Diary Ke Panne

सोमवार, 27 जुलाई 2026

Metamorphosis


कुछ किताबें पढ़ी नहीं जातीं, वे भीतर उतर जाती हैं। वे कहानी के रूप में शुरू होती हैं, लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते आपका परिचय आपसे ही करा देती हैं। Franz Kafka की Metamorphosis मेरे लिए ऐसी ही पुस्तक रही है ।


जब मैंने पहली बार यह उपन्यासिका पढ़ी थी, तब मुझे लगा कि यह एक अजीब-सी फैंटेसी है, एक आदमी एक सुबह उठता है और देखता है कि वह एक विशाल कीड़े में बदल चुका है। बस इतनी-सी बात? क्या इसी पर दुनिया भर के विश्वविद्यालय शोध करते हैं? क्या इसी के लिए इसे विश्व साहित्य की महानतम कृतियों में गिना जाता है?


लेकिन मेरे देखे काफ्का को समझने के लिए मौन को पढ़ना पड़ता है। ग्रेगर साम्सा की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं थी कि वह कीड़ा बन गया। सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उसके बदल जाने के बाद सबसे पहले उसके अपने लोग बदल गए।


जब तक वह कमाने वाला बेटा था, घर का देवता था। जिस दिन वह उपयोगी नहीं रहा, उसी दिन वह घर के लिए बोझ बन गया। यह दृश्य पढ़ते हुए मुझे भारतीय दर्शन का एक पुराना वाक्य याद आया- 


“संसार का अधिकांश प्रेम उपयोगिता पर टिका होता है, अस्तित्व पर नहीं।”


काफ्का शायद यही कहना चाहते थे कि मनुष्य की पहचान उसके होने से कम, उसके काम आने से अधिक तय होती है। यहीं मुझे भगवद्गीता का निष्काम कर्म याद आया। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्म करो, किंतु अपनी पहचान कर्मफल से मत जोड़ो। क्योंकि जिस दिन तुम्हारी पहचान केवल उपलब्धियों पर टिक जाएगी, उस दिन उपलब्धियाँ छिनते ही तुम स्वयं भी खो जाओगे।


ग्रेगर की समस्या उसका कीड़ा बनना नहीं थी। उसकी समस्या यह थी कि उसकी पूरी पहचान केवल “कमाने वाले बेटे” की थी। जैसे ही वह भूमिका समाप्त हुई, उसके अस्तित्व का मूल्य भी समाप्त कर दिया गया।


आज सोचिए… यदि किसी दिन आपका पद छिन जाए, व्यवसाय बंद हो जाए, नौकरी चली जाए, सोशल मीडिया के सारे फ़ॉलोअर्स गायब हो जाएँ, क्या तब भी लोग आपको उसी सम्मान से देखेंगे?


शायद उत्तर है नहीं । यदि उत्तर “नहीं” है, तो हम सब कहीं-न-कहीं ग्रेगर साम्सा ही हैं। काफ्का का साहित्य यहीं भयावह हो जाता है। वह किसी राक्षस की कहानी नहीं लिखते। वह आईना लिखते हैं। क्यूँकि ग्रेगर उस माँ को को कहते हुए सुनता है , वो माँ जिसे अपने बेटे से बेहद प्रेम था एक दिन अपने पति और बेटी से कह रही होती है कि हमें कब इस कीड़े से निजात मिलेगी। 


मुझे अल्बेयर कामू का Absurdism याद आता है। कामू कहते थे कि संसार अर्थ देने के लिए बाध्य नहीं है। अर्थ हमें स्वयं गढ़ना पड़ता है। काफ्का इससे भी एक कदम आगे जाते हैं। वे दिखाते हैं कि कई बार संसार आपको अर्थ गढ़ने का अवसर भी नहीं देता; वह पहले ही आपको एक फ़ाइल, एक कर्मचारी, एक नंबर या एक उपयोगिता में बदल चुका होता है।


और यह केवल साहित्य नहीं है। कॉरपोरेट दफ़्तरों में, न्यायालयों में, विश्वविद्यालयों में, राजनीति में, कितने ही लोग अपने नाम से नहीं, अपनी भूमिका से पहचाने जाते हैं।


“वह जज है।” “वह प्रोफेसर है।” “वह सीईओ है।” लेकिन कोई यह नहीं पूछता, “वह इंसान कैसा है?


लेकिन आधुनिक सभ्यता और रोज़ मर्रा की उठापटक ने ने हमें भीतर से इतना व्यस्त बना दिया है कि हम स्वयं से मिल ही नहीं पाते। और जिनके पास फुर्सत है उनको उनका ख़ुद का दिमाग़ ही खाए जा रहा है ।


Metamorphosis केवल एक मनुष्य के कीड़ा बनने की कथा नहीं है। यह हर उस क्षण की कहानी है, जब समाज किसी व्यक्ति को उसकी मानवता से वंचित कर केवल उसकी उपयोगिता से मापने लगता है। 


आज Artificial Intelligence के युग में सबसे बड़ा प्रश्न यही है, यदि मशीनें हमारा अधिकांश काम करने लगें, तो क्या हमारी कीमत भी घट जाएगी? यदि मनुष्य का मूल्य केवल उसकी उत्पादकता है, तो मशीनें जीत जाएँगी। लेकिन यदि मनुष्य का मूल्य उसकी संवेदना, करुणा, कल्पना और आत्मबोध है, तो कोई मशीन कभी मनुष्य का स्थान नहीं ले सकती।


शायद इसी कारण Metamorphosis आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 1915 में थी। 


किताब पढ़ने के बाद  बंद करने के बाद मैं देर तक सोचता रहा कि हम सब अपने-अपने जीवन में किसी-न-किसी रूपांतरण से गुजरते हैं। उम्र बदलती है, रिश्ते बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं। प्रश्न यह नहीं कि परिवर्तन होगा या नहीं। प्रश्न यह है- जब सब बदल जाएगा, तब भी हमारे आसपास के लोग हमें इंसान ही समझेंगे ? काफ्का ने इस प्रश्न का उत्तर “नहीं” में दिया है।


बेहद डार्क और अब्सर्ड है काफ़्का की ये लेखनी, बिल्कुल जीवन की तरह ।


✍🏻एमजे 

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