
कल CJP के प्रदर्शन में जो कुछ हुआ, उसने लोकतंत्र के कई पुराने प्रश्नों को फिर से जीवित कर दिया। लाठियाँ चलीं, लोग गिरे, पुलिस और प्रदर्शनकारी आमने-सामने खड़े थे। लेकिन इस पूरे दृश्य में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसने पहले धक्का दिया, बल्कि यह है कि लोकतंत्र में असहमति की कीमत आखिर कितनी होनी चाहिए?
यूनानी दार्शनिक सुकरात ने कहा था, “Unexamined Life जीने योग्य नहीं होता।” यदि यह बात व्यक्ति पर लागू होती तो लोकतंत्र पर भी लागू होती है। जो लोकतंत्र अपने विरोध की परीक्षा से डर जाए, वह धीरे-धीरे केवल चुनावों का सर्कस रह जाता है, विचारों का लोकतंत्र नहीं।
भारत का संविधान हमें वोट देने का अधिकार देने के साथ ही , सवाल पूछने का भी साहस देता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और अपनी बात सरकार तक पहुँचाने का अधिकार, हर नागरिक की संवैधानिक शक्ति हैं। लेकिन उसी संविधान ने राज्य को यह दायित्व भी दिया है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे। इसलिए हर प्रदर्शन एक कठिन संतुलन की परीक्षा बन जाता है, एक ओर अधिकार, दूसरी ओर व्यवस्था।
यही कारण है कि किसी भी ऐसी घटना पर प्रतिक्रिया देने से पहले हमें पूरे तथ्य जानने चाहिए। प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और अनावश्यक बल प्रयोग हुआ, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर चोट है। लोकतंत्र की कसौटी यही है कि न विरोध हिंसक हो, न शक्ति मनमानी।
इतिहास गवाह है कि लाठी कभी केवल शरीर पर नहीं पड़ती, वह स्मृतियों पर भी पड़ती है। अंग्रेज़ों के समय लाला लाजपत राय पर चली लाठियाँ आज भी इतिहास की किताबों में दर्ज हैं। गांधी ने नमक उठाया था, हथियार नहीं। जयप्रकाश नारायण ने सत्ता से प्रश्न पूछे थे, युद्ध नहीं छेड़ा था। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही रही कि असहमति को देशद्रोह नहीं, लोकतांत्रिक ऊर्जा माना गया।
फ़्रांसीसी दार्शनिक वोल्टेयर का कथन है - “मैं तुम्हारी बात से सहमत नहीं हूँ तो भी , उसे कहने के तुम्हारे अधिकार की रक्षा करूँगा।”यही किसी भी लोकतांत्रिक समाज की आत्मा है। क्योंकि जिस दिन केवल सहमत लोगों को बोलने की अनुमति रह जाएगी, उस दिन संवाद समाप्त हो जाएगा और केवल प्रतिध्वनि बच जाएगी।
मुझे हमेशा रेल की दो पटरियाँ याद आती हैं। वे कभी एक-दूसरे से मिलती नहीं, फिर भी पूरी ट्रेन उन्हीं के संतुलन पर चलती है। सत्ता और विपक्ष, सरकार और नागरिक, पुलिस और प्रदर्शनकारी इनका रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है। इनका उद्देश्य एक-दूसरे को कुचलना नहीं, बल्कि राष्ट्र को आगे बढ़ाना होना चाहिए। यदि एक पटरी दूसरी पर चढ़ने लगे, तो दुर्घटना तय है।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं—
“बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे,
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है।”
लेकिन इसके साथ एक और बात भी जोड़नी होगी, बोलना अधिकार है, पर शांति बनाए रखना भी उतना ही बड़ा दायित्व है।लोकतंत्र अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों के सहारे चलता है।
कल की घटना पर अंतिम निर्णय अदालतें, जाँच और प्रमाण देंगे। लेकिन एक समाज के रूप में हमें आज ही यह निर्णय लेना होगा कि हम कैसा लोकतंत्र चाहते हैं, वह जिसमें प्रश्न पूछने वाले नागरिक हों, या वह जिसमें प्रश्न पूछने से पहले लोग अपने सिर पर पड़ने वाली संभावित लाठी का हिसाब लगाने लगें।
क्योंकि इतिहास ने बार-बार सिद्ध किया है कि लाठी से भीड़ को कुछ देर के लिए हटाया जा सकता है, लेकिन विचारों को कभी नहीं। विचारों का उत्तर केवल विचार होते हैं। और शायद इसी का नाम लोकतंत्र है।
देश के युवाओं के प्रश्नो का जवाब ना देने और बदले में लाठियाँ देने वाली सरकारों पर लानत है , हज़ार लानत है ।
✍🏻एमजे

