Diary Ke Panne

सोमवार, 20 जुलाई 2026

लानत है😡


कल CJP के प्रदर्शन में जो कुछ हुआ, उसने लोकतंत्र के कई पुराने प्रश्नों को फिर से जीवित कर दिया। लाठियाँ चलीं, लोग गिरे, पुलिस और प्रदर्शनकारी आमने-सामने खड़े थे। लेकिन इस पूरे दृश्य में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसने पहले धक्का दिया, बल्कि यह है कि लोकतंत्र में असहमति की कीमत आखिर कितनी होनी चाहिए?


यूनानी दार्शनिक सुकरात ने कहा था, Unexamined Life   जीने योग्य नहीं होता। यदि यह बात व्यक्ति पर लागू होती तो लोकतंत्र पर भी लागू होती है। जो लोकतंत्र अपने विरोध की परीक्षा से डर जाए, वह धीरे-धीरे केवल चुनावों का सर्कस रह जाता है, विचारों का लोकतंत्र नहीं।


भारत का संविधान हमें वोट देने का अधिकार देने के साथ ही , सवाल पूछने का भी साहस देता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और अपनी बात सरकार तक पहुँचाने का अधिकार, हर नागरिक की संवैधानिक शक्ति हैं। लेकिन उसी संविधान ने राज्य को यह दायित्व भी दिया है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे। इसलिए हर प्रदर्शन एक कठिन संतुलन की परीक्षा बन जाता है, एक ओर अधिकार, दूसरी ओर व्यवस्था।


यही कारण है कि किसी भी ऐसी घटना पर प्रतिक्रिया देने से पहले हमें पूरे तथ्य जानने चाहिए। प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और अनावश्यक बल प्रयोग हुआ, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर चोट है। लोकतंत्र की कसौटी यही है कि न विरोध हिंसक हो, न शक्ति मनमानी।


इतिहास गवाह है कि लाठी कभी केवल शरीर पर नहीं पड़ती, वह स्मृतियों पर भी पड़ती है। अंग्रेज़ों के समय लाला लाजपत राय पर चली लाठियाँ आज भी इतिहास की किताबों में दर्ज हैं। गांधी ने नमक उठाया था, हथियार नहीं। जयप्रकाश नारायण ने सत्ता से प्रश्न पूछे थे, युद्ध नहीं छेड़ा था। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही रही कि असहमति को देशद्रोह नहीं, लोकतांत्रिक ऊर्जा माना गया।


फ़्रांसीसी दार्शनिक वोल्टेयर का कथन है - मैं तुम्हारी बात से सहमत नहीं हूँ तो भी , उसे कहने के तुम्हारे अधिकार की रक्षा करूँगा।यही किसी भी लोकतांत्रिक समाज की आत्मा है। क्योंकि जिस दिन केवल सहमत लोगों को बोलने की अनुमति रह जाएगी, उस दिन संवाद समाप्त हो जाएगा और केवल प्रतिध्वनि बच जाएगी।


मुझे हमेशा रेल की दो पटरियाँ याद आती हैं। वे कभी एक-दूसरे से मिलती नहीं, फिर भी पूरी ट्रेन उन्हीं के संतुलन पर चलती है। सत्ता और विपक्ष, सरकार और नागरिक, पुलिस और प्रदर्शनकारी इनका रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है। इनका उद्देश्य एक-दूसरे को कुचलना नहीं, बल्कि राष्ट्र को आगे बढ़ाना होना चाहिए। यदि एक पटरी दूसरी पर चढ़ने लगे, तो दुर्घटना तय है।


फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं—


“बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे,

बोल ज़बाँ अब तक तेरी है।”


लेकिन इसके साथ एक और बात भी जोड़नी होगी, बोलना अधिकार है, पर शांति बनाए रखना भी उतना ही बड़ा दायित्व है।लोकतंत्र अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों के सहारे चलता है।


कल की घटना पर अंतिम निर्णय अदालतें, जाँच और प्रमाण देंगे। लेकिन एक समाज के रूप में हमें आज ही यह निर्णय लेना होगा कि हम कैसा लोकतंत्र चाहते हैं, वह जिसमें प्रश्न पूछने वाले नागरिक हों, या वह जिसमें प्रश्न पूछने से पहले लोग अपने सिर पर पड़ने वाली संभावित लाठी का हिसाब लगाने लगें।


क्योंकि इतिहास ने बार-बार सिद्ध किया है कि लाठी से भीड़ को कुछ देर के लिए हटाया जा सकता है, लेकिन विचारों को कभी नहीं। विचारों का उत्तर केवल विचार होते हैं। और शायद इसी का नाम लोकतंत्र है।


देश के युवाओं के प्रश्नो का जवाब ना देने और बदले में लाठियाँ देने वाली सरकारों पर लानत है , हज़ार लानत है । 


✍🏻एमजे 

रविवार, 19 जुलाई 2026

दास्तान ए फुटबॉल


तो आज बात करेंगे फुटबॉल की, हम सब ने बचपन में शायद पहला खेल जो खेला है वो फुटबॉल ही होगा , अगर किसी खेल ने मेरे बचपन को भी सबसे ज़्यादा रंग दिया है, तो वह फुटबॉल ही है।


आज जब फीफा वर्ल्ड कप 2026 समाप्त हो चुका है, तो उसकी तस्वीरों के साथ अनायास बचपन की वे दोपहरें लौट आती हैं, जब हमारे लिए फुटबॉल स्कूल की छुट्टी मिलते ही शुरू हो जाने वाला उत्सव था।


स्कूल में जब कभी अचानक छुट्टी हो जाती थी, किसी की मृत्यु के कारण, किसी प्रशासनिक वजह से या फिर किसी ऐसी अनूठी परिस्थिति में जिसका हमें पहले से अंदाज़ा नहीं होता था, तो दूसरे बच्चों के लिए वह छुट्टी होती थी, हमारे लिए वह मैच का ऐलान होता था।


बैग क्लास में ही पटक देते थे और सीधे मैदान की ओर भाग जाते थे। बारिश हो रही है, मैदान में पानी भरा है, कपड़े गंदे होंगे या घर पहुँचकर डाँट पड़ेगी, इन बातों का उस समय कोई मतलब नहीं था। बल्कि मैदान में जितना अधिक कीचड़ होता था, खेल उतना ही यादगार बन जाता था।


हमारे पास महँगे स्टड्स, ब्रांडेड जर्सी, घास से चमकते मैदान या प्रशिक्षित कोच नहीं थे। दो ईंटें रखकर गोलपोस्ट बन जाता था। कई बार गेंद की आधी हवा निकली होती थी, फिर भी खेल पूरा होता था ।


कभी गेंद सीमा से बाहर चली गई तो बहस शुरू हो जाती थी कि थ्रो-इन किसे मिलेगा। कभी किसी ने हाथ लगा दिया तो आधे खिलाड़ी हैंडबॉल चिल्लाते थे और बाकी आधे कहते थे, “जानबूझकर थोड़ी लगाया है!” फिर देर तक बहस ।


कई बार गोल हुआ या नहीं, इसका फैसला गेंद से नहीं, आवाज़ की ताकत से होता था। जिस टीम के खिलाड़ी ज़्यादा ज़ोर से चिल्ला दिए, उसका दावा थोड़ा मज़बूत हो जाता था।


घुटने छिलते थे, कपड़े कीचड़ से भर जाते थे, कोई फिसलकर गिरता था तो पहले सब हँसते थे और फिर हाथ पकड़कर उठा देते थे। शायद वहीं फुटबॉल ने जीवन का पहला बड़ा पाठ सिखाया, 

गिरना खेल का अंत नहीं होता; पड़े रहना खेल का अंत होता है।


एक बात और थी।


जब गेंद किसी एक खिलाड़ी के पैरों में होती थी, तो पूरे मैदान की निगाह उसी पर टिक जाती थी। तभी शायद पहली बार मुझे ये समझ आया कि ज़िम्मेदारी हमेशा उसी के हिस्से आती है, जिसके पास गेंद होती है।


जीवन भी कुछ ऐसा ही है। अवसर आपके पास हो, तो निर्णय भी आपको ही लेना पड़ेगा। आप गेंद किसी और को पास कर सकते हैं, लेकिन कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब गोलपोस्ट सामने होता है और निर्णय आपके अपने पैर को लेना पड़ता है।


कक्षा नौवीं तक आते-आते फुटबॉल धीरे-धीरे पीछे छूट गया और मैंने बास्केटबॉल को अपना लिया। बास्केटबॉल में गति थी, छलाँग थी, तालमेल था और बहुत तेज़ निर्णय लेने पड़ते थे। फिर ग्यारहवीं के बाद क्रिकेट ने लगभग सारे खेलों की जगह ले ली। उसके बाद फुटबॉल नहीं खेला, लेकिन कीचड़ में खेली गई उस फुटबॉल की मिट्टी शायद मन से कभी नहीं उतरी।


दिलचस्प बात यह है कि मैंने 2026 से पहले कभी फुटबॉल वर्ल्ड कप को गंभीरता से फ़ॉलो नहीं किया। न मैंने माराडोना के दौर को समझकर देखा, न ज़िदान की कला को, न मेस्सी और रोनाल्डो की पूरी प्रतिद्वंद्विता को बैठकर जिया।


घर में भी इन दिनों फुटबॉल का ख़ूब बुखार रहा। मेरे बेटे ने रोनाल्डो की जर्सी मँगवाई। मज़े की बात यह है कि वह मेस्सी का प्रशंसक भी है। रोनाल्डो की टीम फ़ाइनल तक नहीं पहुँची, लेकिन उसे कोई ग़म नहीं था। उसकी खुशी का कारण बिल्कुल साफ़ था “रोनाल्डो नहीं पहुँचा तो क्या हुआ, मेस्सी तो पहुँच गया!”


बच्चों का दिल शायद हमसे अधिक उदार होता है। हम बड़े लोग अक्सर किसी एक महानता को स्वीकार करने के लिए दूसरी महानता को छोटा करना चाहते हैं। बच्चे रोनाल्डो की मेहनत और मेस्सी की कला, दोनों से एक साथ प्रेम कर सकते हैं।


मेस्सी को खेलते हुए देखकर मुझे बार-बार लगता है कि कुछ खिलाड़ी गेंद को केवल आगे बढ़ाते हैं, लेकिन कुछ खिलाड़ी गेंद से बातें करते हैं। मेस्सी की सबसे बड़ी ताक़त केवल उनकी गति नहीं है। उनकी असली कला यह है कि वे गेंद प्राप्त करने से पहले ही अगला दृश्य देख लेते हैं। वे खाली जगह को वहाँ देख लेते हैं, जहाँ सामान्य दर्शक को केवल खिलाड़ियों की भीड़ दिखाई देती है।


सेमीफ़ाइनल में इंग्लैंड के विरुद्ध अर्जेंटीना एक समय पीछे था। खेल के अंतिम हिस्से तक इंग्लैंड 1–0 से आगे चल रहा था, लेकिन अर्जेंटीना ने अंतिम मिनटों में अविश्वसनीय वापसी की। एंज़ो फर्नांडेज़ ने 85वें मिनट में बराबरी का गोल किया और फिर इंजरी टाइम में लाउतारो मार्टिनेज़ के गोल ने अर्जेंटीना को 2–1 की जीत के साथ फ़ाइनल में पहुँचा दिया। मेस्सी उस मैच में गोल करने वाले खिलाड़ी नहीं थे, लेकिन महान खिलाड़ी का प्रभाव हमेशा स्कोरशीट पर ही दर्ज हो, यह ज़रूरी तो नहीं । कई बार उसकी उपस्थिति ही विरोधी टीम की रचना बदल देती है।


दो डिफ़ेंडर उसकी ओर खिंचते हैं और किसी तीसरे खिलाड़ी के लिए जगह बन जाती है। वह गेंद को एक कपल अधिक रोकता है और उसी एक पल में पूरी डिफ़ेंसिव लाइन अपनी जगह खो देती है। मेरे देखे कुछ कलाएँ संख्या में नहीं आतीं।


जैसे किसी अच्छे शिक्षक की भूमिका केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि उसने कितने पन्ने पढ़ाए; कभी-कभी उसने किसी विद्यार्थी के भीतर प्रश्न पूछने का साहस पैदा किया होता है।


फ़ाइनल में अर्जेंटीना के सामने स्पेन था, एक ऐसी टीम जिसने पूरे टूर्नामेंट में गेंद पर नियंत्रण, धैर्य, और अनुशासन अद्भुत प्रदर्शन किया। स्पेन ने फ़ाइनल में अर्जेंटीना को लगातार दबाव में रखा। निर्धारित समय तक कोई गोल नहीं हुआ, इसलिए मुकाबला एक्स्ट्रा टाइम में गया। 


फिर 106वें मिनट में वह क्षण आया जिसने पूरा इतिहास बदल दिया। पेद्रो पोरो की ओर से आई गेंद को निको विलियम्स ने आगे पहुँचाया और फेरान टोरेस ने उसे गोल में बदल दिया। स्पेन 1–0 से आगे हो गया। अर्जेंटीना ने आख़िरी प्रयास किए, लेकिन स्पेन का डिफेंस नहीं टूटा । इसी गोल के साथ स्पेन ने दूसरी बार फीफा वर्ल्ड कप जीत लिया और अर्जेंटीना का लगातार दूसरा विश्व खिताब जीतने का सपना अधूरा रह गया। 


फ़ाइनल में मेस्सी का जादू वैसा नहीं चल सका, जिसकी उनके प्रशंसकों को उम्मीद थी। स्पेन ने उनको खेलने की जगह ही नहीं दी । जैसे ही गेंद मेस्सी तक पहुँचती, स्पेन के खिलाड़ी उनके विकल्प बंद कर देते। महानतम कलाकार भी तभी चित्र बना सकता है, जब कैनवास पर थोड़ी जगह बची हो। स्पेन ने उस रात मेस्सी को वही जगह नहीं दी। 


लेकिन शायद महानता का अर्थ हर कहानी का सुखद अंत होना भी नहीं है। हम अक्सर मान लेते हैं कि महान व्यक्ति की यात्रा का अंत भी महान विजय में होना चाहिए। जबकि जीवन ऐसा कोई वादा नहीं करता।


जीवन और खेल की सबसे कठोर सच्चाई यही है कि  हर खिलाड़ी को एक दिन मैदान से बाहर जाना होता है ।


गेंद आपके पास आएगी और चली जाएगी। कभी आपका पास सही होगा, कभी गेंद छिन जाएगी। कभी आपका शॉट गोलपोस्ट से टकराकर भीतर चला जाएगा और कभी वही गेंद एक इंच बाहर निकल जाएगी। जो भी हो आपको सफलता का गोल करने के लिए कभी भी मन माफिक माहौल नहीं मिलेगा आपके आसपास के लोग ही गेंद छीनने का प्रयास करते रहेंगे। बावजूद इसके अगर मैदान में उतरे हो तो खेलना तो होगा। 


✍🏻एमजे 

शनिवार, 18 जुलाई 2026

Free Will ??


कानून पढ़ते-पढ़ाते हुए एक बात मेरे  समझ में आई कि इंसान अपने हर काम के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है। इसलिए अदालतें मेन्स रिया की तलाश करती हैं। लेकिन जैसे-जैसे फिजिक्स पढ़ी, दर्शन पढ़ा और उपनिषदों के कुछ पन्नों में सिर झुकाकर बैठा, एक सवाल भीतर घर करता गया, अगर ब्रह्मांड का हर कण किसी नियम का पालन कर रहा है, तो फिर मेरे निर्णय वास्तव में “मेरे” कैसे हुए?


Einstein का एक वाक्य मुझे हमेशा बेचैन करता है। उन्होंने लिखा था- “Past, present and future is only a stubbornly persistent illusion.”


यदि यह बात सच है, तो हो सकता है कि हम समय में आगे नहीं बढ़ रहे हों; बल्कि समय के भीतर एक-एक दृश्य का अनुभव भर कर रहे हों। जैसे कोई फ़िल्म पहले से पूरी बन चुकी हो और दर्शक उसे एक-एक फ्रेम में देख रहा हो।


जावेद अख़्तर साहब की नज़्म की कुछ पंक्तियां याद आती हैं -


“ ये वक़्त क्या है

ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है

ये जब न गुज़रा था

तब कहाँ था

कहीं तो होगा

गुज़र गया है

तो अब कहाँ है

कहीं तो होगा

कहाँ से आया किधर गया है

ये कब से कब तक का सिलसिला है

ये वक़्त क्या है


वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचल

तमाम एहसास

सारे जज़्बे

ये जैसे पत्ते हैं

बहते पानी की सतह पर

जैसे तैरते हैं

अभी यहाँ हैं

अभी वहाँ हैं

और अब हैं ओझल

दिखाई देता नहीं है लेकिन

ये कुछ तो है

जो कि बह रहा है

ये कैसा दरिया है

किन पहाड़ों से आ रहा है

ये किस समुंदर को जा रहा है

ये वक़्त क्या है


कभी कभी मैं ये सोचता हूँ

कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो

तो ऐसा लगता है

दूसरी सम्त जा रहे हैं

मगर हक़ीक़त में

पेड़ अपनी जगह खड़े हैं

तो क्या ये मुमकिन है

सारी सदियाँ

क़तार-अंदर-क़तार अपनी जगह खड़ी हों

ये वक़्त साकित हो

और हम ही गुज़र रहे हों”


यूनानी दार्शनिक Epictetus ने कहा था- “Some things are up to us, and some things are not.” यानी कुछ चीज़ें हमारे अधिकार में हैं, कुछ बिल्कुल नहीं। शायद जीवन का सारा संघर्ष इन्हीं दोनों के बीच की महीन रेखा को पहचानने का नाम है।


Spinoza इससे भी एक कदम आगे चले गए। उनका मानना था कि मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र इसलिए समझता है क्योंकि वह अपने निर्णयों को तो जानता है, लेकिन उन कारणों को नहीं जानता जिन्होंने उसे वह निर्णय लेने के लिए विवश किया।


यह बात पहली बार पढ़ी थी तो लगा, क्या सचमुच मेरी हर पसंद, हर नापसंद, हर प्रेम, हर क्रोध… मेरे बचपन, मेरे संस्कार, मेरे अनुभव, मेरी जैविक संरचना और परिस्थितियों का जोड़ मात्र है? अगर ऐसा है, तो “मैं” कहाँ हूँ?


फिर गीता सामने आती है और कहती है - 


“प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकार-विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥”


अर्थात् प्रकृति अपने गुणों से सब कर्म कराती है, पर अहंकार से मोहित मनुष्य सोचता है- “मैं ही करता हूँ।” यह श्लोक पढ़कर पहली बार लगा कि शायद प्रश्न Free Will का नहीं, Free Ego का है।


उपनिषद भी अजीब ढंग से मुस्कुराते हैं। वे कहते हैं- तुम लहर हो, यह भी सच है; तुम समुद्र हो, यह उससे भी बड़ा सच है। लहर को लगता है कि वह अपनी दिशा स्वयं तय कर रही है। समुद्र जानता है कि हर लहर उसी की अभिव्यक्ति है।


लेकिन यदि सब पहले से तय है, तो फिर नैतिकता क्यों? प्रयास क्यों? संघर्ष क्यों? शायद इसलिए कि हमें भविष्य नहीं मालूम।


कल्पना कीजिए, आपके हाथ में एक उपन्यास है जिसके अंतिम पृष्ठ पर क्या लिखा है, आपको नहीं पता। लेखक को अंत पता है, पात्र को नहीं। पात्र का हर निर्णय उसके लिए वास्तविक है। उसका साहस भी वास्तविक है, उसका डर भी।


मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर है- 


हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,

बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले।


हम इच्छाएँ करते हैं मानो सब कुछ हमारे हाथ में हो; और फिर परिणाम स्वीकार करते हैं मानो कुछ भी हमारे हाथ में न था। शायद मनुष्य होने का अर्थ ही यही विरोधाभास है।


और अंत में मुझे स्टोइक सम्राट Marcus Aurelius की बात याद आती है- 


“Accept whatever comes to you woven in the pattern of your destiny.”


लेकिन उसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि चरित्र का चुनाव तुम्हारा है। बारिश होना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन भीगते हुए मुस्कुराना या शिकायत करना- शायद यही हमारी थोड़ी-सी आज़ादी है।


और अगर आप मुझसे पूछें कि Free Will है या नहीं, तो मैं कहूँगा- 


मुझे नहीं पता।


लेकिन मेरे देखे इतना ज़रूर है कि यदि यह केवल भ्रम भी है, तो यह ब्रह्मांड का सबसे सुंदर भ्रम है। क्योंकि इसी भ्रम ने मनुष्य को कविता लिखना सिखाया, न्याय करना सिखाया, प्रेम करना सिखाया, और अपनी नियति से सवाल पूछना भी। शायद हम Destiny के सह-लेखक हों या केवल मूक दर्शक। 


✍🏻एमजे