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कुछ कहानियाँ हम देखते हैं और भूल जाते हैं। कुछ कहानियाँ हमारे भीतर थोड़ी देर ठहरती हैं। और कभी-कभी किसी कहानी में एक छोटा-सा दृश्य, एक वाक्य, एक प्रतीक ऐसा मिल जाता है जो फिल्म समाप्त होने के बाद भी हमारा पीछा नहीं छोड़ता। हाल ही में Odyssey देखते हुए मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ। कहानी आगे बढ़ गई, दृश्य बदल गए, लेकिन Odysseus और सायरंस वाला प्रसंग मेरे भीतर कहीं अटक गया। शायद इसलिए कि मुझे लगा यह समुद्र में भटकते किसी प्राचीन यूनानी योद्धा की कहानी भर नहीं है। कहीं न कहीं यह हम सबकी कहानी है।
Odysseus युद्ध जीत चुका है। लेकिन युद्ध जीत लेना और घर पहुँच जाना दो अलग-अलग बातें हैं। वह अपने साथियों के साथ समुद्र के रास्ते अपने घर लौट रहा है। रास्ते में उसे एक ऐसे समुद्री क्षेत्र से गुजरना है जहाँ सायरंस रहती हैं। Greek mythology में सायरंस का असली हथियार उनकी आवाज़ थी। कहा जाता था कि उनका गीत इतना आकर्षक होता था कि उसे सुनने वाला नाविक अपना विवेक खो बैठता, जहाज और साथियों को भूल जाता और उस आवाज़ की ओर बढ़ते-बढ़ते अपनी मृत्यु तक पहुँच जाता।
इस खतरे से बचने के लिए Odysseus अपने साथियों के कानों में वैक्स लगवा देता है ताकि वे सायरंस की आवाज़ सुन ही न सकें। लेकिन स्वयं वह उस गीत को सुनना चाहता है। शायद मनुष्य के भीतर यह जिज्ञासा हमेशा रही है, जिस चीज से पूरी दुनिया आपको बचने को कह रही हो, एक बार उसे जानने की इच्छा और अधिक तीव्र हो जाती है।
लेकिन यहीं Odysseus एक असाधारण काम करता है। वह अपने साथियों से कहता है, मुझे जहाज के मास्ट से मजबूती से बाँध देना। और जब सायरंस का गीत सुनकर मैं तुमसे मुझे खोलने की प्रार्थना करूँ, चीखूँ, आदेश दूँ, गिड़गिड़ाऊँ, तब भी मुझे मत खोलना।
मुझे इस दृश्य की सबसे खूबसूरत बात यह लगी कि Odysseus को अपने साहस पर भरोसा था, लेकिन उसने अपने भविष्य के विवेक पर भरोसा नहीं किया। वह जानता था कि आज जो व्यक्ति निर्णय ले रहा है, सायरंस का गीत सुनने के बाद शायद वही व्यक्ति नहीं रहेगा। इसलिए उसने टेम्पटेशन आने के बाद उससे लड़ने की योजना नहीं बनाई; उसने पहले ही अपने लिए एक सीमा तय कर दी। यही बात मुझे देर तक सोचने पर मजबूर करती रही।
हम अक्सर अपने जीवन में यह मानकर चलते हैं कि जब कठिन समय आएगा, तब हम सही निर्णय ले लेंगे। जब टेम्टेशंस आएगी, तब खुद को रोक लेंगे। लेकिन शायद मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह अपने कमजोर क्षणों में भी स्वयं को उतना ही समझदार समझता है जितना वह अपने मजबूत क्षणों में होता है।
Odysseus ने ऐसा नहीं किया। उसने अपने मजबूत क्षण में अपने कमजोर क्षण के लिए निर्णय ले लिया। यही इस पूरे प्रसंग का वह अर्थ है जिसने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया।
सायरंस का गीत केवल किसी नई और खूबसूरत चीज का प्रलोभन नहीं है। हमारे जीवन में कई बार सबसे खतरनाक Siren वह होती है जो हमें किसी ऐसी चीज की ओर वापस बुलाती है जिसे हम कभी बहुत चाहते थे, जो कभी हमारी थी, लेकिन अब हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है। कोई बीता हुआ समय। कोई अधूरा सपना। कोई खोया हुआ अवसर। कभी-कभी तो हमारा अपना ही पुराना वर्शन।
मनुष्य केवल भविष्य के पीछे भागते हुए नहीं डूबता। कई बार वह अतीत तक वापस तैरने की कोशिश करते हुए भी डूब जाता है। और शायद इसीलिए सायरंस का रूपक इतना शक्तिशाली है। समुद्र आगे की ओर जा रहा है, जहाज घर की ओर बढ़ रहा है, लेकिन आवाज़ पीछे से बुला रही है।
जीवन में भी कितनी बार ऐसा होता है। हम जानते हैं कि हमें आगे जाना है, लेकिन कोई स्मृति हमें पीछे बुलाती रहती है। हम जानते हैं कि कोई अध्याय समाप्त हो चुका है, फिर भी मन उसके अंतिम पन्ने को बार-बार खोलता है। हम जानते हैं कि कुछ लोग, कुछ जगहें और कुछ समय वापस नहीं आते, लेकिन मन उनके लौट आने की संभावना से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाता।
Odysseus history का पहला आदमी बन जाता है, जिसने सायरंस के गीत सुने और सुनने के बाद भी जिंदा रहा। और बाद में जब वो उन गीतों को अपने लोगों से साझा करता है ना उफ्फ! उसने कहा सायरंस का गीत कहता है -
“ what you most want is
what you most can't have and
what you most can't have
is what you already had.”
अर्थात् यह कि आप जिस चीज़ को सबसे ज़्यादा चाहते हो वो वही है जो आपको कभी नहीं मिल सकता….. क्यूँकि जो आपको कभी नहीं मिल सकता वो वही चीज़ है जो कभी आपके पास थी….. अहा! कितनी गहरी बात! कितना शानदार रूपक!…. इसका मतलब ये भी है कि जो आपके पास है उसे सम्भालिए, बहुत कुछ बहुमूल्य हम सभी के पास होता है, हमेशा बस देखने के लिए नज़र और नज़रिया चाहिए।
और यहीं Odysseus हमें एक बहुत साधारण लेकिन गहरी बात सिखाता है, हर मनुष्य को अपने जीवन में कोई न कोई मास्ट चाहिए। कोई ऐसी चीज जिससे वह स्वयं को तब बाँध सके जब उसका अपना मन उसके विरुद्ध हो जाए।
किसी के लिए वह उसका परिवार हो सकता है। किसी के लिए उसका उद्देश्य। किसी के लिए उसका प्रोफेशन, डिसिप्लिन, फेथ, कोई रेस्पोंसिबिलिटी या वर्षों से बनाया हुआ कोई सपना। मेरे लिए हमेशा परिवार, लिखना , अध्ययन और अपने विद्यार्थियों के प्रति मेरी जिम्मेदारी ऐसे ही एंकर्स रहे हैं। जीवन में ऐसे समय भी आए जब मन ने बहुत-सी दिशाओं में जाने को कहा, लेकिन कुछ जिम्मेदारियाँ थीं जिन्होंने मुझे वहीं रोके रखा जहाँ मुझे होना चाहिए था। बाद में समझ आया कि कई बार जिन्हें हम बंधन समझते हैं, वही हमें डूबने से बचा रहे होते हैं।
उम्र के साथ मैंने एक बात और सीखी है- डिसिप्लिन का अर्थ यह नहीं कि आपके भीतर टेम्प्टेशंस समाप्त हो गई है। डिसिप्लिन का अर्थ है कि आपने टेम्प्टेशंस आने से पहले यह तय कर लिया है कि उसके आने पर आप क्या करेंगे।
इसीलिए कुछ निर्णय भावनाओं के बीच नहीं लिए जाने चाहिए। वे पहले लिए जाने चाहिए। जब मन शांत हो, तब तय कर लीजिए कि आपकी सीमाएँ क्या हैं। जब संबंध अच्छे चल रहे हों, तब तय कीजिए कि आपके जीवन मूल्य क्या हैं। जब पैसा पर्याप्त हो, तब तय कीजिए कि आपकी इंटीग्रिटी की कीमत क्या है। जब करियर ठीक चल रहा हो, तब तय कीजिए कि सफलता के लिए आप कौन-सा रास्ता कभी नहीं अपनाएँगे। और जब जीवन शांत हो, तभी तय कर लीजिए कि तूफान आने पर आप किस चीज को पकड़कर खड़े रहेंगे।
क्योंकि तूफान के बीच फिलोसफी याद नहीं आती। उस समय केवल वह मास्ट काम आता है जिससे आपने स्वयं को पहले से बाँध रखा हो।
अब इस प्रश्न का उत्तर खोजिए - जब कभी जीवन में सायरंस मुझे बुलाएँगी, तब मेरा मास्ट क्या होगा?
✍🏻एमजे



