Diary Ke Panne

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

आए हैं समझाने लोग......

20 September 2017



                  कल एक बुद्धिमान से सामना हुआ.... साधारणतः मैं बुद्धिमानों से मिलने से बचता हूँ. क्यूंकि अधिकतर बुद्धिमान, बुद्धिमान होते नहीं हैं उन्हें केवल भ्रम ही होता है अपनी बुद्धिमत्ता का. और इस भ्रम के चलते वो दुनिया को सीख देते रहते हैं. बिना अनुभव रटी हुई बातों को दोहराते रहना ही उनका दैनिक कर्म है. और अगर उन्हें कोई अवधारणा देनी भी हो तो वो उनके फायदे से निकल कर आती है.... अच्छा, साधारणतः ऐसे लोग  वास्तविक बुद्धिमानों से अधिक लोकप्रिय होते हैं क्यूंकि नकली नोट अक्सर असली को चलन से बाहर कर देते हैं .

                 वर्ष 2008 में जब मैं एक MNC में एरिया हेड के पद पर कार्यरत था, हमने राजस्थान के एक शहर में  एक फ्लैट किराए पर लिया था जिसके मालिक तथाकथित बुद्धिमान ही थे ... शाम के समय चाय पर उनसे मुलाक़ात हुई तो उन्होंने अपनी बुद्धि का प्रदर्शन किया. आधे घंटे तक बोलते रहे. उनकी चाय मुझे महंगी पड़ी. अति तब हुई जब वो मुझे बताने लगे की एक बाबा उनके गुरु हैं और उनके ही कहने पर वो लोगों को उनके उपदेश सुनाते रहते हैं ( रटी हुई बातों को दोहराना). अधिकतर लोग यही कर रहे हैं जो बात पालन करने की है उसका पालन करने की जगह लोगों को सुनाते रहते हैं. मेरे देखे लोग अपनी लम्पटता को छुपाने के लिए ही सज्जनता का चोला ओढ़े रहते हैं.... मैंने सुना बाद में किसी लम्पट कार्य के लिए उनकी पिटाई  हुई थी... उन बाबा के कहने पर ही आज कल 14 फ़रवरी मातृ – पितृ पूजन दिवस के रूप में मनाया जाता है और बाबा आज कल जेल में हैं.

                 शोध का विषय है कि जो व्यक्ति लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलता रहता है (कुछ करता नहीं) कहीं तो  ऐसा नहीं कि उसे भ्रष्टाचार का अवसर नहीं मिला इसी लिए लगातार खिलाफ ही बोल रहा हो या जो लगातार सज्जनता का चोला ओढ़कर घूमते रहते हैं कहीं ऐसा तो नहीं की उन्हें लम्पटता का अवसर ही न मिला हो  या जो महिला किसी और महिला के पहनावे या आचरण पर टिका टिपण्णी करती है कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे ऐसा आचरण या पहनावे का अवसर नहीं मिला .... मेरे देखे जैसे ही अवसर मिलेगा ये आदमी भ्रष्टाचार का या लम्पट होने का अवसर हाथ से नहीं जाने देगा या ऐसी महिला आचरण या पहनावे को अपनाने से नहीं चुकेगी...

             बहरहाल जिस बुद्धिमान से मेरा सामना हुआ वो मुझे कह रहे थे की आपका पिछला आर्टिकल “कर्म क्षेत्रे” पढ़ा उसमें जो आपके न्याय की अवधारणा है वो बिलकुल ग़लत है. जयद्रथ को माफ़ किया जाना चाहिए था. या कम से कम निर्णय लेने से पहले ध्रितराष्ट्र की सलाह लेनी ही चाहिए थी. मैंने पूछा... तो फिर गुरमीत सिंह वाले मामले में जो सांसद साक्षी महाराज ने कहा आपके अनुसार वो भी सही होगा?? बोले, हाँ! अव्यवस्थाओं लिए तो कोर्ट ही पूरी तरह से ज़िम्मेदार है. ऐसे लोगों को मैं अच्छी  तरह से जानता हूँ ये लोग परेशानी आने पर छुप जाते हैं, शेर का सामना करने की हिम्मत तो नहीं होती लेकिन शिकार करने के बाद शिकारी को सलाह देने ज़रूर पहुँच जाते हैं....

              ऐसे लोगों को मैं “रीढ़ की हड्डी” विहीन मानता हूँ. मानव शरीर रचना में 'रीढ़ की हड्डी' या मेरुदंड (backbone) पीठ की हड्डियों का समूह है जो मस्तिष्क के पिछले भाग से निकलकर गुदा के पास तक जाती है। इसमें 33 खण्ड होते हैं. “रीढ़ की हड्डी” का होना दृढ व्यक्तित्व का परिचायक है. लोग जो निर्णय की घडी में सामने नहीं आते.... लोग जिनके अनुसार न्याय वह है जो सर्वस्वीकार्य हो या न हो, जिसमें पीड़ित को राहत मिले न मिले बस स्वयं का फायदा हो, ऐसे रीढ़ विहीन लोग क्या तो समाज को दिशा देंगे ???

बरबस ही बच्चन याद आते हैं :

तुम हो कौन, कहो जो मुझसे सही ग़लत पथ लो तो जान
सोच सोच कर
, पूछ पूछ कर बोलो, कब चलता तूफ़ान
सत्पथ वह है
, जिसपर अपनी छाती ताने जाते वीर
मैं हूँ उनके साथ
, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार
कभी नही जो सह सकते हैं
, शीश नवाकर अत्याचार
एक अकेले हों
, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़
मैं हूँ उनके साथ
, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

निर्भय होकर घोषित करते, जो अपने उदगार विचार
जिनकी जिह्वा पर होता है
, उनके अंतर का अंगार
नहीं जिन्हें
, चुप कर सकती है, आतताइयों की शमशीर
मैं हूँ उनके साथ
, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

जो अपने कन्धों से पर्वत से बढ़ टक्कर लेते हैं
पथ की बाधाओं को जिनके पाँव चुनौती देते हैं
जिनको बाँध नही सकती है लोहे की बेड़ी जंजीर
मैं हूँ उनके साथ
, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

जिनको यह अवकाश नही है, देखें कब तारे अनुकूल
जिनको यह परवाह नहीं है कब तक भद्रा
, कब दिक्शूल
जिनके हाथों की चाबुक से चलती हें उनकी तकदीर
मैं हूँ उनके साथ
, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

-          मनमोहन जोशी “MJ“

सोमवार, 18 सितंबर 2017

राग मल्हार ......

               


    



                 
      17 सितम्बर 2017 
      
             मध्यप्रदेश के एक शहर “सागर” से दूसरे शहर “गुना” के सफ़र पर हूँ गाडी श्याम नाम का ड्राईवर चला रहा है.... श्याम एक उत्कृष्ट ड्राईवर है  (नाम में ही अच्छा सारथी होने का गुण है)... तेज़ बारिश होने लगी है...  जीरो विसिबिलिटी होने के बावजूद मैं निश्चिन्त हूँ, क्यूंकि ड्राइविंग सीट पर श्याम बैठा हुआ है... लगभग 5 से 6 घंटों की यात्रा है यह. सोचता हूँ इससे बढ़िया क्या समय होगा राग मल्हार सुनने  के लिए....  

         वस्तुतः मल्हार के प्रकारों में मियाँ की मल्हार और मेघ मल्हार ही प्रचलित हैं लेकिन मैं अपने आप को बहुत ही खुश किस्मत मानता हूँ क्यूंकि मुझे मल्हार के विभिन्न प्रकारों को लाइव सुनने और समझने का मौका इस जीवन में मिला है.... कभी-कभी सोचता हूँ इस छोटे से जीवन में क्या क्या तो कर लिया है मैंने .......

          कक्षा 8 में रहा होऊंगा तब पिताजी की एक रामायण मंडली हुआ करती थी जिसकी एक शाश्वत समस्या थी ढोलक वाले का बिना बताये गायब हो जाना. किसी ने उन्हें सलाह दी की “मनमोहन” को ढोलक सिखाओ... फिर तलाश हुई योग्य गुरु की और योग्य गुरु के रूप में नाम सामने आया श्री रामदास वैष्णव सर का और शुरू हुआ तबला सीखना लगभग 08 वर्षों तक मैंने उनसे विधिवत शिक्षा ग्रहण की....

            कई मंचों पर प्रस्तुतियां दी. दूरदर्शन और आकाशवाणी तक में सराहा गया. कई अवार्ड भी जीते और फिर एक रोज़ दूरदर्शन के ही एक कार्यक्रम के सिलसिले में मिलना हुआ पंडित छोटे लाल व्यास जी से.  लगभग 80 वर्ष के रहे होंगे तब पंडित जी, शास्त्रीय संगीत का अथाह ज्ञान धारण किये हुए. लेकिन पंडित जी न तो किसी को सिखाते थे और न ही मंचों पर प्रस्तुति देते थे. मुझे उनके साथ लम्बा समय बिताने का अवसर प्राप्त हुआ जो अपने आप में कम ही मालूम पड़ता हैं......
  
              पंडित जी से ही रागों और तालों की बारीकियां जानने और समझने को मिली... वो जो मैंने आठ वर्षों में नहीं समझा था कुछ ही महीनों में उनसे समझने को मिला..... पंडित जी से ही पता चला की मल्हार के कई प्रकार होते हैं मेघ मल्हार, मियाँ की मल्हार , मीरा की मल्हार , रामदासी मल्हार, सूरदासी मल्हार , गौड़ मल्हार आदि. पंडित जी बड़ी ही सहजता से सभी रागों को एक के बाद एक गा कर समझाते थे. वो चले गए और उनके साथ चली गई उनकी ये विरासत भी... उनकी बंदिशों के सामने किशोरी अमोनकर का गाया “मीरा की मल्हार”,  उस्ताद राशिद खान का गाया “मियाँ की मल्हार”,  पंडित भीमसेन जोशी जी का “रामदासी  मल्हार” , और पंडित जसराज का “मेघ मल्हार” फीके ही लगते हैं.  

            लगातार कई घंटों तक रागों के महासागर में डूबकी लगाता रहा ..... सोचता हूँ की यह यात्रा कभी ख़त्म न हो और ना ही ख़त्म हों ये राग और रागिनियाँ........


              - मनमोहन जोशी "MJ"

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

The Idea Of Justice



                          सुबह के 5:30 हो रहे हैं... सुबह जल्दी उठ कर एक खूबसूरत पहाड़ी पर पहुँच गया हूँ..  मंद मंद पवन बह रही है.... पंछियों के कलरव से वातावरण गुंजायमान है.... सूर्योदय होने के करीब है.... पहाड़ी पर केफलस, सुकरात और मैं "न्याय" पर चर्चा कर रहे हैं. मैं पूछता हूँ  "न्याय क्या है?" इस पर पहली प्रतिक्रिया केफलस की ओर से ही आती है. उसके अनुसार न्याय का अर्थ है—"अपने कथन और कर्म में सच्चा रहना तथा मनुष्यों एवं देवताओं के प्रति ऋण चुकाना." 

                 सुकरात इस परिभाषा से संतुष्ट नहीं होता . उसके अनुसार सत्य सापेक्षिक होता है. यानी एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है, आवश्यक नहीं कि दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियों में भी ठीक वैसा ही सत्य स्वीकार्य हो. इसलिए केफलस के विचारों की आलोचना वह यह कहकर करता है कि विशेष परिस्थितियों में सत्य और समुचित व्यवहार को न्याय माना जा सकता है. परंतु उसे सार्वभौमिक सत्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. परिस्थिति चाहे जो भी हो, शुभ यदि अशुभ का जन्मदाता अथवा उसे प्रोत्साहित करता हैतो वह न्याय नहीं माना जा सकता. न्याय की कसौटी उसकी सार्वभौमिकता में है. वही न्याय है जो अधिकतम व्यक्तियों को स्वीकार्य हो और अधिकतम परिस्थितियों में न्याय-संगत सिद्ध हो.

                        सुकरात के इन विचारों से मैं सहमत नहीं होता. मैं कहता हूँ न्याय का  सर्व स्वीकार्यता से क्या लेना देना. न्याय का सम्बन्ध तो अपराधी को दण्डित कर पीड़ित को राहत प्रदान करने  से है.

                       मैं कहता हूँ अभी जब गुरमीत (बाबा या राम रहीम कहने में मुझे ऐतराज़ है. ) को सजा हुई थी तो अधिकतम लोगों को नहीं जंची. लाखों लोग सड़क पर आ गए और एक संसद सदस्य साक्षी महाराज ने तो ये तक कह दिया कि जो कुछ गड़बड़ी हुई है उसकी ज़िम्मेदार कोर्ट है .... देश ऐसे मूर्खों से पटा पड़ा है.....

                          मैं पूछता हूँ सुकरात बताओ - क्या कुछ कर्मचारियों द्वारा ऑफिस के किसी एक कर्मचारी को पीटने के सबूत मिल जाने के बाद भी उनको सजा न देना न्याय है?? क्यूंकि बॉस को ये लगता है कि यह अधिकतम लोगों को नहीं जंचेगा या क्यूंकि पीटने वालों कि संख्या अधिक थी तो उन सभी को दंड देने से कार्य प्रभावित होगा..... या कुछ लोग जयद्रथ के नेतृत्व में आधी रात को अभिमन्यु की हत्या कर उसे शरीर रुपी घर से निकल जाने को मजबूर कर दें  और न्यायी राजा  यह कहे कि हत्या तो हुई है लेकिन पहले कारण पता कर लो ऐसा तो नहीं की मरने वाले की ही गलती थी या हत्यारों को सजा ऐसी दी जाए जो अधिकतम को जंचे  या जिससे व्यवस्था न बिगड़े.

                           मैं दोनों को महाभारत का एक प्रसंग सुनाता हूँ  - महाभारत में जयद्रथ सिंधु प्रदेश के राजा थे. और रिश्ते में पांडवों के बहनोई लगते थे. महाभारत का भयंकर युद्ध चल रहा था. अर्जुन लड़ते लड़ते रणक्षेत्र से दूर चले गए  थे. अर्जुन की अनुपस्थिति में पाण्डवों को पराजित करने के लिए द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की. अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदने के लिए उसमें घुस गया...... उसने कुशलतापूर्वक चक्रव्यूह के छः चरण भेद लिए, लेकिन सातवें चरण में उसे दुर्योधन, जयद्रथ आदि सात लोगों ने  घेर लिया और उस पर टूट पड़े. जयद्रथ ने पीछे से निहत्थे अभिमन्यु पर ज़ोरदार प्रहार किया. वह वार इतना तीव्र था कि अभिमन्यु उसे सहन नहीं कर सका और  अभिमन्यु की मृत्यु हो गई   उसकी मृत्यु का समाचार सुनकर अर्जुन क्रोध से पागल हो उठा. उसने प्रतिज्ञा की कि यदि अगले दिन सूर्यास्त से पहले उसने जयद्रथ का वध नहीं किया तो वह आत्मदाह कर लेगा.

                        श्री कृष्ण ने यह नहीं कहा कि अर्जुन तुम अपनी मनमानी कर रहे हो.... या यह नहीं कहा कि कल अपने साथ धृतराष्ट्र को भी ले जाओ क्यूंकि जब तक युद्ध का निर्णय नहीं हो जाता राजा वही है, वो अँधा देखेगा कि गल्ती किसकी थी.... या यह नहीं कहा कि दंड देने से पहले  देखना तुम्हारे द्वारा दिया जा रहा दंड अधिकतम को स्वीकार्य हो. अपितु श्री कृष्ण ने कहा, तुम्हारी प्रतिज्ञा कल के ही रण क्षेत्र में पूरी 
होगी पार्थ, मैं तुम्हारे साथ हूँ. और रही बात रिश्तेदारी की तो न्यायार्थ 
अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है.

मैथली शरण गुप्त याद आते हैं :

वाचक ! प्रथम सर्वत्र ही जय जानकी जीवनकहो,
फिर पूर्वजों के शील की शिक्षा तरंगों में बहो।
दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्य पूर्वक सब सहो,
होगी सफलता क्यों नहीं कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।।
अधिकार खो कर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है;
न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है।

दोनों मेरी बात को गंभीरता से सुन रहे थे और मेरी नींद टूट गई .... उम्मीद करता हूँ फिर कभी इन विद्वानों से मुलाकात होगी और साथ में "प्लेटो" भी होंगे.......

                - मनमोहन जोशी " MJ " 

रविवार, 10 सितंबर 2017

"न चौर हार्यम न च राज हार्यम" - शिक्षा का अधिकार


10 September 2017


                कल रात TV पर एक फिल्म देख रहा था जिसकी समीक्षा दैनिक भास्कर में कभी पढ़ी थी... फिल्म का नाम था हिंदी मीडियम. फिल्म में शीर्षक भूमिका में इरफ़ान खान हैं. इरफान मेरे फेवरेट एक्टर हैं. इरफ़ान की "पान सिंह तोमर  और लाइफ ऑफ़ पाई दर्शनीय फ़िल्में हैं... जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है.

               बहरहाल दिल्ली में रहने वाले एक अमीर परिवार की कहानी के जरिये लेखक और निर्देशक साकेत चौधरी ने दिखाया है कि अंग्रेजी बोलने वालों को "क्लासी"  माना जाता है और हिंदी बोलने वालों को दोयम दर्जा दिया जाता है... जबकि मेरे देखे भाषा केवल सम्प्रेषण का माध्यम है... बाबा राम देव को कौन दोयम दर्जे का मानता है?? अटल बिहारी बाजपाई को किसने दोयम दर्जे का कहा है ?? मनमोहन सिंह और राहुल गांधी किसे क्लासी लगते हैं ?? अर्थात भाषा किसी को "क्लासी" नहीं बनाती, "कर्म" बनाता है.   

              अच्छे स्कूलों में एडमिशन की मारामारी हर शहर की परेशानी है.  स्कूलों में दाखिले का मुद्दा तो हर बार मीडिया की बड़ी हेडलाइंस बनता रहा है. मुट्ठी भर कॉन्वेंट स्कूलों की थोड़ी सी सीट्स के लिए कैसे डोनेशन, सिफारिश और कोटे का खेल होता है उसी स्टोरी को लेकर ये फिल्म आगे बढ़ती है. मेरे देखे केंद्र और राज्य सरकारों की असफलता के मानक हैं ये प्राइवेट स्कूल्स. अपनी असफलता को ढंकने के लिए ही केंद्र सरकार 2009  में शिक्षा का अधिकार क़ानून लेकर आई... इस क़ानून के प्रावधान कहीं से कहीं तक शिक्षा को बढ़ावा देने वाले नहीं दिखते...

               इस अप्रैल में शिक्षा अधिकार कानून लागू हुए सात साल पूरे हो चुके हैं. एक अप्रैल 2010 को "शिक्षा का अधिकार कानून 2009"  पूरे देश में लागू किया गया था. इसी के साथ ही भारत उन  देशों की जमात में शामिल हो गया था, जो अपने देश के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा  उपलब्ध कराने के लिए कानूनन जबावदेह हैं.

                भारत ने शिक्षा के अधिकार को लेकर एक लम्बा सफ़र तय किया है, इसीलिए इससे बुनियादी शिक्षा में बदलाव को लेकर व्यापक उम्मीदें भी जुड़ी थीं. लेकिन इस अधिनियम के लागू होने के सात वर्षों के बाद भी हमें कोई बड़ा परिवर्तन देखने को नहीं मिला है. लक्ष्य रखा गया था कि 31 मार्च 2015 तक देश के 6 से 14 साल तक के सभी बच्चों तक बुनियादी शिक्षा पहुंचा दी जाएगी और इस दिशा में आ रही सभी रुकावटों को दूर कर लिया जाएगा. लेकिन यह डेडलाइन बीत जाने के बाद अभी तक ऐसा नहीं हो सका है और हम लक्ष्य से बहुत दूर हैं.

                अभी भी देश के 92 प्रतिशत स्कूल, इस कानून के सभी मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं. केवल 45 प्रतिशत स्कूल ही प्रति 30 बच्चों पर एक टीचर होने का अनुपात पूरा करते हैं. पूरे देश में अभी भी लगभग 7 करोड़ से भी ज्यादा बच्चे प्राथमिक शिक्षा से बेदख़ल हैं. 2013-14 की एक रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा के अधिकार कानून के मापदंड़ों को पूरा करने के लिए अभी भी 12 से 14 लाख शिक्षकों की आवश्यकता है. आरटीई फोरम की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 51.51, छत्तीसगढ़ में 29.98, असम में 11.43, हिमाचल में 9.01, उत्तर प्रदेश में 27.99, पश्चिम बंगाल में 40.50फीसदी शिक्षक प्रशिक्षित नहीं हैं. इसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है. और जो शिक्षक हैं उनकी गुणवत्ता पर भी प्रश्न चिन्ह है....

               सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा लगातार जारी रिपोर्ट शिक्षा में घटती गुणवत्ता की तरफ हमारा ध्यान खीचते हैं. रिपोर्ट बताते हैं कि किस तरह से छठीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को कक्षा एक और दो के स्तर की भाषायी कौशल एवं गणित की समझ नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि कहीं शिक्षा का अधिकार कानून मात्र बच्चों को स्कूल में प्रवेश कराने और स्कूलों में बुनियादी सुविधायें उपलब्ध कराने का कानून तो साबित नहीं हो रहा है ?  यह कहना गलत नहीं होगा कि इस दौरान सरकारों ने सिर्फ नामांकन, अधोसंरचना और पच्चीस प्रतिशत रिजर्वेशन पर जोर दिया है. पढाई की गुणवत्ता को लगातार नजरअंदाज किया गया है. 

                मध्य प्रदेश के सन्दर्भ में बात करें तो, डाइस रिर्पोट 2013-14  के अनुसार प्रदेश के शासकीय प्राथमिक शालाओं में शिक्षकों का औसत 2.5 है, जो कि देश में सबसे खराब है. म.प्र. के प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों के लगभग एक लाख पद रिक्त हैं. 5295 विद्यालय ऐसे हैं, जहां शिक्षक ही नहीं हैं, जबकि 17 हजार 972  शालायें केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रही हैं.

               एक रिपोर्ट के अनुसार 2009 में मध्य प्रदेश की शासकीय शालाओं में कक्षा 5 के 76 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ लेते थे, लेकिन 2014 की रिर्पोट यह में घट कर 27.8 प्रतिशत हो गई है. अगर बच्चों में घटाव तथा भाग देने की स्थिति को देखें तो 2009 में शासकीय शालाओं में कक्षा 3 के 66.7 प्रतिशत बच्चे घटाव तथा भाग देने के सवाल हल कर लेते थे, जबकि 2014 में यह दर घट कर 5.7 प्रतिशत हो गई.

               एक तरफ उपरोक्त स्थितियां हैं, तो दूसरी तरफ जिस तरह से `शिक्षा अधिकार कानूनको लागू किया जा रहा है. उनसे भी कुछ समस्याएं निकल कर आ रही है. मेरे देखे  यह मात्र प्रशासनिक लापरवाही या सरकारों की उदासीनता का मसला नहीं है. कानून में भी कई  नीतिगत समस्याएं हैं. अगर इन समस्याओं को दूर कर लिया जाए जाए, तो हालत में कुछ सुधार की उम्मीद की जा सकती है.

              पहला मुद्दा है शिक्षकों की संख्या और योग्यता. शिक्षा अधिकार कानून में इसके लिए  विशेष प्रावधान तय किए गए हैं, किन्तु इन प्रावधानों का पालन नही हो पा रहा है. यहां कई स्तर के शिक्षक मौजूद हैं, जिन्हें सहायक शिक्षक, अध्यापक संवर्ग, शिक्षा कर्मी और संविदा शिक्षक के नाम से जाना जाता है. इस सबंध में विशेष वित्तीय प्रावधान लागू करते हुए पूर्णकालिक शिक्षकों की नियुक्ति किए जाने की आवश्यकता है.

             दूसरा मुद्दा शिक्षा के अधिकार कानून की सीमाओं से सम्बंधित है,जैसे इस कानून में छः साल तक के आयु वर्ग के बच्चों की कोई बात नहीं कही गई है, यानी बच्चों के प्री-एजुकेशन को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है.

            तीसरा मुद्दा अनिवार्य शिक्षा या शिक्षा के सामान अवसर के तहत सिर्फ प्राइवेट स्कूलों में 25 फीसदी सीटों पर कमजोर आय वर्ग के बच्चों के आरक्षण की व्यवस्था की गई है. इससे सरकारी शालाओं में पढ़ने वालों का भी पूरा जोर प्राइवेट स्कूलों की ओर हो गया है. यह एक तरह से गैर बराबरी और शिक्षा के बाजारीकरण को बढ़ावा देता है. जिनके पास थोड़ा-बहुत पैसा आ जाता है वे भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर हैं, लेकिन जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर हैं उन्हें भी इस ओर प्रेरित किया जा रहा है.

                देश के विभिन्न राज्यों में भी सरकारी स्कूलों को बंद करके सरकारें ही शिक्षा के इस निजीकरण की प्रक्रिया को मजबूत बना रही है. नेशनल कोलिएशन फॉर एजुकेशन की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में 17120 महाराष्ट्र 14 हजार, गुजरात 13 हजार, कर्नाटका 12 हजार और आंध्रप्रदेश में 5 हजार स्कूलों को बंद किया जा चुका है. कुछ अन्य राज्यों में भी सरकारी स्कूलें बंद की गई हैं और की जा रही हैं.

                  इससे पहले सन 1993 में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक क्रांतिकारी फैसले से तत्कालीन सरकार को जगाया. न्यायालय ने कहा कि संविधान में जीवन के अधिकार का अर्थ तो तभी है जब व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार मिला हो. इस फैसले के तहत सरकार को 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा का अधिकार देना आवश्यक था. मजबूर होकर कांग्रेस सरकार ने "सैकिया कमेटी" का गठन किया जिसने 1997 में संविधान में उपयुक्त बदलाव करने का सुझाव दिया.

                  सन 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने संविधान में उपयुक्त बदलाव कर 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया. साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता, अध्यापकों के वेतनमान, आदि अन्य सुविधाओं के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता से बचा गया. यहाँ तक की बच्चों की शिक्षा के लिए अभिभावकों का  मूल कर्त्तव्य बनाकर जिम्मेवार ठहराया गया.

                  किसी भी देश का शिक्षा क्षेत्र व्यवसाय के अलावा भी बहुत कुछ होता है. संयुक्त राष्ट्र ने 1948 के मानव अधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा पत्र में शिक्षा के अधिकार को एक मानव अधिकार घोषित किया गया है. वैसे स्वर्गीय गोपाल कृष्ण गोखले ने 18 मार्च 1910 में ही भारत में "मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा" के प्रावधान के लिए ब्रिटिश विधान परिषद् के समक्ष प्रस्ताव रखा था, जो निहित स्वार्थों के विरोध के चलते अंततः ख़ारिज हो गया.

                 एक सुभाषित के अनुसार शिक्षा या विद्या सर्वश्रेष्ठ संपत्ति है जिसे चुराया नहीं जा सकता, इसका भाइयों में बंटवारा नहीं होता, सरकार इस पर GST नहीं लगा सकती, यह भारकारी भी नहीं होता और खर्च करने पर लगातार बढ़ता ही जाता है :

"न चौर हार्यम न च राज हार्यम,
न भ्रात्रभाज्यम न च भारकारी ।
व्यये कृते वर्धते नित्यं,
विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम् ।।"



                                  -       मनमोहन जोशी “Mj”



बुधवार, 6 सितंबर 2017

जातस्य ही ध्रुवो मृत्यु....



06 September 2017 

                  देखो हमारी कॉलोनी में कौन आया है... सुबह श्रीमती जी ने आवाज़ देकर उठाया... आँख मलता हुआ उठता हूँ कौन आया है भई ?? कौवा आया है अभी एक दिखा था और एक ऊपर छत पर बैठा है देखो, वो कौवे को दिखाते हुए कहती है... हम्म, मैं कहता हूँ, इसका मतलब न्यू रानी बाग़ का ईको सिस्टम ठीक है क्यूंकि पुरे इंदौर शहर में कौवे नहीं दीखते... वो  कहती है कौवे का दिखना इसलिए भी खास है क्यूंकि आज से पितृ पक्ष शुरू हो रहा है और कहते हैं की पितृ गण कौवे के रूप में आते हैं.

                    बात चल ही रही थी की ऑफिस से कॉल आता है, “सर, शेर सिंग (ऑफिस का चौकीदार) बेहोश हो गया है”... मैं कहता हूँ उसे हॉस्पिटल ले जाओ मैं थोड़ी देर में आता हूँ.. जल्दबाजी में नहाने जाता हूँ... जैसे ही बाथ रूम से बाहर आता हूँ फ़ोन की घंटी बजनी शुरू हो जाती है... एक कॉल मैंने मिस कर दिया है... फिर से कॉल आ रहा है... मित्र सुनील तिवारी लाइन पर हैं कहते हैं शेर सिंह नहीं रहा... तुरंत गुर्जर हॉस्पिटल में आ जाओ.

                     मैं जल्दी से कपड़े पहन कर निकल जाता हूँ ... कल ही तो मिला था शेर सिंह, हमेशा की तरह हँसता हुआ... कल मिला तो बोला- सर, आज शिक्षक दिवस है आशीर्वाद दीजिये.और आज वो हमारे बीच नहीं है.... यही है जीवन की क्षणिकता.

अटल जी की कविता के कुछ शब्द याद आ रहे हैं :

" जो कल थे,
वे आज नहीं हैं।
जो आज हैं,
वे कल नहीं होंगे।
होने, न होने का क्रम,
इसी तरह चलता रहेगा,
हम हैं, हम रहेंगे,
यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।
सत्य क्या है?
होना या न होना?
या दोनों ही सत्य हैं?
जो है, उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।
मुझे लगता है कि
होना-न-होना एक ही सत्य के
दो आयाम हैं,
शेष सब समझ का फेर,
बुद्धि के व्यायाम हैं।"

                         मुझे याद आता है, मृत्यु से मेरा परिचय बहुत पुराना है. किशोर से युवा होते हुए कई लोगों की मृत्यु को करीब से देखा. दादी, नाना , नानी, बाबा (ताऊ जी) उनमें ख़ास थे... और इन सबमें भी बाबा मेरे सबसे करीब थे जिनके  जाने के बाद मैं कई रातों तक नहीं सोया...  मुझे नींद में लगता जैसे वो मुझे पुकार रहे हैं बब्बू”.... यही वो नाम था जिससे वो मुझे पुकारते थे. उनकी मृत्यु गाँव के कुँए में डूब कर हुई थी... वहाँ से उनकी लाश दूसरे दिन निकाली जा सकी थी...मृत्यु से दो दिन पहले किसी बात पर झगड़ कर वो गाँव जा रहे थे... उनके झगडे से होने वाले कोलाहल से मैं परेशान था... जाने से पहले मुझसे मिलने आये कहा गाँव जा रहा हूँ ये पैसे कितने हैं गिन दो, जो गाडी वाले को देना है वो अलग कर दो और बाकी पैसा अलग... मैंने वैसा कर दिया... लेकिन ठीक से बात नहीं की.. वो बोले मैं जा रहा हूँ अब वापस नहीं आऊंगा... मैंने बैठे ही बैठे कहा था ठीक है मत आना... और वो चले गए कभी ना आने के लिए...

                      वो कहते थे कि बब्बूमेरा भगवान् है... मैं भाइयों में सबसे छोटा था खेल में अक्सर मेरी हार होती थी. लेकिन अगर वो खेल के बीच में आ जाएँ तो मेरा संबल कई गुना हो जाता था क्यूंकि वो कहते, तुम इसको हरा ही नहीं सकते भले मैं हार रहा होऊं, वो कहते थे यही जीतेगा... 

                     उनके जाने के पश्चात्  मैंने लगातार  मृत्यु और उसके रहस्य को जानने की कोशिशें की... पुट्टपर्ती के सत्य साईं बाबा के पास (जब वो जीवित थे )  आश्रम में एक माह रहा. रजनीश की मैं "मृत्यु सीखता हूँ" और "कठोपनिषद"  कई बार पढ़ी... मृत्यु के पार”, “आत्मा रहस्य” , “गरुड़ पुराणऔर न जाने कितनी ही किताबें पढ़ डालीं... भगवद्गीता  पढता रहता हूँ जिससे रहस्य कुछ खुलता हुआ सा मालूम पड़ता है.....

एक बात तय है जो जन्मा है वो मरेगा.. जो बना है वो मिटेगा... इसीलिए जब भी किसी से मिलें ऐसे मिलें जैसे अंतिम बार मिल रहे हों... प्रेम पूर्वक , श्रद्धा पूर्वक... श्रीकृष्ण कहते हैं :

“ जातस्य ही ध्रुवो मृत्युध्रुवम् जन्म मृतस्य च |
 तस्माद् अपरिहार्येर्थेन त्वम् शोचितुमर्हसि ||” 

अर्थात: “ जो जन्म लेता हैउसकी मृत्यु अवश्य होती है । और मृत्यु के बाद जन्म अवश्य होता है । जिसमें कोई परिवर्तन न हो सके ऐसी यह कुदरती व्यवस्था है । अतः किसी की मृत्यु पर शोक करना तेरे लिए उचित नहीं है । 
   
                  जो भी हो मेरे देखे जीवन की खूबसूरती मृत्यु से है... कमाल यह है की जाने का समय तय नहीं है... और उस पर तुर्रा यह की सब कुछ यहीं छोड़ कर जाना है... सब कुछ मतलब सब कुछ!!!!!


                                     - मनमोहन जोशी " Mj" 

विध्वंस और निर्माण जिसकी गोद में खेलते हैं......


                                                       05 September 2017


                रात के 10 बज कर 55  मिनट हो रहे हैं... आज दो कारणों से दिन विशेष रहा एक तो गणपति जी  की विदाई, अनंत चौदस के रूप में और दूसरा शिक्षक दिवस... मेरे कई कार्य रूपों में से एक महत्वपूर्ण रूप शिक्षक का भी है.

              शिक्षण कार्य कब से कर रहा हूँ ठीक ठीक याद कर पाना कठिन है.... लेकिन याद आता है कि जब मैं कक्षा 5 में पढता था , श्री गुप्ते सर हमारे क्लास टीचर हुआ करते थे और वो मेथमेटिक्स पढ़ाते  थे..... अक्सर वो क्लास मेरे भरोसे छोड़ जाते थे कि ये वाला चैप्टर मन मोहन समझा देगा..... या हिंदी वाली मैडम ये कह कर क्लास के बाहर चली जाती थी की प्रश्नोत्तर लिखवा देना.... फिर मैंने जैसे ही स्कूल की पढ़ाई पूरी की और बीएससी में दाखिला लिया, खुद का कोचिंग इंस्टिट्यूट MM Tutorials शुरू कर लिया था...... लगभग 6 वर्ष फाइनेंसियल  सेक्टर में जॉब करने के बाद  वापस से एजुकेशन फील्ड ज्वाइन करना शायद मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन निर्णयों में से एक रहा है......

             कौटिल्य ने कहा है, “शिक्षा और शिक्षक दोनों ही साधारण नहीं होते .. विध्वंस और निर्माण दोनों शिक्षक की गोद में खेलते हैं ”.  शिक्षण-कार्य की प्रक्रिया का विधिवत अध्ययन शिक्षाशास्त्र या शिक्षणशास्त्र  कहलाता है. शिक्षण एक सजीव गतिशील प्रक्रिया है. इसमें अध्यापक और शिक्षार्थी के मध्य अन्त:क्रिया होती रहती है और सम्पूर्ण अन्त:क्रिया किसी लक्ष्य की ओर उन्मुख होती है. शिक्षक और शिक्षार्थी शिक्षाशास्त्र के आधार पर एक दूसरे के व्यक्तित्व से लाभान्वित और प्रभावित होते रहते हैं और यह प्रभाव किसी विशिष्‍ट दिशा की और स्पष्ट रूप से अभिमुख होता है. बदलते समय के साथ सम्पूर्ण शिक्षा-चक्र गतिशील है. उसकी गति किस दिशा में हो रही है? कौन प्रभावित हो रहा है? इस दिशा का लक्ष्य निर्धारण शिक्षाशास्त्र करता है.

              प्रत्येक शिक्षक की हार्दिक इच्छा होती है कि उसका शिक्षण प्रभावपूर्ण हो. इसके लिये शिक्षक को कई बातों को जानकर उन्हे व्यवहार में लाना पड़ता है, जैसे -  आरम्भ कहां से करना है , कैसे करना है , छात्र इसमें रुचि ले रहे हैं या नहीं , अर्जित ज्ञान को छात्रों  के लिये उपयोगी कैसे बनाया जाय, आदि.
शिक्षण के अनेक सिद्धांत प्रतिपादित किये गए है जैसे :

1. क्रिया द्वारा सीखने का सिद्धान्त
2. जीवन से सम्बद्धता का सिद्धान्त
3. कार्य कारण का सिद्धान्त
4. चुनाव का सिद्धान्त
5. विभाजन का सिद्धान्त
6 . पुनरावृत्ति का सिद्धान्त

कुछ शिक्षा शास्त्रियों ने शिक्षण के सूत्र भी प्रतिपादित किये हैं जिनमें से कुछ विशेष जो मुझे प्रिय हैं इस प्रकार हैं :

1. ज्ञात से अज्ञात की ओर चलो
2. सरल से कठिन की ओर चलो
3. स्थूल से सूक्ष्म की ओर चलो
4. अनुभव से तर्क की ओर चलो
5. पूर्ण से अंश की ओर चलो
6. विश्लेषण से संश्लेषण की ओर चलो

             साधारणतः शिक्षक और गुरु को एक ही अर्थ में लिया जाता है लेकिन मेरे देखे गुरु ज्यादा व्यापक व सम्मान पूर्ण शब्द है. शिक्षक की तुलना में कहीं बड़ा. वस्तुतः शिक्षक और शिक्षार्थी में मात्रा या जानकारी का ही भेद होता है जबकि गुरु और शिष्य में गुण का. गुरु गीता नामक ग्रंथ में विस्तार से गुरु का महत्व और महिमा पर चर्चा की गई है . इसके रचयिता वेद व्यास माने जाते हैं..... वास्तव में यह स्कन्द पुराण का एक भाग है जिसमें कुल 352  श्लोक हैं.

              वेद व्यास ने बड़ी सहजता से  शिव -पार्वती के संवाद के माध्यम से  गुरु कौन है?  उसका महत्व क्या है? कौन गुरु हो सकता है? उसकी कैसी महिमा है?, शिष्य की योग्यता, उसकी मर्यादा, व्यवहार, अनुशासन आदि प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा की है .... मेरे देखे इसे बीएड या एमएड  के पाठ्यक्रम में जोड़ा जाना चाहिए...

                गुरु गीता में विभिन्न प्रकार के गुरुओं का वर्णन है जैसे - 'सूचक गुरु', 'वाचक गुरु', बोधक गुरु', 'निषिद्ध गुरु', 'विहित गुरु', 'परम गुरु' आदि.

गुरुगीता के 34 वें श्लोक के अनुसार :

गुकारश्चान्धकारस्तु रुकारस्तन्निरोधकृत् |
अन्धकारविनाशित्वात् गुरुरित्यभिधीयते
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अर्थात :गु कार अंधकार है और उसको दूर करनेवा ल रु कार है. जो अज्ञानता के अन्धकार को नष्ट कर दे वही गुरु है.

                                             - मनमोहन जोशी "Mj"