Diary Ke Panne

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

शुभ दीपावली....





 दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों "दीप" अर्थात "दिया" व "आवली" अर्थात "श्रृंखला"  से हुई है. दीपावली को विभिन्न भाषाओं में लगभग मिलते जुलते नामों से जाना जाता है. लेकिन कब इसका अपभ्रंश रूप  दिवालीकब प्रचलित हो गया इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है.

जब हम बच्चे थे तो दीपावली का हमारे लिए मतलब होता था नए कपड़े, पटाखे, मिठाइयां और रंग बिरंगी रौशनियाँ. त्योहार की शुरुआत कई महीनों पहले बाबा(ताऊ जी)  की घोषणा से हो जाती थी वो लगातार सुबह-शाम, तारीख बताते रहते थे कि किस दिन धनतेरस होना है और किस दिन दीपावली.

कक्षा आठ में जाकर जब पहली बार हिंदी और इंग्लिश में दीपावली का निबंध याद किया वो भी बड़े बच्चों का निबंध जो बड़े भैया ने कॉलेज में तैयार किया था उन्होंने हमें याद करवा दिया. अच्छी बात ये रही की इसके बाद फिर कभी दीपावली का निबंध याद करने की ज़रूरत नहीं पड़ी. और हाँ इस त्यौहार के बारे में कई ऐसी जानकारी भी मिली जो साधारण तौर पर इस उम्र के बच्चों को नहीं होती है.

दीपावली का पर्व अंधकार पर प्रकाश के विजय के रूप में मनाया जाता है. लेकिन मेरे देखे अन्धकार और प्रकाश में कोई लड़ाई है ही नहीं. अन्धकार तो केवल प्रकाश का अभाव मात्र है जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं उससे कैसी लड़ाई?? मेरी समझ यह कहती है कि ये अन्धकार और प्रकाश प्रतीकात्मक हैं. यहाँ शायद अज्ञान रुपी अन्धकार और ज्ञान रुपी प्रकाश की बात हो रही है. वैसे तो इन दोनों में भी कोई लड़ाई नहीं है और अज्ञान भी केवल ज्ञान का अभाव मात्र ही है.

हिंदू दर्शन में योग, वेदांत और सांख्य सभी शाखाओं में यह विश्वास है कि इस भौतिक शरीर और मन से परे वहां कुछ है जो शुद्ध अनंत, और शाश्वत है जिसे आत्मन् या आत्मा कहा गया है. दीपावली, बाह्य अंधकार पर आंतरिक प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई का उत्सव है.

विभिन्न धर्मों में इस पर्व को मनाने के अपने धार्मिक कारण हैं एक मान्यता के अनुसार कार्तिक अमावस्या को भगवान श्री राम जी चौदह वर्ष का बनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे. अयोध्या वासियों ने अपने आराध्य का स्वागत दीप जलाकर किया था. बाबा तुलसी ने इस दिन का बेहद खूबसूरत वर्णन किया है:-

सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद।
 चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद॥
अर्थात:- आनन्दकन्द श्री रामजी अपने महल को चले, आकाश फूलों की वृष्टि से छा गया. नगर के स्त्री-पुरुषों के समूह अटारियों पर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे हैं.

कंचन कलस बिचित्र सँवारे।सबहिं धरे सजि निज निजद्वारे॥
बन्दनवार पताका केतुसबन्हि बनाए मंगल हेतु 
  अर्थात:- सोने के कलशों को विचित्र रीति से सजाकर सब लोगों ने अपने-अपने दरवाजों पर रख लिया. सब लोगों ने बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगाईं.

बीथीं सकल सुगंध सिंचाई।गजमनि रचि बहु चौक पुराईं। 
नाना भाँतिसुमंगल साजे।हरषि नगर निसान बहु बाजे॥ 
अर्थात:- सारी गलियाँ सुगंधित द्रवों से धोई गईं. गजमुक्ताओं से रचकर बहुत सी चौकें पुराई गईं. अनेकों प्रकार के सुंदर मंगल साज सजाए गए और हर्षपूर्वक नगर में बहुत से डंके बजने लगे.
  
एक अद्भुत दोहे में प्रतीकों के माध्यम से बाबा तुलसी लिखते हैं कि ;-
 नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस। 
अस्त भएँबिगसत भईं निरखि राम राकेस॥अर्थात:- स्त्रियाँ कुमुदनी हैं,अयोध्या सरोवर है और श्री राम का विरह सूर्य है अर्थात इस विरह सूर्य के ताप से वे मुरझा गई थीं. अब उस विरह रूपी सूर्य के अस्त होने पर श्री राम रूपी पूर्णचन्द्र को देख कर वे खिल उठीं है.

बहरहाल भारत के कुछ क्षेत्रों में दीपावली के इस पर्व को को यम और नचिकेता की कथा के साथ भी जोड़ा जाता है.यह अद्भुत  कथा कठोपनिषद नामक ग्रन्थ में मिलती है.

सातवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक नागनंद में राजा हर्ष ने इस पर्व का उल्लेख दीपप्रतिपादुत्सव: के नाम से किया है. जिसमें दिये जलाये जाते थे और नव दंपत्ति को उपहार दिए जाते थे.

नवीं शताब्दी में राजशेखर ने काव्यमीमांसा में इस पर्व को  दीपमालिका कहा है जिसमें घरों की पुताई की जाती थी और तेल के दीयों से रात में घरों, सड़कों और बाजारों सजाया जाता था.

फारसी यात्री और इतिहासकार अलबरुनी, ने भारत पर अपने ग्यारहवीं सदी के संस्मरण में, दीवाली को कार्तिक महीने में नये चंद्रमा के दिन पर हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला त्यौहार वर्णीत किया है.

महाभारत के अनुसार बारह वर्षों के वनवास व एक वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडव आज ही के दिन वापस लौटे थे अतः उनके वापसी के प्रतीक रूप में दीपावली मनाई जाती है.

फिर एक प्रश्न यह उठता है कि दीपवाली के दिन लक्ष्मी पुजन क्यूँ किया जाता है ?? इसका कारण यह है कि दीपावली के दिन ही पांच दिवसीय सागर मंथन के पश्चात लक्ष्मी जी ने जन्म लिया था. और दीपावली की रात वह क्षण है जब लक्ष्मी जी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे विवाह बंधन में बंधीं अर्थात यह प्रेम दिवस भी है.

आज के दिन लोग लक्ष्मी जी की मूर्ति ला कर उसे घर में स्थापित करते हैं. मेरे देखे हमें विष्णु जी की मूर्ति लाकर उसकी स्थापना करनी चाहिए लक्ष्मी जी तो पीछे पीछे चली आएंगी.

भारत के पूर्वी क्षेत्र उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी जी की जगह माँ  काली की पूजा की जाती है और इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं.

जैन मतावलंबियों के अनुसार जैनों के चौबीसवें तीर्थंकर, महावीर स्वामी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी. इसी दिन उनके प्रथम शिष्य, गौतम गणधर को कैवल्य प्राप्त हुआ था.

सिक्खों के लिए भी आज का दिन महत्त्वपूर्ण है क्योंकि आज ही के दिन अमृतसर में 1577 को स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था.

बहरहाल केवल मिट्टी के दिए जला देने भर से ही मन का अंधियारा नहीं मिटेगा.. ज्ञान प्राप्ति की ललक जगानी होगी. उद्यम करना होगा धरती पाताल एक कर देना पड़ेगा...

इस दीपावाली मनुष्यता के लिए प्रार्थना करता हूँ कि मनुष्य मन का अँधेरा छंटे और प्रेम का प्रकाश चहूँ  फैले.... नीरज साहब की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं :-

 दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा,
 धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ !
  
 बहुत बार आई-गई यह दिवाली
 मगर तम जहाँ था वहीं पर खड़ा है, बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक
 कफन रात का हर चमन पर पड़ा है,
 न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे
 ऊषा को जगाओ, निशा को सुलाओ !
  
 दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा
 धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!

  
-मनमोहन जोशी


रविवार, 21 अक्टूबर 2018

प्रेम और स्त्री मन........







आज ट्विटर ओपन किया तो देखा कि प्रिंस हैरी और मेगन मार्कल की फोटो ट्रेंड कर रही है. इसमें प्रिंस हैरी डायस पे खड़े हैं और मेगन छाता लेकर खड़ी हैं. थोड़ा इन्टरनेट खंगालने पर पता चला कि प्रिंस हैरी और उनकी पत्नी मेगन मार्कल हाल ही में न्यू साउथ वेल्स गए थे जहां प्रिंस हैरी स्पीच दे रहे थे और बारिश शुरू हो गई. जहां वो खड़े थे उस जगह पर कोई शेड नहीं था. मेगन छाता लेकर पहुँच जाती हैं और स्पीच ख़त्म होते तक वहीं खड़ी रहती हैं, मुस्कुराती हुई. उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है और विडियो देख कर आपको ये अहसास होगा कि उनको ये करने में आनंद मिल रहा है.

लोग TWEET  करके अपनी ख़ुशी ज़ाहिर कर रहे हैं. कुछ लोगों को आश्चर्य है कि कोई राजघराने की किसी संभ्रांत महीला ने ऐसा पहली बार किया है. मेरे देखे स्त्री मन को समझना कठिन है. वस्तुतः स्त्री प्रेम करती है तो ऐसे ही करती है. पुरुष के प्रेम में ही सभी तरह के गुणा भाग होते हैं. स्त्री तो निस्वार्थ मन से बिना कुछ सोचे कूद पड़ती है प्रेम में, भिड़ जाती है यमराज से, छोड़ देती है महलों का वैभव.
   
प्रेम एक अद्भुत अहसास है, शारीरिक आकर्षण के परे, दिव्य. यह अनेक भावनाओं का एक ऐसा मिश्रण है जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता. कबीर ने इसे गूंगे का गुड़ कहा है. रातों की नीदों का उड़ जाना इसका एक आरंभिक लक्षण है.

प्राचीन ग्रीक लोगों ने चार तरह के प्रेम को पहचाना है. ये हैं - रिश्तेदारी, दोस्ती, वासना और दिव्य प्रेम. प्रेम को अक्सर वासना समझा जाता है या शारीरिक आकर्षण, लेकिन यह एक रसायन है. जिन्होंने अनुभव किया है वह सहमत होंगे क्योंकि यह यंत्र नहीं विलयन है जिसमें द्रष्टा और दृष्टि एक हो जाते हैं. सभी तरह की दुई खो जाती है. मन, शरीर और आत्मा एक हो जाते हैं. कोई मांग नहीं रह जाती.

सूफ़ियों ने इस प्रेम की अनुभूति की है. किसी सूफ़ी फ़क़ीर ने कहा है - तुझ हरजाई की बाँहों में और प्रेम परीत की राहों में / मैं सब कुछ बैठी हार वे.सब कुछ हार देना ही होता है तभी जीत मिलती है. अल्लामा इक़बाल ने कहीं लिखा है कि ये बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है, जो चाहे लगा दो डर कैसा.

तो मेरे देखे ये अनुभूति हर किसी को नहीं होती है. ये किसी  साधारण व्यक्ति का अनुभव नहीं हो सकता. अतीव साहसी लोग जीवन में इसका अनुभव करते हैं. आम लोग तो शारीरिक आकर्षण या मोह या आसक्ति को ही प्रेम मानकर चलते हैं. किसी शायर ने लिखा भी है

इश्क के लिए कुछ ख़ास दिल मखसूस होते हैं,
  ये वो नगमा है जो हर साज़ पे गाया नहीं जाता."

स्त्री स्वाधीन मन के साथ ही जन्म लेती है. आवश्यकता है कि पुरुष और समाज उसकी स्वाधीनता को अक्षुण्ण रहने दें. स्त्री का स्वाधीन मन और समर्पित प्रेम उसे स्वयं परेशानी में रह कर अपने प्रेमी को सुरक्षा प्रदान करने को प्रेरित करता है.

वाल्मीकि रामायण में उल्लेख मिलता है कि सीता, राम के साथ वन जाने की जिद करती है. राम पूछते हैं तुम मेरे साथ वन आकर क्या करोगी? वह कहती हैं – “अग्रतस्ते गमिष्यामि मृद्नन्ती कुशकण्टकान्” अर्थात- "मैं तुम्हारे रास्ते के कुश काँटे रौंदती हुई आगे-आगे चलूँगी."  यही स्त्री का प्रेम है.
    
- मनमोहन जोशी 

शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

EAT, PRAY, LOVE.....




एलिज़ाबेथ गिल्बर्ट के  संस्मरणों को पेंगुइन बुक्स ने  Eat, Pray, Love के नाम से 2006 में उपन्यास के रूप में प्रकाशित किया था जो एक बेस्टसेलर बुक है. यदि आप जीवन के अर्थ को तलाश रहे हैं या जीवन में संतुलन को खोज रहे हैं तो तो यह किताब अवश्य पठनीय है. 

इस पुस्तक को पढ़ते हुए यकीन हो चलेगा की आतंरिक ख़ुशी ही सब कुछ है लेकिन वो ख़ुशी है कहाँ ?? समाज में ?? काम में ?? भोग विलास में ?? आध्यात्म में ?? या प्रेम में ??

 इस पुस्तक को रयान मर्फी ने 2010 में फिल्म का रूप दिया. जूलिया रॉबर्ट्स इसमें एलिज़ाबेथ के किरदार में हैं जिनका नाम है “लिज़” अद्भुत किताब पर कमाल की फिल्म है यह. और जूलिया रोबर्ट्स तो हैं ही बेहतरीन.

फिल्म के तीन हिस्से हैं सबसे पहले “ईट” जो की भोग की बात करता है. फिर है “प्रे” जहां भक्ति या आध्यात्म की बात होगी और फिर “लव”, विशुद्ध प्रेम की बात.

 इस कहानी को पढ़ते या देखते समय यकीन मानें आप एक दूसरी ही दुनिया में खो जायेंगे.   

एलिजाबेथ लिखती हैं - हमने अपनी संकुचित मान्यताओं में इश्वर का जो रूप गढ़ा है, शायद ईश्वर उससे कहीं ज्यादा असीम और विशालतम है.

कहानी कुछ ऐसी है कि 34 वर्षीय लिज़ के जीवन में सब ठीक चल रहा होता है. लेकिन वो अपने वर्तमान जीवन से खुश नहीं है और तलाक के बाद पूरा एक वर्ष दुनिया देखने में बीता देती है. शुरू के चार महीने वो इटली में बीताती है भोग विलास में (EAT). इसके बाद तीन महीने भारत में अध्यात्म की तलाश में (PRAY) और फिर वर्ष के अंतिम महीने इंडोनेशिया के बाली द्वीप में दोनों के बीच संतुलन की तलाश में (LOVE).

मानो प्रेम ही भोग और अध्यात्म के बीच का संतुलन हो.
    
 जब वो इटली में होती है तो अपने इटैलियन दोस्त जूलियो से पूछती है कि रोम का उद्देश्य क्या है तो वह कहता है भोग और केवल भोग. जब वो उससे पूछता है कि तुम्हारे जीवन का उद्देश्य क्या है? वो कहती है - मैं अभी तो नहीं जानती, लेकिन मुझे महसूस हो रहा है कि मेरा उद्देश्य जल्द ही मेरे सामने आएगा, और जब आएगा तो मैं पहचान लूंगी.

एक रोज़ वह योग पर एक पुराना लेख पढ़ रही होती है. तब उसे संस्कृत शब्द “अंतेवासिन” मिलता है जिसका अर्थ है: " वो जो सीमा पर गुरु के समीप रहता है." यह उस व्यक्ति की ओर इशारा करता है जिसने सांसारिक जीवन के दौड़-धूप को छोड़ दिया है और नगर की सीमा पर वन के समीप जाकर रहने लगा है. न तो वह पूरी तरह से सन्यासी है और न ही संसारी.
  
उसे उसके जीवन का उद्देश्य मिल जाता है. प्रेम में उसने भोग और अध्यात्म के संतुलन को पा लिया है.... वस्तुतः लिज़ एक अंतेवासिन ही है. जो अंतराल में  ठहर गई है.... प्रेम के अद्भुत, खूबसूरत और डरावने वन के समीप लगातार बदलती सीमा पर एक विद्यार्थी के रूप में...
-       
           - मनमोहन जोशी  

रविवार, 14 अक्टूबर 2018

दिशा हारा केमोन बोका मोंटा रे ......




संगीत मेरे जीवन का एक अहम हिस्सा रहा है. जीवन के एक दौर में मैं चौबीसों घंटे संगीत में ही रमता था जटिल राग गायन , बेहतरीन बंदिशें , ग़ज़ल , दादरा, ठुमरी, टप्पा , ख्याल और तराना इन सबको बेहद करीब से देखा, सुना और समझा है.

वैसे तो कहा जाता है कि “म्यूजिक हेज़ नो लैंग्वेज” लेकिन फिर भी मुझे  लगता है कि अगर राग, ताल और शब्दों की समझ हो तो आनंद कई गुना हो जाता है. कई बार इन बारीकियों में उलझने का मन नहीं होता तो कोई ऐसी भाषा का गाना उठा लेता हूँ जो मुझे समझ नहीं आता लेकिन फिर जुट जाता हूँ उस भाषा के शब्दों को समझने और संगीत की बारीकियों को जानने में.

मैं एक डाइवर्सिफाइड लिसनर हूँ कुछ भी  सकता हूँ बस दिल तक उतरना चाहिए... तमिल और तेलुगु मुझे नहीं आती लेकिन इल्या राजा और रहमान की तेलुगु कम्पोजीशन मज़े से सुन सकता हूँ और यहाँ आकर यह धारणा ठीक मालूम पड़ती हैं की “म्यूजिक हेज़ नो लैंग्वेज”.

एक घटना याद आती है – मैं और मित्र सुनील तिवारी एक यात्रा पर थे. जिस शहर हम पहुँचने वाले थे वहां एक पत्रकार मित्र नौशाद खान हमारा इंतज़ार कर रहे थे लंच के लिए. हम जैसे ही शहर में इंटर हुए वो मित्र हमें चौराहे पर ही दिख गए अपनी बाइक के पास खड़े हुए. कार मैं ड्राइव कर रहा था और किशोरी अमोनकर की आवाज में श्री गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ चल रहा था (कभी समय निकाल कर किशोरी अमोणकर को सुनिए आवाज़ दिल को चीरती हुई पार निकल जाएगी आत्मा के, कभी किशोरी पर भी कुछ लिखूंगा). मित्र सुनील जी ने कहा अरे इसे बंद कर दो वो आ रहा है भाई, अच्छा नहीं मालूम पड़ता. लेकिन मैं भी कहाँ मानने वाला था मैंने और वॉल्यूम तेज़ कर दी. क्या संगीत का भी कोई जाती, धर्म होता है?? मेरे देखे तो नहीं?? नौशाद जी आकर गाडी में बैठ गए कुछ देर में अथर्व शीर्ष का पाठ ख़त्म हुआ और जो अगला गाना मेरे खजाने से निकल कर बजा वह नुसरत साहब का गाया नात था बोल थे अल्लाहू -अल्लाहू –अल्लाहू.

 तो मेरे सुनने का कोई पैटर्न नहीं है मैं रिहाना से लेकर एड शीरन तक को सूनता हूँ और स्वानंद किरकिरे से लेकर पंडित कुमार गन्धर्व तक को. मेरे देखे किसी गाने या संगीत में उतर जाने के दो तरीके हैं एक हेड फ़ोन ऑन कर लीजिये और दूसरा कार में सुनिए. हेड फ़ोन में भी मेरे देखे सोनी का हेड फ़ोन सबसे शानदार अनुभव देता है.                     

आजकल मैं एड शीरन के गाने सुन रहा हूँ वैसे तो उनका गाया शेप ऑफ़ यू बहुत फेमस हुआ है लेकिन उनके गाये सारे गाने बेहतरीन हैं “परफेक्ट” सुन कर देखें. मेरे आल टाइम पसंदीदा गानों की लिस्ट बहुत लम्बी है लेकिन स्वानंद किरकिरे के गाए गाने अद्भुत हैं. अपने आप में एक फलसफा लिए उनकी लेखनी और आवाज़ आपको दूसरी दुनिया में ले जाते हैं. जैसे लूटेरा फिल्म ( यह ओ हेनरी के उपन्यास पर आधारित है,कभी इस पर भी कुछ लिखूंगा)  का एक गाना है मोंटा रे...  अमिताभ भट्टाचार्य और स्वानंद किरकिरे ने अपनी आवाज़ दी है और शब्द भी अमिताभ भटाचार्य के ही हैं जिसमें वो बीच बीच में बांग्ला के शब्द भी पिरो देते हैं जिसके कारण गीत और भी मधुर मालूम पड़ता है शब्द हैं -

कागज़ के दो पंख ले के उड़ा चला जाये रे
जहां नहीं जाना था ये वहीं चला हाये रे
उमर का ये ताना बाना समझ ना पाए रे
जुबां पे जो मोह माया नमक लगाये रे
के देखे ना भाले ना जाने ना दाये रे
“दिशा हारा केमोन बोका मोंटा रे”

“दिशा हारा” का अर्थ है भटका हुआ, “केमोन” मतलब किधर चला और “मोंटा रे” का अर्थ है मन रे. गीत कार अपने मन से बात कर रहा है की कागज़ के पंख लेके तू कहाँ भटक रहा है? बुद्धि कहती है जिधर नहीं जाना उधर क्यूँ जाता है?? पूरा गीत सुनें. एक -एक अंतरे पर एक ब्लॉग लिखा जा सकता है, अद्भुत !!   

इसी ज़मीन पर स्वानंद किरकिरे ने फिल्म हजारों ख्वाहिशें ऐसी में एक खूबसूरत गीत लिखा और गाया है बोल हैं -

बावरा मन देखने चला एक सपना
बावरे से मन की देखो बावरी हैं बातें
बावरी सी धड़कने हैं बावरी हैं साँसें
बावरी सी करवटों से निंदिया दूर भागे

सुनें इन बेहतरीन नगमों को और करें आज अपने बावरे मन से कुछ बावरी सी बातें... कौन कहता है आजकल अच्छे गाने नहीं बन रहे या नहीं गाये जा रहे.

-मनमोहन जोशी

ओ रंगरेज़....





फिल्म भाग मिल्खा भाग में एक बेहद खूबसूरत सूफी गाना है “ओ रंगरेज़”.. जावेद बशीर और श्रेया घोषाल की जादुई आवाज़ में इसे सुनिए, शर्त लगा सकता हूँ कि दुबारा सुने बिना नहीं रह पाएंगे. शंकर एहसान लोय की तिकड़ी ने अद्भुत सुरों से सजाया है इस गाने को. और प्रसून जोशी ने क्रिएट किया है शब्दों का मैजिक.
  
ओ रंगरेज़
ओ रंगरेज़ तेरे रंग दरिया में
डूबना है बस तेरा बन के
 नहीं रहना दूजा बन के

एक भी सांस अलग नहीं लेनी
खींच लेना प्राण इस तन के
हाय, नहीं रहना दूजा बन के
अपने ही रंग में मुझको रंग दे
धीमे धीमे रंग में मुझको रंग दे
सोंधे सोंधे रंग में मुझको रंग दे
रंग देना, रंग देना, रंग दे
ना

इस गाने को समझने के लिए ये जानना ज़रूरी है कि ये रंगरेज़ कौन है? और किस सन्दर्भ में यहाँ रंगरेज़ शब्द का उपयोग किया गया है.

रंगरेज़, शब्द फारसी भाषा का है जिसका अर्थ है रंग में रंगने वाला. प्राचीन समय में भारत का नील और रंगों का व्यापार पूरी दुनिया में हुआ करता था. इरान, इराक और मिश्र में भी हमारा व्यापार होता था. वहां के लोगों द्वारा ही हमे रंगरेज कहा जाता था. जिसका अर्थ कपडे रंगने वाले होता है. 

रंगरेजों के पूर्वज मुशरिक थे. तनु वेड्स मनु के एक गाने में जो महान वडाली बंधू की कंपोज़ की हुई कवाली है, जिसमें कुछ लाइनें आती है – “मेरा मुशरिक तू, मेरा मग़रिब तू”. मुहम्मद बिन कासिम के सिंध के राजा दाहिर को पराजित करने के बाद 9वी 10वी शताब्दी में मुस्लिम समुदाय के संपर्क में आने के बाद तथा सूफी संतो से प्रभावित होकर इन लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया.

लेकिन सुफिस्म में रंगरेज़ शब्द का उपयोग एक अलग ही ढंग से किया जाता है उस एक व्यक्ति के लिए जिसने आपको अपने रंग में रंग दिया हो या आप जिसके रंग में रंग जाना चाहते हैं. आप जिसके प्रेम में हों उसके लिए रंगरेज़ शब्द का उपयोग करते हैं. गुलाम फरीद खुदा के लिए रंगरेज़ शब्द का उपयोग करते हैं तो रूमी इस रहस्यमयी संसार को चलाने वाली उस परम शक्ति को रंगरेज़ कहते हैं. 

कबीर ने गुरु को रंगरेज़ कहा है. अपने एक पद में कबीर लिखते हैं “सद्गुरु मेरे रंगरेज़ मेरी चुनर रंग डाली.” यहाँ रंगरेज़ गुरु हैं और चुनर का अर्थ आत्मा से है.

तो रंगरेज़ का एक अर्थ निकलता है ऐसा शख्स जो आपकी आत्मा को रंग दे अपने ही रंग में.

सूरदास अपने एक पद में श्री कृष्ण को रंगरेज़ कहते हैं और रंग जाना चाहते हैं उनके ही रंग में :-
“श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया ।
ऐसी रंग दे
, के रंग नहीं छुटे ।
 धोबिया धोये चाहे सारी उमरिया ॥

लाल ना रंगाऊं मैं तो, हरी ना रंगाऊ।
अपने ही रंग में रंग दे चुनरिया ॥“

तनु वेड्स मनु में वडाली बंधु का गाया गाना एक बेहद खूबसूरत सूफियाना कलाम है “ ऐ रंगरेज़” इसमें एक जगह राज शेखर लिखते हैं-  रंगरेज़ तूने अफ़ीम क्या है ख़ाली जो मुझसे पूछे कौन सा रंग, रंगों का कारोबार है तेरा तो तू ही ये जाने कौन सा रंग.. 

ये रंगरेज़ गुरु है और ये अपने मन को रंगाने आया शिष्य है जो कहता है क्या सीखाना है ये तू जाने क्या सीखना है ये मैं कैसे बता सकता हूँ. फिर वो कहता है -
मेरा बालम रंग , मेरा साजन रंग 
मेरा कातिक रंग, मेरा अगहन रंग
मेरा फागुन रंग, मेरा सावन रंग 
पलपल रंगते रंगते मेरे आठों पहर मन भावन रंग.

मेरे देखे कुछ चीज़ें समझने से ज्यादा महसूस करने की होती हैं. तो रंगरेज़ को समझने से ज्यादा अच्छा है महसूस करके देखा जाए. तो ढूंढें उस एक को जिसके रंग में आप रंग जाना चाहते हैं. अपने रंगरेज़ को. और तब तक वडाली बंधुओं की आवाज़ में खो जाइए और रंग जाइए राजशेखर जी के शब्दों के रंग में इस क़व्वाली के साथ. यू ट्यूब पर उपलब्ध है :

ऐ रंगरेज़ मेरे
, ऐ रंगरेज़ मेरे,
ये बात बता रंगरेज़ मेरे
ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है
के दिल बन गया सौदाई....


✍️MJ

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

विध्वंस और निर्माण किसकी गोद में खेलते हैं ????





                      कुछ माह पूर्व एक विश्व स्तरीय सौन्दर्य प्रतियोगिता में देश का प्रतिनिधित्व कर रही मानुषी छिल्लर को जब आखिरी राउंड में यह पूछा गया कि आपके अनुसार वह कौन सा प्रोफेशन है जिसे सबसे अधिक वेतन और सुविधाएं मिलनी चाहिए?? तो मानुषी ने जो उत्तर दिया उसकी चहुँ ओर प्रसंशा हुई और उसके उत्तर को नेशनल एंड इंटरनेशनल न्यूज़ में जगह मिली. लेकिन अगर मैं चयन समीति में होता तो केवल इस उत्तर के लिए ही मानुषी को या तो बॉटम में रखता या रिजेक्ट कर देता.

                 तो क्या था प्रश्न?? क्या उत्तर दिया था मानुषी ने?? और आज शिक्षक दिवस के ठीक एक दिन पूर्व इन बातों का उल्लेख करने का तुक क्या है ?? समझते हैं इस आलेख में....


                  मानुषी को पूछा गया था कि वह कौन सा प्रोफेशन है जिसे सबसे ज्यादा वेतन मिलना चाहिए?? मानुषी का उत्तर था “माँ”. क्या माँ होना कोई प्रोफेशन है?? क्या माँ को वेतन दिया जा सकता है ?? कौन देगा वेतन?? फिर पिता, चाचा, चाची , दादा , दादी आदि  ने क्या बिगाड़ा है ?? और यदि माँ होना एक प्रोफेशन है तो वकील , डॉक्टर, CA और शिक्षक  ये सब शायद रिश्तेदारियां हैं?? 

                   आज शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या को मैं इस प्रश्न और उत्तर का छिद्रान्वेषण कर रहा हूँ क्यूंकि मेरे देखे शिक्षण कार्य ही वह वृत्ति है जिसे सबसे ज्यादा वेतन और सुविधाएं मिलनी चाहिए. क्यूँ?? इसका उत्तर मैं आगे पैराग्राफ में देता हूँ.

                  मेरे देखे शिक्षा के क्षेत्र में भारत में क्रांति की आवश्यकता है. शिक्षक, जीवन में चूके हुए लोग नहीं हो सकते. शिक्षक होने का अधिकार तो केवल उन्हें होना चाहिए जिन्होंने जीवन को वास्तविकता, पूर्णता और जागरूकता के साथ जिया है. जिनके पास अनुभव का गांडीव और ज्ञान की प्रत्यंचा है और जो सामर्थ्य रखते हैं अपनी मेधा से ज्ञान रुपी मछली की आँख को भेदने का. 
                  आचार्य कौटिल्य ने कहा है , “विध्वंस और निर्माण दोनों शिक्षक की गोद में खेलते हैं. शिक्षा और शिक्षक कभी साधारण नहीं होते”. क्या वर्तमान समय में ऐसा दिखाई पड़ रहा है ?? अजी नहीं साहब विध्वंस और निर्माण केवल नेताओं और माफियाओं  की गोद में खेल रहे हैं. अधिकतर शिक्षकों के पास न तो वह  मेधा ही बची है और न ही वह सामर्थ्य. आचार्य कौटिल्य कृपया आकर देखिये वर्तमान में सबसे साधारण वर्ग शिक्षक ही दीख रहा है. आपकी बात में बल नहीं रहा.  

वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में अधिकतर जीवन से चूके हुए लोग ही आ रहे हैं . संविदा शिक्षक, शिक्षा कर्मी या अतिथि शिक्षक के रूप में ये किसी संस्थान में पिछले दरवाजे से घुस जाना चाहते हैं और फिर मुख्य दरवाजे से (परमानेंट शिक्षक के रूप में ) जब निकलना चाहते हैं तो सरकार डंडे का ऐसा उपयोग करती है कि कई दिन तक शिक्षक को क्लास में खड़े होकर ही पढ़ाना पड़ता है.
मेरे देखे समाज में तब तक क्रांति नहीं आएगी जब तक शिक्षा और शिक्षक को वो मान नहीं मिलेगा जिसके वे हक़दार हैं.

कुछ सुझाव:
1. स्टेट एजुकेशन सर्विसेज के नाम से एक संवैधानिक संस्था का गठन होना चाहिए जो योग्य शिक्षकों की तलाश कर सके.
2. विकट  मेधा के लोगों को परीक्षा में आगे जाने का अवसर मिलना चाहिए.
3. लिखित परीक्षा के साथ ही कठिनतम साक्षात्कार होना चाहिए. जिसमें सामूहिक चर्चा , तात्कालिक भाषण , लेक्चरेट, आदि शामिल किये जाने चाहिए.
4. चुने हुए प्रतिभागियों को उच्च स्तरीय ट्रेनिंग से होकर गुजारना चाहिए.
5. स्पोर्ट्स और सेना की तरह शिक्षा और शिक्षण कार्य में किसी भी तरह के आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए.
6.  सर्वाधिक वेतन और सुविधाएं इन शिक्षकों को मिलने चाहिए.
7.  शिक्षकों का कोड ऑफ़ कंडक्ट तैयार किया जाना चाहिए ता कि उच्च चरित्र के लोग सेवा में आएं और चरित्र वान बने रहें.

                         अगर इन कुछ बातों को लागू कर दिया जाए तो शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति की आशा की जा सकती है. जब तक अच्छे शिक्षक नहीं होंगे सभ्य समाज का निर्माण नहीं हो सकता . यदि समाज सभ्य नहीं होगा तो देश में समता और विधि के शासन की अपेक्षा नहीं की जा सकती. यदि देश में विधि का शासन न हो तो वैश्विक शांति की स्थापना असंभव है.                                    
                          कल पांच सितम्बर शिक्षक दिवस है. केवल उन शिक्षक मित्रों को ही शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ जो शिक्षक होने पर गर्व करते हैं और जो शिक्षक हो जाने के बाद कुछ और हो जाना नहीं चाहते.

अस्तु !!
-   
-    -मनमोहन जोशी

रविवार, 26 अगस्त 2018

"रामराखी" और "चूड़ाराखी"



                       संयुक्त परिवारों के टूटने की चिंता अक्सर वही लोग करते हैं जो कभी संयुक्त परिवार में रहे नहीं. क्यूंकि संयुक्त परिवार में रहना तब आसान था जब पूरा परिवार एक ही कार्य करता था और परिवार की बागडोर एक मुखिया के हाथ में होती थी. आज के दौर में जब परिवार में सब के काम अलग अलग हैं, एक भाई साल के दस लाख रुपये कमाता हो और दूसरा एक लाख तो संयुक्त परिवार की अवधारणा वैसे ही ख़त्म हो जाती है. लेकिन संयुक्त परिवार की अनेक बुराइयों पर एक खूबी भारी पड़ती है वह है त्योहारों का मनाना. मेरे दखे त्योहारों का सही आनंद संयुक्त परिवार में ही है.

                      मेरा बचपन संयुक्त परिवार में ही बीता है. पिताजी के कुल चार भाई और सात बहनें थे (कोई शक नहीं की देश की आबादी में दादा जी का बड़ा योगदान रहा है). इनके अलावा भी पापा ने कई राखी बहनें बना रखी थी. अतः ये तो स्पष्ट है कि हमारे घर में रक्षा बंधन का त्यौहार बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता था. सुबह से बुआओं का आना-जाना लगा रहता था और भाँती भाँती के पकवान खाने को मिल जाते थे.

                     मेरी कोई बहन नहीं और श्रीमती जी का कोई भाई नहीं. इस डिस्क्लेमर को किसी खेद के रूप में न देखा जाए. या ऐसे न समझा जाए कि मुझे किसी बहन की तलाश है. मेरे दखे सारे रिश्ते नाते हम जन्म के साथ ही पा जाते हैं. हमें केवल मित्र बनाने का ही अधिकार होता है. बचपन में रक्षा बंधन इतना मना लिया की अब यह एक मात्र त्यौहार का दिन बचा है जिसे हम छुट्टी के रूप में आनंद के साथ मनाते हैं.
 
                   रक्षाबन्धन प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चाँदी जैसी मँहगी वस्तु तक की हो सकती है. रक्षासूत्र बाँधते समय संस्कृत का एक श्लोक का उच्चारित किया जाता है, जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है. भविष्यपुराण के अनुसार इन्द्राणी द्वारा निर्मित रक्षासूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र के हाथों बांधते हुए निम्नलिखित स्वस्तिवाचन किया था. यह श्लोक रक्षाबन्धन का अभीष्ट मन्त्र है -

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥
अर्थात - "जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी) ! तुम अडिग रहना"

                  स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है. कथा कुछ इस प्रकार है- दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की. तब भगवान वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा माँगने पहुँचे. गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी. भगवान ने तीन पग में सारा आकाश पाताल और धरती नापकर राजा बलि को रसातल में भेज दिया.  बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया. भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया. उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे राखी बांधकर अपना भाई बनाया और अपने पति को अपने साथ ले आयीं. उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी. विष्णु पुराण के एक प्रसंग में कहा गया है कि श्रावण की पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिये फिर से प्राप्त किया था. हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है.

                   इस त्यौहार का सम्बन्ध गुरु-शिष्य से भी है. प्राचीन गुरुकुल पद्धति में  जब स्नातक अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद  गुरुकुल से विदा लेता था तो वह गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उसे रक्षासूत्र बाँधता था जबकि आचार्य अपने विद्यार्थी को इस कामना के साथ रक्षासूत्र बांधते थे कि उसने जो ज्ञान प्राप्त किया है वह अपने भावी जीवन में उसका समुचित ढंग से प्रयोग करे. ताकि वह अपने ज्ञान के साथ-साथ आचार्य की गरिमा की रक्षा करने में भी सफल हो.
                  
                  मेरे देखे रक्षाबन्धन का यह पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता  का सांस्कृतिक उपाय भी रहा है. विवाह के बाद बहन दुसरे घर चली जाती है. इस त्यौहार के बहाने प्रतिवर्ष अपने भाइयों को उनके घर जाकर राखी बाँधती है और इस प्रकार अपने रिश्तों का नवीनीकरण करती रहती है. दो परिवारों का और कुलों का पारस्परिक मिलन होता रहता है.

                 अपने राजस्थान प्रवास के दौरान मुझे रामराखीऔर चूड़ाराखीया लूंबाको भी करीब से जानने समझने का अवसर प्राप्त हुआ.  रामराखी सामान्य राखी से भिन्न होती है. इसमें लाल डोरे पर एक पीले छींटों वाला फुँदना लगा होता है. यह राखी  भगवान को ही बाँधी जाती है. चूड़ा राखी महिलाओं की चूड़ियों में बाँधी जाती है. जोधपुर में इस दिन गोबर, मिट्टी और भस्मी से स्नान कर शरीर को शुद्ध किया जाता है. इसके बाद गणपति, दुर्गा, गोभिला तथा सप्तर्षियों के मंडल बनाकर उनकी मन्त्रोच्चारण के साथ पूजा की जाती हैं. धार्मिक अनुष्ठान करने के बाद घर आकर हवन किया जाता है, वहीं रेशमी डोरे से राखी बनायी जाती है. राखी को कच्चे दूध से अभिमन्त्रित बांधते हैं और इसके बाद ही भोजन करने का प्रावधान है.

                 मैंने कहीं पढ़ा था कि  रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग-भंग का विरोध करते समय रक्षाबन्धन त्यौहार को बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर इस त्यौहार का राजनीतिक उपयोग किया था. 16 अक्टूबर 1905 को बंग भंग की नियत घोषणा के दिन रक्षा बन्धन की योजना साकार हुई. लोग गंगा स्नान करके सड़कों पर यह कहते हुए उतर आये-
सप्त कोटि लोकेर करुण क्रन्दन, सुनेना सुनिल कर्ज़न दुर्जन.
ताइ निते प्रतिशोध मनेर मतन करिल, आमि स्वजने राखी बन्धन..

                  एक बार रक्षा बंधन के इस दिन मैं मुंबई में था तब एक मित्र से यह जानकारी मिली कि महाराष्ट्र में यह त्योहार नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से विख्यात है. इस दिन सागर तट पर जाकर अपने जनेऊ बदलते हैं और पूजा करते हैं. इस अवसर पर वरुण देवता को प्रसन्न करने के लिये नारियल अर्पित करने की परम्परा  है. यही कारण है कि इस एक दिन के लिये मुंबई के समुद्र तट नारियल से भर जाते हैं.

रक्षा बंधन के इस पावन पर्व की शुभकानाएं.
 

- मनमोहन जोशी 

रविवार, 22 जुलाई 2018

गोंचा पर्व - हरी बोल

तुपकी चलाते हुए



श्री बलभद्र , सुभद्रा और जगन्नाथ  


                                      
Add caption





भगवान् श्री जगन्नाथ - हरी बोल 





                       बताते हैं की हमारे पूर्वज भारत के उड़ीसा राज्य के पुरी क्षेत्र के रहने वाले थे. हां वही पुरी जिसे पुरुषोत्तम पुरी, शंख क्षेत्र तथा श्री क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है. वही पुरी जो भगवान श्री जगन्नाथ जी की मुख्य लीला-भूमि है. पापा से ऐसा जानने को मिला था की बस्तर महाराजा ने अपने राज्य क्षेत्र में पूजा पाठ करने हेतु हमारे पूर्वजों को भूमि देकर बस्तर क्षेत्र में बसाया था.

                  छत्तीसगढ़ ही नहीं अपितु भारत देश का सबसे खूबसूरत क्षेत्र है बस्तर. वनवासी संस्कृति से परिपूर्ण. खनिज सम्पद्दा और वन क्षेत्र को अपने में समेटे यह एक अद्वितीय स्थल है, जो अभी व्यावसायिक पर्यटन से कुछ हद तक अछूता है. आज यहाँ "बाहुड़ा गोंचा" त्यौहार मनाया जा रहा है.

                   मूलतः यह जगन्नाथ पुरी में मनाया जाने वाला त्यौहार है. जहां के प्रधान देवता श्री जगन्नाथ हैं. पुरी में यह त्यौहार "रथयात्रा" के नाम से मनाया जाता है. लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में इसे "गोंचा पर्व" के नाम से मानते हैं. यह रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन मुख्य मंदिर से शुरू होकर दो किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर पर समाप्त होती है, जहां भगवान जगन्नाथ सात दिनों तक विश्राम करते हैं. आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन फिर से वापसी यात्रा होती है, जो मुख्य मंदिर पहुंचती है. ओड़िसा में इसे ही "बहुड़ा यात्रा" कहते हैं. बस्तर के लोग इसी यात्रा को "बाहुड़ा गोंचा" के नाम से मनाते हैं.  

                   पुरी की यह रथ यात्रा देश विदेश के सैलानियों का आकर्षण केंद्र होती है. इससे सम्बंधित कुछ ख़ास बातें इस प्रकार हैं :
1)- भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा- तीनों के रथ नारियल की लकड़ी से बनाए जाते हैं. ये लकड़ी वजन में अन्य लकडिय़ों की तुलना में हल्की होती है और इससे बने रथ को आसानी से खींचा जा सकता है. भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है और यह अन्य रथों से आकार में बड़ा भी होता है. यह रथ, यात्रा में बलभद्र और सुभद्रा के रथ के पीछे चलता है.

2) भगवान जगन्नाथ के रथ के कई नाम हैं जैसे:- गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष आदि. इस रथ के घोड़ों के नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व हैं, जिनका रंग सफेद होता है. इसके सारथी का नाम दारुक है. इस रथ के रक्षक भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ हैं. रथ की ध्वजा को त्रिलोक्यवाहिनी कहा जाता है. रथ को जिस रस्सी से खींचा जाता है, वह शंखचूड़ नाम से जानी जाती है. इस रथ में 16 पहिए होते हैं.

3) बलराम के रथ का नाम तालध्वज है. इस पर महादेव का प्रतीक अंकित होता है. रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी का नाम मताली है. रथ के ध्वज को उतानी कहते हैं. त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनावा इसके अश्वों के नाम हैं.

4)  सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है. सुभद्राजी के रथ पर देवी दुर्गा का प्रतीक मढ़ा होता है. रथ की रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन हैं. रथ का ध्वज नदंबिक कहलाता है. रोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता इसके अश्व होते हैं.

                    भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने की यह परंपरा अति प्राचीन है. इस रथ यात्रा से जुड़ी एक कथा इस प्रकार है : "कलयुग के प्रारंभिक काल में मालव देश पर राजा इंद्रद्युम का शासन था. वह भगवान जगन्नाथ के भक्त थे. राजन ने पुरी में एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया. मंदिर निर्माण से प्रसन्न भगवान् जगन्नाथ ने राजा इंद्रद्युम से कहा कि वे वर्ष में एक बार आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन यहाँ पधारेंगे.  स्कंदपुराण के उत्कल खंड के अनुसार इंद्रद्युम ने आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन प्रभु के यात्रा की व्यवस्था की. तभी से यह परंपरा रथयात्रा के रूप में चली आ रही है."
  
                     छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल अंचल बस्तर में मनाया जाने वाला गोंचा पर्व पुरी के रथ यात्रा के समान होते हुए भी कई मायनों में अनोखा है. बस्तर के गाँव बेड़ाउमर के कारीगर रियासतकाल से रथ निर्माण का कार्य कर रहे हैं. बस्तर महाराजा द्वारा वर्षों पूर्व सौंपे गए इस कार्य को वहाँ की पीढियां अब तक पूरा कर रही हैं.
  
                       बस्तर गोंचा पर्व में भगवान जगन्नाथ के सम्मान में तुपकी चलाने की भी अनोखी परंपरा है जो इस पर्व को विश्व में अलग स्थान दिलाती है. बस्तर के नानगूर क्षेत्र के आदिवासियों  द्वारा तुपकी बनाने का कार्य गोंचा पर्व के एक-दो माह पूर्व प्रारंभ कर दिया जाता है.

                         तुपकी का शाब्दिक अर्थ है छोटी तोप. बस्तर में बन्दुक को तुपक कहा जाता है शायद इससे ही तुपकी शब्द बना हो. तुपकी पोले बांस की नली से बनाई जाती है. इसे तैयार करने के लिए ताड़ के पत्तों, बांस की खपच्चीयों  तथा रंग-बिरंगी कागज की पन्नियों का उपयोग किया जाता है. 

                        “पेंगको तुपकी की गोली के रूप में उपयोग में लाया जाता है. यह एक जंगली फल है जो मटरदाने के समान दिखता है. इस फल का संस्कृत-हिन्दी नाम मलकांगिनी है, जो आषाढ़ माह में बस्तर के जंगलों में फलता-फूलता है. यह तुपकी गोंचा पर्व और आदिवासी संस्कृति का समन्वय है.

                        ये अनोखी संस्कृति, त्यौहार और विरासत हमें विश्व में सबसे अनोखा बनाते हैं. आवश्यकता हैं इन्हें जानने, समझने और इन पर गर्व करने की. इन्हें संजोये रखना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है.

         - मनमोहन जोशी