Diary Ke Panne

रविवार, 6 सितंबर 2026

सोलिप्सिज़्म……



​आज यूँ ही एकांत के किसी बहुत शांत क्षण में मेरे मन के भीतर एक विचित्र प्रश्न जन्म लेता है, जिस संसार को मैं देख रहा हूँ, क्या वह सचमुच वैसा ही है जैसा मुझे दिखाई देता है? जिन लोगों से मैं प्रेम करता हूँ, जिनसे संवाद करता हूँ, जिनके सुख-दुःख को महसूस करता हूँ, क्या उनका अस्तित्व मेरे अनुभव से स्वतंत्र भी है? यह आकाश, ये वृक्ष, ये रास्ते, यह भीड़, ये संबंध, यह पूरा संसार क्या ये सब मेरे बाहर घट रही वास्तविकताएँ हैं, या मैं केवल अपनी ही चेतना में उपस्थित अनुभवों को संसार का नाम दे रहा हूँ?


ख्याल बहुत गहरे हो गए मैं उतरता चला गया और फिर जैसे ही मैं उस विचार के विशाल भंवर से बाहर निकला मैंने गूगल बाबा से पूछा क्या ये विचार पहले किसी को आया है क्या किसी ने इस तरह पहले चिंतन किया हुआ है यदि हाँ तो उसके बारे में बताओ.. बाबा ही ने उत्तर दिया - “वत्स इस  विचार को solipsism, अर्थात् सोलिप्सिज़्म कहते हैं । इसका मूल आग्रह यह नहीं है कि संसार निश्चित रूप से अस्तित्वहीन है, बल्कि यह है कि जिस एक अस्तित्व के प्रति मैं प्रत्यक्ष रूप से आश्वस्त हो सकता हूँ, वह मेरी अपनी चेतना है। संसार के बारे में मुझे जो कुछ भी ज्ञात है, अंततः वह मेरी चेतना के द्वार से होकर ही मेरे पास आता है। मैंने सूर्य को अपनी दृष्टि से देखा है, संगीत को अपने कानों से सुना है, पीड़ा को अपनी अनुभूति में जाना है और प्रेम को भी अपने भीतर ही अनुभव किया है। यहाँ तक कि किसी दूसरे व्यक्ति की चेतना का अनुमान भी मैं उसके शब्दों, व्यवहार और अभिव्यक्तियों से लगाता हूँ; मैं उसकी चेतना में सीधे प्रवेश नहीं कर सकता।” 


अब मेरे विचार और तीखे होने लगते हैं - मैं सोचता हूँ यदि मेरे प्रत्येक प्रमाण का अंतिम स्थान मेरी चेतना ही है, तो मैं अपनी चेतना के बाहर स्थित किसी वस्तु की स्वतंत्र वास्तविकता को पूर्ण निश्चितता के साथ कैसे प्रमाणित करूँ?


लेकिन यहीं एक सावधानी आवश्यक है। सोलिप्सिज़्म को सीधे भारतीय अद्वैत वेदान्त या उपनिषदों का सिद्धांत मान लेना दार्शनिक रूप से उचित नहीं होगा। दोनों के प्रश्न कभी-कभी एक-दूसरे के बहुत निकट दिखाई देते हैं, पर उनके निष्कर्षों में गहरा अंतर है। पश्चिमी सोलिप्सिज़्म जहाँ कभी-कभी विचार को इस संभावना तक ले जाता है कि “केवल मेरा मन ही निश्चित है”, वहीं उपनिषदों की यात्रा “मेरा” को बचाने की नहीं, बल्कि उसी “मैं” की सीमाओं को तोड़ने की यात्रा है।


उपनिषद पूछते हैं- जिसे तुम “मैं” कहते हो, वह वास्तव में कौन है?


क्या तुम शरीर हो? शरीर तो बचपन से युवावस्था और युवावस्था से वृद्धावस्था तक बदलता रहता है। क्या तुम विचार हो? विचार तो प्रत्येक क्षण आते-जाते रहते हैं। क्या तुम स्मृतियाँ हो? स्मृतियाँ धुँधली पड़ सकती हैं। क्या तुम भावनाएँ हो? क्रोध आता है और चला जाता है, दुःख आता है और चला जाता है, प्रसन्नता आती है और चली जाती है। फिर वह कौन है जो इन सभी परिवर्तनों को जान रहा है? वह कौन है जो कहता है “मेरे भीतर विचार आया”, “मुझे क्रोध आया”, “मैं दुःखी था”, “अब मैं प्रसन्न हूँ”?


उपनिषदों की दृष्टि इसी “जानने वाले” की ओर मुड़ती है। बृहदारण्यक उपनिषद का प्रसिद्ध “नेति, नेति” यह नहीं, यह नहीं मानो मनुष्य से कहता है कि स्वयं को उन वस्तुओं से अलग करके देखो जिन्हें तुम देख सकते हो, जान सकते हो, अनुभव कर सकते हो। जो दिखाई दे रहा है वह दृश्य है; प्रश्न उस द्रष्टा का है जो उसे देख रहा है। जो विचार बनकर उपस्थित हो रहा है वह भी ज्ञेय है; प्रश्न उस ज्ञाता का है जो विचार को जान रहा है।


और तब भारतीय दर्शन एक अद्भुत मोड़ लेता है। साधारण मनुष्य कहता है“मैं संसार को देख रहा हूँ।” सोलिप्सिज़्म पूछता है, “क्या संसार मेरे देखने से स्वतंत्र भी है?” लेकिन उपनिषद पूछते हैं, “पहले यह बताओ कि यह ‘मैं’ कौन है जो संसार को देख रहा है?” यही अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।


छान्दोग्य उपनिषद का महावाक्य “तत्त्वमसि” “तुम वही हो”व्यक्तिगत अहंकार को ब्रह्मांड का स्वामी घोषित नहीं करता। उसका आशय यह नहीं कि “सिर्फ मैं हूँ और बाकी सब मेरी कल्पना है।” इसके विपरीत, वह सीमित व्यक्तिगत पहचान को विस्तृत करता है। वह कहता है कि तुम्हारे अस्तित्व की सबसे गहरी वास्तविकता उस परम वास्तविकता से पृथक नहीं है जो समस्त अस्तित्व का आधार है।


बृहदारण्यक उपनिषद का “अहं ब्रह्मास्मि” मैं ब्रह्म हूँ, भी यदि अहंकार से पढ़ा जाए तो उसका अर्थ पूरी तरह बिगड़ जाता है। यहाँ “अहं” उस सामाजिक व्यक्ति का अहंकार नहीं है जो कहे कि संसार में केवल मैं महत्वपूर्ण हूँ। यहाँ तो जिस क्षण ब्रह्म का बोध होता है, उसी क्षण सीमित अहंकार का सिंहासन टूटने लगता है। बूंद यह घोषणा नहीं करती कि समुद्र केवल मेरी कल्पना है; वह पहचानती है कि उसकी वास्तविक प्रकृति समुद्र से पृथक नहीं।


इसीलिए Solipsism और Advaita Vedanta को एक मान लेना एक आकर्षक किंतु गंभीर भूल होगी। Solipsism का चरम रूप कह सकता है “केवल मेरी चेतना का अस्तित्व सुनिश्चित है।” अद्वैत का बोध कहता है, “जिसे तुम अपनी निजी चेतना समझ रहे हो, उसकी अंतिम वास्तविकता निजी नहीं है।”


एक में “मैं” के बाहर संसार संदिग्ध हो सकता है; दूसरे में “मैं” और “संसार” का अंतिम द्वैत ही प्रश्न के घेरे में आ जाता है।


माण्डूक्य उपनिषद इस चर्चा को और अधिक रहस्यमय गहराई देता है। वह चेतना की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं पर विचार करता है और फिर “तुरीय” की ओर संकेत करता है। जाग्रत अवस्था में हमें बाहरी संसार अत्यंत ठोस लगता है। स्वप्न में भी, जब तक स्वप्न चल रहा होता है, उसका संसार वास्तविक प्रतीत होता है। वहाँ लोग होते हैं, भय होता है, दौड़ना होता है, प्रेम होता है, मृत्यु तक हो सकती है। लेकिन जागने के बाद हमें ज्ञात होता है कि वह पूरा अनुभव चेतना में घट रहा था।


यहीं से भारतीय दर्शन एक असाधारण प्रश्न उठाता है, यदि स्वप्न के भीतर रहते हुए स्वप्न हमें वास्तविक लगता था, तो जाग्रत संसार की वास्तविकता के बारे में हमारी निश्चितता का आधार क्या है?


इसका अर्थ यह नहीं कि उपनिषद सरलता से कह देते हैं कि जाग्रत संसार एक स्वप्न है और उसका कोई अस्तित्व नहीं। प्रश्न अधिक सूक्ष्म है। वे हमारी उस सहज धारणा को चुनौती देते हैं जिसके अनुसार “जो मुझे दिखाई दे रहा है, वही अंतिम सत्य है।”


आदि शंकराचार्य की अद्वैत परंपरा में “माया” की अवधारणा इसी संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। माया का अर्थ केवल जादू या यह कहना नहीं है कि संसार बिल्कुल है ही नहीं। अद्वैत की दृष्टि में अनुभव का संसार व्यवहार के स्तर पर उपस्थित है; हम उसमें चलते हैं, निर्णय लेते हैं, धर्म-अधर्म का विचार करते हैं, पीड़ा अनुभव करते हैं और अपने कर्मों के परिणामों से गुजरते हैं। परंतु यह परम सत्य नहीं है। रस्सी को अंधेरे में साँप समझ लेने का प्रसिद्ध उदाहरण इसी बात को समझाता है। साँप का भय अनुभव के स्तर पर वास्तविक हो सकता है हृदय की गति बढ़ सकती है, शरीर काँप सकता है….लेकिन ज्ञान होने पर पता चलता है कि जिस आधार पर साँप आरोपित था, वह रस्सी थी।


अर्थात् भ्रम पूर्ण शून्यता पर खड़ा नहीं होता; उसके पीछे कोई अधिष्ठान होता है। यहाँ भारतीय अद्वैत और Solipsism के बीच फिर एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। सोलिप्सिज़्म का प्रश्न हो सकता है, “क्या बाहर का संसार मेरे मन का निर्माण है?” अद्वैत पूछता है, “वह कौन-सी अंतिम सत्ता है जिसके कारण मन, जगत और अनुभव तीनों संभव हैं?”


और उत्तर किसी व्यक्तिगत मन में नहीं, ब्रह्म में खोजा जाता है। यह विचार गौड़पाद के माण्डूक्यकारिका में और भी गहरा रूप ग्रहण करता है। उनके अजातीवाद में उत्पत्ति के हमारे सामान्य विचार तक को चुनौती मिलती है। हम संसार को घटनाओं, कारणों, जन्म और विनाश की शृंखला के रूप में देखते हैं; किंतु परम दृष्टि से वास्तविकता को इस परिवर्तनशीलता के भीतर बाँधना पर्याप्त नहीं। यह दर्शन साधारण बुद्धि को असुविधा में डालता है, क्योंकि साधारण बुद्धि वस्तुओं की दुनिया में सहज है; उसे “यह वस्तु कहाँ से आई?” पूछना आता है, पर “अस्तित्व स्वयं क्या है?” पूछना कठिन लगता है।


केन उपनिषद का प्रश्न इसी रहस्य को छूता है मन किसके द्वारा प्रेरित होकर सोचता है? वाणी किसके कारण बोलती है? आँख के देखने के पीछे कौन-सी सत्ता है? यह खोज हमें वस्तुओं से हटाकर उस चेतना की ओर ले जाती है जिसके कारण वस्तुओं का अनुभव संभव होता है।


यहाँ पहुँचकर दर्शन जीवन से जुड़ जाता है। हम सामान्यतः अपने पूरे जीवन को बाहर की वस्तुओं को व्यवस्थित करने में लगा देते हैं। बेहतर घर, बेहतर पद, अधिक प्रतिष्ठा, अधिक प्रशंसा, अधिक नियंत्रण। हमें लगता है कि संसार थोड़ा और हमारे अनुकूल हो जाए तो हम शांत हो जाएँगे। लेकिन उपनिषद दिशा उलट देते हैं। वे पूछते हैं, जिस व्यक्ति के लिए तुम पूरा संसार व्यवस्थित करने में लगे हो, क्या तुमने कभी उस व्यक्ति को जाना है?


यहीं सोलिप्सिज़्म का बौद्धिक संदेह और उपनिषदों का आत्मान्वेषण कुछ क्षणों के लिए एक ही द्वार पर खड़े दिखाई देते हैं। दोनों हमारी सहज निश्चितताओं को हिलाते हैं। दोनों पूछते हैं कि अनुभव और वास्तविकता के बीच संबंध क्या है। दोनों चेतना की केंद्रीयता की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। लेकिन द्वार के बाद दोनों की राह अलग हो जाती है।


सोलिप्सिज़्म में यदि सावधानी न रखी जाए तो व्यक्ति एक दार्शनिक एकांत में पहुँच सकता है, “शायद केवल मैं हूँ।” उपनिषदों में आत्मान्वेषण अपनी पूर्णता पर इसके ठीक विपरीत अनुभव की ओर संकेत करता है, “केवल यह छोटा-सा ‘मैं’ नहीं हूँ।”


वहाँ अलगाव नहीं, अभेद की अनुभूति है। ईशावास्य उपनिषद की दृष्टि में जो व्यक्ति समस्त प्राणियों को आत्मा में और आत्मा को समस्त प्राणियों में देखता है, उसके लिए घृणा और अलगाव का आधार ही बदल जाता है। यह विचार अद्वैत को केवल Metaphysics नहीं रहने देता; उससे Ethics भी निकलती है। यदि दूसरा पूरी तरह “पराया” नहीं है, तो दूसरे को चोट पहुँचाने का अर्थ क्या है? यदि अस्तित्व की गहराई में विभाजन उतना अंतिम नहीं जितना सतह पर दिखाई देता है, तो करुणा केवल नैतिक आदेश नहीं रहती; वह ज्ञान का स्वाभाविक परिणाम बन सकती है।


लेकिन अंतिम सत्य ये है कि यदि एक दिन तुम्हारी सारी उपाधियाँ, सारे संबंध, सारी स्मृतियाँ, सारी उपलब्धियाँ और वे सारी पहचानें जिनसे तुम स्वयं को परिभाषित करते आए हो, एक-एक करके हटा दी जाएँगी और वस्तुतः कुछ भी शेष नहीं बचेगा । और यदि कुछ बचेगा तो वो क्या है ??


अब सर फटने को है, तो यहीं रोकता हूँ इस आलेख को? कुछ सूझे तो कमेंट में लिख कर बताना ।



✍🏻एमजे 

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

अद्भुद लेख MJ sir🙏 इस लेख से इतने सारे तंतु निकल गये है कि इसपर और विचार और इसका उत्तर आपके अगले लेख में जानना चाहता हु

Tax Charcha By Akhilesh Shukla ने कहा…

Great Sir, I am your student and I follow you

Tax Charcha By Akhilesh Shukla ने कहा…

Shri MJ सर को शिक्षक दिवस की अनंत अनन्त हार्दिक शुभकामनाएं, आप सदैव ही सबको अपने ज्ञान से प्रकाशित करते रहें , आप सदा स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहे, आपकी ख्याति निरंतर बढ़ती रहे, यही परम पुज्य परमात्मा से प्रार्थना करता हूं l जय हिंद