Diary Ke Panne

मंगलवार, 5 जून 2018

ओत्मा खुखुर...


                                                            





          होटल के रूम में फ़ोन की घंटी की आवाज़ से जागता हूँ. आज 26 मई है सुबह के 7:30 हो रहे हैं. फ़ोन पर डोल्मा है .. कह रही है ब्रेक फ़ास्ट का टाइम हो गया है नीचे आ जाइए . फिर याद दिलाती है की आज आपको नुब्रा वैली जाना है, समय पर निकलना ठीक होगा.

          नुब्रा घाटी एक तीन भुजाओं वाली घाटी है जो लद्दाख  के उत्तर-पूर्व में स्थित है, यह श्योक और नुब्रा नदियों के संगम से बनती है.  श्योक नदी उत्तर पश्चिम की ओर बहती है और नुब्रा नदी एक न्यूनकोण बनाते हुए इसमें उत्तर-उत्तर पश्चिम से आ कर मिलती है. श्योक नदी आगे जाकर सिन्धु नदी में मिलती है. इस घाटी की ऊँचाई लगभग 10,000 फीट है. यहाँ के स्थानीय लोगों के अनुसार इसका प्राचीन नाम डुमरा (फूलों की घाटी) था. जो कालांतर में नुब्रा नदी के नाम पर नुब्रा ही पड़ गया.  यहाँ पहुँचने के लिये लेह के खर्दुन्गला दर्रे से होकर जाया जाता है.

                    सुबह के 8:30 बज रहे हैं. हम नाश्ता करके तैयार हैं, आज की रोमांचक यात्रा के लिए. आज हमारे साथ गाइड के रूप में गेल्सन हैं जो लेह के ही रहने वाले हैं. दो बोट्टल्स पानी और कुछ सुखा नाश्ता साथ में लेकर हम चल देते हैं नुब्रा की ओर. हम सूमूर नामक एक गाँव में पहुँच कर कैंप में ठहरते हैं. दुसरे दिन सुबह उठ कर हम चल पड़ते हैं नुब्रा घाटी घुमने.

                 लेह से नुब्रा तक की यात्रा बहुत आकर्षक है. सबसे पहला आकर्षण खारदुंग ला दर्रा है. यह हिमालय स्थित एक दर्रा है जो समुद्र तल से लगभग 18,380 फीट की ऊँचाई पर स्थित है. यह परिवहन योग्य, विश्व का सबसे ऊँचा दर्रा है, परन्तु इसकी ऊँचाई विवादित है. लद्दाख क्षेत्र में लेह के पास स्थित यह दर्रा “श्योक” और “नुब्रा” घाटियों को जोड़ता है. यहाँ पर साल भर कई मोटर साइकिल रैलीयाँ होती रहती हैं.

                   खारदुंग ला में दुनिया का सबसे ऊंचा कैफ़े भी स्थित है.... जैसे ही हम  खारदुंग ला  पहुँचते हैं. ठण्ड के मारे हालत खराब होने लगती है. हम कैफ़े में  नूडल्स और गरमागरम चाय लेकर थोड़ी राहत महसूस करते हैं. फिर दौर शुरू होता है फोटोग्राफी का... चारों ओर बर्फ से ढंके हुए पहाड़ और खूबसूरत वादी के बीच हम अतिशय ठण्ड का आनंद लेने लगते हैं. बदन को काटने वाली तेज़ ठंडी हवाएं हमें गुदगुदा रही हैं. हम फोटोग्राफी के बाद चल देते हैं अपने अगले पड़ाव की ओर .   
 

               इस यात्रा में हमारा अगला पड़ाव है, दिस्कित मोनेस्ट्री . इस मोनेस्ट्री की स्थापना चोंगज़ेम सिरेब झांगपो ने 14 वीं शताब्दी में की थी. यह मठ लेह में स्थित है.”तिब्बत समर्थन समूह” के सहयोग से यह मठ तिब्बती बच्चों के लिए एक स्कूल भी चलाता है. दलाई लामा अपने कुछ दिन की यात्रा पर जब भारत आये थे, तब उन्होंने यहाँ स्थित 120  फुट की ऊंची “मैत्रेय” की प्रतिमा का उद्घाटन किया था, जो इस मठ के आकर्षण का केंद्र है. इस मूर्ति का निर्माण बौद्ध संघ और लद्दाख के पर्यटन कार्यालय द्वारा मिलकर करवाया गया है.

              बौद्ध मान्यताओं के अनुसार मैत्रेय भविष्य के बुद्ध हैं. कुछ बौद्ध ग्रन्थों, जैसे अमिताभ सूत्र और सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र में इनका एक नाम “अजीत” भी मिलता है. "मैत्रेय" शब्द संस्कृत के "मित्र" अथवा "मित्रता" से निकला है. पालि भाषा में यह "मेत्तेय" है. पालि शाखा के दीघ निकाय और बुद्धवंश नामक ग्रन्थ में इनका उल्लेख मिलता है. बौद्ध परम्पराओं के अनुसार, मैत्रेय एक बोधिसत्व हैं जो पृथ्वी पर भविष्य में अवतरित होंगे और बुद्धत्व प्राप्त करेंगे तथा विशुद्ध धर्म की शिक्षा देंगे.

              मोनेस्टरी घूमते हुए हमारी मुलाक़ात एक लामा से होती है जो बताते हैं कि आमतौर पर मैत्रेय बुद्ध को बैठी हुई अवस्था में निरूपित किया जाता है. उन्हें सिंहासन पर, या तो दोनों पाँव धरती पर रखे हुए अथवा एक पाँव घुटने से मुड़ा हुआ दूसरे पाँव पर रखे हुए, अपने समय की प्रतीक्षा में बैठा हुआ निरूपित किया जाता है. यहाँ जो मूर्ति स्थापित है उसमें इन्हें सर पर स्तूपाकार मुकुट धारण किये हुए दिखाया गया है. यह स्तूप गौतम बुद्ध के अवशेषों का निरूपण करता है, जिनके द्वारा मैत्रेय अपने उत्तराधिकारी होने की पहचान साबित करेंगे और श्वेत कमल पर रखे धर्मचक्र को पुनः प्राप्त करेंगे.

                     मैत्रेय की खूबसूरत विशालकाय प्रतिमा और दिस्कित मोनेस्टरी के साथ बहुत सारी फोटो खिंचवाने के बाद हम अगले पड़ाव की ओर बढ़ते हैं.

                      गेल्सन हमें बताता है कि अगले पड़ाव में हम ATB राइड्स के लिए जा रहे हैं. ATB एक किस्म की चार पहिया बाइक होती है जो रेत, बर्फ, कीचड़ और पथरीली ज़मीन पर भी आसानी से चल सकती है. मैं और श्रीमती जी दोनों ही ATB चलाने का आनंद लेते हैं. ATB की रोमांचक राइड के बाद हम चल पड़ते हैं अगले आकर्षण की ओर दो कूबड़ वाले ऊंटों की सवारी के लिए.

                     दो कूबड़ वाले ऊंट को जीव विज्ञान में camelus bactrianus कहते हैं. आम भाषा में इन्हें बैक्ट्रियन ऊंट कहा जाता है. यह लगभग 40 - 50 साल तक जीता है. वयस्क ऊंट के कूबड़ तक की ऊंचाई दो मीटर से ऊपर भी जा सकती है. सिर्फ कूबड़ ही 30 इंच तक का हो जाता है. इसका वजन सात सौ से लेकर एक हजार किलो तक हो सकता है. रेगिस्तान का ये जहाज 60 - 65 किमी प्रति घंटे की दौड़ भी लगा लेता है. घाटी में नदी के किनारों पर हरियाली है जहां ये दो कूबड़ वाले ऊंट चरते हुए देखे जा सकते हैं.
      
                      ऊँट कैमुलस जीनस के अंतर्गत आने वाला एक खुरधारी जीव है. अरबी ऊँट के एक कूबड़ जबकि बैकट्रियन ऊँट के दो कूबड़ होते हैं. अरबी ऊँट पश्चिमी एशिया के सूखे रेगिस्तान क्षेत्रों के जबकि बैकट्रियन ऊँट मध्य और पूर्व एशिया में पाए जाते हैं. ऊँट शब्द का प्रयोग मोटे तौर पर ऊँट परिवार के छह ऊँट जैसे प्राणियों के लिए किया जाता है, इनमें से  दो वास्तविक ऊँट और चार दक्षिण अमेरिकी ऊँट जैसे जीव है जो हैं लामा, अलपाका, गुआनाको और विकुना कहलाते हैं.

                  भारत में ये दो कूबड़ वाले ऊँट  केवल लद्दाख की नुब्रा घाटी में ही पाए जाते हैं. वैसे भी दुनिया में दो कूबड़ वाले ऊंट कम ही स्थानों पर पाए जाते हैं और ये सभी स्थान ठन्डे रेगिस्तान हैं. वे स्थान जहां दो कूबड़ वाले ऊँट पाए जाते हैं,  गोबी मरुस्थल मंगोलिया, अल्ताई पहाड़ियां रूस और तक्लामाकन मरुस्थल चीन, हैं.

                  इन ऊंटों को देखना और इनकी सवारी करने का रोमांच मुझसे नहीं संवर रहा था. हम गाड़ी से उतर कर सीधे ऊंटों के मालिक के पास पहुँचते हैं. कई ऊंटों के समूह यहाँ हैं जिनके अलग –अलग मालिक हैं . हम जिससे मिल रहे हैं उसका नाम अब्दुल है. वो हमें ऊंटों के एक समूह के पास ले जाता है. इसमें से एक ऊँट की और मैं बढ़ता हूँ और उसकी लगाम पकड़ कर बैठ जाता हूँ. सभी मित्र अलग – अलग ऊंटों पर सवार हो जाते हैं. मैं अब्दुल से पूछता हूँ जिस ऊँट पर मैं बैठा हूँ उसका नाम क्या है?? अब्दुल बताता है साहब इसका नाम है “ओत्मा खुखुर”.   
                             -------------क्रमश:

-मनमोहन जोशी


P.S.
नुब्रा घाटी का मनोहारी दृश्य 

राहुल मैं और डोल्मा 

मित्रों के साथ 

मैत्रेय बुद्धा की 120 फीट ऊंची मूर्ती 

शुक्रवार, 1 जून 2018

सफ़र की बात....... 24-May-2018



जीवनम विला  की बालकनी के बाहर चाय पीते हुए 

श्रीमती जी के साथ सेल्फी 


24 may 2018

              सुबह के 5:30 बज रहे हैं. रात भर से मैं और श्रीमती जी इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एअरपोर्ट के टर्मिनल-1 में सुबह होने का इंतज़ार कर रहे हैं. इतनी ज्यादा कूलिंग कर रखी है कि शरीर ठण्ड से कांपने लगा है. आँख खोल कर पहले मोबाइल में टाइम देखता हूँ और फिर पाता हूँ की मेरे उपर शाल पड़ी हुई है. रात में ठण्ड देख कर श्रीमती जी ने मुझे शाल से ढँक दिया होगा.खैर हम एअरपोर्ट के लाउन्ज में ही फ्रेश हो कर निकल जाते हैं टर्मिनल-2 के लिए जहां से हमें लेह के लिए फ्लाइट पकड़नी है. 

              दिल्ली का यह एअरपोर्ट अपनी सुविधाओं के लिए विश्व के बेहतरीन एयरपोर्ट्स में गिना जाता है. वर्ष 2014 में इस एअरपोर्ट को  विश्व के सबसे बेहतरीन एअरपोर्ट का अवार्ड मिल चुका है.  हर वर्ष लगभग चार करोड़ यात्रियों को यात्रा सुविधा मुहैया करवाने के लिए इस एअरपोर्ट को नंबर वन एअरपोर्ट का अवार्ड दिया गया था.

                1930 में दिल्ली का पहला  एअरपोर्ट सफ़दरजंग विमान क्षेत्र बना था और यही 1962 तक दिल्ली का प्रमुख एअरपोर्ट बना रहा. बढ़ते यातायात के कारण व छोटे रनवे में  बड़े जेट विमानों को उतार पाने में अक्षम होने के कारण 1962 में लगभग सभी नागरिक उड़ान पालम विमान क्षेत्र भेज दी गईं.  पालम विमानक्षेत्र का निर्माण द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान स्टेशन पालम के रूप में किया गया था. 

              अंग्रेज़ों के जाने के बाद यह 1962 तक वाय़ु सेना स्टेशन के रूप में ही कार्य करता रहा. 1962  में इसका नाम बदल कर इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एअरपोर्ट कर दिया गया. वर्तमान में इसके टर्मिनल- 1,2 और 3 से रेगुलर फ्लाइट्स जाती हैं.

             बहरहाल हम टर्मिनल-1 से बाहर निकलते हैं. सामने ही चाय की एक शॉप है जहां कुल्हड़ में चाय मिल रही है. अगर एअरपोर्ट में आपको ऐसा कोई देशी जुगाड़ दिख जाए तो समझो इसकी कीमत अनाप - सनाप होगी. एक चाय लेकर हम आगे बढ़ जाते हैं शटल की ओर (दिल्ली एअरपोर्ट पर एक टर्मिनल से दुसरे टर्मिनल तक जाने के लिए बस की सुविधा है, जिसे शटल कहा जाता है).
    
             टर्मिनल-2 पर पहुँच कर मित्र को फ़ोन लगाता हूँ. पता चला, जिस मित्र ने जाने की पहल की थी किसी निजी कारण से उनका परिवार नहीं आ रहा है. पहले हमारे ग्रुप में कुल 12 लोग थे लेकिन अब हम 7 ही लोग सफ़र करेंगे. निर्धारित समय पर चेक इन के बाद हम फ्लाइट में बैठ जाते हैं. कुल डेढ़ घंटे की फ्लाइट है.

               आँखें बंद कर बैठता हूँ और खो जाता हूँ लद्दाख के जादुई इतिहास में. लद्दाख में मिले शिलालेखों से पता चलता है कि यह स्थान नव-पाषाणकाल से स्थापित है. यहाँ  के प्राचीन निवासी मोन और दार्द लोगों का वर्णन हेरोडोट्समेगस्थनीजप्लीनीटॉलमी के रचनाओं में और नेपाली पुराणों में भी मिलता है.

             बौद्ध यात्री ह्वेनसांग के लेखों में इस क्षेत्र का वर्णन मिलता है जिसके अनुसार पहली शताब्दी के आसपास लद्दाख कुषाण राज्य का हिस्सा था. बौद्ध धर्म दूसरी शताब्दी में कश्मीर से लद्दाख में फैला.

              आठवीं शताब्दी में लद्दाख पूर्व से तिब्बती प्रभाव और मध्य एशिया से चीनी प्रभाव के टकराव का केन्द्र बन गया था. इस प्रकार इसका आधिपत्य बारी-बारी से चीन और तिब्बत के हाथों में आता रहा. सन 842 में एक तिब्बती शाही प्रतिनिधि न्यिमागोन ने तिब्बती साम्राज्य के विघटन के बाद लद्दाख को कब्जे में कर लिया और पृथक लद्दाखी राजवंश की स्थापना की. राजवंश ने उत्तर-पश्चिम भारत, खासकर कश्मीर से धार्मिक विचारों और बौद्ध धर्म का खूब प्रचार किया. इसके अलावा तिब्बत से आये लोगों ने भी बौद्ध धर्म को फैलाया.

              17वीं शताब्दी में लद्दाख का एक कालक्रम तैयार किया गयाजिसका नाम “ला ड्वाग्स रग्याल राब्स” है. जिसका अर्थ है लद्दाखी राजाओं का शाही कालक्रम. कालक्रम का प्रथम भाग 1610 से 1640 के मध्य लिखा गया और दूसरा भाग 17वीं शताब्दी के अन्त में. इसे ए. एच. फ्रैंक ने अंग्रेजी में अनुवादित किया जिसका प्रकाशन वर्ष 1926 हुआ.

                उपलब्ध साहित्य से पता चलता है कि 13वीं शताब्दी में जब दक्षिण एशिया में इस्लामी प्रभाव बढ रहा थातो लद्दाख ने धार्मिक मामलों में तिब्बत से मार्गदर्शन लिया. लगभग दो शताब्दियों बाद सन 1600 तक ऐसा ही रहा. उसके बाद पड़ोसी मुस्लिम राज्यों के हमलों से यहां आंशिक धर्मान्तरण हुआ.

              अचानक श्रीमती जी की आवाज़ से जागता हूँ. आँखें खोलता हूँ तो खिड़की के बाहर का अद्भुत नज़ारा मन को प्रफुल्लित कर देता है. आंखों पर यकीन नहीं हो रहा है कि इतनी खूबसूरती इसी धरती पर है. ये कौन चित्रकार है ये कौन चित्र कार है?? सहसा भरत व्यास जी की लिखी पंक्तियाँ याद आती हैं :

“ये कौन चित्रकार है, ये कौन चित्रकार है
हरी भरी वसुंधरा पर नीला नीला ये गगन
के जिसपे बादलों की पालकी उड़ा रहा पवन
दिशाएं देखो रंग भरी चमक रहीं उमंग भरी
ये किसने फूल फूल से किया श्रृंगार है
ये कौन चित्रकार है ,ये कौन चित्रकार 
है

कुदरत की इस पवित्रता को तुम निहार लो
इनके गुणों को अपने मन में तुम उतार लो
चमका दो आज लालिमा अपने ललाट की
कण कण से झनकती तुम्हीं छबी विराट की
अपनी तो आँख एक है
,  इसकी हज़ार है
ये कौन चित्रकार है ,ये कौन चित्रकार 
है

तपस्वियों सी हैं अटल ये पवर्तों कि चोटियाँ
ये बर्फ़ कि घुमावदार घेरदार घाटियाँ
ध्वजा से ये खड़े हुए हैं वृक्ष देवदार के
गलीचे ये गुलाब के बगीचे ये बहार के
ये किस कवि की कल्पना का चमत्कार है
ये कौन चित्रकार है, ये कौन चित्रकार है "

               बर्फ से ढंके हुए पहाड़ बहुत ही खूबसूरत दिखाई पड़ रहे हैं. हम पिक्चर्स क्लिक करने लगते हैं. अब हमारे सामने बिना बर्फ के रंग बिरंगे पहाड़ आ गए हैं. फ्लाइट हिचकोले खा रही है. हम लैंडिंग के लिए तैयार हैं.  
फ्लाइट लैंड कर चुकी है. 

              हम फ्लाइट से बाहर आकर देखते हैं कि चारों ओर रेतीले भूरे पठार व वैसे ही भूरे पहाड़ से एअरपोर्ट घिरा हुआ है. हवा में अच्छी-खासी ठंडक घुली हुई है. इस ठण्ड के साथ ही हमें यकीं हो गया है कि हमारे लाये हुए गर्म कपडे यहाँ काम में नहीं आने वाले.

               हम बैगेज काउंटर पर पहुँचते हैं. अभी बैग नहीं आये हैं. हम बेल्ट के पास इंतज़ार कर रहे हैं . अनाउंसमेंट सुनाई पड़ती है, “ जुले! लेह में आपका स्वागत है. अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण आपको सांस लेने में तकलीफ हो सकती है. पहला दिन आराम करें! लगातार पानी पीते रहें. अधिक समस्या होने पर डॉक्टर से संपर्क करें. जुले!!

             हम बैग लेकर एअरपोर्ट से बहार आते हैं. बाहर कई लोग हाथों में तख्ती लिए यात्रियों का इंतेज़ार कर रहे हैं . मैं उस आदमी को खोज रहा हूँ जिसके पास मेरे नाम की तख्ती है. मैं उस आदमी के सामने हूँ. उसे कहता हूँ जुले! तुम हमारे ग्रुप का इंतज़ार कर रहे हो. ड्राईवर का नाम थिम्पे है, वह  हमारा सामान एक ट्रैवलर में रख देता है.

             दोपहर के बारह बज रहे हैं. हम एअरपोर्ट के पास ही एक खूबसरत विला में पहुँचते हैं. इस जगह का नाम जीवनम विला है. हमारे रूकने और खाने का इंतज़ाम यहीं है. जिस कमरे में हम ठहरे हैं यहाँ से बाहर का नज़ारा बेहद ही ख़ास है. एक ओर  ITBP का कैंप दिख रहा है और दूसरी और बर्फ से ढंकी हुई खूबूसरत काराकोरम पहाड़ी श्रृंखला.

              ऑक्सीजन लेवल काफी कम है और हम ये स्पष्ट महसूस कर पा रहे हैं. शरीर को वहां के वातावरण में एड्जस्ट करने हेतु 24 घंटे आराम  करने की सलाह दी गई है. यदि शरीर ने यहाँ के वातावरण को एक्सेप्ट नहीं किया तो सिरदर्दचक्करउल्टी व सांस की तकलीफ से पूरा टूर चौपट हो सकता है. भोजन करने के बाद हम आज का दिन आराम करते हुए ही बिताना चाहते हैं. 
बहरहाल मैं तो चला सोने...... जुले !!!
 ----- क्रमशः

-       - मन मोहन जोशी   



प्लेन की खिड़की से एअरपोर्ट का दृश्य
प्लेन की खिड़की से लिया गया विहंगम दृश्य 

लेह एअरपोर्ट

जीवनम  विला की बालकनी से लिया गया शाम का दृश्य 

जीवनम विला 





जीवनम विला में हमारी हर छोटी बड़ी ज़रूरत का ख्याल रखने वाला - राहुल  






गुरुवार, 31 मई 2018

सफ़र की शुरूआत




23 मई 2018  


                    वर्ष 2007 में जब मैं जोधपुर में था तब मन में पहली बार लद्दाख यात्रा का ख़याल आया. तमन्ना थी की लद्दाख को नजदीक से देखूं, चप्पा- चप्पा, जैसे राजस्थान देखा है. वैसे जीवन में तमन्नाएं मैंने कम ही पाली हैं लेकिन जो भी कुछ शिद्दत से चाहा है वह पाया है.
        
                   अभी नए ज़माने के एक बाबा जो आज- कल  बहुत सुने जा रहे हैं, नाम है जग्गी वासुदेव, बुद्धिमान आदमी जाने जाते हैं, उनका एक इंटरव्यू कुछ दिनों पहले मैं देख रहा था. किसी जिज्ञासु ने पूछा कि क्या लॉ ऑफ़ अट्रैक्शनकाम करता है??  उन्होंने व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ कहा "so u read foreign writers a lot, hmm". सब हंस पड़ते हैं और वो स्पष्ट कहते हैं "No it won't work." शायद उन्हें कहना चाहिए था "I don't know"  या  " आई डोंट हैव एनी एक्सपीरियंस ऑफ दिस." क्योंकि ये विदेशी अवधारणा नहीं है. यही तो धम्मपद का सार है. यही तो बुद्ध की देशना है. यही तो उपनिषदों में है. ये तो मेरा अनुभव है. कभी इस पर विस्तार से लिखूंगा. मुझसे पूछो की लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन काम करता है क्या ?? तो कहूंगा हाँकाम करता है. और ये भी बता सकूंगा कैसे???

                     बहरहाल मैं बात कर रहा था मेरी लद्दाख यात्रा के बारे में. तो मेरा विवाह भी एक घुमक्कड़ी से हुआ है. और विवाह के वर्ष से ही हम लेह जाने की प्लानिंग में हैं. सबसे पहले तो हम बाइक से जाने कि प्लानिंग में थे. 2007 में जब मैंने सबसे पहले लद्दाख जाने के बारे में सोचा तो हमारी प्लानिंग थी कि हम जयपुर से दिल्ली होते हुए लद्दाख पहुंचेंगे. कुछ ऐसा रूट था जयपुर- दिल्ली-मनाली - रोहतांग- कोकसर- टाण्डी - केलांग-  जिस्पा - दारचा - जिंगजिंगबार-  बारालाचा ला - सरचू -  गाटा लूप-  नकीला - लाचुलुंग ला-  पांग - मोरे मैदान- तंगलंग ला - उप्शी-  कारु और कारू से लेह. लेकिन टीम कभी एक साथ तैयार नहीं हो पाई.एक बार तो हमने टीम बना कर सारी तैयारियां कर ली लेकिन फिर किसी कारण से यात्रा टल गई.

                    कुछ वर्ष पहले हम मनाली गए थे. प्लानिंग ये थी कि मनाली से बाइक रेंट पर लेकर लद्दाख निकल जाएंगे लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाए.  पिछले वर्ष सोचा कि अब फ्लाइट से चलेंगे और वहीँ बाइक रेंट पर ले कर विश्व के सबसे ऊंचे रास्तों को नापेंगे. तो सोच तो हर वर्ष रहा हूँ बस प्लान एक्सीक्यूट नहीं हो पा रहा है. लेकिन कुछ सप्ताह पहले मई के शुरूआती दिनों में जयपुर से एक पुराने मित्र का कॉल आया कि हम एक ग्रुप में लद्दाख जा रहे हैं, चलो. 24 मई की सुबह दिल्ली एयरपोर्ट पर मिलेंगे.

                   लद्दाख शब्द का अर्थ है ऊंचे दर्रों वाली भूमि. लद्दाख, उत्तरी जम्मू और कश्मीर में, काराकोरम और हिमालय पर्वत श्रेणी के बीच स्थित है. यह भारत के सबसे विरल जनसंख्या वाले भागों में से एक है. लद्दाख जिले का क्षेत्रफल 97,776 वर्ग किलोमीटर है. इसके उत्तर में चीन तथा पूर्व में तिब्बत की सीमाएँ हैं. बॉर्डर एरिया होने के कारण सामरिक दृष्टि से इसका बड़ा महत्व है. यह  उत्तर-पश्चिमी हिमालय के पर्वतीय क्रम में आता है, जहाँ का अधिकांश धरातल कृषि योग्य नहीं है. यहाँ की जलवायु अत्यंत शुष्क एवं कठोर है. नदियाँ वर्ष में कुछ ही समय प्रवाहित हो पाती हैं, शेष समय में बर्फ जमी रहती है. सिंधु मुख्य नदी है. जिले की राजधानी एवं प्रमुख नगर लेह है, जिसके उत्तर में कराकोरम पर्वत तथा दर्रा है. अधिकांश जनसंख्या घुमक्कड़ है, जिनकी प्रकृति, संस्कार एवं रहन-सहन तिब्बत एवं नेपाल से प्रभावित है. पूर्वी भाग में अधिकांश लोग बौद्ध हैं और हेमिस गोंपा बौंद्धों का सबसे बड़ा धार्मिक संस्थान है.

                    बहरहाल मन में एक प्रश्न उठा कि क्या लद्दाख जाने के लिए ये ठीक समय है??  कई लोग लोग अक्सर पूछते रहते हैंकि फलां जगह जाने के लिए कौन सा महीना अच्छा है? और फिर ज्ञानी जन ज्ञान बांटते हुए फलां मौसम या महीने का नाम बताते हैं. मेरे देखे ये प्रश्न गलत ही गलत हैपूछना तो ये चाहिए कि ठंड, बारिश या गर्मी में से जो भी मौसम आपको पसंद है, वो मौसम फलां जगह पर कौन से महीनों में मिलेगा और गूगल इस बारे में लगभग सटीक जानकारी उपलब्ध करवा देगा.

                     मेरे देखे कहीं भी घुमने के लिए समय वो बढ़िया है जब आपके पास पैसा, मन और छुट्टियां तीनों एक साथ हों. लेकिन अंग्रेजी में एक कहावत है जो बिल्कुल सटीक है "you cannt find time and money for anything. If you want you must make it". अतः मन का होना सबसे महत्वपूर्ण है. मौसम तो सारे ही अच्छे होते हैं. वैसे लद्दाख के बारे में यह नहीं कहा जा सकता क्यूंकि आपको ये भी देखना होता है कि साल के कौन से महीनों में बर्फ बारी के कारण रस्ते बंद होते हैं. तो लद्दाख जाने के लिए मार्च से लेकर मई तक के महीने सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं. क्यूंकि इस समय वहाँ का मौसम सबसे खुशनुमा होता है. लेकिन पीक सीजन होने के कारण सभी चीज़ों के दाम बढे हुए होते हैं.

                     जैसे ही श्रीमती जी को पता चला हम लेह जाने वाले हैं वो तैयारियों में जुट गई. गर्म कपड़े, जीन्स, टी शर्ट, दवाइयों आदि की सूची बना ली गई. जो चीजें घर में नही थी उनकी शॉपिंग शुरू हो गई. 

                    क्यूंकि दिल्ली से हमारी फ्लाइट कल यानी 24 मई की सुबह 8:40 की है, हमें एक दिन पहले दिल्ली पहुंचना पड़ा. और आज 23 मई की रात 12:00 बजे हम दिल्ली एअरपोर्ट के टर्मिनल 1 पर बैठे इंतज़ार कर रहे हैं कि कब सुबह हो और लेह के लिए फ्लाइट पकड़ी जाए.

                                                               ---------------- क्रमशः

-मन मोहन जोशी

      

शनिवार, 12 मई 2018

अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा !!!


PC: Random click by Bade Bhaiya S. Joshi 


                               एक पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने जबलपुर आया हुआ हूँ. यात्रा करते हुए मुझे मौन रहना ही अच्छा लगता है. सहयात्रियों से अनर्गल वार्तालाप करना या देश की राजनीति की दिशा और दशा तय करना मुझे बिलकुल भी नहीं भाता. ऐसा नहीं की अभी ऐसा हुआ है हमेशा से ही ऐसा है. कल ट्रेन में चढ़ते ही एक शख्स से मुलाकात हुई. चढ़ते ही उन्होंने इंटरव्यू लेना शुरू कर दिया. आपका सीट कौनसा है?? कहाँ जा रहे हो?? इंदौर में क्या करते हो?? जबलपुर किस सिलसिले में जा रहे हो वगैरह वगैरह?? लेकिन जैसे ही उन्होंने पूछा क्या लगता है 2019 के चुनावों के क्या परिणाम होंगे??? मैंने अपना हेड फ़ोन ऑन किया और हॉलीवुड मूवीज के अपने खजाने से निकाल ली एक खतरनाक मूवी, जो Robert A. Heinlein  की शोर्ट स्टोरी  All You Zombies” पर बनाई गई है. नहीं ये भूत वाली फिल्म नहीं है एक साइंस फिक्शन है.  

                              मैं पहले भी कई बार इस फिल्म को देखने की कोशिश कर चुका हूँ लेकिन हमेशा आधे में बंद कर देता हूँ. सोचा आज ख़त्म कर के सोता हूँ. इसकी कहानी को समझाना आसान नहीं है. खुद देखें और समझने की कोशिश करें. इतना बता सकता हूँ की यह टाइम ट्रेवल पर बेस्ड एक ऐसी फिल्म है जो आपका दिमाग घुमा देगी. फिल्म की शुरुआत में तीन लोग बैठ कर बात करते दिखाई देंगे. आगे आपको पता चलेगा की ये तीनों एक ही व्यक्ति है. भूत, भविष्य और वर्तमान जो टाइम ट्रेवल करते हुए समय के एक मोड़ पर आकर मिल गए हैं. खतरू कहानी है. दिमाग की चक्कर घिन्नी बन जाएगी.

                            लेकिन मेरे घुमक्कड़ मन में जो विचार आया वह यह है कि क्या समय की यात्रा संभव है ?? टाइम ट्रेवल पर बहुत सारी फ़िल्में बनी हैं लेकिन मेरी पसंदीदा है स्टीवन स्पीलबर्ग की “back to the future” ये फिल्म तीन पार्ट में बनी है. एक रोज़ मैंने और श्रीमती जी ने तीनों पार्ट एक के बाद एक देख डाली थी. कमाल की फिल्म और बेहतरीन स्टोरी.                 
टाइम ट्रेवल पर जो बेहतरीन साहित्य उपलब्ध है वो है एच जी वेल्स का उपन्यास द टाईम मशीन. यह टाइम ट्रेवल पर आधारित एक महान साहित्य माना जाता है.

                          वैज्ञानिक समय यात्रा को असंभव मानते रहे हैं. न्युटन ने समय को एक सीधी रेखा में चलने वाले बाण के जैसा माना है
, जिसे एक बार छोड़ दिया तब वह एक सीधी रेखा मे चलता जाता है. आइंसटाईन के अनुसार समय एक नदी के प्रवाह के जैसा है जो सितारों व आकाशगंगाओ के घुमावो से बहता है, इसकी गति इन पिंडो के पास से बहते हुये कम ज्यादा होती रहती है. ब्रह्मांड मे फैली हुयी घड़ियाँ अपनी अपनी गति से चलती रहती हैं. लेकिन आइंस्टाइन के मित्र कर्ट गोएडल ने आईन्स्टाईन के समीकरणों का एक ऐसा हल निकाला जो समय यात्रा को संभव बनाता है. गोयेडल का दिया गया सिद्धांत शानदार है.  यह एक ऐसे ब्रह्मांड की कल्पना करता है जो एक घूर्णन करते हुये द्रव से भरा है. कोई भी इस द्रव के घूर्णन की दिशा मे चलता जायेगा अपने आपको प्रारंभिक बिन्दू पर पायेगा, भूतकाल में.

                        लेकिन बिग-बैंग थ्योरी कहती है की ब्रह्माण्ड अपना विस्तार कर रहा है घूर्णन नहीं. अगर ब्रह्माण्ड घूर्णन कर रहा होता तो शायद समय यात्रा संभव हो सकती थी. स्टीफन हांकिन्ग ने भी शुरुआती दौर में समय यात्रा की अवधारणा का विरोध किया था. स्टीफन हाकिंग ने कहा था की यदि समय यात्रा संभव होती तो भविष्य के यात्री हमसे मिलते, वो कहाँ हैं ??? लेकिन बाद में उन्होंने अपना मत बदल दिया. उनके अनुसार समय यात्रा संभव है लेकिन प्रैक्टिकल नहीं है.

                       मेरे देखे समय यात्रा संभव है. लेकिन केवल भूतकाल की. भविष्य की नहीं. क्योंकि भविष्य का मतलब ही है, वह जो नहीं है.... और हम जब  भूतकाल की यात्रा करेंगे तो हम वहाँ कुछ भी बदलाव नहीं कर पायेंगे.  हम सब रोजाना यह यात्रा कर रहे हैं. उदाहरण के लिए जब आप अपनी शादी की विडियो रिकॉर्डिंग देख रहे होते हो तो शायद आप उस समय में पहुँच जाते हो यात्रा करते हुए. आप सारी चीज़ों को फिर से होते हुए देखते हो. स्वयं से दूर खड़े हो कर स्वयं को. लेकिन कुछ भी बदल नहीं सकते. मुझे लगता है शायद यही टाइम ट्रेवल है.  आप को क्या लगता है ?????

-       -मनमोहन जोशी “MJ”       

मंगलवार, 8 मई 2018

उफ़्फ़ ये खबरें......


                       
                                   

                 टीवी पर ख़बरें देखना छोड़ चुका हूँ या ये कहना ज्यादा ठीक होगा कि खबरें देखना छुट सा गया है. पहले रवीश की रिपोर्ट देख लिया करता था या फिर प्राइम टाइम की कोई बहस. लेकिन वहाँ भी केवल अनर्गल वार्तालाप ही हाथ लगे.  पिछले कुछ दिनों से अखबार भी नहीं पढ़ रहा था. ख़बरों के लिए इन्टरनेट के माध्यम का ही इन दिनों उपयोग करता रहा. 

                बहुत दिनों बाद आज का दैनिक भास्कर खोला तो फ्रंट पेज पर बलात्कार की खबर थी. सीधे आखरी पेज पर पहुंचा तो वहाँ भी बलात्कार की ही खबर. तो क्या इन दिनों भारत में केवल बलात्कार ही हो रहे हैं???? और अचानक से बच्चों से बलात्कार ही होने लगे हैं??? सोचा इन खबरों की पड़ताल अपने आलेख में करूँ....
                  
                   पिछले दिनों एक मित्र मिलने आये जो एक प्रख्यात सामाजिक संगठन के लिए काम करते हैं और मुझसे स्नेह भी रखते हैं.... उन्होंने बताया कि उनका संगठन बलात्कार के विरुद्ध एक जागरूकता रैली कर रहा है जिसमें मुझे वो मुख्य वक्ता के रूप में बुलाना चाहते हैं.

मैं: किसको जागरूक करना है??
मित्र : लड़कियों को.
मैं:
4 महीने की बच्ची को कैसे जागरूक करेंगे???
वो: नहीं, उनसे बड़े उम्र के लोगों को तो जागरूक कर सकते हैं.
मैं : चार- पांच साल की बच्चियों को क्या जागरूक करोगे?
??
                          
                      मुझे लगता है अगर किसी को जागरूक करने की आवश्यकता है तो वो है मीडिया के लोग और सोशल मीडिया के लड़ाके.... हाँ मैंने लड़ाके ही लिखा है मतलब fighters. खबर छपती है की फलां रिश्तेदार ने बच्ची का बलात्कार किया. अगर मीडिया ही ये तय कर रही है तो फिर पुलिस किस बात का इन्वेस्टीगेशन कर रही है और कोर्ट का क्या काम रह गया है????? नहीं, अपराधों का मीडिया में तय होना भयावह है. इस मीडिया ट्रायल को रोकना होगा. ऐसी ख़बरों को पढ़ कर कोई जागरूक नहीं हो रहा बल्कि मेरे देखे एक भय का माहौल चारों और व्याप्त हो गया है. लोग रिश्तों को ग़लत नज़रों से देखने लगे हैं और नई पीढ़ी हर किसी पर शक करने लगी है.

                       दूसरी और सोशल मीडिया के लड़ाके बलात्कार की खबरों को पीडिता की फोटो और नाम के साथ वायरल करने में लगे हैं. अरे मूढ़ मतों ये भी एक अपराध है. IPC की धारा 228 A बलात्कार पीडिता की पहचान जारी करने को दंडनीय अपराध बनाती है.
                           
                   एक आवश्यकता सरकार को भी जगाने की है क्यूंकि लगातार कानून में परिवर्तन कर जनता को मुर्ख बनाने से कोई बदलाव नहीं आयेगा. जैसा की अध्यादेश के माध्यम से सरकार ने 12 वर्ष से कम आयु की पीड़िताओं के साथ हुए अपराध के लिए मृत्युदंड का प्रावधान कर दिया है लेकिन यही सरकार बलात्कार मामले में अपराधियों को फांसी नहीं दे रही है... बलात्कार के मामलों में फांसी की कई दया याचिकाएं लंबित पड़ी हैं जिनको खारिज कर तत्काल अपराधियों को फांसी पर चढ़ाया जाना चाहिए.
                           
                    इन सब के परे एक बात स्पष्ट कर दूं कि देश का माहौल इतना ख़राब भी नहीं है, सारे पुरुष बलात्कारी या लम्पट नहीं हैं, रिश्तों में पवित्रता और शुद्धता बची हुई है, भूमिगत जल स्तर भले ही नीचे जा रहा है लेकिन आंखों का पानी अभी भी सूखा नहीं है. आवश्यकता है तो केवल इन्हें देखने की, महसूस करने की.

-मनमोहन जोशी “MJ”                     

सोमवार, 7 मई 2018

इन दिनों ......








आज बहुत दिनों बाद लौटा हूँ इस ब्लॉग पर..... ऐसा नहीं की लिखता नहीं रहा.... लेकिन इन दिनों, बहुत कुछ आक्रोश की बातें और बेहद निजी बातें लिखी हैं जो कभी उचित समय पर प्रकाशित की जायेंगी. न भी प्रकाशित हों तो किसी को क्या फर्क पड़ता है.  वैसे भी लगातार नहीं लिखा इन दिनों. जब कभी समय मिला तो you tube चैनल के लिए कुछ रिकॉर्ड कर लिया या फिर पढने बैठ गया. 

                पिछले कुछ दिनों में कुछ कमाल का साहित्य पढ़ गया हूँ. जॉन सी मैक्सवेल की “Winning Attitude”, मेल्कम ग्लेडवेल की “आउटलायर्स”, और ब्रायन ट्रेसी की “eat that frog” पढ़ी. साथ ही मेरे प्रिय लेखक रस्किन बांड की भी कुछ किताबें पढ़ गया. कुछ महीने पहले इंदौर में बुक फेयर लगा था जहां से कुछ किताबें खरीद लाया था. एक पुस्तक रस्किन ने भी स्वयं अपने ऑटोग्राफ के साथ मुझे भिजवाई थी. “रूम ओन द रूफ”, “नाईट एट देओली”, और “एडवेंचर्स ऑफ़ रस्टी”. जब इतना शानदार साहित्य पढने के लिए उपलब्ध हो तो क्या लिखा जाए और कौन तो लिखे.

               सही बताऊँ तो इन दिनों लिखने में आलस्य भी आने लगा है. और कुछ लोग इस लेखनी से नाराज़ भी हैं. जो नाराज़ हैं वो होते रहें. वैसे भी आप हर किसी को खुश नहीं कर सकते और मैं किसी को भी खुश करने के लिए भी नहीं लिखता.
        
              बहरहाल मैं बात कर रहा था लिखने पढने के बारे में. तो इन दिनों कमाल का खाजाना हाथ लगा है. राहुल सांकृत्यान का सम्पूर्ण वांग्मय “मेरी जीवन यात्रा” मंगवा ली गई है. अमेज़न से यह पार्सल मेरे पास पहुंचा और मैं इसे पढने में लग गया हूँ. राधा कृष्ण प्रकाशन की यह कृति कुल 11 खण्डों में विभाजित है. जिसको पढ़ते हुए मैं घुमक्कड़ी का विकट स्वाद ले पाऊंगा ऐसी उम्मीद है.

               मैं लम्बे समय से यात्रा वृत्तान्त पर कुछ अच्छा साहित्य पढना चाह रहा था और राहुल संकृत्यायन के साथ घुमक्कड़ी का मज़ा अब कई गुना होने वाला है. यायावरी मुझे हमेशा से पसंद रही है , स्वभाव से मैं घुमक्कड़ ही हूँ और घुमक्कड़ी के बारे में राहुल संकृत्यायन के विचार पढ़कर अपने घुमक्कड़ होने पर गर्व होने लगा है. और सोच रहा हूँ कि जीवन का अधिकतम समय घुमक्कड़ी में बिताऊं.

 राहुल जी के शब्दों में :

 
“दुनिया के अधिकांश मनीषी घुमक्कड़ रहे हैं ।  आचार-विचार
, बुद्धि और तर्क तथा सहृदयता में सर्वश्रेष्‍ठ महात्मा बुद्ध घुमक्कड़-राज थे। यद्यपि वह भारत से बाहर नहीं गये, लेकिन वर्षा के तीन मासों को छोड़कर एक जगह रहना वह पाप समझते थे। वह स्वयं ही घुमक्कड़ नहीं थे, बल्कि आरंभ ही में अपने शिष्‍यों को उन्‍होने कहा था - ''चरथ भिक्‍खवे!'' जिसका अर्थ है - भिक्षुओ! घुमक्कड़ी करो, चलते रहो । बुद्ध के भिक्षुओं ने अपने गुरु की शिक्षा को कितना माना, क्या इसे बताने की आवश्‍यकता है

क्या उन्‍होंने पश्चिम में मकदूनिया तथा मिश्र से पूरब में जापान त‍क, उत्तर में मंगोलिया से लेकर दक्षिण में बाली और बांका के द्वीपों तक को रौंदकर रख नहीं दिया? जिस बृहत्तर-भारत के लिए हरेक भारतीय को उचित अभिमान है, क्या उसका निर्माण इन्‍हीं घुमक्कड़ों की चरण-धूलि ने नहीं किया? केवल बुद्ध ने ही अपनी घुमक्कड़ी से प्रेरणा नहीं दी, बल्कि घुमक्कड़ों का इतना जोर बुद्ध से एक दो शताब्दियों पूर्व ही था, जिसके ही कारण बुद्ध जैसे घुमक्कड़-राज इस देश में पैदा हो सके। उस वक्त पुरुष ही नहीं, स्त्रियाँ तक जम्‍बू-वृत्त की शाखा ले अपनी प्रखर प्रतिभा का जौहर दिखातीं, बाद में कूपमंडूकों को पराजित करती सारे भारत में मुक्‍त होकर विचरा करतीं थीं ।“ उनके अनुसार : ‘‘समदर्शिता घुमक्कड़ का एकमात्र दृष्टिकोण है और आत्मीयता उसके हरेक बर्ताव का सार।’’                 

मैं तो चला राहुल संकृत्यायन के साथ समय और विश्व की यात्रा पर. 

बरबस ही ख्वाजा मीर याद आ रहे हैं :
“सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ”

-मन मोहन जोशी “MJ“