Diary Ke Panne

शुक्रवार, 3 जनवरी 2025

खैरूआ सरकार..


खैरूआ सरकार 🙏

पूर्वा फॉल 

प्रिय सत्यम एवं अन्य भक्तगणों के साथ ♥️

28 दिसंबर 2024

रात 2:30 बजे ही बनारस से रीवा वापस आये हैं, अंग्रेजों के अनुसार प्रातः काल में और सनातनियों के हिसाब से ब्रह्मा मुहूर्त में. 3:00 बजे सोया होऊंगा और लो सुबह छ: बजे ही नींद खुल गई. 


नीचे टहल आया और आते वक्त चाय भी भेजने को बोल आया हूँ. यूँ तो चाय पीना मेरी आदत में नहीं रहा लेकिन पिछले कई वर्षों से सुबह की चाय घर पर मैं ही बनाता हूँ.. 


चाय आ गई है और गर्म चाय के प्याले का आनंद लेते हुए मैं ये ब्लॉग लिख रहा हूँ… कल के थकान भरे दिन के बाद आज मैंने सोचा है किसी को भी नींद से नहीं जगाना है. 


सुबह के आठ बज रहे हैं मैं ब्रेकफास्ट कर आया हूँ. हम रीवा के लैंडमार्क प्लाजा नाम के आलीशान होटल में रुके हुए हैं. होटल बहुत ही बढ़िया है, यहाँ का खाना शानदार है और रेस्तरां की मैनेजर ऋतु एक बेहतरीन मैनेजर है. चाय तो वो मेरे मन का बना ही रही है खाना और नाश्ता भी शानदार है. शुरुआत में कुछ समस्याएं आईं थी लेकिन जीएम साहब की तत्परता और फ्रंट ऑफिस मैनेजर गौरव की विनम्रता से सब कुछ सही हो गया. 


अनमोल को फ़ोन लगा कर पूछता हूँ आज का क्या प्लान है?

 अनमोल - आज हमें खैरुआ सरकार के दर्शन को जाना है. रास्ते में पूर्वा फाल पड़ेगा वहाँ रुकते हुए जायेंगे. 

 मैं - ओके हम 1:00 बजे तक तैयार रहेंगे.


दोपहर के 1:00 बज रहे हैं.. अनमोल आ गया है, वो बताता है कि आज प्रियांशु को ऑफिस में कुछ काम है इसीलिए वो नहीं आ पाया.


हम तिवारी जी के यहाँ से समोसे का आनंद लेते हुए पहले पूर्वा फाल पहुंचते हैं.. ये एक अद्भुत प्राकृतिक स्थान है.. mesmerisingly beautiful… पूर्वा फाल इतनी खूबसूरत जगह है कि इसकी ख़ूबसूरती पर मैं अलग से एक ब्लॉग लिख सकता हूँ. बहरहाल धुँध के चलते हम इसका पूरा मज़ा नहीं ले सके.. फिर आयेंगे पूर्वा.


दोपहर के 2:00 बज रहे हैं और हम निकल गए हैं खैरूआ सरकार के दर्शन के लिए. यह सतना जिले के अंतर्गत नागौद से कुछेक किलोमीटर दूर प्रकृति की गोद में बसा स्वयंभू हनुमान जी का एक मंदिर है. तिवारी परिवार यहाँ पर लगभग तीन सौ वर्षों से सेवारत हैं… इस परिवार की वर्तमान पीढ़ी के महंत सत्यम तिवारी लॉ ग्रेजुएट हैं और मेरे प्रिय हैं.. सत्यम ने भव्य पूजन का आयोजन किया है. अद्भुत ऊर्जा का केंद्र यह क्षेत्र हनुमत साधकों के लिए अप्रतिम है. पूजन के दौरान अपने भीतर मैं अद्भुत ऊर्जा का संचार महसूस करता हूँ और श्रीमती जी की आँखों से अविरल गंगा की धारा बहने लगती है. अनमोल, हनु को गोद में लिए हुए है और हम अब ऊर्जा के एक दूसरे ही आयाम मैं तैर रहे हैं.


अद्भुत, अप्रतिम, अहा !!


क्रमशः…. 

बुधवार, 1 जनवरी 2025

दास्ताँ कहते कहते…


Banaras 

Pryagraj 
चित्र: गूगल से साभार 
27 दिसंबर

रात के 10 बज रहे हैं. प्रयाग राज में रिया, राहुल, महेंद्र और अन्य मित्र इंतज़ार कर रहे हैं.. इंतज़ार करवाना और करना इन दोनों कामों से मुझे नफ़रत है. आशुफ़्ता ने कहा भी है - 

“हमें भी आज ही करना था इंतिज़ार उस का

उसे भी आज ही सब वादे भूल जाने थे ॥”


हम वादा तो नहीं भूले लेकिन व्यस्तताओं के चलते सारे वादे पूरे भी नहीं कर पाये. अब प्रयागराज जाना संभव नहीं 8:00 बजे ही मित्रों को सूचना दे दी थी कि हम नहीं आ पाएंगे. 


प्रयागराज (जिसे इलाहाबाद नाम से भी जाना जाता है) उत्तर प्रदेश राज्य का एक प्रमुख नगर है. ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि 1575 में इसका दौरा करने के बाद, अकबर इस स्थान से इतना प्रभावित हुआ कि उसने एक किले के निर्माण का आदेश दिया और 1584 तक इसका नाम अल्लाहबास रखा, बाद में शाहजहाँ के अधीन इसे बदलकर इलाहाबाद कर दिया गया. यह जिले का मुख्यालय है और हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थ भी है. 


अक्टूबर 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस जगह का नाम बदलकर पुनः प्रयागराज कर दिया. मान्यता है कि यहां सृष्टिकर्ता ब्रह्म ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने के बाद प्रथम यज्ञ किया था. इसी प्रथम यज्ञ के 'प्र' और 'याग' अर्थात यज्ञ से मिलकर प्रयाग बना और उस स्थान का नाम प्रयाग पड़ा . इस पावन नगरी के अधिष्ठाता भगवान श्री विष्णु हैं और वे यहाँ वेणीमाधव रूप में विराजमान हैं. हर बारह वर्ष में यहाँ कुंभ का मेला सजता है जो इस बार जनवरी 2025 में ही होना तय है.


रात में काल भैरव के दर्शन करने में देरी हुई और भीड़ के चलते हम देर से निकल पाये.. 


सोचता हूँ बनारस इकलौता शहर है जहाँ जीवन और मृत्यु साथ साथ चलते है. "यहाँ एक तरफ दशाश्वमेध पर जीवन और दूसरी तरफ मणिकर्णिका पर मृत्यु दोनों को साथ साथ चलते हुए देखना संभव है ".


महाभारत काल में उल्लेख मिलता है कि काशी भारत के समृद्ध जनपदों में से एक था. भीष्म ने काशी नरेश की तीन पुत्रियों अम्बा, अंबिका और अम्बालिका का अपहरण किया था. इस अपहरण के परिणामस्वरूप काशी और हस्तिनापुर  की शत्रुता हो गई. कर्ण ने भी दुर्योधन के लिये काशी राजकुमारी का बलपूर्वक अपहरण किया था, जिस कारण काशी नरेश महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की तरफ से लड़े थे. कालांतर में गंगा की बाढ़ ने हस्तिनापुर को तबाह कर दिया, तब पाण्डवों के वंशज वर्तमान प्रयागराज में यमुना किनारे कौशांबी में नई राजधानी बनाकर बस गए थे उनका राज्य वत्स कहलाया और काशी पर वत्स का अधिकार हो गया था.


बहरहाल गाड़ी अनमोल चला रहा है और रात के दो बज कर तीस मिनट हो रहे हैं शानदार ठंड और धुंध के बीच हम वापस रीवा लौटे हैं.. इस यात्रा को बेहद सफल कहा जाये तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी बस एक ही कसक दिल में रह गई की सभी मित्रों से मिलना नहीं हो पाया.. अब अगली बार ज़रूर ध्यान रखूँगा कि बैक टू बैक इतने सारे प्लान नहीं बनाने हैं.


क्रमशः…

बासा करो बनारस में…

27 दिसंबर ।। सुबह 7:30 बजे 






















सुबह के ठीक साढ़े सात बज रहे हैं.. हम रीवा से निकल चुके हैं वाराणसी के लिए.. प्लानिंग ऐसी है कि 11:30 तक हम बनारस पहुँचेंगे सीधे काशी विश्वनाथ के दर्शन करेंगे. 1:00 बजे से 3:00 बजे तक एक बुक शॉप में बुक साइनिंग सेरेमनी का आयोजन किया गया है. 3:00 बजे से पाँच बजे तक कुछ मित्रों से मिलने और थोड़ी शॉपिंग करने का प्लान है 5:00 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे तक अस्सी घाट पर विशेष गंगा आरती में शामिल होने का प्लान है. ये प्लानिंग बनाई है मित्र विनीत और रवि ने..


बनारस पहुंचते ही मुझे समझ आ गया था कि ये प्लानिंग काम में नहीं आने वाली…  कार मैं ही ड्राइव कर रहा था. अनायास ही अष्टभुजा शुक्ल याद आ गए. बनारस का परिचय करवाते हुए वो लिखते हैं- 


ठगों से ठगड़ी में

संतों से सधुक्कड़ी में

लोहे से पानी में

अँग्रेज़ों से अँग्रेज़ी में

पंडितों से संस्कृत में

बौद्धों से पालि में

पंडों से पंडई

गुंडों से गुंडई में

और 

निवासियों से भोजपुरी में

बतियाता हुआ यह बनारस है…


 बनारस पहुँचते ही हमने जीपीएस से अन्नपूर्णा मंदिर पार्किंग का पता जानना चाहा.. पता चला ये जगह केवल 80 मीटर दूर है लेकिन वहाँ पहुँचने में 27 मिनट लगेंगे. इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितना ज़ोरदार ट्रैफिक रहा होगा. विनीत भाई से जानकारी मिली कि उन्होंने अस्सी घाट पर कुछ मित्रों को पहले ही मिलने बुला लिया है.. कुछ मित्र बुक शॉप पर इंतज़ार कर रहे हैं..अभी दोपहर के बारह बजे और हम पहुँचे हैं अन्नपूर्णा मंदिर में.


अन्नपूर्णा मंदिर के महंत जी से मिलना अद्भुत रहा. ये मंदिर अपने आप में अलौकिक है. माँ अन्नपूर्णा को तीनों लोकों की माता माना जाता है… कहा जाता है कि इन्‍होंने स्‍वयं भगवान शिव को खाना खिलाया था. इस मंदिर की दीवार पर कई चित्र लगे हुए हैं. एक चित्र में देवी कलछी पकड़ी हुई हैं. अन्नपूर्णा मंदिर के प्रांगण में कुछ एक मूर्तियाँ स्थापित है, जिनमें माँ काली,शंकर पार्वती,और नरसिंह भगवान का मंदिर है. अन्नकूट महोत्सव पर माँ अन्नपूर्णा की स्वर्ण प्रतिमा का दर्शन एक दिन के लिए भक्तगण कर सकते हैं.


मैंने कहीं पढ़ा था कि जब आद्य शंकराचार्य सैकड़ों वर्ष पूर्व इस स्थान पर आए तो अनायास ही उनके मुख से निकल पड़ा -


नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी

निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।

प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी

भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥


इस स्थान पर ही उन्होंने अन्नपूर्णा स्तोत्र की रचना कर ज्ञान वैराग्य प्राप्ति की कामना की थी… अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राण बल्लभे,ज्ञान वैराग्य सिद्धर्थं भिक्षां देहि च पार्वती.


यहाँ से हम बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए मंदिर प्रांगण पर पहुँचे. अब दोपहर के एक बज चुके हैं कई सारे मित्र बुक साइनिंग सेरेमनी के लिए इंतज़ार कर रहे हैं जो इंतज़ार ही करते रह गए क्यूँकि मंदिर से निकलते हमको 3:00 बज गए हैं. ईश दर्शन के साथ ही मुख्य महंत और सीईओ से भी मिलना हुआ.. कई सारे और मित्र यहाँ भी मिल गए जिनके साथ मुलाक़ात की, फोटो और सेल्फ़ीज़ भी ली गईं.


शाम के 4:00 बज हम बोट से हम लोग अस्सी घाट पहुँचे पता चला यहाँ लगभग ढाई लाख लोग आज पहुँचे हुए हैं गंगा आरती और दर्शन के लिए…


अस्सी घाट, का सही उच्चारण असीघाट है यह गंगा के बायें तट पर उत्तर से दक्षिण फैली घाटों की शृंखला में सबसे दक्षिण की ओर का अंतिम घाट है. इसके पास कई मंदिर और अखाड़े हैं.


इसका नामकरण असी नामक प्राचीन नदी के गंगा के साथ संगम के स्थल होने के कारण हुआ है. पौराणिक कथा है कि युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद दुर्गा देवी ने दुर्गाकुंड के तट पर विश्राम किया था ओर यहीं अपनी असि यानी “तलवार” छोड़ दी थी जिसके गिरने से असी नदी उत्पन्न हुई. असी और गंगा का संगम विशेष रूप से पवित्र माना जाता है.. यहाँ प्राचीन काशी खंडोक्त संगमेश्वर महादेव का मंदिर है. अस्सी घाट काशी के पांच प्रमुख तीर्थों में से एक है.


यहाँ पहले से ही कई मित्र इंतज़ार कर रहे हैं पता चला कि नीति और उनका पूरा परिवार सुबह ग्यारह बजे से हमारे इंतज़ार में घाट पर ही हैं. मित्र अमित ने बताया कि वे दो दिनों से मिलने की प्रतीक्षा में थे. कई मित्रों से मिलना हुआ लेकिन ठीक से बात नहीं हो पाई क्यूंकि घाट पर तेज आवाज़ में भजन और आरती चल रही थी. भाई प्रशांत बजरंगी और अखिलेश से मिलना अद्भुत रहा.


गंगा सेवा समिति के अध्यक्ष और सदस्य गणों से सम्मानित होना ईश्वरीय कृपा से ही संभव है.. हमने गंगा पूजन किया और विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती में शामिल हुए… जिसके बाद हमने बाबा भैरव के दर्शन किए लाखों की भीड़ को छेड़ते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना और दर्शन पूजन कर पाना रवि भाई के कारण ही संभव हो पाया. सभी मित्रों का जितना शुक्रिया किया जाये उतना कम है.


बहरहाल यहाँ से निकलकर हमें प्रयागराज जाना है रिया और उनका परिवार वहाँ हमारा इंतज़ार जो कर रहे हैं…


क्रमशः….

सोमवार, 30 दिसंबर 2024

मोहन की नगरी…






जब तक मैं छत्तीसगढ़ में रहा तब तक नया साल मतलब घूमने और पिकनिक का समय होता था. मेरे मित्रों के अलग-अलग कई ग्रुप थे. संगीत वाले दोस्तों का एक ग्रुप, लॉ वाले दोस्तों का एक, स्कूल फ्रेंड्स का एक और ऐसे ही अन्य… सभी के साथ वन डे पिकनिक के प्लान बनाते और 31 दिसंबर से लेकर जनवरी के पहले सप्ताह तक तीन चार जगह तो घूम ही आते थे.


फिर कुछ समझदार हुए तो नए साल के दिन निकलना बंद कर दिया क्यूंकि न्यू ईयर सेलिब्रेशन में केवल धक्का-मुक्की और भीड़ ही मिलती है और कुछ नहीं.


फिर जब बेटा हुआ तो तीन चार साल कहीं निकले ही नहीं और अब वो स्कूल में है तो सारी प्लानिंग उसके वेकेशन के हिसाब से ही बनती है.


लंबे समय बाद नए साल के स्वागत में अपने घर से बाहर हूँ. प्लानिंग में था कि बनारस में BHU कैंपस में बुक लांच की सेरेमनी रखी जाएगी… BHU के विभागाध्यक्ष लंबे समय से बुला रहे हैं बस मैं ही समय नहीं निकाल पा रहा…. या ये कहूँ तो बेहतर होगा जो समय वो देते हैं मेरी व्यस्तताएँ रहती हैं और जो समय मैं देता हूँ उस दौरान उनकी.


इस बार भी ऐसा हुआ मैंने 25 से 31 दिसम्बर तक का समय दिया और पता चला कि इस दौरान BHU में विंटर वेकेशंस होंगे. बहरहाल विनीत भाई ने पूरा प्लान सेट किया. 27 दिसंबर का समय तय हुआ. हम सीधे बनारस ना जा कर रीवा में रुके. कुछ मित्रों का आग्रह था. फिर ये भी पता चला कि रीवा से बनारस मात्र तीन घंटे का ही सफ़र है. 


रीवा मध्य प्रदेश का एक खूबसूरत शहर है.. रीवा शहर मध्य प्रदेश प्रांत के विंध्य पठार के एक हिस्से का निर्माण करता है और टोंस, बीहर, बिछिया नदी एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा सिंचित है. इसके उत्तर में उत्तर प्रदेश राज्य, पश्चिम में सतना, पूर्व में मऊगंज एवं पूर्व तथा दक्षिण में सीधी जिले स्थित है.  रीवा के जंगलों में ही सफेद बाघ की नस्ल पाई गई हैं. जिले की प्रमुख उपज धान है. यहाँ के ताला नामक जंगल में बांधवगढ़ का ऐतिहासिक किला स्थित है. ये जगह प्राकृतिक नज़ारों से भरपूर सफेद शेर मोहन का घर. और कोई शहर कैसे खूबसूरत होता है? प्रकृति से, और वहाँ के खूबसूरत लोगों से. रीवा में ये दोनों ही प्रचुर मात्रा  है. 


सुबह जैसे ही हम रीवा पहुँचे गुड्डू भैया लेने आ गए… अनमोल ने सारा इंतज़ाम कर रखा था और इस प्लानिंग में जुड़ गए प्रिय प्रियांशु.


पहुँचते ही गरिमा का मेसेज आ गया “सर, आज का भोजन हमारे यहाँ कीजिए!” इतने स्नेह पूर्ण निमंत्रण को मैं अस्वीकार नहीं कर पाया. गरिमा का पूरा परिवार हमारे स्वागत के लिए उपस्थित था. उनकी मम्मी ने विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए थे इसमें ख़ास था रीवा का लोकल फ़ूड “उसना”… हम उनके साथ बात करने में ऐसे खो गए जैसे पहले से ही एक दूसरे को जानते हों.. बेटा और श्रीमती जी ज़्यादा घुल मिल गए.. प्यार भरी मुलाक़ात में फ़ोटो लेना रह गया. 


वर्तमान दौर का चलन है दिल मिले या ना मिले फोटो खिंचवाते रहिए.. मैं इसमें अभी भी कच्चा हूँ. बहुत सारे मोमेंट कैप्चर ही नहीं हो पाते कैमरे से, लेकिन दिल में जगह बना लेते हैं… शायद यही सही तरीका हो मिलने का 🤔


बहरहाल सत्ताईस दिसंबर की सुबह हम वाराणसी के लिए निकले.. जो भारत का प्राचीनतम बसा शहर है. भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का प्रसिद्ध नगर है… इसे ‘बनारस’ और ‘काशी’ भी कहते हैं


प्रसिद्ध अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन लिखते हैं: “बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों (लीजेन्ड्स) से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है।”


क्रमशः …..


✍️एमजे 
 

रविवार, 29 दिसंबर 2024

शुक्रिया 2024

 








सुबह घर पर बात कि तो मम्मी से पता चला की जब मैं पाँच बरस का था तो पहली बार पूरे परिवार के साथ बनारस घूमने गए थे.. रेल से सफ़र करते थे और धर्मशाला में रुकते थे. 

घूमने का शौक शायद जीन्स में ही आ गया है. अब हम होटल्स में रुकते हैं और अपनी गाड़ी से ट्रैवल करते हैं. लेकिन ट्रेवलिंग कैसे भी की जाये आपको हमेशा कुछ नया सीखने को मिलता है.

आप ट्रैवल करते समय सस्ते होटल में रुकें या पाँच सितारा में इससे बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता लेकिन सामान उठाने वाले को तुरंत कुछ रुपए निकाल कर टिप्स दे देना, कमरे को साफ रखना, थैंक्स कहना, आहिस्ता बोलना, लोगों से सम्मान पूर्वक बात करना... ये है असल लग्जरी.

मै हमेशा लग्जरी में रहता हूं और रहना पसंद करता हूँ.. मुझे लगता है पाँच सितारा कोई प्रॉपर्टी नहीं होती बल्कि वहाँ सर्विस देने वाले लोग होते हैं और लक्ज़री आपकी तबियत में होती है, आपकी आदतें होती है फ़ाइव स्टार... ये दीवारें, ये फर्नीचर कभी फ़ाइव स्टार नहीं हो सकते. कई बार मैं ऐसी प्रॉपर्टी में भी रुका हूँ जो बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन वहाँ काम करने वाले लोगों ने उस यात्रा को यादगार बना दिया.

घूमने का भी एक कल्चर है..इसके कुछ असूल हैं. पैसों से केवल सुविधा मिल सकती है, तमीज नहीं.  पैसे केवल आपको उस जगह ले जा सकते हैं, आनंद आपको आपकी फितरत से आएगा.  क्लास आपके बिहेवियर से नजर आता है...

बहरहाल बनारस की पाँच सितारा रही इस यात्रा में स्नेहिल मित्रों ने चार चाँद लगा दिए विनीत, नीति, रवि, अमित,सौरभ,अनमोल और प्रियांशु का साथ आनंद को कई गुना कर गया.

बाबा विश्वनाथ, माँ अन्नपूर्णा के दर्शन और गंगा आरती करके हमने 2024 को प्रेमपूर्वक विदा कहा. आशा है 2025 सभी के लिए समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली लेकर आए.

✍️एमजे 

PS: बनारस की यादें, खैरूआ सरकार के दर्शन और रीवा के मित्रों पर बहुत कुछ लिखा है. जिनको अलग-अलग ब्लॉग में जगह दी जाएगी जुड़े रहना. 


रविवार, 15 दिसंबर 2024

हमने यूँ दिल को समझाया

 


कक्षा आठ में था जब पहली बार तबला शब्द सुना. ढोलक पता था देखा था छुआ भी था लेकिन ये तबला क्या होता है ? पापा चाहते थे कि मैं ढोलक बजाना सीखूँ जिसके लिए शहर के सबसे योग्य शिक्षक की तलाश की गई और उन्होंने सुझाया कि मोहन को तबला सिखाओ ढोलक और बाक़ी दूसरे ताल वाद्य तो वो वैसे ही बजा लेगा. 


पिताजी के साथ योग्य गुरु से मिलने पहुँचे, तो उन्होंने कहा कि रोज़ एक घंटे की क्लास लगेगी और घर पर भी कम से कम एक घंटे रियाज़ करना होगा मैं हाँ में हाँ मिलाता रहा. और हम रामदास गुरुजी के यहाँ से लौट आए. मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कि पूछता तबला कैसा होता है? उससे मिलवाइये ना सही कम से कम शक्ल ही दिखा दीजिए. 


बहरहाल सीखना शुरू हुआ और मुझे घर पर रियाज़ करने के लिए तबला ख़रीदना था. माता जी से कहा तो बोली हर महीने कुछ पैसा जमा करके ख़रीदलेना एक साथ ढाई हज़ार रुपए नहीं दे सकती. घर का सारा बजट वही देखती थी. पैसों के मामले में एकदम सुलझी. हमने कभी उनको फ़िज़ूल खर्ची करते नहीं देखा. 


खैर घर पर हमारे एक जर्सी गाय पाल रखी थी. मैं रोज़ एक घर में दूध की डिलीवरी करने जाता जहाँ से हर महीने 400 रुपए मिलते. पूरे पैसे जमा करता अपने गुल्लक में और कुछ महीनों के भीतर ही मेरे पास 2800 रुपए जमा हो चुके थे. तबला ख़रीदने विशेष रूप से रायपुर गया और वहाँ से ख़ूबसूरत सा तबला ख़रीद लाया.


कुछ वर्षों बाद जब मैं भी कमाने लगा था और मेरी तबले की विधिवत शिक्षा पूरी हो चुकी थी और उच्च शिक्षा के लिए गुरुदेव छोटेलाल व्यास के सान्निध्य और सेवा में लगा था तब मेरे एक मित्र थे उधौ चतुर्वेदी (गुरु जी हमें उधौ और माधौ कहते थे) के साथ हैदराबाद तबला ख़रीदने गया और उसी जगह से तबला ख़रीदकर लाया जहाँ से उस्ताद ज़ाकिर हुसैन तबला बनवाते थे.  ये वो समय था जब तबले और शास्त्रीय संगीत के प्रति मेरी दीवानगी अपने चरम पर थी. लगता था जैसे यही जीवन है. 


इस समय तक मन ही मन एक और व्यक्ति को गुरु मान चुका था उस्ताद ज़ाकिर  हुसैन.. इनके कैसेट हमारे घर पर थे… और दूरदर्शन पर यदा कदा  उनके दर्शन हो जाया करते थे. उस्ताद जी से एक ही बार संयोग से मिलना हुआ वो भी तब जब मैंने तबला बजाना छोड़ दिया था. राजस्थान के जोधपुर शहर में एक कार्यक्रम का आयोजन था जहाँ मुझे भी श्रोता के रूप में निमंत्रित किया गया था.. मंत्रमुग्ध कर देने वाले तबला वादन को सुनने के बाद ग्रीन रूम में उनसे मिलने पहुंचा, मैंने कहा उस्ताद जी प्रणाम, बोले उस्ताद बड़े लोग होते हैं मुझे ज़ाकिर ही कहो. बेहद सादा दिल महान कलाकार.. उन्होंने पूछा क्या अभी तबला बजाते हो ?? मैंने कहा नहीं बस आपको सुनता रहता हूँ तबला बजाना छोड़ दिया है… 


बहरहाल कल शाम से ही मन असहज था पता नहीं क्यों रात नींद ही नहीं आ रही थी. बेचैनी का कोई कारण तो ना था लेकिन मन बेचैन था सुबह उठा तो उस्ताद जी के नहीं रहने की खबर पढ़ कर मन अवाक् रह गया.. फिर ख्याल आया कि आत्मा के आकाश से तारा जो टूटा था, मन कैसे बेचैन ना होता??


हमने ये सुन के दिल को समझाया 

कि जाने वाले यहाँ के थे ही नहीं… 


उस्ताद ज़ाकिर साहब 🙏 मेरे गुरु थे. उनका जाना अपूरणीय है.


✍️एमजे