Diary Ke Panne

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

हैराँ हूँ….


क़ानून के अलावा अगर किसी एक विषय ने मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित किया है, तो वह है फिजिक्स। शायद इसलिए कि क़ानून और फिजिक्स, दोनों एक ही सवाल का जवाब खोजते हैं।

“दुनिया चलती कैसे है?”


फ़र्क बस इतना है कि क़ानून समाज के नियम समझाता है, और फिजिक्स ब्रह्मांड के।


मुझे याद है, लगभग पंद्रह-सोलह वर्ष पहले मैंने स्टीफन हॉकिंग की पुस्तक “ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम” पढ़नी शुरू की थी। सच कहूँ तो पहली बार में आधी बातें समझ ही नहीं आईं। कई पन्ने दो-दो, तीन-तीन बार पढ़ने पड़े। फिर इस पर बनी हॉलीवुड मूवी भी देखी । स्टीफन हॉकिंग ने पहली बार मुझे एक ऐसे विचार से परिचित कराया जिसने मेरी सोच बदल दी।


स्पेस-टाइम फैब्रिक।


पहले मुझे लगता था कि अंतरिक्ष यानी स्पेस एक खाली मैदान है, जहाँ ग्रह और तारे इधर-उधर घूम रहे हैं। लेकिन आइंस्टीन ने कहा कि स्पेस खाली नहीं है। वह एक तरह का अदृश्य फैब्रिक है, एक ऐसा ताना-बाना जिसमें स्पेस और टाइम दोनों एक साथ जुड़े हुए हैं।


इसे समझने का सबसे आसान तरीका है एक रबर की चादर की कल्पना करना। उस चादर पर अगर आप एक भारी गेंद रख दें, तो चादर नीचे की ओर धँस जाती है। अब उसी चादर पर एक छोटी गेंद घुमाइए। वह सीधी नहीं चलेगी। वह बड़ी गेंद के आसपास मुड़ती हुई घूमने लगेगी।


हम बचपन से पढ़ते आए हैं कि पृथ्वी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण उसके चारों ओर घूमती है। लेकिन आइंस्टीन ने कहा सूर्य पृथ्वी को खींच नहीं रहा। सूर्य ने अपने विशाल द्रव्यमान से स्पेस-टाइम को मोड़ दिया है, और पृथ्वी उसी मुड़े हुए रास्ते पर चल रही है।


क्या अद्भुत विचार है!


यानी कभी-कभी रास्ता बदलने के लिए किसी को धक्का नहीं देना पड़ता। केवल उसके आसपास की दुनिया का ज्यामिति बदल दीजिए, उसका रास्ता अपने-आप बदल जाएगा।


शायद यही बात इंसानों पर भी लागू होती है।


कई बार हम लोगों को बदलने की कोशिश करते रहते हैं, जबकि बदलने की ज़रूरत व्यक्ति की नहीं, उसके एनवायरनमेंट की होती है।


मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर भी अनायास याद आता है—


“हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं,

मक़दूर हो तो साथ रखूँ नौहागर को मैं।”


ग़ालिब की हैरानी इंसान के भीतर की थी, और मेरी हैरानी ब्रह्मांड को लेकर है । लेकिन दोनों की को जानने की मंज़िल एक ही है, सवाल पूछना।


और मेरे देखे शायद सभ्यता आगे भी सवाल पूछने वालों ने ही बढ़ाई है, जवाब देने वालों ने नहीं।


और आज सवाल पूछने वाले ही नहीं रहे , मीडिया मसखरी में लगी है , मसखरे खबर दे रहे हैं , और जो सही सवाल उठा रहा है या तो वो घबराया हुआ है या उसको पहले ही देश विरोधी घोषित कर दिया गया है ।


बहरहाल मुझे फिजिक्स बेहद पसंद है क्यूँकि ये हमें हमारी औक़ात भी बताती है… और संभावनाएँ भी।


- एमजे 

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