Diary Ke Panne

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

गौहर-ए-नायाब


 

पिछले दिनों एक स्टूडेंट का मिलने आना हुआ. वो अपने माता पिता के साथ मिलने आई थी. जज बन चुकी है और पोस्टिंग को भी कई महीने बीत चुके. मुझे लगा शायद कुछ सीरियस मैटर है.


जब भी स्टूडेंट्स का सिलेक्शन होता है तो अधिकतर से मेरी फ़ोन पर बात हो जाती है और मिलना भी हो जाता है. लेकिन इस स्टूडेंट से ना तो मेरी बात ही हो पाई थी और ना ही मिलना. उसका कारण ये है कि बाजारवाद के इस दौर में मैं सलेक्टेड कैंडिडेट को कॉल लगाकर बात करने से बचना चाहता हूँ. जहां हर कोई सफलता का बाप बनने की कोशिश कर रहा हो तो वहाँ मैं उन स्टूडेंट्स के साथ खड़ा हो जाना ठीक समझता हूँ, जो किसी कारण से रह गये. ऐसे में मैंने कॉल नहीं किया और उसका भी कॉल नहीं आया.


बेहद सौम्य मुस्कान वाली ये लड़की जब 2021 में पढ़ने आई थी तो बेहद शांत और घबराई सी रहती थी एक बार मैंने किसी बात पर ज़ोरदार डाँट दिया था तो आँसू बह निकले थे, और फिर मुझे ही अपना रूमाल देना पड़ा था… उसे देखकर सारी पुरानी बातें याद आ गई. 


आते ही उसने पाँव छुए और बोली सर मैं आपसे माफ़ी माँगने आई हूँ. क्यूँकि सिलेक्शन के बाद मैं अभी आ रही हूँ और आपसे बात भी नहीं की.

मैं- अरे किस बात को माफ़ी अब तो तुम “जज” हो बधाई लेने का समय है ये ना कि माफ़ी माँगने का.


उसके पिता भी मेरे पाँव छूने के लिए झुके और मैंने उनका हाथ थाम लिया, मैंने कहा- ना ना आप बड़े हैं आप तो आशीर्वाद दीजिए. 


हाथ जोड़े बैठे पिता ने बताया कि वो चाय का ठेला लगाते हैं और माता जी भी घरों में काम करती है. 


लड़की बोली सर आपको याद है जब मैं पढ़ने आई थी तो आपने ही हौसला बढ़ाया था कि तुम थोड़ी मेहनत करो तो जज बन सकती हो, आपकी डाँट से मैं तो रो पड़ती थी लेकिन मेरा फ़ोकस भी उसके कारण ही बढ़ा. आपने अपनी किताबें भी मुझे पढ़ने के लिए दी, आप हर एक स्टूडेंट का ख़्याल रखते हैं.. आप मेरा नाम लेकर क्लास में कहते थे जागो तो मुझे तो स्पेशल फील होता था. आपके लिखाए नोट्स आज भी मेरे काम आ रहे हैं और आपके लेक्चर्स तो मैं आज भी मिस करती हूँ. उसकी आँखों में फिर आंसू थे. 


मैंने माहौल हल्का करने के लिए बात बदली, चाय के लिए कमल को बोला और फिर पूछा ये बताओ सिलेक्शन के बाद क्यूँ नहीं आई, कॉल तक नहीं किया.


वो बोली- बात ये है कि मैं फ़ोन पर बात नहीं करना चाहती थी. आपसे मिलकर आशीर्वाद लेना चाहती थी. बताना चाहती थी कि आपने रास्ते के पत्थर को तराशकर अनमोल हीरा बना दिया है. दूसरी बात ये कि आप सलेक्टेड लोगों का सम्मान करते हैं जबकि सम्मान आपका होना चाहिए. मेरे पास पैसे नहीं थे कि आपको कुछ दे पाती… ख़ाली हाथ आने का मन नहीं था… सोचा था पहली सैलरी मिलते ही आपके चरणों में रख दूँगी लेकिन काम में ऐसी उलझी की आने वक्त ही नहीं मिला.  लेकिन मैंने पहली सैलरी निकाल कर रख ली थी जो आज लेकर आई हूँ .


उसने आग्रह पूर्वक मेरी ओर नोटों से भरा लिफ़ाफ़ा बढ़ाते हुए कहा स्वीकार कीजिए और आशीर्वाद दीजिए. मैंने लिफ़ाफ़ा लिया अब मेरी आँखें नम थीं, भावनाओं का ज्वार उमड़-घुमड़ रहा था, कितनी दुआएँ दूँ इस बच्ची को!! ये कृतघ्नता का दौर है आज के समय में बच्चे माँ बाप को क्रेडिट नहीं देते और देखो तो क्या ही प्यारे संस्कार हैं कि ये अपनी मेहनत और सफलता का श्रेय मुझे दे रही है.


मैंने उसमें से एक पाँच सौ का नोट निकाला कमल को बुलाकर कहा कि मिठाई ले आओ और लिफ़ाफ़ा माता जी के हाथों में थमा दिया और कहा कि इसपर पहला हक़ माँ का है. बोली सर माँ का हक़ तो सब पर है ये आप रखिए.


मैंने लिफ़ाफ़ा उसके पर्स में डाल दिया क्यूँकि जो सुख और अनुभूति का एहसास मैं कर रहा था उसके सामने सारे संसार की संपदा भी तुच्छ मालूम पड़ रही थी…. लगा जैसे वो बच्ची ही नहीं सफल हुई मेरा शिक्षक होना भी सफल हुआ.


“कर दिया ख़ुद को समुंदर के हवाले हम ने

तब कहीं गौहर-ए-नायाब निकाले हम ने


ज़िंदगी नाम है चलने का तो चलते ही रहे

रुक के देखे न कभी पाँव के छाले हम ने”


✍️एमजे




रविवार, 6 अक्टूबर 2024

कल रात जहां मैं था…









देश में नवरात्रि की धूम है, माता रानी के दरबार और दुर्गा पंडालों में गरबे… और उसपर इंदौर टॉक द्वारा सजाया गया गरबा ग्रूव. कल रात मैं सपरिवार यहीं इसी कार्यक्रम का हिस्सा बना, गवाह बना. 

जब ज़िम्मेदारी के पौधे में कर्तव्य के पुष्प पल्लवित होते हैं तो उसकी सुगंध कैसी होती है ये महसूस करना हो तो इंदौर टॉक के किसी भी कार्यक्रम में पहुँच जाइए.. अतुल और आशीष भाई द्वारा कसे हुए कार्यक्रम कैसे आयोजित किए जाते हैं? कार्यक्रम में पारिवारिक माहौल के बीच भव्यता को कैसे सजाया जाता है? सुरक्षा को कितना महत्व दिया जाना चाहिये..आदि-आदि कई बातें हैं जो इनके इवेंट से समझी और सीखी जा सकती हैं. सबसे महत्वपूर्ण किसी भी सेलिब्रिटी से ज़्यादा महत्वपूर्ण परिवार और स्थानीय मित्र होते हैं ये बात सिर्फ़ और सिर्फ़ इंदौर टॉक के कार्यक्रमों में ही देखने को मिलती है.

कल का कार्यक्रम भी कुछ ऐसा ही अद्भुत था. मैरियट होटल के लॉन में सजा था गरबा पंडाल और कार्यक्रम की शुरुआत माँ की भव्य आरती से की गई.. फिर हनुमत पथक का मंत्र मुग्ध कर देने वाला और रोंगटें खड़े कर देने वाला ढोल वादन.. जिसमें युवा लड़के और लड़कियाँ अपने वज़न के बराबर ही वज़न का ढोल कमर में बांधे गणपति, दुर्गा और शिव की स्तुति करते हैं, अपने ढोल वादन से.. आपने इनके वायरल वीडियो देखे होंगे केदार नाथ और तुंग नाथ में वादन करते हुए. कुल 6 वर्ल्ड रिकॉर्ड्स हैं हनुमत पथक के नाम पर.

फिर शुरू हुआ लाईव म्यूजिक, और गरबा करते लोग घण्टों झूमते रहे आकांक्षा की आवाज़ और उनके ऑर्केस्ट्रा के संगीत पर. वैष्णवी ने क्या ही खूब संचालन किया!

अहा ! क्या तो आयोजन और क्या ही संयोजन… व्यावसायिकता के इस दौर में पारिवारिकता और शुचिता को महत्व देते इस तरह का आयोजन करने के लिए भाई साहब मोहन पांडे जी और इंदौर टॉक की पूरी टीम को साधुवाद… मुझे गर्व होता है कि हम तिवारी बंधुओं के स्नेह और सम्मान के पात्र हैं ❤️


 

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

श्राद्ध का मनोविज्ञान



किसी भी त्योहार या कर्म काण्ड  का मज़ाक़ बनाना अब आम बात मालूम पड़ती है.. मूर्खों का यही तरीक़ा होता है जो बात समझ नहीं आई या जो अपनी समझ से बाहर का हो उसका मज़ाक़ बना दो. देखो कैसे बॉलिवुडिया फ़िल्मों में शास्त्रीय संगीत का मज़ाक़ बनाया जाता है कारण साफ़ है.


श्राद्ध कर्म और मृत्यु भोज का भी ऐसे ही लगातार मज़ाक़ बनाया जाता रहा है और इन दिनों तो इसकी बाढ़ सी आ गई है.


मैंने एक कहानी सुनी थी कि कैसे एक बार एक संत अपने घर के बाहर पानी फेंक रहे थे तो किसी ने पूछा ये क्या कर रहे हो उन्होंने कहा कि अपने खेतों को पानी दें रहा हूँ वह व्यक्ति हंसा कहता है कि यहाँ पानी फेंकने से कैसे ख़ेत को पानी मिलेगा?? संत कहते हैं जैसे यहाँ श्राद्ध कर्म करने से तुम्हारे पितरों को दूसरी दुनियाँ में भोजन मिलता है.


संत की बात सटीक मालूम पड़ती है क्योंकि हमें श्राद्ध कर्म की सच्चाई और विज्ञान का नहीं पता. ये ठीक वैसा है जैसे आप AC के रिमोट से tv को कंट्रोल करना चाहते हों और विज्ञान का मज़ाक़ बनाते हों.


मुझे तो ये श्राद्ध कर्म और मृत्यु पश्चात के रिचुअल्स कमाल मनोवैज्ञानिक मालूम पड़ते हैं. दो अनुभव बताता हूँ -


  1. मेरे ताऊ जी की जब मृत्यु हुई उस समय मेरे मन में उनके लिए कुछ न कर पाने की टीस थी.. दो दिन तक तो कुछ खाने का भी मन नहीं था, उनको अग्नि देकर घर आने के बाद लगने लगा था जैसे ये संसार आसार है. लेकिन तेरह दिनों के कर्मकांड ने मुझे नार्मल होने में मदद की. लोगों का घर आते रहना और सिर्फ़ रिचुअल्स के लिये उनके साथ खाने बैठना, मेरी अनासक्ति को तोड़ने में कारगर साबित हुए. और इतनी सी बात की वो अभी भी हमारे आसपास हैं, उनके लिए प्रार्थना करना और उनको अपने हाथ से भोजन बना कर परोसना ये सारे कर्मकाण्ड मन की इस ग्लानि को धोने के लिए पर्याप्त थे कि मैं उनके लिए कुछ नहीं कर सका.
  2. कुछ समय पहले सास को मृत्यु हुई, पंडित जी ने कहा संकल्प लें कि उनकी आख़री इच्छा पूरी करेंगे और उनका श्रद्धाएँ और पिंड दान विधान पूर्वक करेंगे.. मैंने कहा उनकी सारी इच्छाएँ जो कुछ उन्होंने मुझे बताईं उनके जीवन काल में ही पूरी कर चुका हूँ, हाँ एक इच्छा उनकी रह गई थी, गया जाने की तो वो पूरी करूँगा ही….अब जब भी उनकी तिथि आती है बेटियों को ध्यान आता है कि मम्मी को क्या पसंद था वो उस दिन इनके मन का भोजन पकाती हैं और परोसती हैं जो किसी गाय को या किसी वृद्ध को या किसी पक्षी को या किसी ज़रूरतमंद को या किसी विद्वान को खिलाई जाती है, कितनी असीम शांति उनको मिलती होगी ये उनसे ही पूछा जा सकता है.


बहरहाल श्राद्धकर्म उन मूर्खों के लिए भी है जिन्होंने अपने बुजुर्गों को जीते जी सताया लेकिन अब उनके मन में पछतावा है और वो पश्चाताप करना चाहते हैं. कितना सुंदर, कितना गहरा कितना वैज्ञानिक सीधे मानव मन से जुड़ा है ये श्राद्ध पर्व.


जब अपने किसी प्रिय जन की मृत्यु से, आत्मा के आकाश में, ख़ालीपन का पौधा उगे तो उसमें उगने देना संताप के फूल और उससे निकलने वाले शोक की ख़ुशबू को व्याप जाने देना अपने अस्तित्व के ब्रह्मांड में में. फिर समूह पाओगे श्राद्ध पर्व जैसे महत्वपूर्ण कर्मकाण्ड को.


 ध्यान रखना श्री कृष्ण ने कहा है -

जातस्य ही ध्रुवो मृत्यु, ध्रुवम् जन्म मृतस्य च |

 तस्माद् अपरिहार्येर्थे, न त्वम् शोचितुमर्हसि ||” 


अर्थात: “ जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु अवश्य होती है..और मृत्यु के बाद जन्म अवश्य होता है... जिसमें कोई परिवर्तन न हो सके ऐसी यह कुदरती व्यवस्था है. अतः किसी की मृत्यु पर शोक करना वैसे तो उचित नहीं है.”

   

                  जो भी हो मेरे देखे जीवन की खूबसूरती मृत्यु से है... और जब तक जीवित हैं किसी ग्लानि के बोझ से हम न दबे रहें.. अपने पूर्वजों को याद रखें और इसी बहाने कुछ लोगों को भोजन भी मिल जाए तो बात ही क्या..


✍️एमजे


PS- अपने विचार कमेंट बॉक्स में अवश्य साझा करें :)


 

मंगलवार, 17 सितंबर 2024

विदा गीत ❤️


 साल 98 के वसंत की दोपहरी, उस दिन मैं कुछ छोटे बच्चों को पढ़ा रहा था, ख़ुद कक्षा बारह में पढ़ता था लेकिन आस पास के छोटे बच्चों को घर पर ही मैथ्स और इंगलिश पढ़ाता था….

हम जॉइंट फ़ैमिली में रहते थे.. जॉइंट फ़ैमिली के जहाँ अपने फ़ायदे हैं कि आप एक ही छत के नीचे बहुत सारे रिश्ते जी सकते हो और आपको सभी का प्यार मिलता है तो वहीं एक शाश्वत पारिवारिक क्लेश आपके जीवन का भाग हो जाता है.


हमारे इसी बड़े संयुक्त परिवार का हिस्सा थे मेरे ताऊ जी. प्यार से हम उन्हें बाबा कहते थे. उनके बीवी बच्चे नहीं थे.. या कहें हम भाई बहन ही उनके बच्चे थे. वे हनुमान जी के पुजारी थे. साफ़ सफ़ेद कपड़े पहनने का उन्होंने शौक़ था और स्पष्टवादी होने के कारण किसी के भी मुँह पर ही सच बोलने का साहस रखते थे और बोलते भी थे.


वो मुझसे बड़ा स्नेह रखते थे मुझे “बब्बू” बोलकर बुलाते थे.. कहते “बब्बू” तो मेरा भगवान है.. कभी हम भाई कुछ खेल रहे होते और वो वहाँ मौजूद होते तो कहते तुम लोग इसको (मतलब मुझे) नहीं हरा पाओगे ( भले ही मैं हार रहा होता था).. अब कोई जीते कोई हारे मुझे तो मेडल मिल चुका होता.. वो मेरा संबल थे.


बहरहाल चलते हैं उस रोज़ पर… उस दिन भी किसी बात पर घर के लोग आपस में झगड़ रहे थे, जब मैं बच्चों को पढ़ा रहा था.. यूँ तो बाबा की हम बच्चों को छोड़कर किसी से भी नहीं बनती थी लेकिन अधिकतर लड़ाइयों में उनकी कोई ग़लती नहीं होती थी. बस परेशानी ये थी कि वो लगातार बोलते रहते थे और मैं ये बिना जाने कि किसकी ग़लती थी और मुद्दा क्या था बस यही कहता था कि आपस में बैठकर बात कर लो.. चिल्लाओ मत.


सो उस दिन भी मैंने यही किया मैं अपने कमरे से बाहर आया और उनसे झल्लाकर बोला चिल्लाओ मत… मुझे याद है, मैंने ये बात बड़ी नाराज़गी से कही थी और वापस पढ़ाने चला गया कमरे में. 


वो थोड़ी देर बाद मेरे कमरे में आये, बोले मैं गाँव जा रहा हूँ अब नहीं रह पाऊँगा यहाँ ( वो अक्सर ऐसा कहते थे )

मैं - ठीक है जाओ 

वो - देखना मेरे पास कितने पैसे हैं, और बताना कितने टैक्सी वाले को देना है, उतने पैसे अलग कर देना 

(मैंने वैसा ही किया, पैसों को उनके पर्स के अलग- अलग खानों में जमा दिया. टैक्सी वाले को देने के पैसे अलग कर दिए खुल्ले पैसे अलग और बड़े नोट अलग..फिर पर्स उनके हाथ में रख दिया.)

वो - जा रहा हूँ , अब वापस नहीं आऊँगा, देख लेना तुम लोग 

मैं- हाँ हाँ जाओ 

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और फिर वो कभी नहीं आये.. तीन दिन बाद खबर मिली कि वो लापता हैं.. बाद में गाँव के कुएँ से उनकी लाश मिली.. पुलिस वालों का कहना था कि रात में पाँव फिसलने के कारण वो गिर गये होंगे.. आत्महत्या या अपराध जैसी की बात से इनकार किया गया.


कई महीनों तक मेरे कानों में उनकी आवाज़ गूंजती रही.. आज भी बस यही सोचता हूँ कि जाने के पहले एक बार उनके गले लग लिया होता या पाँव छू कर आशीर्वाद ले लिया होता या टैक्सी स्टैंड पर उनको छोड़ आया होता या कम से कम एक बार उनको ये बता पाता कि उनका मेरे जीवन में क्या महत्व है… लेकिन..


कल गणपति विसर्जन करते हुए यही ख़्याल आया कि मिलन का उत्सव तो मनाया ही जाता है.. विदा कितना गौरवपूर्ण हो सकता है अनंत चतुर्दशी इस इस बात के महत्व को रेखांकित करने ही आती है… ये विदा का गीत है… हर एक व्यक्ति गौरवपूर्ण विदाई का हक़दार है.. मेरे देखे विदा गौरवपूर्ण ही होना चाहिए.. अंतिम विदा नहीं हर एक विदा क्यूँकि हमें नहीं पता कि कौन सी विदाई अंतिम है.


मुझे लगता है बिछोह की ऊष्मा का पौधा जब दिल की ज़मीन पर उगे तो उसके पुष्प की ख़ुशबू चेतना के आकाश में किस तरह व्याप जानी चाहिए ये दिखाने आते हैं गणपति. मिलन और जुदाई दोनों ही उल्लास और उत्सव से भरे हों ये बताने आते हैं गणपति.


आइये अपने आस पास भी विदा के इस गीत को उत्सव में बदलने का प्रयास करें ताकि फिर कोई बब्बू अपने बाबा से इस तरह विदा ना हो कि उम्र भर हृदय में विदा का गीत गूंजने कि जगह विदा का शूल चुभता रहे..


✍️एमजे


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रविवार, 15 सितंबर 2024

ईद 🌙





मैं सौभाग्यशाली रहा हूँ कि बचपन से ही मेरी मित्र मंडली में कोई न कोई मुस्लिम मित्र अवश्य ही रहा है जिससे इस्लामिक मान्यताओं और इस्लाम से जुड़े लोगों और त्योहारों को नज़दीक से जानने का अवसर मिला. प्राइमरी स्कूल में इरफ़ान , गुफ़रान और मोतीउर्रहमान से मित्रता हुई. मोती अभी एक मस्जिद में मोमिन है. बाद कॉलेज के दिनों में तो मैंने मोती से बक़ायदा उर्दू की बेसिक शिक्षा भी ली. 


मिडिल स्कूल में भाई समीर क़ुरैशी से मित्रता हुई जो अभी तक अनवरत जारी है. जब इंदौर आया तो सबसे पहले शानू भाई से मित्रता हुई. इमरान भाई कमाल के कपड़े सिलते हैं जिनसे मित्रता के एक दशक से ज़्यादा पूरे हो चुके हैं. हारून हमारा सिक्योरिटी हेड है लेकिन परिवार का सदस्य ही कहना ज़्यादा ठीक रहेगा. जिम जाना शुरू किया तो इलयास भाई से मित्रता हो गई. और स्टूडेंट्स तो कई हैं जिन्हें मैं मित्र कहना ही ठीक समझता हूँ .


आज बड़ी ईद है. जब मैं स्कूल में था तो रियाज़ भाई के यहाँ से न्योता आता था और जब बड़ा हुआ तो भाई समीर के यहाँ से. रियाज़ के यहाँ तो हम सेवइयाँ खाने जाते थे लेकिन समीर के घर तो अम्मी बिना खाना खाए वापस आने ही नहीं देती थी, कहतीं थीं मोहन आया है, कृष्ण कन्हैया, तो भोग लगाए बिना कैसे जाने दूँगी. अलग से मेरे लिये दाल और चाँवल पकाए जाते थे. अपार स्नेह मिलता था.


बहरहाल ईद मिलाद-उन-नबी को ईद-ए-मिलाद के नाम से भी जाना जाता है. इस्लाम धर्म में ईद मिलाद-उन-नबी का त्योहार पैगंबर हजरत मोहम्मद के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है. ईद मिलाद-उन-नबी इस्लामी कैलेंडर के तीसरे महीने रबी अल-अव्वल की 12वीं तारीख को मनाया जाने वाला एक खास इस्लामिक त्योहार है. इस दिन मुस्लिम समुदाय में विशेष प्रार्थनाएं, समारोह और जश्न मनाए जाते हैं. लोग मस्जिदों में जाकर प्रार्थना करते हैं, और पैगंबर मुहम्मद साहब की शिक्षाओं को याद करते हैं.


मैंने पैग़म्बर साहब को खूब पढ़ा है. आइये आज के दिन उनकी कुछ शिक्षाओं को याद करें -


  1. पड़ोसियों का ख्याल
    वो इंसान कहलाने के लायक़ नहीं है जिसका पेट भरा हो, जबकि उसके पड़ोसी भूखे सो रहे हों.
  2. सादा जिंदगी
    उन लोगों को देखो जो आपसे कमतर हैं, न कि उन लोगों को जो अपने से बेहतर हैं.
  3. खुश रहना                                                                      खुश रहो और सबको सकारात्मक महसूस करवाओ.
  4. साफ-सफाई                                                                           साफ-सफाई और अच्छी सेहत को पैग़म्बर साहब ने इस्लाम का अहम हिस्सा बताया है.
  5. सदका                                                                               कमाई का 2.5 फीसद दान करना फर्ज है
  6. अच्छा व्यवहार (अखलाक)                                               पैग़म्बर साहब के अनुसार सब से अच्छा व्यवहार करना इंसानियत का पहला उसूल है.


ईद मुबारक़🌙🌙

✍️एमजे


ओणम और साद्या ❤️

केले का पत्ता बिछ गया अब पकवान परोसे जायें 

जोशी परिवार ओणम फेस्टिवल में 

 

ओणम केरल का एक प्रमुख त्योहार है। दस दिनी यह उत्सव इस वर्ष 5 सितंबर को शुरू हुआ और आज 15 सितंबर को इसका आख़िरी दिन है।


दिन की शुरुआत केरलियन मित्रों को शुभकामनाएँ देने से हुईं और रात हमने ओणम स्पेशल भोजन जो कि पारंपरिक केरल का भोजन होता है और यह केले के पत्ते पर ही परोसा जाता है , के साथ पर्व मनाया। इस विशेष थाली में कुल 26 व्यंजन परोसे जाते हैं जिसे साद्या कहा जाता है इसमें मेरे पसंदीदा अड़ा पायसम और रसम होते हैं वहीं श्रीमती जी को बेसिबीले खिचड़ी, उत्पम् और विभिन्न प्रकार की चटनियाँ पसंद आती हैं ।


अड़ा पायसम गुड़ की खीर होती है ।इसके अलावा इस थाली में मैदे से बनाई जाने वाली खीर जिसे पलाड़ा कहते हैं, गेहूं से बनने वाली खीर, जिसे गोदम्ब कहते हैं और अरहर की दाल सें बनने वाली खीर, जिसे पझम कहते हैं, भी शामिल होती है। इसके अलावा चावल, परिप्पु करी, पच्चड़ी, पुलुस्सरी, ओलन, कालन, चेन , खट्टा रायता, नारियल के पकवान , नीर डोसा और उत्तपम प्रमुख होते हैं ।


ओणम का उत्सव भगवान वामन की जयन्ती और राजा बलि के स्वागत में प्रति वर्ष आयोजित किया जाता है जो दस दिनों तक चलता है। उत्सव त्रिक्काकरा में केरल के एक मात्र वामन मन्दिर से प्रारम्भ होता है। ओणम में प्रत्येक घर के आँगन में फूलों की पंखुड़ियों से सुन्दर सुन्दर रंगोलिया डाली जाती हैं जिसे पूकलम कहा जाता है । युवतियां उन रंगोलियों के चारों ओर वृत्त बनाकर उल्लास पूर्वक नृत्य (तिरुवाथिरा कलि) करती हैं। इस पूकलम का प्रारम्भिक स्वरुप पहले (अथम के दिन) तो छोटा होता है परन्तु रोज़ इसमें एक और वृत्त फूलों का बढ़ा दिया जाता है। ऐसे बढ़ते बढ़ते दसवें दिन यह पूकलम बड़े आकार को धारण कर लेता है। इस पूकलम के बीच त्रिक्काकरप्पन (वामन अवतार में विष्णु), राजा बलि तथा उसके अंग-रक्षकों की प्रतिष्ठा होती है जो कच्ची मिटटी से बनायीं जाती है। ओणम में नौका दौड़ जैसे खेलों का आयोजन भी होता है। 


ओणम एक सम्पूर्णता से भरा हुआ त्योहार है जो सभी के घरों को सुखों से भर देता है।


यह अथम से शुरू होता है और थिरुवोनम के साथ समाप्त होता है. आठ अन्य उत्सव के दिन चिथिरा, चोडी, विशाकम, अनिज़म, थ्रिकेता, मूलम, पूरादम और उथ्रादोम हैं.


मेरे मन में है कि किसी वर्ष इन दस दिनी उत्सव के दौरान केरल में रहूँ और ओणम को जी भर कर जी लूँ । समझूँ इस समृद्ध संस्कृति को और संजो लूँ इस विरासत को। 


✍️एमजे


मंगलवार, 10 सितंबर 2024

ग्रेविटी से ज़्यादा शक्तिशाली क्या है ?


 मैं और श्रीमती जी इंटरस्टेलर नामक फ़िल्म देख रहे थे. क्रिस्टोफ़र नोलन के सिनेमा में कुछ जादू है कि जितनी बार देखो उतना ही जादुई मालूम पड़ता है. फ़िल्म का हीरो कूपर अपनी बेटी को छोड़कर फिफ्थ डायमेंशन में जाता है जहां से आना असंभव है. वह एक ऐसे ग्रह में भी फँस गया था जहां पर एक घंटे का बीतना पृथ्वी पर सात घंटे के बीत जाने के बराबर है.

उसने अपनी बेटी से वादा किया है कि वो वापस आएगा और वो वापस आता है. जब वो पृथ्वी से गया था तब उसकी उम्र कोई 35 बरस की थी और उसकी बेटी मात्र 10 बरस की लेकिन जब वो वापस आया है तो उसकी उम्र नहीं बढ़ी है लेकिन उसकी बेटी मर्फ़ 94 बरस की हो गई है और मरणासन्न है. लेकिन वो वापस आया है.

अपने जीवन के अंतिम समय में कूपर को देख उसकी बेटी कहती है - कोई मेरा विश्वास नहीं करता था लेकिन मुझे पता था, आप एक दिन वापस जरूर आओगे…

कूपर पूछता है - कैसे?

बेटी रुँधे गले से कहती है - क्योंकि मेरे पिता ने मुझसे वादा किया था. 

फ़िल्म बताती है कि ग्रेविटी एकलौती चीज है, जो समय और आयामों के बीच सफर कर सकती है, पर मेरे देखे यह एकलौती चीज नहीं है. तो फिर ऐसा क्या है जिसने ग्रेविटी को भी मात दे दी है??

ऐसी ही एक बेहद प्यारी कहानी पढ़ने को मिलती है आदिशंकराचार्य के बारे में. जब वे मात्र 8 बरस के थे तब संन्यासी होकर चल दिये थे ज्ञान की खोज में. उस समय उनकी माँ ने उनसे वचन लिया था कि वो मृत्यु के पहले एक बार ज़रूर उनसे मिलने आये.

भारत भ्रमण पर निकले शंकर ने सम्राट सुधन्वा के साथ मिलकर कापालिकों की समस्या का समाधान किया और अपने सभी शिष्यों को श्रृंगेरी भेजते हुए कहा कि मैं कालड़ी जा रहा हूँ, मेरी माता ने मुझे याद किया है. मैंने उन्हें वचन दिया था कि अन्तिम समय में उनके साथ रहूँगा. जब वे घर पहुँचे तो माता आर्याम्बा मृत्युशैय्या पर थीं. शंकर ने उन्हें आत्म तत्व का उपदेश दिया और ठीक दोपहर के समय उन्होंने शरीर त्याग दिया.


शंकर ने उनकी प्रदक्षिणा की और शव के मुख में अक्षत  डालते हुए उनके सब्र का बाँध टूट गया.. उनके रूँधे कंठ से फूट पड़ा - 


मुक्तामणि त्वं नयनं ममेति 

राजेति जीवेति चिर सुत त्वम्।

इत्युक्तवत्यास्तव वाचि मातः 

ददाम्यहं तण्डुलमेव शुष्कम् ॥


अर्थात् हे माँ! जिस मुख से तुम मुझे अपनी आँखों का तारा कहा करती थीं.. मेरे राजदुलारे सदा जीते रहो, कहते हुए तुम कभी न अघाती थीं, मेरा दुर्भाग्य है कि उस मुख में मैं शुष्क तंडुल डालने के सिवा कुछ और न कर सका…


सोच रहा हूँ वो क्या है जो कूपर को उसकी बेटी मर्फ़ तक खींच लाया ? वो क्या है जो शंकर को उनकी माता तक खींच लाया ?? ये वही शक्ति है जो ग्रेविटी से ज़्यादा ताकतवर है… तारों से ज़्यादा चमकीली और डार्क मैटर से ज़्यादा सघन है… ये नदी से ज़्यादा चंचल है और ब्लैकहोल से ज़्यादा ख़तरनाक. ये इस कॉस्मोस से ज़्यादा विशाल है और परमाणु से ज़्यादा सूक्ष्म… ये प्रेम है ❤️


✍️एमजे