Diary Ke Panne

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

संसद भ्रमण - एक संस्मरण






आज 20 नवम्बर 2018 का दिन है दोपहर के 3 बज रहे हैं ... मैं इस समय ट्रेन में हूँ. लॉ स्टूडेंट्स के साथ दिल्ली की यात्रा पर हूँ. मेरे साथ कुछ ऑफिस स्टाफ, रिटायर्ड जज लक्ष्मीकांत भार्गव जी, और भारतीय न्याय पालिका के भविष्य, जो भविष्य के न्यायाधीश हैं, सफ़र कर रहे हैं . या यह कहना उचित होगा कि मैं इन सबके साथ सफर कर रहा हूँ.

हमारी प्लानिंग है कि हम भारतीय संसद और सर्वोच्च न्यायपालिका को निकट से देख सकें और बचे हुए समय में दिल्ली भ्रमण करें. मालवा एक्सप्रेस जो इंदौर से 12.45 बचे छूटती है में हम सवार हो गए हैं . ट्रेन में बैठते ही एक हादसा घटा एक बैग में मेरा पैर पड़ा  और उसका लॉक टूट गया  एक धारदार मोटी लोहे की कील मेरे पैंर में घुस गई स्टूडेंट्स की तत्परता से फर्स्ट ऐड उपलब्ध हो सका. मेरे ऑफिस स्टाफ और स्टूडेंट्स इस यात्रा से क्या पाने वाले हैं ये तो राम जाने लेकिन इतना तय है कि मैं इस यात्रा से बहुत कुछ सीखने वाला हूँ.

अकैडमी से हर वर्ष हम स्टूडेंट्स को एजुकेशन टूर्स पर ले जाते रहे हैं लेकिन मैं कभी भी इस टूर का हिस्सा नहीं बन पाता . पता नहीं क्यूँ? लास्ट मूमेंट पर मैं जाना कैंसिल कर देता हूँ. लेकिन इस बार मैं आ ही गया हूँ.

 बहरहाल हम कुछ चुनिन्दा स्टूडेंट्स को ही साथ लेकर आये हैं . कुल 20 लोगों की टीम दो कम्पार्टमेंट में बंटी हुई है. मैं दोपहर की छोटी सी नींद लेने की बाद उस कम्पार्टमेंट में आ गया हूँ जहां भार्गव साब बैठे हुए हैं. वो खाना खा रहे हैं. भार्गव साब एक बेहद बुद्धिमान और उतने ही विनम्र व्यक्ति हैं 70 के पास उम्र पहुँच रही है लेकिन चेहरे पर ज्ञान की चमक देखते ही बनती है. मेरा उनसे कुछ अलग ही तरह का स्नेह है. मैं उनके साथ बैठ जाता हूँ और देखते ही देखते स्टूडेंट्स भी आकर बैठने लग जाते हैं. अंकिता और मोनिका के घर से बहुत कुछ बन कर आया है वो खिलाती जाती हैं. फिर शमीम, परिधि, रिदम, मनीष , गोविन्द और देवेश आ जाते हैं. ज्ञान चर्चा का दौर चलने लगा है कानून से लेकर अध्यात्म तक की बातें...... ये जान कर अच्छा लगता है कि आप विद्वान विद्यार्थियों के शिक्षक हैं.

21-11-2018
सुबह  6:30  बजे ट्रेन दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुँचती है . हमने ट्रैवलर बुक कर ली है जो हमें सीधे होटल तक ले जाती है.

सुबह के 9:30 बज रहे हैं हम दिल्ली भ्रमण को निकल चुके हैं पहले क़ुतुब मीनार , फिर लोटस टेम्पल, फिर लाल किला और इंडिया गेट होते हुए हम शाम को होटल पहुँचते हैं . कुछ स्टूडेंट्स शाम को शॉपिंग करने के लिए जाना चाहते हैं. चोट के कारण मेरी हिम्मत नहीं हो रही. अभिषेक, माया  और महेंद्र सबकी ज़िम्मेदारी लेकर उनके साथ चल देते हैं.

22-11-2018
सुबह नाश्ते के बाद हम सब संसद भवन और सर्वोच्च न्यायलय की विजिट के लिए निकल पड़ते हैं.               

नियत समय पर संसद भवन में ज़रूरी जांच के बाद हमारी एंट्री होती है. 

सिक्यूरिटी ऑफिसर श्री खुमान जी हमारे गाइड हैं. वो हमें बताते चलते हैं कि संसद एक ऐसा स्‍थान है जहाँ राष्‍ट्र के समग्र क्रियाकलापों पर चर्चा होती है और कानूनों का निर्माण होता है. संसद परिसर में बात करना मना है. जैसे ही हम मुख्य द्वार पर पहुँचते हैं मेरी निगाहें एक अद्भुत श्लोक पर पड़ती है:-
“लो ३ कद्धारमपावा ३ र्ण ३३
पश्येम त्वां वयं वेरा ३३३३३
(हुं ३ आ) ३३ ज्या ३ यो ३
आ ३२१११ इति।“

इस श्लोक से मैं परिचित हूँ यह छान्द्योग्योप्निषद से लिया गया है जिसका अर्थ है-
"द्वार खोल दो, लोगों के हित में ,
और दिखा दो झांकी।
जिससे प्राप्ति हो जाए
,
सार्वभौम प्रभुता की।"

भवन में प्रवेश करने के बाद दाहिनी ओर लिफ्ट संख्या 1 के पास हमें लोक सभा की धनुषाकार लॉबी दिखाई पड़ती है. यहाँ से मुड़ते ही सेन्ट्रल हॉल के मार्ग के गुम्बद पर अरबी भाषा का एक उद्धरण दिखाई पड़ता है :-
“इन्नलाहो ला युगय्यरो मा बिकौमिन्।
हत्ता युगय्यरो वा बिन नफसे हुम।।“

इसका  शब्दशः अनुवाद कुछ ऐसा होगा-

"खुदा ने आज तक उस कौम की हालत नहीं बदली,
न हो जिसको ख्याल खुद अपनी हालत बदलने का।" 

संक्षेप में कहूं तो ये बहुत ही खूबसूरत उद्धरण है जिसका अर्थ है कि आप स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हैं।

हम लोक सभा चैम्बर के भीतर प्रवेश करते हैं जहां खुमान जी हमें उस चैम्बर के कोने कोने के बारे में विस्तार से समझाते हैं. मेरा ध्यान अध्यक्ष के आसन के ऊपर अंकित शब्द पर जाता है. लिखा है : धर्मचक्र-प्रवर्तनाय अर्थात "धर्म परायणता के चक्रावर्तन के लिए".

 हम यहाँ से निकल कर संसद भवन के द्वार संख्या 1 से केन्द्रीय कक्ष की ओर बढ़ते हैं तो उस कक्ष के द्वार के ऊपर अंकित पंचतंत्र के निम्नलिखित संस्कृत श्लोक की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट होता है:-
“अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।“

एक स्टूडेंट के पूछने पर मैं बताता हूँ की यह पंचतंत्र से लिया गया है और इसका हिन्दी अनुवाद कुछ इस तरह है :-
"यह मेरा है , वह पराया है ,
ऐसा सोचना संकुचित विचार है।
उदारचित्त वालों के लिए ,
सम्पूर्ण विश्व ही परिवार है।"

आगे जाने पर लिफ्ट संख्या 1 के निकटवर्ती गुम्बद पर महाभारत का एक श्लोक अंकित पाता हूँ :-
“न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा,
वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
धर्म स नो यत्र न सत्यमस्ति
,
सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति।।“

इसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है:-
"वह सभा नहीं है जिसमें वृद्ध न हों,
वे वृद्ध नहीं है जो धर्मानुसार न बोलें
,
जहां सत्य न हो वह धर्म नहीं है
,
जिसमें छल हो वह सत्य नहीं है।"

इन सभी श्लोकों और भवन की खूबसुरती के बीच खोया हुआ मैं जब अपने विद्यार्थियों के साथ राज्य सभा भवन में पहुँचता हूँ तो एक खूबसूरत घटना घटती है हमारे ड्रेस कोड (सफ़ेद शर्ट और ब्लैक कोट) को देख कर सिक्यूरिटी ऑफिसर खुमान जी पूछते हैं “फ्रॉम व्हिच डिपार्टमेंट यू आल आर?” मैं कहता हूँ हम लोग कौटिल्य अकैडमी इंदौर से आये हैं.. माय नाम इस मनमोहन जोशी एंड दे आर माय स्टूडेंट्स, प्रिपेयरिंग फॉर जुडिशल सर्विसेज”. वो एक दम जोश से कहते हैं सर हमने आपको you tube पर सुना है. और राज्य सभा में उपस्थित लोगों को वो एकेडमी और इसके कोर्सेज के बारे में बताने लगते हैं. गर्व से सीना फूला हुआ है.

 लेकिन असली गर्व का दिन वह होगा जब इन स्टूडेंट्स में से कोई एक भविष्य में किसी दिन सुप्रीम कोर्ट में शपथ ग्रहण कर रहा होगा या कर रही होगी .........

क्रमश:         

-मनमोहन जोशी          

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

शुभ दीपावली....





 दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों "दीप" अर्थात "दिया" व "आवली" अर्थात "श्रृंखला"  से हुई है. दीपावली को विभिन्न भाषाओं में लगभग मिलते जुलते नामों से जाना जाता है. लेकिन कब इसका अपभ्रंश रूप  दिवालीकब प्रचलित हो गया इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है.

जब हम बच्चे थे तो दीपावली का हमारे लिए मतलब होता था नए कपड़े, पटाखे, मिठाइयां और रंग बिरंगी रौशनियाँ. त्योहार की शुरुआत कई महीनों पहले बाबा(ताऊ जी)  की घोषणा से हो जाती थी वो लगातार सुबह-शाम, तारीख बताते रहते थे कि किस दिन धनतेरस होना है और किस दिन दीपावली.

कक्षा आठ में जाकर जब पहली बार हिंदी और इंग्लिश में दीपावली का निबंध याद किया वो भी बड़े बच्चों का निबंध जो बड़े भैया ने कॉलेज में तैयार किया था उन्होंने हमें याद करवा दिया. अच्छी बात ये रही की इसके बाद फिर कभी दीपावली का निबंध याद करने की ज़रूरत नहीं पड़ी. और हाँ इस त्यौहार के बारे में कई ऐसी जानकारी भी मिली जो साधारण तौर पर इस उम्र के बच्चों को नहीं होती है.

दीपावली का पर्व अंधकार पर प्रकाश के विजय के रूप में मनाया जाता है. लेकिन मेरे देखे अन्धकार और प्रकाश में कोई लड़ाई है ही नहीं. अन्धकार तो केवल प्रकाश का अभाव मात्र है जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं उससे कैसी लड़ाई?? मेरी समझ यह कहती है कि ये अन्धकार और प्रकाश प्रतीकात्मक हैं. यहाँ शायद अज्ञान रुपी अन्धकार और ज्ञान रुपी प्रकाश की बात हो रही है. वैसे तो इन दोनों में भी कोई लड़ाई नहीं है और अज्ञान भी केवल ज्ञान का अभाव मात्र ही है.

हिंदू दर्शन में योग, वेदांत और सांख्य सभी शाखाओं में यह विश्वास है कि इस भौतिक शरीर और मन से परे वहां कुछ है जो शुद्ध अनंत, और शाश्वत है जिसे आत्मन् या आत्मा कहा गया है. दीपावली, बाह्य अंधकार पर आंतरिक प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई का उत्सव है.

विभिन्न धर्मों में इस पर्व को मनाने के अपने धार्मिक कारण हैं एक मान्यता के अनुसार कार्तिक अमावस्या को भगवान श्री राम जी चौदह वर्ष का बनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे. अयोध्या वासियों ने अपने आराध्य का स्वागत दीप जलाकर किया था. बाबा तुलसी ने इस दिन का बेहद खूबसूरत वर्णन किया है:-

सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद।
 चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद॥
अर्थात:- आनन्दकन्द श्री रामजी अपने महल को चले, आकाश फूलों की वृष्टि से छा गया. नगर के स्त्री-पुरुषों के समूह अटारियों पर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे हैं.

कंचन कलस बिचित्र सँवारे।सबहिं धरे सजि निज निजद्वारे॥
बन्दनवार पताका केतुसबन्हि बनाए मंगल हेतु 
  अर्थात:- सोने के कलशों को विचित्र रीति से सजाकर सब लोगों ने अपने-अपने दरवाजों पर रख लिया. सब लोगों ने बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगाईं.

बीथीं सकल सुगंध सिंचाई।गजमनि रचि बहु चौक पुराईं। 
नाना भाँतिसुमंगल साजे।हरषि नगर निसान बहु बाजे॥ 
अर्थात:- सारी गलियाँ सुगंधित द्रवों से धोई गईं. गजमुक्ताओं से रचकर बहुत सी चौकें पुराई गईं. अनेकों प्रकार के सुंदर मंगल साज सजाए गए और हर्षपूर्वक नगर में बहुत से डंके बजने लगे.
  
एक अद्भुत दोहे में प्रतीकों के माध्यम से बाबा तुलसी लिखते हैं कि ;-
 नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस। 
अस्त भएँबिगसत भईं निरखि राम राकेस॥अर्थात:- स्त्रियाँ कुमुदनी हैं,अयोध्या सरोवर है और श्री राम का विरह सूर्य है अर्थात इस विरह सूर्य के ताप से वे मुरझा गई थीं. अब उस विरह रूपी सूर्य के अस्त होने पर श्री राम रूपी पूर्णचन्द्र को देख कर वे खिल उठीं है.

बहरहाल भारत के कुछ क्षेत्रों में दीपावली के इस पर्व को को यम और नचिकेता की कथा के साथ भी जोड़ा जाता है.यह अद्भुत  कथा कठोपनिषद नामक ग्रन्थ में मिलती है.

सातवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक नागनंद में राजा हर्ष ने इस पर्व का उल्लेख दीपप्रतिपादुत्सव: के नाम से किया है. जिसमें दिये जलाये जाते थे और नव दंपत्ति को उपहार दिए जाते थे.

नवीं शताब्दी में राजशेखर ने काव्यमीमांसा में इस पर्व को  दीपमालिका कहा है जिसमें घरों की पुताई की जाती थी और तेल के दीयों से रात में घरों, सड़कों और बाजारों सजाया जाता था.

फारसी यात्री और इतिहासकार अलबरुनी, ने भारत पर अपने ग्यारहवीं सदी के संस्मरण में, दीवाली को कार्तिक महीने में नये चंद्रमा के दिन पर हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला त्यौहार वर्णीत किया है.

महाभारत के अनुसार बारह वर्षों के वनवास व एक वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडव आज ही के दिन वापस लौटे थे अतः उनके वापसी के प्रतीक रूप में दीपावली मनाई जाती है.

फिर एक प्रश्न यह उठता है कि दीपवाली के दिन लक्ष्मी पुजन क्यूँ किया जाता है ?? इसका कारण यह है कि दीपावली के दिन ही पांच दिवसीय सागर मंथन के पश्चात लक्ष्मी जी ने जन्म लिया था. और दीपावली की रात वह क्षण है जब लक्ष्मी जी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे विवाह बंधन में बंधीं अर्थात यह प्रेम दिवस भी है.

आज के दिन लोग लक्ष्मी जी की मूर्ति ला कर उसे घर में स्थापित करते हैं. मेरे देखे हमें विष्णु जी की मूर्ति लाकर उसकी स्थापना करनी चाहिए लक्ष्मी जी तो पीछे पीछे चली आएंगी.

भारत के पूर्वी क्षेत्र उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी जी की जगह माँ  काली की पूजा की जाती है और इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं.

जैन मतावलंबियों के अनुसार जैनों के चौबीसवें तीर्थंकर, महावीर स्वामी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी. इसी दिन उनके प्रथम शिष्य, गौतम गणधर को कैवल्य प्राप्त हुआ था.

सिक्खों के लिए भी आज का दिन महत्त्वपूर्ण है क्योंकि आज ही के दिन अमृतसर में 1577 को स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था.

बहरहाल केवल मिट्टी के दिए जला देने भर से ही मन का अंधियारा नहीं मिटेगा.. ज्ञान प्राप्ति की ललक जगानी होगी. उद्यम करना होगा धरती पाताल एक कर देना पड़ेगा...

इस दीपावाली मनुष्यता के लिए प्रार्थना करता हूँ कि मनुष्य मन का अँधेरा छंटे और प्रेम का प्रकाश चहूँ  फैले.... नीरज साहब की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं :-

 दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा,
 धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ !
  
 बहुत बार आई-गई यह दिवाली
 मगर तम जहाँ था वहीं पर खड़ा है, बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक
 कफन रात का हर चमन पर पड़ा है,
 न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे
 ऊषा को जगाओ, निशा को सुलाओ !
  
 दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा
 धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!

  
-मनमोहन जोशी


रविवार, 21 अक्टूबर 2018

प्रेम और स्त्री मन........







आज ट्विटर ओपन किया तो देखा कि प्रिंस हैरी और मेगन मार्कल की फोटो ट्रेंड कर रही है. इसमें प्रिंस हैरी डायस पे खड़े हैं और मेगन छाता लेकर खड़ी हैं. थोड़ा इन्टरनेट खंगालने पर पता चला कि प्रिंस हैरी और उनकी पत्नी मेगन मार्कल हाल ही में न्यू साउथ वेल्स गए थे जहां प्रिंस हैरी स्पीच दे रहे थे और बारिश शुरू हो गई. जहां वो खड़े थे उस जगह पर कोई शेड नहीं था. मेगन छाता लेकर पहुँच जाती हैं और स्पीच ख़त्म होते तक वहीं खड़ी रहती हैं, मुस्कुराती हुई. उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है और विडियो देख कर आपको ये अहसास होगा कि उनको ये करने में आनंद मिल रहा है.

लोग TWEET  करके अपनी ख़ुशी ज़ाहिर कर रहे हैं. कुछ लोगों को आश्चर्य है कि कोई राजघराने की किसी संभ्रांत महीला ने ऐसा पहली बार किया है. मेरे देखे स्त्री मन को समझना कठिन है. वस्तुतः स्त्री प्रेम करती है तो ऐसे ही करती है. पुरुष के प्रेम में ही सभी तरह के गुणा भाग होते हैं. स्त्री तो निस्वार्थ मन से बिना कुछ सोचे कूद पड़ती है प्रेम में, भिड़ जाती है यमराज से, छोड़ देती है महलों का वैभव.
   
प्रेम एक अद्भुत अहसास है, शारीरिक आकर्षण के परे, दिव्य. यह अनेक भावनाओं का एक ऐसा मिश्रण है जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता. कबीर ने इसे गूंगे का गुड़ कहा है. रातों की नीदों का उड़ जाना इसका एक आरंभिक लक्षण है.

प्राचीन ग्रीक लोगों ने चार तरह के प्रेम को पहचाना है. ये हैं - रिश्तेदारी, दोस्ती, वासना और दिव्य प्रेम. प्रेम को अक्सर वासना समझा जाता है या शारीरिक आकर्षण, लेकिन यह एक रसायन है. जिन्होंने अनुभव किया है वह सहमत होंगे क्योंकि यह यंत्र नहीं विलयन है जिसमें द्रष्टा और दृष्टि एक हो जाते हैं. सभी तरह की दुई खो जाती है. मन, शरीर और आत्मा एक हो जाते हैं. कोई मांग नहीं रह जाती.

सूफ़ियों ने इस प्रेम की अनुभूति की है. किसी सूफ़ी फ़क़ीर ने कहा है - तुझ हरजाई की बाँहों में और प्रेम परीत की राहों में / मैं सब कुछ बैठी हार वे.सब कुछ हार देना ही होता है तभी जीत मिलती है. अल्लामा इक़बाल ने कहीं लिखा है कि ये बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है, जो चाहे लगा दो डर कैसा.

तो मेरे देखे ये अनुभूति हर किसी को नहीं होती है. ये किसी  साधारण व्यक्ति का अनुभव नहीं हो सकता. अतीव साहसी लोग जीवन में इसका अनुभव करते हैं. आम लोग तो शारीरिक आकर्षण या मोह या आसक्ति को ही प्रेम मानकर चलते हैं. किसी शायर ने लिखा भी है

इश्क के लिए कुछ ख़ास दिल मखसूस होते हैं,
  ये वो नगमा है जो हर साज़ पे गाया नहीं जाता."

स्त्री स्वाधीन मन के साथ ही जन्म लेती है. आवश्यकता है कि पुरुष और समाज उसकी स्वाधीनता को अक्षुण्ण रहने दें. स्त्री का स्वाधीन मन और समर्पित प्रेम उसे स्वयं परेशानी में रह कर अपने प्रेमी को सुरक्षा प्रदान करने को प्रेरित करता है.

वाल्मीकि रामायण में उल्लेख मिलता है कि सीता, राम के साथ वन जाने की जिद करती है. राम पूछते हैं तुम मेरे साथ वन आकर क्या करोगी? वह कहती हैं – “अग्रतस्ते गमिष्यामि मृद्नन्ती कुशकण्टकान्” अर्थात- "मैं तुम्हारे रास्ते के कुश काँटे रौंदती हुई आगे-आगे चलूँगी."  यही स्त्री का प्रेम है.
    
- मनमोहन जोशी 

शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

EAT, PRAY, LOVE.....




एलिज़ाबेथ गिल्बर्ट के  संस्मरणों को पेंगुइन बुक्स ने  Eat, Pray, Love के नाम से 2006 में उपन्यास के रूप में प्रकाशित किया था जो एक बेस्टसेलर बुक है. यदि आप जीवन के अर्थ को तलाश रहे हैं या जीवन में संतुलन को खोज रहे हैं तो तो यह किताब अवश्य पठनीय है. 

इस पुस्तक को पढ़ते हुए यकीन हो चलेगा की आतंरिक ख़ुशी ही सब कुछ है लेकिन वो ख़ुशी है कहाँ ?? समाज में ?? काम में ?? भोग विलास में ?? आध्यात्म में ?? या प्रेम में ??

 इस पुस्तक को रयान मर्फी ने 2010 में फिल्म का रूप दिया. जूलिया रॉबर्ट्स इसमें एलिज़ाबेथ के किरदार में हैं जिनका नाम है “लिज़” अद्भुत किताब पर कमाल की फिल्म है यह. और जूलिया रोबर्ट्स तो हैं ही बेहतरीन.

फिल्म के तीन हिस्से हैं सबसे पहले “ईट” जो की भोग की बात करता है. फिर है “प्रे” जहां भक्ति या आध्यात्म की बात होगी और फिर “लव”, विशुद्ध प्रेम की बात.

 इस कहानी को पढ़ते या देखते समय यकीन मानें आप एक दूसरी ही दुनिया में खो जायेंगे.   

एलिजाबेथ लिखती हैं - हमने अपनी संकुचित मान्यताओं में इश्वर का जो रूप गढ़ा है, शायद ईश्वर उससे कहीं ज्यादा असीम और विशालतम है.

कहानी कुछ ऐसी है कि 34 वर्षीय लिज़ के जीवन में सब ठीक चल रहा होता है. लेकिन वो अपने वर्तमान जीवन से खुश नहीं है और तलाक के बाद पूरा एक वर्ष दुनिया देखने में बीता देती है. शुरू के चार महीने वो इटली में बीताती है भोग विलास में (EAT). इसके बाद तीन महीने भारत में अध्यात्म की तलाश में (PRAY) और फिर वर्ष के अंतिम महीने इंडोनेशिया के बाली द्वीप में दोनों के बीच संतुलन की तलाश में (LOVE).

मानो प्रेम ही भोग और अध्यात्म के बीच का संतुलन हो.
    
 जब वो इटली में होती है तो अपने इटैलियन दोस्त जूलियो से पूछती है कि रोम का उद्देश्य क्या है तो वह कहता है भोग और केवल भोग. जब वो उससे पूछता है कि तुम्हारे जीवन का उद्देश्य क्या है? वो कहती है - मैं अभी तो नहीं जानती, लेकिन मुझे महसूस हो रहा है कि मेरा उद्देश्य जल्द ही मेरे सामने आएगा, और जब आएगा तो मैं पहचान लूंगी.

एक रोज़ वह योग पर एक पुराना लेख पढ़ रही होती है. तब उसे संस्कृत शब्द “अंतेवासिन” मिलता है जिसका अर्थ है: " वो जो सीमा पर गुरु के समीप रहता है." यह उस व्यक्ति की ओर इशारा करता है जिसने सांसारिक जीवन के दौड़-धूप को छोड़ दिया है और नगर की सीमा पर वन के समीप जाकर रहने लगा है. न तो वह पूरी तरह से सन्यासी है और न ही संसारी.
  
उसे उसके जीवन का उद्देश्य मिल जाता है. प्रेम में उसने भोग और अध्यात्म के संतुलन को पा लिया है.... वस्तुतः लिज़ एक अंतेवासिन ही है. जो अंतराल में  ठहर गई है.... प्रेम के अद्भुत, खूबसूरत और डरावने वन के समीप लगातार बदलती सीमा पर एक विद्यार्थी के रूप में...
-       
           - मनमोहन जोशी  

रविवार, 14 अक्टूबर 2018

दिशा हारा केमोन बोका मोंटा रे ......




संगीत मेरे जीवन का एक अहम हिस्सा रहा है. जीवन के एक दौर में मैं चौबीसों घंटे संगीत में ही रमता था जटिल राग गायन , बेहतरीन बंदिशें , ग़ज़ल , दादरा, ठुमरी, टप्पा , ख्याल और तराना इन सबको बेहद करीब से देखा, सुना और समझा है.

वैसे तो कहा जाता है कि “म्यूजिक हेज़ नो लैंग्वेज” लेकिन फिर भी मुझे  लगता है कि अगर राग, ताल और शब्दों की समझ हो तो आनंद कई गुना हो जाता है. कई बार इन बारीकियों में उलझने का मन नहीं होता तो कोई ऐसी भाषा का गाना उठा लेता हूँ जो मुझे समझ नहीं आता लेकिन फिर जुट जाता हूँ उस भाषा के शब्दों को समझने और संगीत की बारीकियों को जानने में.

मैं एक डाइवर्सिफाइड लिसनर हूँ कुछ भी  सकता हूँ बस दिल तक उतरना चाहिए... तमिल और तेलुगु मुझे नहीं आती लेकिन इल्या राजा और रहमान की तेलुगु कम्पोजीशन मज़े से सुन सकता हूँ और यहाँ आकर यह धारणा ठीक मालूम पड़ती हैं की “म्यूजिक हेज़ नो लैंग्वेज”.

एक घटना याद आती है – मैं और मित्र सुनील तिवारी एक यात्रा पर थे. जिस शहर हम पहुँचने वाले थे वहां एक पत्रकार मित्र नौशाद खान हमारा इंतज़ार कर रहे थे लंच के लिए. हम जैसे ही शहर में इंटर हुए वो मित्र हमें चौराहे पर ही दिख गए अपनी बाइक के पास खड़े हुए. कार मैं ड्राइव कर रहा था और किशोरी अमोनकर की आवाज में श्री गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ चल रहा था (कभी समय निकाल कर किशोरी अमोणकर को सुनिए आवाज़ दिल को चीरती हुई पार निकल जाएगी आत्मा के, कभी किशोरी पर भी कुछ लिखूंगा). मित्र सुनील जी ने कहा अरे इसे बंद कर दो वो आ रहा है भाई, अच्छा नहीं मालूम पड़ता. लेकिन मैं भी कहाँ मानने वाला था मैंने और वॉल्यूम तेज़ कर दी. क्या संगीत का भी कोई जाती, धर्म होता है?? मेरे देखे तो नहीं?? नौशाद जी आकर गाडी में बैठ गए कुछ देर में अथर्व शीर्ष का पाठ ख़त्म हुआ और जो अगला गाना मेरे खजाने से निकल कर बजा वह नुसरत साहब का गाया नात था बोल थे अल्लाहू -अल्लाहू –अल्लाहू.

 तो मेरे सुनने का कोई पैटर्न नहीं है मैं रिहाना से लेकर एड शीरन तक को सूनता हूँ और स्वानंद किरकिरे से लेकर पंडित कुमार गन्धर्व तक को. मेरे देखे किसी गाने या संगीत में उतर जाने के दो तरीके हैं एक हेड फ़ोन ऑन कर लीजिये और दूसरा कार में सुनिए. हेड फ़ोन में भी मेरे देखे सोनी का हेड फ़ोन सबसे शानदार अनुभव देता है.                     

आजकल मैं एड शीरन के गाने सुन रहा हूँ वैसे तो उनका गाया शेप ऑफ़ यू बहुत फेमस हुआ है लेकिन उनके गाये सारे गाने बेहतरीन हैं “परफेक्ट” सुन कर देखें. मेरे आल टाइम पसंदीदा गानों की लिस्ट बहुत लम्बी है लेकिन स्वानंद किरकिरे के गाए गाने अद्भुत हैं. अपने आप में एक फलसफा लिए उनकी लेखनी और आवाज़ आपको दूसरी दुनिया में ले जाते हैं. जैसे लूटेरा फिल्म ( यह ओ हेनरी के उपन्यास पर आधारित है,कभी इस पर भी कुछ लिखूंगा)  का एक गाना है मोंटा रे...  अमिताभ भट्टाचार्य और स्वानंद किरकिरे ने अपनी आवाज़ दी है और शब्द भी अमिताभ भटाचार्य के ही हैं जिसमें वो बीच बीच में बांग्ला के शब्द भी पिरो देते हैं जिसके कारण गीत और भी मधुर मालूम पड़ता है शब्द हैं -

कागज़ के दो पंख ले के उड़ा चला जाये रे
जहां नहीं जाना था ये वहीं चला हाये रे
उमर का ये ताना बाना समझ ना पाए रे
जुबां पे जो मोह माया नमक लगाये रे
के देखे ना भाले ना जाने ना दाये रे
“दिशा हारा केमोन बोका मोंटा रे”

“दिशा हारा” का अर्थ है भटका हुआ, “केमोन” मतलब किधर चला और “मोंटा रे” का अर्थ है मन रे. गीत कार अपने मन से बात कर रहा है की कागज़ के पंख लेके तू कहाँ भटक रहा है? बुद्धि कहती है जिधर नहीं जाना उधर क्यूँ जाता है?? पूरा गीत सुनें. एक -एक अंतरे पर एक ब्लॉग लिखा जा सकता है, अद्भुत !!   

इसी ज़मीन पर स्वानंद किरकिरे ने फिल्म हजारों ख्वाहिशें ऐसी में एक खूबसूरत गीत लिखा और गाया है बोल हैं -

बावरा मन देखने चला एक सपना
बावरे से मन की देखो बावरी हैं बातें
बावरी सी धड़कने हैं बावरी हैं साँसें
बावरी सी करवटों से निंदिया दूर भागे

सुनें इन बेहतरीन नगमों को और करें आज अपने बावरे मन से कुछ बावरी सी बातें... कौन कहता है आजकल अच्छे गाने नहीं बन रहे या नहीं गाये जा रहे.

-मनमोहन जोशी

ओ रंगरेज़....





फिल्म भाग मिल्खा भाग में एक बेहद खूबसूरत सूफी गाना है “ओ रंगरेज़”.. जावेद बशीर और श्रेया घोषाल की जादुई आवाज़ में इसे सुनिए, शर्त लगा सकता हूँ कि दुबारा सुने बिना नहीं रह पाएंगे. शंकर एहसान लोय की तिकड़ी ने अद्भुत सुरों से सजाया है इस गाने को. और प्रसून जोशी ने क्रिएट किया है शब्दों का मैजिक.
  
ओ रंगरेज़
ओ रंगरेज़ तेरे रंग दरिया में
डूबना है बस तेरा बन के
 नहीं रहना दूजा बन के

एक भी सांस अलग नहीं लेनी
खींच लेना प्राण इस तन के
हाय, नहीं रहना दूजा बन के
अपने ही रंग में मुझको रंग दे
धीमे धीमे रंग में मुझको रंग दे
सोंधे सोंधे रंग में मुझको रंग दे
रंग देना, रंग देना, रंग दे
ना

इस गाने को समझने के लिए ये जानना ज़रूरी है कि ये रंगरेज़ कौन है? और किस सन्दर्भ में यहाँ रंगरेज़ शब्द का उपयोग किया गया है.

रंगरेज़, शब्द फारसी भाषा का है जिसका अर्थ है रंग में रंगने वाला. प्राचीन समय में भारत का नील और रंगों का व्यापार पूरी दुनिया में हुआ करता था. इरान, इराक और मिश्र में भी हमारा व्यापार होता था. वहां के लोगों द्वारा ही हमे रंगरेज कहा जाता था. जिसका अर्थ कपडे रंगने वाले होता है. 

रंगरेजों के पूर्वज मुशरिक थे. तनु वेड्स मनु के एक गाने में जो महान वडाली बंधू की कंपोज़ की हुई कवाली है, जिसमें कुछ लाइनें आती है – “मेरा मुशरिक तू, मेरा मग़रिब तू”. मुहम्मद बिन कासिम के सिंध के राजा दाहिर को पराजित करने के बाद 9वी 10वी शताब्दी में मुस्लिम समुदाय के संपर्क में आने के बाद तथा सूफी संतो से प्रभावित होकर इन लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया.

लेकिन सुफिस्म में रंगरेज़ शब्द का उपयोग एक अलग ही ढंग से किया जाता है उस एक व्यक्ति के लिए जिसने आपको अपने रंग में रंग दिया हो या आप जिसके रंग में रंग जाना चाहते हैं. आप जिसके प्रेम में हों उसके लिए रंगरेज़ शब्द का उपयोग करते हैं. गुलाम फरीद खुदा के लिए रंगरेज़ शब्द का उपयोग करते हैं तो रूमी इस रहस्यमयी संसार को चलाने वाली उस परम शक्ति को रंगरेज़ कहते हैं. 

कबीर ने गुरु को रंगरेज़ कहा है. अपने एक पद में कबीर लिखते हैं “सद्गुरु मेरे रंगरेज़ मेरी चुनर रंग डाली.” यहाँ रंगरेज़ गुरु हैं और चुनर का अर्थ आत्मा से है.

तो रंगरेज़ का एक अर्थ निकलता है ऐसा शख्स जो आपकी आत्मा को रंग दे अपने ही रंग में.

सूरदास अपने एक पद में श्री कृष्ण को रंगरेज़ कहते हैं और रंग जाना चाहते हैं उनके ही रंग में :-
“श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया ।
ऐसी रंग दे
, के रंग नहीं छुटे ।
 धोबिया धोये चाहे सारी उमरिया ॥

लाल ना रंगाऊं मैं तो, हरी ना रंगाऊ।
अपने ही रंग में रंग दे चुनरिया ॥“

तनु वेड्स मनु में वडाली बंधु का गाया गाना एक बेहद खूबसूरत सूफियाना कलाम है “ ऐ रंगरेज़” इसमें एक जगह राज शेखर लिखते हैं-  रंगरेज़ तूने अफ़ीम क्या है ख़ाली जो मुझसे पूछे कौन सा रंग, रंगों का कारोबार है तेरा तो तू ही ये जाने कौन सा रंग.. 

ये रंगरेज़ गुरु है और ये अपने मन को रंगाने आया शिष्य है जो कहता है क्या सीखाना है ये तू जाने क्या सीखना है ये मैं कैसे बता सकता हूँ. फिर वो कहता है -
मेरा बालम रंग , मेरा साजन रंग 
मेरा कातिक रंग, मेरा अगहन रंग
मेरा फागुन रंग, मेरा सावन रंग 
पलपल रंगते रंगते मेरे आठों पहर मन भावन रंग.

मेरे देखे कुछ चीज़ें समझने से ज्यादा महसूस करने की होती हैं. तो रंगरेज़ को समझने से ज्यादा अच्छा है महसूस करके देखा जाए. तो ढूंढें उस एक को जिसके रंग में आप रंग जाना चाहते हैं. अपने रंगरेज़ को. और तब तक वडाली बंधुओं की आवाज़ में खो जाइए और रंग जाइए राजशेखर जी के शब्दों के रंग में इस क़व्वाली के साथ. यू ट्यूब पर उपलब्ध है :

ऐ रंगरेज़ मेरे
, ऐ रंगरेज़ मेरे,
ये बात बता रंगरेज़ मेरे
ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है
के दिल बन गया सौदाई....


✍️MJ

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

विध्वंस और निर्माण किसकी गोद में खेलते हैं ????





                      कुछ माह पूर्व एक विश्व स्तरीय सौन्दर्य प्रतियोगिता में देश का प्रतिनिधित्व कर रही मानुषी छिल्लर को जब आखिरी राउंड में यह पूछा गया कि आपके अनुसार वह कौन सा प्रोफेशन है जिसे सबसे अधिक वेतन और सुविधाएं मिलनी चाहिए?? तो मानुषी ने जो उत्तर दिया उसकी चहुँ ओर प्रसंशा हुई और उसके उत्तर को नेशनल एंड इंटरनेशनल न्यूज़ में जगह मिली. लेकिन अगर मैं चयन समीति में होता तो केवल इस उत्तर के लिए ही मानुषी को या तो बॉटम में रखता या रिजेक्ट कर देता.

                 तो क्या था प्रश्न?? क्या उत्तर दिया था मानुषी ने?? और आज शिक्षक दिवस के ठीक एक दिन पूर्व इन बातों का उल्लेख करने का तुक क्या है ?? समझते हैं इस आलेख में....


                  मानुषी को पूछा गया था कि वह कौन सा प्रोफेशन है जिसे सबसे ज्यादा वेतन मिलना चाहिए?? मानुषी का उत्तर था “माँ”. क्या माँ होना कोई प्रोफेशन है?? क्या माँ को वेतन दिया जा सकता है ?? कौन देगा वेतन?? फिर पिता, चाचा, चाची , दादा , दादी आदि  ने क्या बिगाड़ा है ?? और यदि माँ होना एक प्रोफेशन है तो वकील , डॉक्टर, CA और शिक्षक  ये सब शायद रिश्तेदारियां हैं?? 

                   आज शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या को मैं इस प्रश्न और उत्तर का छिद्रान्वेषण कर रहा हूँ क्यूंकि मेरे देखे शिक्षण कार्य ही वह वृत्ति है जिसे सबसे ज्यादा वेतन और सुविधाएं मिलनी चाहिए. क्यूँ?? इसका उत्तर मैं आगे पैराग्राफ में देता हूँ.

                  मेरे देखे शिक्षा के क्षेत्र में भारत में क्रांति की आवश्यकता है. शिक्षक, जीवन में चूके हुए लोग नहीं हो सकते. शिक्षक होने का अधिकार तो केवल उन्हें होना चाहिए जिन्होंने जीवन को वास्तविकता, पूर्णता और जागरूकता के साथ जिया है. जिनके पास अनुभव का गांडीव और ज्ञान की प्रत्यंचा है और जो सामर्थ्य रखते हैं अपनी मेधा से ज्ञान रुपी मछली की आँख को भेदने का. 
                  आचार्य कौटिल्य ने कहा है , “विध्वंस और निर्माण दोनों शिक्षक की गोद में खेलते हैं. शिक्षा और शिक्षक कभी साधारण नहीं होते”. क्या वर्तमान समय में ऐसा दिखाई पड़ रहा है ?? अजी नहीं साहब विध्वंस और निर्माण केवल नेताओं और माफियाओं  की गोद में खेल रहे हैं. अधिकतर शिक्षकों के पास न तो वह  मेधा ही बची है और न ही वह सामर्थ्य. आचार्य कौटिल्य कृपया आकर देखिये वर्तमान में सबसे साधारण वर्ग शिक्षक ही दीख रहा है. आपकी बात में बल नहीं रहा.  

वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में अधिकतर जीवन से चूके हुए लोग ही आ रहे हैं . संविदा शिक्षक, शिक्षा कर्मी या अतिथि शिक्षक के रूप में ये किसी संस्थान में पिछले दरवाजे से घुस जाना चाहते हैं और फिर मुख्य दरवाजे से (परमानेंट शिक्षक के रूप में ) जब निकलना चाहते हैं तो सरकार डंडे का ऐसा उपयोग करती है कि कई दिन तक शिक्षक को क्लास में खड़े होकर ही पढ़ाना पड़ता है.
मेरे देखे समाज में तब तक क्रांति नहीं आएगी जब तक शिक्षा और शिक्षक को वो मान नहीं मिलेगा जिसके वे हक़दार हैं.

कुछ सुझाव:
1. स्टेट एजुकेशन सर्विसेज के नाम से एक संवैधानिक संस्था का गठन होना चाहिए जो योग्य शिक्षकों की तलाश कर सके.
2. विकट  मेधा के लोगों को परीक्षा में आगे जाने का अवसर मिलना चाहिए.
3. लिखित परीक्षा के साथ ही कठिनतम साक्षात्कार होना चाहिए. जिसमें सामूहिक चर्चा , तात्कालिक भाषण , लेक्चरेट, आदि शामिल किये जाने चाहिए.
4. चुने हुए प्रतिभागियों को उच्च स्तरीय ट्रेनिंग से होकर गुजारना चाहिए.
5. स्पोर्ट्स और सेना की तरह शिक्षा और शिक्षण कार्य में किसी भी तरह के आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए.
6.  सर्वाधिक वेतन और सुविधाएं इन शिक्षकों को मिलने चाहिए.
7.  शिक्षकों का कोड ऑफ़ कंडक्ट तैयार किया जाना चाहिए ता कि उच्च चरित्र के लोग सेवा में आएं और चरित्र वान बने रहें.

                         अगर इन कुछ बातों को लागू कर दिया जाए तो शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति की आशा की जा सकती है. जब तक अच्छे शिक्षक नहीं होंगे सभ्य समाज का निर्माण नहीं हो सकता . यदि समाज सभ्य नहीं होगा तो देश में समता और विधि के शासन की अपेक्षा नहीं की जा सकती. यदि देश में विधि का शासन न हो तो वैश्विक शांति की स्थापना असंभव है.                                    
                          कल पांच सितम्बर शिक्षक दिवस है. केवल उन शिक्षक मित्रों को ही शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ जो शिक्षक होने पर गर्व करते हैं और जो शिक्षक हो जाने के बाद कुछ और हो जाना नहीं चाहते.

अस्तु !!
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-    -मनमोहन जोशी