
कानून पढ़ते-पढ़ाते हुए एक बात मेरे समझ में आई कि इंसान अपने हर काम के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है। इसलिए अदालतें मेन्स रिया की तलाश करती हैं। लेकिन जैसे-जैसे फिजिक्स पढ़ी, दर्शन पढ़ा और उपनिषदों के कुछ पन्नों में सिर झुकाकर बैठा, एक सवाल भीतर घर करता गया, अगर ब्रह्मांड का हर कण किसी नियम का पालन कर रहा है, तो फिर मेरे निर्णय वास्तव में “मेरे” कैसे हुए?
Einstein का एक वाक्य मुझे हमेशा बेचैन करता है। उन्होंने लिखा था- “Past, present and future is only a stubbornly persistent illusion.”
यदि यह बात सच है, तो हो सकता है कि हम समय में आगे नहीं बढ़ रहे हों; बल्कि समय के भीतर एक-एक दृश्य का अनुभव भर कर रहे हों। जैसे कोई फ़िल्म पहले से पूरी बन चुकी हो और दर्शक उसे एक-एक फ्रेम में देख रहा हो।
मगर यहीं कहानी खत्म नहीं होती।
यूनानी दार्शनिक Epictetus ने कहा था- “Some things are up to us, and some things are not.” यानी कुछ चीज़ें हमारे अधिकार में हैं, कुछ बिल्कुल नहीं। शायद जीवन का सारा संघर्ष इन्हीं दोनों के बीच की महीन रेखा को पहचानने का नाम है।
Spinoza इससे भी एक कदम आगे चले गए। उनका मानना था कि मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र इसलिए समझता है क्योंकि वह अपने निर्णयों को तो जानता है, लेकिन उन कारणों को नहीं जानता जिन्होंने उसे वह निर्णय लेने के लिए विवश किया।
यह बात पहली बार पढ़ी थी तो लगा, क्या सचमुच मेरी हर पसंद, हर नापसंद, हर प्रेम, हर क्रोध… मेरे बचपन, मेरे संस्कार, मेरे अनुभव, मेरी जैविक संरचना और परिस्थितियों का जोड़ मात्र है? अगर ऐसा है, तो “मैं” कहाँ हूँ?
फिर गीता सामने आती है और कहती है -
“प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकार-विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥”
अर्थात् प्रकृति अपने गुणों से सब कर्म कराती है, पर अहंकार से मोहित मनुष्य सोचता है- “मैं ही करता हूँ।” यह श्लोक पढ़कर पहली बार लगा कि शायद प्रश्न Free Will का नहीं, Free Ego का है।
उपनिषद भी अजीब ढंग से मुस्कुराते हैं। वे कहते हैं- तुम लहर हो, यह भी सच है; तुम समुद्र हो, यह उससे भी बड़ा सच है। लहर को लगता है कि वह अपनी दिशा स्वयं तय कर रही है। समुद्र जानता है कि हर लहर उसी की अभिव्यक्ति है।
लेकिन यदि सब पहले से तय है, तो फिर नैतिकता क्यों? प्रयास क्यों? संघर्ष क्यों? शायद इसलिए कि हमें भविष्य नहीं मालूम।
कल्पना कीजिए, आपके हाथ में एक उपन्यास है जिसके अंतिम पृष्ठ पर क्या लिखा है, आपको नहीं पता। लेखक को अंत पता है, पात्र को नहीं। पात्र का हर निर्णय उसके लिए वास्तविक है। उसका साहस भी वास्तविक है, उसका डर भी।
मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर है-
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले।
हम इच्छाएँ करते हैं मानो सब कुछ हमारे हाथ में हो; और फिर परिणाम स्वीकार करते हैं मानो कुछ भी हमारे हाथ में न था। शायद मनुष्य होने का अर्थ ही यही विरोधाभास है।
और अंत में मुझे स्टोइक सम्राट Marcus Aurelius की बात याद आती है-
“Accept whatever comes to you woven in the pattern of your destiny.”
लेकिन उसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि चरित्र का चुनाव तुम्हारा है। बारिश होना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन भीगते हुए मुस्कुराना या शिकायत करना- शायद यही हमारी थोड़ी-सी आज़ादी है।
और अगर आप मुझसे पूछें कि Free Will है या नहीं, तो मैं कहूँगा-
मुझे नहीं पता।
लेकिन मेरे देखे इतना ज़रूर है कि यदि यह केवल भ्रम भी है, तो यह ब्रह्मांड का सबसे सुंदर भ्रम है। क्योंकि इसी भ्रम ने मनुष्य को कविता लिखना सिखाया, न्याय करना सिखाया, प्रेम करना सिखाया, और अपनी नियति से सवाल पूछना भी। शायद हम Destiny के सह-लेखक हैं ।
✍🏻एमजे
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