Diary Ke Panne

सोमवार, 27 जुलाई 2026

Metamorphosis


कुछ किताबें पढ़ी नहीं जातीं, वे भीतर उतर जाती हैं। वे कहानी के रूप में शुरू होती हैं, लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते आपका परिचय आपसे ही करा देती हैं। Franz Kafka की Metamorphosis मेरे लिए ऐसी ही पुस्तक रही है ।


जब मैंने पहली बार यह उपन्यासिका पढ़ी थी, तब मुझे लगा कि यह एक अजीब-सी फैंटेसी है, एक आदमी एक सुबह उठता है और देखता है कि वह एक विशाल कीड़े में बदल चुका है। बस इतनी-सी बात? क्या इसी पर दुनिया भर के विश्वविद्यालय शोध करते हैं? क्या इसी के लिए इसे विश्व साहित्य की महानतम कृतियों में गिना जाता है?


लेकिन मेरे देखे काफ्का को समझने के लिए मौन को पढ़ना पड़ता है। ग्रेगर साम्सा की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं थी कि वह कीड़ा बन गया। सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उसके बदल जाने के बाद सबसे पहले उसके अपने लोग बदल गए।


जब तक वह कमाने वाला बेटा था, घर का देवता था। जिस दिन वह उपयोगी नहीं रहा, उसी दिन वह घर के लिए बोझ बन गया। यह दृश्य पढ़ते हुए मुझे भारतीय दर्शन का एक पुराना वाक्य याद आया- 


“संसार का अधिकांश प्रेम उपयोगिता पर टिका होता है, अस्तित्व पर नहीं।”


काफ्का शायद यही कहना चाहते थे कि मनुष्य की पहचान उसके होने से कम, उसके काम आने से अधिक तय होती है। यहीं मुझे भगवद्गीता का निष्काम कर्म याद आया। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्म करो, किंतु अपनी पहचान कर्मफल से मत जोड़ो। क्योंकि जिस दिन तुम्हारी पहचान केवल उपलब्धियों पर टिक जाएगी, उस दिन उपलब्धियाँ छिनते ही तुम स्वयं भी खो जाओगे।


ग्रेगर की समस्या उसका कीड़ा बनना नहीं थी। उसकी समस्या यह थी कि उसकी पूरी पहचान केवल “कमाने वाले बेटे” की थी। जैसे ही वह भूमिका समाप्त हुई, उसके अस्तित्व का मूल्य भी समाप्त कर दिया गया।


आज सोचिए… यदि किसी दिन आपका पद छिन जाए, व्यवसाय बंद हो जाए, नौकरी चली जाए, सोशल मीडिया के सारे फ़ॉलोअर्स गायब हो जाएँ, क्या तब भी लोग आपको उसी सम्मान से देखेंगे?


शायद उत्तर है नहीं । यदि उत्तर “नहीं” है, तो हम सब कहीं-न-कहीं ग्रेगर साम्सा ही हैं। काफ्का का साहित्य यहीं भयावह हो जाता है। वह किसी राक्षस की कहानी नहीं लिखते। वह आईना लिखते हैं। क्यूँकि ग्रेगर उस माँ को को कहते हुए सुनता है , वो माँ जिसे अपने बेटे से बेहद प्रेम था एक दिन अपने पति और बेटी से कह रही होती है कि हमें कब इस कीड़े से निजात मिलेगी। 


मुझे अल्बेयर कामू का Absurdism याद आता है। कामू कहते थे कि संसार अर्थ देने के लिए बाध्य नहीं है। अर्थ हमें स्वयं गढ़ना पड़ता है। काफ्का इससे भी एक कदम आगे जाते हैं। वे दिखाते हैं कि कई बार संसार आपको अर्थ गढ़ने का अवसर भी नहीं देता; वह पहले ही आपको एक फ़ाइल, एक कर्मचारी, एक नंबर या एक उपयोगिता में बदल चुका होता है।


और यह केवल साहित्य नहीं है। कॉरपोरेट दफ़्तरों में, न्यायालयों में, विश्वविद्यालयों में, राजनीति में, कितने ही लोग अपने नाम से नहीं, अपनी भूमिका से पहचाने जाते हैं।


“वह जज है।” “वह प्रोफेसर है।” “वह सीईओ है।” लेकिन कोई यह नहीं पूछता, “वह इंसान कैसा है?


लेकिन आधुनिक सभ्यता और रोज़ मर्रा की उठापटक ने ने हमें भीतर से इतना व्यस्त बना दिया है कि हम स्वयं से मिल ही नहीं पाते। और जिनके पास फुर्सत है उनको उनका ख़ुद का दिमाग़ ही खाए जा रहा है ।


Metamorphosis केवल एक मनुष्य के कीड़ा बनने की कथा नहीं है। यह हर उस क्षण की कहानी है, जब समाज किसी व्यक्ति को उसकी मानवता से वंचित कर केवल उसकी उपयोगिता से मापने लगता है। 


आज Artificial Intelligence के युग में सबसे बड़ा प्रश्न यही है, यदि मशीनें हमारा अधिकांश काम करने लगें, तो क्या हमारी कीमत भी घट जाएगी? यदि मनुष्य का मूल्य केवल उसकी उत्पादकता है, तो मशीनें जीत जाएँगी। लेकिन यदि मनुष्य का मूल्य उसकी संवेदना, करुणा, कल्पना और आत्मबोध है, तो कोई मशीन कभी मनुष्य का स्थान नहीं ले सकती।


शायद इसी कारण Metamorphosis आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 1915 में थी। 


मुझे याद है किताब पढ़ कर बंद करने के बाद मैं कई दिनों तक ये सोचता रहा था कि हम सब अपने-अपने जीवन में किसी-न-किसी रूपांतरण से गुजरते हैं। उम्र बदलती है, रिश्ते बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं। प्रश्न यह नहीं कि परिवर्तन होगा या नहीं। प्रश्न यह है- जब सब बदल जाएगा, तब भी हमारे आसपास के लोग हमें इंसान ही समझेंगे ? काफ्का ने इस प्रश्न का उत्तर “नहीं” में दिया है।


बेहद डार्क और अब्सर्ड है काफ़्का की ये लेखनी, बिल्कुल जीवन की तरह ।


✍🏻एमजे 

रविवार, 26 जुलाई 2026

होमर की महान रचना - ओडिसी

हाल ही में श्रीमती जी के साथ क्रिस्टोफर नोलन की The Odyssey देखी। क्रिस्टोफर नोलन सिनेमा के महान चित्रकार हैं। उनसे बेहतर इस विधा को कहने वाला मेरी नज़र में कोई दूसरा नहीं। थिएटर से लौटते समय बार-बार एक ही विचार मन में आ रहा था, मनुष्य बदल जाता है, साम्राज्य मिट जाते हैं, भाषाएँ बदल जाती हैं, लेकिन अच्छी कहानियों की उम्र शायद समय से भी अधिक होती है।


लगभग अट्ठाईस सौ वर्ष पहले एजियन सागर के किनारे एक कवि ने एक कहानी कही थी। आज उसी कहानी को IMAX के विशाल पर्दे पर बैठकर दुनिया सुन रही है। यदि यह कला की अमरता नहीं है, तो फिर अमरता किसे कहेंगे?


होमर… इतिहास आज भी उनके बारे में अंतिम निर्णय नहीं दे पाया है। कुछ विद्वान कहते हैं कि वे एक अंधे कवि थे। कुछ कहते हैं कि “होमर” कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों तक चली मौखिक परंपरा का नाम है। लेकिन इससे क्या फ़र्क पड़ता है? शेक्सपियर को भी लेकर विवाद हैं, व्यास को लेकर भी हैं। लेखक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसकी रचना होती है।


माना जाता है कि Odyssey लगभग आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व लिखी गई। सोचिए, जब भारत में उपनिषदों की गूँज आकार ले रही थी, तब भूमध्यसागर के किनारे कोई मनुष्य घर लौटने की सबसे महान कथा लिख रहा था।


मेरे हाथ Odyssey वर्षों पहले लगी थी। कानून की किताबें पढ़ते-पढ़ते आदत बन गई थी कि बीच-बीच में इतिहास, दर्शन और साहित्य भी पढ़ा जाए। एक दिन विश्व साहित्य के खंड में यह पुस्तक मिल गई। मुझे लगा होगा, कोई युद्ध कथा होगी, कोई राजा होगा, तलवारें होंगी, विजय होगी। लेकिन कुछ अध्याय पढ़ने के बाद समझ आया कि यह युद्ध जीतने वाले आदमी की कहानी नहीं है; यह युद्ध के बाद भी इंसान बने रहने वाले आदमी की कहानी है।


उस समय एक बात ने मुझे भीतर तक चौंकाया था। हम बचपन से सीखते हैं कि नायक सबसे शक्तिशाली होता है। लेकिन ओडीसियस की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भुजाएँ नहीं थीं। उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी, धैर्य। वह जानता था कि कब लड़ना है, कब छिपना है, कब चुप रहना है और कब अपना नाम भी नहीं बताना है।


कानून पढ़ने वाले विद्यार्थियों को यह बात विशेष रूप से समझनी चाहिए। हर मुक़दमा अदालत में बहस से नहीं जीता जाता। कई मुक़दमे सही समय की प्रतीक्षा से जीते जाते हैं। यही बात जीवन के हर युद्ध पर लागू होती है।


शायद इसीलिए मुझे Odyssey हमेशा एक महाकाव्य से अधिक मनोविज्ञान की पुस्तक लगी। नोलन ने इस कठिनाई को समझा है। होमर की सबसे बड़ी चुनौती युद्ध नहीं थी; मनुष्य का मन था। और नोलन की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उन्होंने उस मन को दृश्य दे दिया।


फ़िल्म में कई संवाद देर तक साथ रहते हैं। वे ऐसे संवाद नहीं हैं जिन पर लोग सीटियाँ बजाएँ। वे ऐसे संवाद हैं जिन्हें सुनकर कुछ क्षण के लिए मनुष्य अपने भीतर चला जाता है। जैसे ओडिसियस जब अपने बेटे से पहली बार मिलता है तो उसका बेटा पूछता है आप कौन हैं ? आपकी आँखों में देवताओं सी चमक है। ओडिसियस जवाब देते हैं- मनुष्यों में देवताओं को मत ढूँढो निराशा हाथ लगेगी। 


और मेरा फेवरेट दृश्य, जिसकी चर्चा किए बिना यह लेख अधूरा रहेगा, वह है, धनुष परीक्षा।


मैंने वह प्रसंग पुस्तक में पढ़ा था। पढ़ते समय रोमांच हुआ था। लेकिन पर्दे पर उसे देखना एक अलग अनुभव था।


सैकड़ों लोग, एक धनुष, असफल होते योद्धा और भीड़ के बीच एक साधारण-सा दिखने वाला अजनबी।


दृश्य इतना शांत रखा गया है कि आपको लगता है जैसे पूरा सभागार साँस रोककर बैठा है। वह अजनबी बिना किसी प्रदर्शन के धनुष उठाता है। कोई वीरता का भाषण नहीं। कोई अनावश्यक नाटकीयता नहीं। केवल एक सहज गति… प्रत्यंचा चढ़ती है… और तीर अपने नियत मार्ग पर निकल जाता है।


उसी क्षण पहचान लौट आती है। ये तो ओडिसियस है, महान योद्धा। जीवन में हमें भी बार-बार अपना परिचय देना पड़े तो ये एक बेकार और सतही जीवन हुआ लेकिन एक सही क्षण, एक सही कर्म और वर्षों के संदेह समाप्त हो जाएँ तो बात बने। 


नोलन ने इस दृश्य को जितने संयम से रचा है, वही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।


और फिर संगीत… लुडविग गोरानसन  ने क्या कमाल का बैकग्राउंड स्कोर दिया है , जो मन के आकाश में देर तक गुंजायमान होता रहता है। यदि आपने कभी समुद्र को ध्यान से सुना हो, तो आप जानते होंगे कि उसकी आवाज़ में एक साथ भय भी होता है और आकर्षण भी। फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर बार-बार वही अनुभव कराता है। कहीं वह लहरों जैसा लगता है, कहीं किसी सैनिक की धड़कन जैसा और कहीं किसी बूढ़े मनुष्य की स्मृतियों जैसा।


मेरे लिए यह फ़िल्म किसी राजा के घर लौटने की कहानी नहीं रही। यह हर उस मनुष्य की कहानी है जिसने अपने जीवन में कभी लंबा रास्ता तय किया है। जिसने अपने हिस्से का अकेलापन देखा है। जिसने कई बार अपनी पहचान छिपाकर काम किया है। जिसने यह सीखा है कि हर युद्ध तलवार से नहीं जीता जाता।


मुझे अचानक महाभारत का यक्ष-प्रश्न याद आया, जहाँ बुद्धि बल से बड़ी हो जाती है। फिर रामायण का वह वनवास याद आया जिसमें चौदह वर्ष केवल दूरी नहीं थे, चरित्र की परीक्षा थे। और फिर उपनिषदों का वह आग्रह, मनुष्य बाहर जितना चलता है, उससे कहीं अधिक भीतर चलता है।


शायद इसी कारण अलग-अलग सभ्यताओं की महान कथाएँ एक-दूसरे से मिलती-जुलती दिखाई देती हैं। पात्र बदल जाते हैं, भूगोल बदल जाता है, लेकिन मनुष्य का संघर्ष नहीं बदलता।


आज से लगभग तीन हज़ार वर्ष पहले होमर ने जो प्रश्न पूछा था, वही प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है- 


घर क्या है? क्या वह केवल वह स्थान है जहाँ हम रहते हैं? या वह अवस्था है जहाँ पहुँचकर हमें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती?


क्रिस्टोफर नोलन ने इस महान प्रश्न को फिर से जीवित कर दिया। और शायद महान कलाकार का काम उत्तर देना नहीं, सही प्रश्न छोड़ जाना होता है। उत्तर तो हमारे आसपास मंडराते रहते हैं ।


✍🏻एमजे 


सोमवार, 20 जुलाई 2026

लानत है😡


कल CJP के प्रदर्शन में जो कुछ हुआ, उसने लोकतंत्र के कई पुराने प्रश्नों को फिर से जीवित कर दिया। लाठियाँ चलीं, लोग गिरे, पुलिस और प्रदर्शनकारी आमने-सामने खड़े थे। लेकिन इस पूरे दृश्य में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसने पहले धक्का दिया, बल्कि यह है कि लोकतंत्र में असहमति की कीमत आखिर कितनी होनी चाहिए?


यूनानी दार्शनिक सुकरात ने कहा था, Unexamined Life   जीने योग्य नहीं होता। यदि यह बात व्यक्ति पर लागू होती तो लोकतंत्र पर भी लागू होती है। जो लोकतंत्र अपने विरोध की परीक्षा से डर जाए, वह धीरे-धीरे केवल चुनावों का सर्कस रह जाता है, विचारों का लोकतंत्र नहीं।


भारत का संविधान हमें वोट देने का अधिकार देने के साथ ही , सवाल पूछने का भी साहस देता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का अधिकार और अपनी बात सरकार तक पहुँचाने का अधिकार, हर नागरिक की संवैधानिक शक्ति हैं। लेकिन उसी संविधान ने राज्य को यह दायित्व भी दिया है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे। इसलिए हर प्रदर्शन एक कठिन संतुलन की परीक्षा बन जाता है, एक ओर अधिकार, दूसरी ओर व्यवस्था।


यही कारण है कि किसी भी ऐसी घटना पर प्रतिक्रिया देने से पहले हमें पूरे तथ्य जानने चाहिए। प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और अनावश्यक बल प्रयोग हुआ, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर चोट है। लोकतंत्र की कसौटी यही है कि न विरोध हिंसक हो, न शक्ति मनमानी।


इतिहास गवाह है कि लाठी कभी केवल शरीर पर नहीं पड़ती, वह स्मृतियों पर भी पड़ती है। अंग्रेज़ों के समय लाला लाजपत राय पर चली लाठियाँ आज भी इतिहास की किताबों में दर्ज हैं। गांधी ने नमक उठाया था, हथियार नहीं। जयप्रकाश नारायण ने सत्ता से प्रश्न पूछे थे, युद्ध नहीं छेड़ा था। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही रही कि असहमति को देशद्रोह नहीं, लोकतांत्रिक ऊर्जा माना गया।


फ़्रांसीसी दार्शनिक वोल्टेयर का कथन है - मैं तुम्हारी बात से सहमत नहीं हूँ तो भी , उसे कहने के तुम्हारे अधिकार की रक्षा करूँगा।यही किसी भी लोकतांत्रिक समाज की आत्मा है। क्योंकि जिस दिन केवल सहमत लोगों को बोलने की अनुमति रह जाएगी, उस दिन संवाद समाप्त हो जाएगा और केवल प्रतिध्वनि बच जाएगी।


मुझे हमेशा रेल की दो पटरियाँ याद आती हैं। वे कभी एक-दूसरे से मिलती नहीं, फिर भी पूरी ट्रेन उन्हीं के संतुलन पर चलती है। सत्ता और विपक्ष, सरकार और नागरिक, पुलिस और प्रदर्शनकारी इनका रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है। इनका उद्देश्य एक-दूसरे को कुचलना नहीं, बल्कि राष्ट्र को आगे बढ़ाना होना चाहिए। यदि एक पटरी दूसरी पर चढ़ने लगे, तो दुर्घटना तय है।


फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं—


“बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे,

बोल ज़बाँ अब तक तेरी है।”


लेकिन इसके साथ एक और बात भी जोड़नी होगी, बोलना अधिकार है, पर शांति बनाए रखना भी उतना ही बड़ा दायित्व है।लोकतंत्र अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों के सहारे चलता है।


कल की घटना पर अंतिम निर्णय अदालतें, जाँच और प्रमाण देंगे। लेकिन एक समाज के रूप में हमें आज ही यह निर्णय लेना होगा कि हम कैसा लोकतंत्र चाहते हैं, वह जिसमें प्रश्न पूछने वाले नागरिक हों, या वह जिसमें प्रश्न पूछने से पहले लोग अपने सिर पर पड़ने वाली संभावित लाठी का हिसाब लगाने लगें।


क्योंकि इतिहास ने बार-बार सिद्ध किया है कि लाठी से भीड़ को कुछ देर के लिए हटाया जा सकता है, लेकिन विचारों को कभी नहीं। विचारों का उत्तर केवल विचार होते हैं। और शायद इसी का नाम लोकतंत्र है।


देश के युवाओं के प्रश्नो का जवाब ना देने और बदले में लाठियाँ देने वाली सरकारों पर लानत है , हज़ार लानत है । 


✍🏻एमजे 

रविवार, 19 जुलाई 2026

दास्तान ए फुटबॉल


तो आज बात करेंगे फुटबॉल की, हम सब ने बचपन में शायद पहला खेल जो खेला है वो फुटबॉल ही होगा , अगर किसी खेल ने मेरे बचपन को भी सबसे ज़्यादा रंग दिया है, तो वह फुटबॉल ही है।


आज जब फीफा वर्ल्ड कप 2026 समाप्त हो चुका है, तो उसकी तस्वीरों के साथ अनायास बचपन की वे दोपहरें लौट आती हैं, जब हमारे लिए फुटबॉल स्कूल की छुट्टी मिलते ही शुरू हो जाने वाला उत्सव था।


स्कूल में जब कभी अचानक छुट्टी हो जाती थी, किसी की मृत्यु के कारण, किसी प्रशासनिक वजह से या फिर किसी ऐसी अनूठी परिस्थिति में जिसका हमें पहले से अंदाज़ा नहीं होता था, तो दूसरे बच्चों के लिए वह छुट्टी होती थी, हमारे लिए वह मैच का ऐलान होता था।


बैग क्लास में ही पटक देते थे और सीधे मैदान की ओर भाग जाते थे। बारिश हो रही है, मैदान में पानी भरा है, कपड़े गंदे होंगे या घर पहुँचकर डाँट पड़ेगी, इन बातों का उस समय कोई मतलब नहीं था। बल्कि मैदान में जितना अधिक कीचड़ होता था, खेल उतना ही यादगार बन जाता था।


हमारे पास महँगे स्टड्स, ब्रांडेड जर्सी, घास से चमकते मैदान या प्रशिक्षित कोच नहीं थे। दो ईंटें रखकर गोलपोस्ट बन जाता था। कई बार गेंद की आधी हवा निकली होती थी, फिर भी खेल पूरा होता था ।


कभी गेंद सीमा से बाहर चली गई तो बहस शुरू हो जाती थी कि थ्रो-इन किसे मिलेगा। कभी किसी ने हाथ लगा दिया तो आधे खिलाड़ी हैंडबॉल चिल्लाते थे और बाकी आधे कहते थे, “जानबूझकर थोड़ी लगाया है!” फिर देर तक बहस ।


कई बार गोल हुआ या नहीं, इसका फैसला गेंद से नहीं, आवाज़ की ताकत से होता था। जिस टीम के खिलाड़ी ज़्यादा ज़ोर से चिल्ला दिए, उसका दावा थोड़ा मज़बूत हो जाता था।


घुटने छिलते थे, कपड़े कीचड़ से भर जाते थे, कोई फिसलकर गिरता था तो पहले सब हँसते थे और फिर हाथ पकड़कर उठा देते थे। शायद वहीं फुटबॉल ने जीवन का पहला बड़ा पाठ सिखाया, 

गिरना खेल का अंत नहीं होता; पड़े रहना खेल का अंत होता है।


एक बात और थी।


जब गेंद किसी एक खिलाड़ी के पैरों में होती थी, तो पूरे मैदान की निगाह उसी पर टिक जाती थी। तभी शायद पहली बार मुझे ये समझ आया कि ज़िम्मेदारी हमेशा उसी के हिस्से आती है, जिसके पास गेंद होती है।


जीवन भी कुछ ऐसा ही है। अवसर आपके पास हो, तो निर्णय भी आपको ही लेना पड़ेगा। आप गेंद किसी और को पास कर सकते हैं, लेकिन कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब गोलपोस्ट सामने होता है और निर्णय आपके अपने पैर को लेना पड़ता है।


कक्षा नौवीं तक आते-आते फुटबॉल धीरे-धीरे पीछे छूट गया और मैंने बास्केटबॉल को अपना लिया। बास्केटबॉल में गति थी, छलाँग थी, तालमेल था और बहुत तेज़ निर्णय लेने पड़ते थे। फिर ग्यारहवीं के बाद क्रिकेट ने लगभग सारे खेलों की जगह ले ली। उसके बाद फुटबॉल नहीं खेला, लेकिन कीचड़ में खेली गई उस फुटबॉल की मिट्टी शायद मन से कभी नहीं उतरी।


दिलचस्प बात यह है कि मैंने 2026 से पहले कभी फुटबॉल वर्ल्ड कप को गंभीरता से फ़ॉलो नहीं किया। न मैंने माराडोना के दौर को समझकर देखा, न ज़िदान की कला को, न मेस्सी और रोनाल्डो की पूरी प्रतिद्वंद्विता को बैठकर जिया।


घर में भी इन दिनों फुटबॉल का ख़ूब बुखार रहा। मेरे बेटे ने रोनाल्डो की जर्सी मँगवाई। मज़े की बात यह है कि वह मेस्सी का प्रशंसक भी है। रोनाल्डो की टीम फ़ाइनल तक नहीं पहुँची, लेकिन उसे कोई ग़म नहीं था। उसकी खुशी का कारण बिल्कुल साफ़ था “रोनाल्डो नहीं पहुँचा तो क्या हुआ, मेस्सी तो पहुँच गया!”


बच्चों का दिल शायद हमसे अधिक उदार होता है। हम बड़े लोग अक्सर किसी एक महानता को स्वीकार करने के लिए दूसरी महानता को छोटा करना चाहते हैं। बच्चे रोनाल्डो की मेहनत और मेस्सी की कला, दोनों से एक साथ प्रेम कर सकते हैं।


मेस्सी को खेलते हुए देखकर मुझे बार-बार लगता है कि कुछ खिलाड़ी गेंद को केवल आगे बढ़ाते हैं, लेकिन कुछ खिलाड़ी गेंद से बातें करते हैं। मेस्सी की सबसे बड़ी ताक़त केवल उनकी गति नहीं है। उनकी असली कला यह है कि वे गेंद प्राप्त करने से पहले ही अगला दृश्य देख लेते हैं। वे खाली जगह को वहाँ देख लेते हैं, जहाँ सामान्य दर्शक को केवल खिलाड़ियों की भीड़ दिखाई देती है।


सेमीफ़ाइनल में इंग्लैंड के विरुद्ध अर्जेंटीना एक समय पीछे था। खेल के अंतिम हिस्से तक इंग्लैंड 1–0 से आगे चल रहा था, लेकिन अर्जेंटीना ने अंतिम मिनटों में अविश्वसनीय वापसी की। एंज़ो फर्नांडेज़ ने 85वें मिनट में बराबरी का गोल किया और फिर इंजरी टाइम में लाउतारो मार्टिनेज़ के गोल ने अर्जेंटीना को 2–1 की जीत के साथ फ़ाइनल में पहुँचा दिया। मेस्सी उस मैच में गोल करने वाले खिलाड़ी नहीं थे, लेकिन महान खिलाड़ी का प्रभाव हमेशा स्कोरशीट पर ही दर्ज हो, यह ज़रूरी तो नहीं । कई बार उसकी उपस्थिति ही विरोधी टीम की रचना बदल देती है।


दो डिफ़ेंडर उसकी ओर खिंचते हैं और किसी तीसरे खिलाड़ी के लिए जगह बन जाती है। वह गेंद को एक कपल अधिक रोकता है और उसी एक पल में पूरी डिफ़ेंसिव लाइन अपनी जगह खो देती है। मेरे देखे कुछ कलाएँ संख्या में नहीं आतीं।


जैसे किसी अच्छे शिक्षक की भूमिका केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि उसने कितने पन्ने पढ़ाए; कभी-कभी उसने किसी विद्यार्थी के भीतर प्रश्न पूछने का साहस पैदा किया होता है।


फ़ाइनल में अर्जेंटीना के सामने स्पेन था, एक ऐसी टीम जिसने पूरे टूर्नामेंट में गेंद पर नियंत्रण, धैर्य, और अनुशासन अद्भुत प्रदर्शन किया। स्पेन ने फ़ाइनल में अर्जेंटीना को लगातार दबाव में रखा। निर्धारित समय तक कोई गोल नहीं हुआ, इसलिए मुकाबला एक्स्ट्रा टाइम में गया। 


फिर 106वें मिनट में वह क्षण आया जिसने पूरा इतिहास बदल दिया। पेद्रो पोरो की ओर से आई गेंद को निको विलियम्स ने आगे पहुँचाया और फेरान टोरेस ने उसे गोल में बदल दिया। स्पेन 1–0 से आगे हो गया। अर्जेंटीना ने आख़िरी प्रयास किए, लेकिन स्पेन का डिफेंस नहीं टूटा । इसी गोल के साथ स्पेन ने दूसरी बार फीफा वर्ल्ड कप जीत लिया और अर्जेंटीना का लगातार दूसरा विश्व खिताब जीतने का सपना अधूरा रह गया। 


फ़ाइनल में मेस्सी का जादू वैसा नहीं चल सका, जिसकी उनके प्रशंसकों को उम्मीद थी। स्पेन ने उनको खेलने की जगह ही नहीं दी । जैसे ही गेंद मेस्सी तक पहुँचती, स्पेन के खिलाड़ी उनके विकल्प बंद कर देते। महानतम कलाकार भी तभी चित्र बना सकता है, जब कैनवास पर थोड़ी जगह बची हो। स्पेन ने उस रात मेस्सी को वही जगह नहीं दी। 


लेकिन शायद महानता का अर्थ हर कहानी का सुखद अंत होना भी नहीं है। हम अक्सर मान लेते हैं कि महान व्यक्ति की यात्रा का अंत भी महान विजय में होना चाहिए। जबकि जीवन ऐसा कोई वादा नहीं करता।


जीवन और खेल की सबसे कठोर सच्चाई यही है कि  हर खिलाड़ी को एक दिन मैदान से बाहर जाना होता है ।


गेंद आपके पास आएगी और चली जाएगी। कभी आपका पास सही होगा, कभी गेंद छिन जाएगी। कभी आपका शॉट गोलपोस्ट से टकराकर भीतर चला जाएगा और कभी वही गेंद एक इंच बाहर निकल जाएगी। जो भी हो आपको सफलता का गोल करने के लिए कभी भी मन माफिक माहौल नहीं मिलेगा आपके आसपास के लोग ही गेंद छीनने का प्रयास करते रहेंगे। बावजूद इसके अगर मैदान में उतरे हो तो खेलना तो होगा। 


✍🏻एमजे