Diary Ke Panne

रविवार, 26 जुलाई 2026

होमर की महान रचना - ओडिसी

हाल ही में श्रीमती जी के साथ क्रिस्टोफर नोलन की The Odyssey देखी। क्रिस्टोफर नोलन सिनेमा के महान चित्रकार हैं। उनसे बेहतर इस विधा को कहने वाला मेरी नज़र में कोई दूसरा नहीं। थिएटर से लौटते समय बार-बार एक ही विचार मन में आ रहा था, मनुष्य बदल जाता है, साम्राज्य मिट जाते हैं, भाषाएँ बदल जाती हैं, लेकिन अच्छी कहानियों की उम्र शायद समय से भी अधिक होती है।


लगभग अट्ठाईस सौ वर्ष पहले एजियन सागर के किनारे एक कवि ने एक कहानी कही थी। आज उसी कहानी को IMAX के विशाल पर्दे पर बैठकर दुनिया सुन रही है। यदि यह कला की अमरता नहीं है, तो फिर अमरता किसे कहेंगे?


होमर… इतिहास आज भी उनके बारे में अंतिम निर्णय नहीं दे पाया है। कुछ विद्वान कहते हैं कि वे एक अंधे कवि थे। कुछ कहते हैं कि “होमर” कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों तक चली मौखिक परंपरा का नाम है। लेकिन इससे क्या फ़र्क पड़ता है? शेक्सपियर को भी लेकर विवाद हैं, व्यास को लेकर भी हैं। लेखक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसकी रचना होती है।


माना जाता है कि Odyssey लगभग आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व लिखी गई। सोचिए, जब भारत में उपनिषदों की गूँज आकार ले रही थी, तब भूमध्यसागर के किनारे कोई मनुष्य घर लौटने की सबसे महान कथा लिख रहा था।


मेरे हाथ Odyssey वर्षों पहले लगी थी। कानून की किताबें पढ़ते-पढ़ते आदत बन गई थी कि बीच-बीच में इतिहास, दर्शन और साहित्य भी पढ़ा जाए। एक दिन विश्व साहित्य के खंड में यह पुस्तक मिल गई। मुझे लगा होगा, कोई युद्ध कथा होगी, कोई राजा होगा, तलवारें होंगी, विजय होगी। लेकिन कुछ अध्याय पढ़ने के बाद समझ आया कि यह युद्ध जीतने वाले आदमी की कहानी नहीं है; यह युद्ध के बाद भी इंसान बने रहने वाले आदमी की कहानी है।


उस समय एक बात ने मुझे भीतर तक चौंकाया था। हम बचपन से सीखते हैं कि नायक सबसे शक्तिशाली होता है। लेकिन ओडीसियस की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भुजाएँ नहीं थीं। उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी, धैर्य। वह जानता था कि कब लड़ना है, कब छिपना है, कब चुप रहना है और कब अपना नाम भी नहीं बताना है।


कानून पढ़ने वाले विद्यार्थियों को यह बात विशेष रूप से समझनी चाहिए। हर मुक़दमा अदालत में बहस से नहीं जीता जाता। कई मुक़दमे सही समय की प्रतीक्षा से जीते जाते हैं। यही बात जीवन के हर युद्ध पर लागू होती है।


शायद इसीलिए मुझे Odyssey हमेशा एक महाकाव्य से अधिक मनोविज्ञान की पुस्तक लगी। नोलन ने इस कठिनाई को समझा है। होमर की सबसे बड़ी चुनौती युद्ध नहीं थी; मनुष्य का मन था। और नोलन की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उन्होंने उस मन को दृश्य दे दिया।


फ़िल्म में कई संवाद देर तक साथ रहते हैं। वे ऐसे संवाद नहीं हैं जिन पर लोग सीटियाँ बजाएँ। वे ऐसे संवाद हैं जिन्हें सुनकर कुछ क्षण के लिए मनुष्य अपने भीतर चला जाता है। जैसे ओडिसियस जब अपने बेटे से पहली बार मिलता है तो उसका बेटा पूछता है आप कौन हैं ? आपकी आँखों में देवताओं सी चमक है। ओडिसियस जवाब देते हैं- मनुष्यों में देवताओं को मत ढूँढो निराशा हाथ लगेगी। 


और मेरा फेवरेट दृश्य, जिसकी चर्चा किए बिना यह लेख अधूरा रहेगा, वह है, धनुष परीक्षा।


मैंने वह प्रसंग पुस्तक में पढ़ा था। पढ़ते समय रोमांच हुआ था। लेकिन पर्दे पर उसे देखना एक अलग अनुभव था।


सैकड़ों लोग, एक धनुष, असफल होते योद्धा और भीड़ के बीच एक साधारण-सा दिखने वाला अजनबी।


दृश्य इतना शांत रखा गया है कि आपको लगता है जैसे पूरा सभागार साँस रोककर बैठा है। वह अजनबी बिना किसी प्रदर्शन के धनुष उठाता है। कोई वीरता का भाषण नहीं। कोई अनावश्यक नाटकीयता नहीं। केवल एक सहज गति… प्रत्यंचा चढ़ती है… और तीर अपने नियत मार्ग पर निकल जाता है।


उसी क्षण पहचान लौट आती है। ये तो ओडिसियस है, महान योद्धा। जीवन में हमें भी बार-बार अपना परिचय देना पड़े तो ये एक बेकार और सतही जीवन हुआ लेकिन एक सही क्षण, एक सही कर्म और वर्षों के संदेह समाप्त हो जाएँ तो बात बने। 


नोलन ने इस दृश्य को जितने संयम से रचा है, वही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।


और फिर संगीत… लुडविग गोरानसन  ने क्या कमाल का बैकग्राउंड स्कोर दिया है , जो मन के आकाश में देर तक गुंजायमान होता रहता है। यदि आपने कभी समुद्र को ध्यान से सुना हो, तो आप जानते होंगे कि उसकी आवाज़ में एक साथ भय भी होता है और आकर्षण भी। फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर बार-बार वही अनुभव कराता है। कहीं वह लहरों जैसा लगता है, कहीं किसी सैनिक की धड़कन जैसा और कहीं किसी बूढ़े मनुष्य की स्मृतियों जैसा।


मेरे लिए यह फ़िल्म किसी राजा के घर लौटने की कहानी नहीं रही। यह हर उस मनुष्य की कहानी है जिसने अपने जीवन में कभी लंबा रास्ता तय किया है। जिसने अपने हिस्से का अकेलापन देखा है। जिसने कई बार अपनी पहचान छिपाकर काम किया है। जिसने यह सीखा है कि हर युद्ध तलवार से नहीं जीता जाता।


मुझे अचानक महाभारत का यक्ष-प्रश्न याद आया, जहाँ बुद्धि बल से बड़ी हो जाती है। फिर रामायण का वह वनवास याद आया जिसमें चौदह वर्ष केवल दूरी नहीं थे, चरित्र की परीक्षा थे। और फिर उपनिषदों का वह आग्रह, मनुष्य बाहर जितना चलता है, उससे कहीं अधिक भीतर चलता है।


शायद इसी कारण अलग-अलग सभ्यताओं की महान कथाएँ एक-दूसरे से मिलती-जुलती दिखाई देती हैं। पात्र बदल जाते हैं, भूगोल बदल जाता है, लेकिन मनुष्य का संघर्ष नहीं बदलता।


आज से लगभग तीन हज़ार वर्ष पहले होमर ने जो प्रश्न पूछा था, वही प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है- 


घर क्या है? क्या वह केवल वह स्थान है जहाँ हम रहते हैं? या वह अवस्था है जहाँ पहुँचकर हमें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती?


क्रिस्टोफर नोलन ने इस महान प्रश्न को फिर से जीवित कर दिया। और शायद महान कलाकार का काम उत्तर देना नहीं, सही प्रश्न छोड़ जाना होता है। उत्तर तो हमारे आसपास मंडराते रहते हैं ।


✍🏻एमजे 


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