17 सितम्बर 2017
मध्यप्रदेश
के एक शहर “सागर” से दूसरे शहर “गुना” के सफ़र पर हूँ गाडी श्याम नाम का ड्राईवर चला रहा है.... श्याम एक उत्कृष्ट
ड्राईवर है (नाम में ही अच्छा सारथी होने का गुण है)... तेज़ बारिश होने लगी है... जीरो विसिबिलिटी होने के बावजूद मैं
निश्चिन्त हूँ, क्यूंकि ड्राइविंग सीट पर श्याम बैठा हुआ है... लगभग 5 से 6 घंटों की यात्रा है यह. सोचता हूँ इससे बढ़िया क्या समय होगा राग
मल्हार सुनने के लिए....
वस्तुतः मल्हार के प्रकारों में मियाँ की मल्हार और मेघ मल्हार ही
प्रचलित हैं लेकिन मैं अपने आप को बहुत ही खुश किस्मत मानता हूँ क्यूंकि मुझे
मल्हार के विभिन्न प्रकारों को लाइव सुनने और समझने का मौका इस जीवन में मिला
है.... कभी-कभी सोचता हूँ इस छोटे से जीवन में क्या क्या तो कर लिया है मैंने
.......
कक्षा 8 में रहा होऊंगा तब पिताजी की एक रामायण मंडली हुआ करती थी
जिसकी एक शाश्वत समस्या थी ढोलक वाले का बिना बताये गायब हो जाना. किसी ने उन्हें
सलाह दी की “मनमोहन” को ढोलक सिखाओ... फिर तलाश हुई योग्य गुरु की और योग्य गुरु
के रूप में नाम सामने आया श्री रामदास वैष्णव सर का और शुरू हुआ तबला सीखना लगभग 08 वर्षों
तक मैंने उनसे विधिवत शिक्षा ग्रहण की....
कई मंचों पर प्रस्तुतियां दी. दूरदर्शन और आकाशवाणी तक में सराहा
गया. कई अवार्ड भी जीते और फिर एक रोज़ दूरदर्शन के ही एक कार्यक्रम के सिलसिले में
मिलना हुआ पंडित छोटे लाल व्यास जी से. लगभग 80 वर्ष के रहे होंगे तब पंडित जी, शास्त्रीय संगीत का अथाह ज्ञान धारण
किये हुए. लेकिन पंडित जी न तो किसी को सिखाते थे और न ही मंचों पर प्रस्तुति देते
थे. मुझे उनके साथ लम्बा समय बिताने का अवसर प्राप्त हुआ जो अपने आप में कम ही मालूम
पड़ता हैं......
पंडित जी से ही रागों और तालों की बारीकियां जानने और समझने को
मिली... वो जो मैंने आठ वर्षों में नहीं समझा था कुछ ही महीनों में उनसे समझने को
मिला..... पंडित जी से ही पता चला की मल्हार के कई प्रकार होते हैं मेघ मल्हार,
मियाँ की मल्हार , मीरा की मल्हार , रामदासी मल्हार, सूरदासी मल्हार , गौड़ मल्हार आदि.
पंडित जी बड़ी ही सहजता से सभी रागों को एक के बाद एक गा कर समझाते थे. वो चले गए
और उनके साथ चली गई उनकी ये विरासत भी... उनकी बंदिशों के सामने किशोरी अमोनकर
का गाया “मीरा की मल्हार”, उस्ताद राशिद
खान का गाया “मियाँ की मल्हार”, पंडित
भीमसेन जोशी जी का “रामदासी मल्हार” , और पंडित जसराज का “मेघ मल्हार” फीके ही लगते हैं.
लगातार कई घंटों तक रागों के महासागर में डूबकी लगाता रहा .....
सोचता हूँ की यह यात्रा कभी ख़त्म न हो और ना ही ख़त्म हों ये राग और रागिनियाँ........
2 टिप्पणियां:
Nice sir
Thanx Baljeet...
एक टिप्पणी भेजें