों को नहीं जानता जिन्होंने उसे वह निर्णय लेने के लिए विवश किया।


यह बात पहली बार पढ़ी थी तो लगा, क्या सचमुच मेरी हर पसंद, हर नापसंद, हर प्रेम, हर क्रोध… मेरे बचपन, मेरे संस्कार, मेरे अनुभव, मेरी जैविक संरचना और परिस्थितियों का जोड़ मात्र है? अगर ऐसा है, तो “मैं” कहाँ हूँ?


फिर गीता सामने आती है और कहती है - 


“प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकार-विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥”


अर्थात् प्रकृति अपने गुणों से सब कर्म कराती है, पर अहंकार से मोहित मनुष्य सोचता है- “मैं ही करता हूँ।” यह श्लोक पढ़कर पहली बार लगा कि शायद प्रश्न Free Will का नहीं, Free Ego का है।


उपनिषद भी अजीब ढंग से मुस्कुराते हैं। वे कहते हैं- तुम लहर हो, यह भी सच है; तुम समुद्र हो, यह उससे भी बड़ा सच है। लहर को लगता है कि वह अपनी दिशा स्वयं तय कर रही है। समुद्र जानता है कि हर लहर उसी की अभिव्यक्ति है।


लेकिन यदि सब पहले से तय है, तो फिर नैतिकता क्यों? प्रयास क्यों? संघर्ष क्यों? शायद इसलिए कि हमें भविष्य नहीं मालूम।


कल्पना कीजिए, आपके हाथ में एक उपन्यास है जिसके अंतिम पृष्ठ पर क्या लिखा है, आपको नहीं पता। लेखक को अंत पता है, पात्र को नहीं। पात्र का हर निर्णय उसके लिए वास्तविक है। उसका साहस भी वास्तविक है, उसका डर भी।


मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर है- 


हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,

बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले।


हम इच्छाएँ करते हैं मानो सब कुछ हमारे हाथ में हो; और फिर परिणाम स्वीकार करते हैं मानो कुछ भी हमारे हाथ में न था। शायद मनुष्य होने का अर्थ ही यही विरोधाभास है।


और अंत में मुझे स्टोइक सम्राट Marcus Aurelius की बात याद आती है- 


“Accept whatever comes to you woven in the pattern of your destiny.”


लेकिन उसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि चरित्र का चुनाव तुम्हारा है। बारिश होना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन भीगते हुए मुस्कुराना या शिकायत करना- शायद यही हमारी थोड़ी-सी आज़ादी है।


और अगर आप मुझसे पूछें कि Free Will है या नहीं, तो मैं कहूँगा- 


मुझे नहीं पता।


लेकिन मेरे देखे इतना ज़रूर है कि यदि यह केवल भ्रम भी है, तो यह ब्रह्मांड का सबसे सुंदर भ्रम है। क्योंकि इसी भ्रम ने मनुष्य को कविता लिखना सिखाया, न्याय करना सिखाया, प्रेम करना सिखाया, और अपनी नियति से सवाल पूछना भी। शायद हम Destiny के सह-लेखक हों या केवल मूक दर्शक। 


✍🏻एमजे


शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

हैराँ हूँ….


क़ानून के अलावा अगर किसी एक विषय ने मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित किया है, तो वह है फिजिक्स। शायद इसलिए कि क़ानून और फिजिक्स, दोनों एक ही सवाल का जवाब खोजते हैं।

“दुनिया चलती कैसे है?”


फ़र्क बस इतना है कि क़ानून समाज के नियम समझाता है, और फिजिक्स ब्रह्मांड के।


मुझे याद है, लगभग पंद्रह-सोलह वर्ष पहले मैंने स्टीफन हॉकिंग की पुस्तक “ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम” पढ़नी शुरू की थी। सच कहूँ तो पहली बार में आधी बातें समझ ही नहीं आईं। कई पन्ने दो-दो, तीन-तीन बार पढ़ने पड़े। फिर इस पर बनी हॉलीवुड मूवी भी देखी । स्टीफन हॉकिंग ने पहली बार मुझे एक ऐसे विचार से परिचित कराया जिसने मेरी सोच बदल दी।


स्पेस-टाइम फैब्रिक।


पहले मुझे लगता था कि अंतरिक्ष यानी स्पेस एक खाली मैदान है, जहाँ ग्रह और तारे इधर-उधर घूम रहे हैं। लेकिन आइंस्टीन ने कहा कि स्पेस खाली नहीं है। वह एक तरह का अदृश्य फैब्रिक है, एक ऐसा ताना-बाना जिसमें स्पेस और टाइम दोनों एक साथ जुड़े हुए हैं।


इसे समझने का सबसे आसान तरीका है एक रबर की चादर की कल्पना करना। उस चादर पर अगर आप एक भारी गेंद रख दें, तो चादर नीचे की ओर धँस जाती है। अब उसी चादर पर एक छोटी गेंद घुमाइए। वह सीधी नहीं चलेगी। वह बड़ी गेंद के आसपास मुड़ती हुई घूमने लगेगी।


हम बचपन से पढ़ते आए हैं कि पृथ्वी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण उसके चारों ओर घूमती है। लेकिन आइंस्टीन ने कहा सूर्य पृथ्वी को खींच नहीं रहा। सूर्य ने अपने विशाल द्रव्यमान से स्पेस-टाइम को मोड़ दिया है, और पृथ्वी उसी मुड़े हुए रास्ते पर चल रही है।


क्या अद्भुत विचार है!


यानी कभी-कभी रास्ता बदलने के लिए किसी को धक्का नहीं देना पड़ता। केवल उसके आसपास की दुनिया का ज्यामिति बदल दीजिए, उसका रास्ता अपने-आप बदल जाएगा।


शायद यही बात इंसानों पर भी लागू होती है।


कई बार हम लोगों को बदलने की कोशिश करते रहते हैं, जबकि बदलने की ज़रूरत व्यक्ति की नहीं, उसके एनवायरनमेंट की होती है।


मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर भी अनायास याद आता है—


“हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं,

मक़दूर हो तो साथ रखूँ नौहागर को मैं।”


ग़ालिब की हैरानी इंसान के भीतर की थी, और मेरी हैरानी ब्रह्मांड को लेकर है । लेकिन दोनों की को जानने की मंज़िल एक ही है, सवाल पूछना।


और मेरे देखे शायद सभ्यता आगे भी सवाल पूछने वालों ने ही बढ़ाई है, जवाब देने वालों ने नहीं।


और आज सवाल पूछने वाले ही नहीं रहे , मीडिया मसखरी में लगी है , मसखरे खबर दे रहे हैं , और जो सही सवाल उठा रहा है या तो वो घबराया हुआ है या उसको पहले ही देश विरोधी घोषित कर दिया गया है ।


बहरहाल मुझे फिजिक्स बेहद पसंद है क्यूँकि ये हमें हमारी औक़ात भी बताती है… और संभावनाएँ भी।


- एमजे 

बुधवार, 15 जुलाई 2026

Parallel Lines


बेटे ने आज पूछा पापा पैरेलल लाइन्स क्या होती हैं और वे दोनों एक दूसरे से कभी क्यों नहीं मिलती। ख़याल आया यही तो हमें स्कूल में पढ़ाया गया था 

“दो समांतर रेखाएँ कभी नहीं मिलतीं।”


हमने इस वाक्य को गणित का नियम समझकर याद कर लिया। लेकिन कभी यह नहीं पूछा कि यह बात किस दुनिया की है?

किस ब्रह्मांड की? किस ज्यामिति की?


यूक्लिड की Geometry कहती है कि यदि दुनिया सपाट है, यदि धरती एक flat surface है, तो दो parallel lines कभी नहीं मिलेंगी। वे साथ-साथ चलेंगी, बराबर दूरी बनाए रखेंगी, लेकिन एक-दूसरे को कभी छुएँगी नहीं। यही उनका धर्म है। यही उनकी पहचान है। यही उनका अस्तित्व है।


लेकिन फिर गणित का एक दूसरा संसार सामने आता है जिसे हम  ज्योमेट्राइक नाम से जानते हैं ।


वह कहती है 

नहीं…

यह ब्रह्मांड सपाट नहीं है इसीलिए यहाँ हर parallel line अंततः मिलती है।

मगर कहाँ? Infinity पर… अनंत पर।


यहीं से मेरे भीतर एक सवाल जन्म लेता है। अगर दो parallel lines मिल गईं… तो क्या वे अब भी parallel हैं? क्योंकि parallel होने का अर्थ ही यह था कि वे कभी नहीं मिलेंगी। अगर मिलना उनकी नियति बन गया… तो क्या उनका स्वभाव बचा? या उनका अस्तित्व ही बदल गया?


और शायद… यही प्रश्न मोहब्बत भी पूछती है। कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में रेल की पटरियों की तरह आते हैं। एक ही दिशा… एक ही सफ़र… एक ही मंज़िल की तरफ़ बढ़ते हुए… मगर मिलने की इजाज़त नहीं। साथ चलना उनकी तक़दीर है, मिल जाना नहीं। या वे लोग जो इस समय रेखा में हमसे बिछड़ गए हैं क्या वे किसी समांतर दुनिया में चले गए हैं जो अब कभी नहीं मिलेंगे ? 


लेकिन फिर Projective Geometry फिर से आकर कहती है

रुको… क्षितिज को देखो। वहाँ ज़मीन और आसमान मिल रहे हैं।

और यहीं मुझे सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। अगर सचमुच वे मिल गए… तो क्या वे अब भी ज़मीन और आसमान हैं? नहीं। वे अब क्षितिज हैं। न पूरी तरह ज़मीन… न पूरी तरह आसमान… मिलन ने दोनों की पहचान बदल दी। यही तो paradox है। जिस मिलन की इच्छा थी… उसी मिलन ने दोनों का अस्तित्व बदल दिया। और शायद… प्रेम और चाहना का  का सबसे बड़ा दुःख भी यही है। हम सोचते हैं कि जो लोग हमें छोड़ गए हैं अगर इस स्पेस टाइम में दोबारा हमसे मिल जाते तो सब पहले जैसा हो जाता। लेकिन वक्त कभी किसी को पहले जैसा रहने नहीं देता।


इंतज़ार सिर्फ़ दूरी नहीं बढ़ाता… इंसान भी बदल देता है। इसीलिए मुझे लगता है कि Projective Geometry का Infinity कोई जगह नहीं है। वह समय है। और उस समय तक पहुँचते-पहुँचते… parallel lines भी बदल चुकी होती हैं, ज़मीन और आसमान भी बदल चुके होते हैं, और प्रेम करने वाले भी। मिलन तो होता है…लेकिन मिलने वाले नहीं बचते।


शायद इसी वजह से इस दुनिया में सारे रिश्ते अधूरे हैं लोग मिलते हैं बिछड़ जाते हैं और वे समानांतर चलकर अमर हो जाते हैं।


-एमजे  

रविवार, 5 जनवरी 2025

यक्ष प्रश्न….

 

29 दिसंबर 2024

खैरूआ सरकार के दर्शन करके हम लोग कल शाम को ही लौट आए थे प्रिय सौरभ अपने कुछ मित्रों के साथ मिलने आए हुए हैं. वे यहाँ से कुछ सौ किलोमीटर दूर रहते हैं। जानकारी मिलते ही वो अपने मित्रों के साथ आ पहुँचे। अनमोल के घर पर सबको मिलने बुलाया। कुछ बातों मुलाक़ातों का दौर चला और फिर वो लोग रवाना हुए।

रात के 9:30 बजे प्रियांशु के पिताजी का आना हुआ। बेहद सौम्य और सरल व्यक्तित्व। पता चला कि वो छत्तीसगढ़ में भी रहे हैं। खाने की थाली लग गई है। अनमोल की मम्मी और बहन ने बड़े प्यार से खाना बनाया है.. खीर और कढ़ी के तो क्या ही कहने.. 



बातों-बातों में प्रियांशु के पिताजी ने कहा कि अघमर्षण कुंड ज़रूर जाइयेगा.. मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा ये जानकर कि पांडव कालीन वो कुंड यहाँ रीवा से साठ किलोमीटर की दूरी पर ही है।


30 दिसंबर 2024 

हम सुबह ही नहा धो कर निकल गए हैं अघमर्षण कुंड के लिए जो धारकुंडी आश्रम क्षेत्र में आता है.. सोचता हूँ यही वो रास्ते हैं जिनमें आज से हज़ारों वर्ष पहले पांडव भटक रहे थे। वनवास के दौरान, बारहवें वर्ष में वे इसी स्थान पर थे तब उन्होंने एक रोज़ प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश की। पानी का प्रबंध करने का जिम्मा प्रथमतः सहदेव को सौंप गया। उन्हें पास में एक जलाशय दिखा जिससे पानी लेने वे वहां पहुंचे। जलाशय के स्वामी यक्ष ने उन्हें रोकते हुए पहले कुछ प्रश्नों का उत्तर देने की शर्त रखी। सहदेव उस शर्त और यक्ष को अनदेखा कर जलाशाय से पानी लेने लगे। तब यक्ष ने सहदेव को निर्जीव कर दिया। सहदेव के न लौटने पर क्रमशः नकुल, अर्जुन और फिर भीम ने पानी लाने की जिम्मेदारी उठाई। वे उसी जलाशय पर पहुंचे और यक्ष की शर्तों की अवज्ञा करने के कारण निर्जीव हो गए।    


अंत में चिंतातुर युधिष्ठिर स्वयं उस जलाशय पर पहुंचे। यक्ष ने प्रकट होकर उन्हें भी आगाह किया और अपने प्रश्नों के उत्तर देने के लिए कहा। युधिष्ठिर ने धैर्य दिखाया। उन्होंने न केवल यक्ष के सभी प्रश्न ध्यानपूर्वक सुने अपितु उनका तर्कपूर्ण उत्तर भी दिया जिसे सुनकर यक्ष संतुष्ट हो गया। 


महाभारत के वन पर्व में इसका विस्तृत वर्णन है यहाँ केवल कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर दे रहा हूँ जिन्होंने मुझे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित किया है - 


प्रश्न: मानव जीवन का उद्देश्य क्या है?

उत्तर: जीवन का उद्देश्य उस चेतना को जानना है जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। 

प्रश्न: जन्म का कारण क्या है?
उत्तर: अतृप्त वासनाएं, कामनाएं और कर्मफल ये ही जन्म का कारण हैं।

प्रश्न: जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है?
उत्तर: जिसने स्वयं को, उस आत्म तत्व को जान लिया वह जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।

प्रश्न: संसार में दुःख क्यों है?
उत्तर: संसार के दुःख का कारण लालच, स्वार्थ और भय हैं।

प्रश्न: तो फिर ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की?
उत्तर: ईश्वर ने संसार की रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की।

प्रश्न: क्या ईश्वर है? कौन है वह? क्या वह स्त्री है या पुरुष?
उत्तर: कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है। तुम हो इसलिए वह भी है उस महान कारण को ही ईश्वर कहा गया है। वह न स्त्री है न पुरुष।

प्रश्न: उसका (ईश्वर) स्वरूप क्या है?
उत्तर: वह सत्-चित्-आनन्द है, वह निराकार ही सभी रूपों में अपने आप को व्यक्त करता है।

प्रश्न: यदि ईश्वर ने संसार की रचना की तो फिर ईश्वर की रचना किसने की?
उत्तर: वह अजन्मा अमृत और अकारण है।

प्रश्न: भाग्य क्या है?
उत्तर: हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है। परिणाम अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। यह परिणाम ही भाग्य है।

प्रश्न: सुख और शान्ति का रहस्य क्या है?
उत्तर: सत्य, सदाचार, प्रेम और क्षमा सुख का कारण हैं। असत्य, अनाचार, घृणा और क्रोध का त्याग शान्ति का मार्ग है।

प्रश्न: चित्त पर नियंत्रण कैसे संभव है?
उत्तर: इच्छाएं, कामनाएं चित्त में उद्वेग उत्पन्न करती हैं। इच्छाओं पर विजय चित्त पर विजय है।

प्रश्न: सच्चा प्रेम क्या है?
उत्तर: स्वयं को सभी में देखना सच्चा प्रेम है।


प्रश्न: आसक्ति क्या है?
उत्तर: प्रेम में मांग, अपेक्षा, अधिकार आसक्ति है।

प्रश्न: जागते हुए भी कौन सोया हुआ है?
उत्तर: जो आत्मा को नहीं जानता वह जागते हुए भी सोया है।

प्रश्न: कमल के पत्ते में पड़े जल की तरह अस्थायी क्या है?
उत्तर: यौवन, धन और जीवन।

प्रश्न: स्वयं के  सारे दुःखों का नाश कौन कर सकता है?
उत्तर: जो सब छोड़ने को तैयार हो।

यक्ष प्रश्न: भय से मुक्ति कैसे संभव है?
उत्तर:  वैराग्य से।

प्रश्न: मुक्त कौन है?
उत्तर: जो अज्ञान से परे है।

प्रश्न: अज्ञान क्या है?
उत्तर: आत्मज्ञान का अभाव अज्ञान है।

प्रश्न: वह क्या है जो अस्तित्व में है और नहीं भी?
उत्तर: माया।

यक्ष प्रश्न: माया क्या है?
उत्तर: नाशवान जगत।

प्रश्न:  परम सत्य क्या है?
उत्तर: ब्रह्म।…!

प्रश्नः मनुष्य का सच्चा साथ कौन देता है?

उत्तरः धैर्य ही मनुष्य का साथी होता है।

प्रश्न: स्थायित्व किसे कहते हैं? धैर्य क्या है? स्नान किसे कहते हैं? और दान का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर:  ‘अपने धर्म में स्थिर रहना ही स्थायित्व है। अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना ही धैर्य है। मनोमालिन्य का त्याग करना ही स्नान है और प्राणीमात्र की रक्षा का भाव ही वास्तव में दान है।’

प्रश्नः भूमि से महान क्या है?
उत्तरः संतान को कोख़ में धरने वाली मां, भूमि से भी महान होती है।

प्रश्नः आकाश से भी ऊंचा कौन है?
उत्तरः पिता।

प्रश्नः हवा से भी तेज चलने वाला कौन है?
उत्तरः मन।

प्रश्नः  घास से भी तुच्छ चीज क्या है?
उत्तरः चिंता।

प्रश्न : विदेश में साथ किसे ले जाना चाहिए?
उत्तरः विद्या को ।

प्रश्न : किसके छूट जाने पर मनुष्य सर्वप्रिय बनता है ?
उत्तरः अहंभाव के छूट जाने पर मनुष्य सर्वप्रिय बनता है।


 प्रश्न : किस चीज को गंवाकर मनुष्य धनी बनता है?
उत्तरः लालच।

प्रश्न : संसार में सबसे बड़े आश्चर्य की बात क्या है?
उत्तरः हर रोज आंखों के सामने कितने ही प्राणियों की मृत्यु हो जाती है यह देखते हुए भी इंसान कल के सपने देखता है और भविष्य की आशा करता है। यही महान आश्चर्य है।


प्रश्नः ऐसा कौन सा शास्त्र है, जिसका अध्ययन करके बुद्धिमान बना जा सकता है?
उत्तरः ऐसा कोई शास्त्र नहीं है। स्वयं के अनुभव व महान गुरुओं की संगति ही मनुष्य के बुद्धिमान बनने के साधन हैं। 


युधिष्ठिर के विद्वत्तापूर्ण उत्तरों को सुन कर यक्ष प्रसन्न हुए और सभी भाइयों को जीवन प्रदान किया…. 


अद्भुत ऊर्जावान इस क्षेत्र में हमारा होना और भ्रमण करना इस जीवन  की एक उपलब्धि ही कही जाए तो अतिशियोक्ति नहीं होगी। 


अस्तु !


✍️एमजे