Diary Ke Panne

रविवार, 13 अगस्त 2017

संवाद हीनता या संवेदन हीनता का दौर....





"कबीर क्षुधा कूकरी, करत भजन में भंग।
वाकूं टुकडा डारि के, सुमिरन करूं सुरंग।।"
                                             -संत कबीर


शुक्रवार 11 अगस्त 2017.... दरवाजे की घंटी बजती है..... चौंक कर उठता हूँ तो सीधे घडी पर नज़र जाती है, रात के तीन बजे हैं? पत्नी से पूछता हूँ क्या तुमने घंटी की आवाज़ सुनी ?? यही प्रश्न वो भी दोहराती है?...... और दोनों एक साथ कहते हैं हाँ......

उठ कर दरवाज़ा खोलता हूँ .... एक अनजान महिला और पुरुष दरवाजे पर खड़े हैं....दरवाज़ा खोलते ही दोनों मार्मिक  आवाज़ में कहते हैं हमें गाडी की ज़रूरत है दीदी को हॉस्पिटल ले जाना है?.... मैं दोनों को नहीं जानता हूँ..... पूछता हूँ तो पता चलता है दोनों पास वाली multi में रहते हैं और उनके परिवार की कोई बुजुर्ग महिला बीमार है....

 मैं - ठीक है आप गाडी ले जाइए ....
 वे- हमें कार चलाना नहीं आता
मैं – हम्म............. आपने अपनी multi में किसी को क्यूँ नहीं उठाया?
वे- कोई दरवाज़ा नहीं खोल रहा
मैं- यहाँ भी कई लोगों के पास कार है देखिये अगर कोई जाने को तैयार हो तो... अगर कोई न उठे तो मुझे वापस उठा लेना...... इतना कहकर बिना उनका उत्तर सुने मैं दरवाज़ा बंद कर देता हूँ......

दरवाज़ा बंद करते ही सोचता हूँ ये मैंने क्या कहा? मैं कैसे इतना असंवेदनशील हो सकता हूँ ?? मैं तो sensodyne  भी नहीं लगाता मुझे तो सेंसिटिव होना ही चाहिए .... ये सुन कर की कोई परिवार परेशान है मुझे झनझनाहट क्यों नहीं हुई?

कार की चाबी ले कर जिस हालत में होता हूँ उसी हालत में यानी शॉर्ट्स और बनियान में नीचे उतरता हूँ देखता हूँ की दंपत्ति किसी और के फ्लैट की घंटी बजा रहे हैं ....... वो मुझे देख मेरे साथ चल देते हैं....रास्ते में पूछता हूँ कि मेरे फ्लैट की घंटी क्यूँ बजाई क्या वो मुझे जानते हैं ? जवाब मिलता है कि नीचे चौकीदार ने बताया 201 की घंटी बजाइए जोशी जी मदद करेंगे...... महिला को हॉस्पिटल में एडमिट करवा कर मैं वापस घर आता हूँ .....

सुबह के पांच बज रहे हैं कई सारे प्रश्न दिमाग में उमड़-घुमड़ रहे हैं ..... कहाँ जा रहे हैं हम?? ये संचार क्रांति का दौर हैं या संवाद हीनता का या संवेदन हीनता का......

लगातार कई ख़बरें भी पढने को मिल रही हैं एक महिला बिल्डिंग के अठारहवें माले में अपने फ्लैट में मरकर कंकाल हो जाती है और किसी को पता तक नहीं चलता.... एक IAS अधिकारी पारिवारिक कलेश के कारण आत्म हत्या कर लेता है.... कई बच्चे हॉस्पिटल में कुछ अधिकारियों और एक गैस सप्लाई करने वाली कंपनी की संवेदनहीनता से मर जाते हैं???

रविवार 13 अगस्त 2017 शाम के 6 बजकर 52 मिनट हो रहे हैं, व्यस्तता के चलते लिखना नहीं हो पा रहा था , आज इस लेख  को पूरा करने बैठा हूँ | दो दिनों से ये बातें दिमाग में कौंध रही हैं.... स्वतंत्रता दिवस करीब है.... जश्न के इस माहौल में तय कर लिया जाना चाहिए कि कौन ज़िम्मेदार है ???? 

मेरे देखे ये समय आत्ममंथन का है.. चिंतन का है... यह तय करने का समय है कि कौन ज़िम्मेदार है??  जिन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला वो पडौसी या वो अधिकारी जिन्होंने कंपनी के बिल नहीं भरे या वो कंपनी जिसने लोगों की जान से ज्यादा पैसे को महत्व दिया या वो पत्नी जिसे केवल अपनी चिंता रही या वो माँ बाप जो बहु से नहीं निभा पाए ..... कौन ज़िम्मेदार है???????


हम प्रकृति पर्यावरण और आस पड़ोस के प्रति ही नहीं वरन्  अपने परिवार और स्वयं के प्रति भी संवेदनहीन होते जा रहे हैं...संवेदनशीलता के उदहारण के रूप में मुझे याद आता है  कि हर्षवर्धन ने  उनकी प्रसिद्ध रचना नागानान्द नाटक  में एक संत के आश्रम का वर्णन करते हुए कहा  है कि उनके  आश्रम में पेड़ों की केवल ऊपरी खाल  निकालते  हैं, क्यों कि  गहरे स्तर पर जाने और खुरचने से पेड़ों को बहुत दर्द  होता है | श्लोक कुछ इस प्रकार है : 
          
              “कण्डूयमानेन कटम् कदाचिद्वनद्विपेनोन्मथिता त्वगस्य
              अथैनमद्रेस्तनया शुशोच सेनान्यमालीढ मिवासुरास्त्रै: ||



इस दौर में जहाँ हर कोई दूसरों पर दोष मढ रहा है, संवाद हीनता संवेदन हीनता में बदलती जा रही है.... हर कोई  दूसरों को दोष दे रहा है , दूसरों को पूछ रहा है  कि तुमने क्या किया या क्या कर रहे हो ?? मुझे लगता है प्रत्येक व्यक्ति को इन सभी चीज़ों के लिए स्वयं की ज़िम्मेदारी तय करनी चाहिए  .....

 मेरे देखे मैं ज़िम्मेदार हूँ ... समय हैं ज़िम्मेदारी लेने का..... समय है संवेदनशील होने का..... समय है किसी के लिए उठ खड़े होने का.... कब तक दूसरों को दोष देते रहेंगे???
 ... सोचें..........

                    -मन मोहन जोशी “मन”

रविवार, 30 अप्रैल 2017

द मोस्ट एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी प्लेस ऑफ़ द वर्ल्ड- जोधपुर


29-04-2017


                  वर्ष 2014 के विश्व के अति विशेष स्थानों (द मोस्ट एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी प्लेसेज़ ऑफ़ द वर्ल्ड) की सूची में प्रथम स्थान पाने वाला शहर...बेहतरीन लोगों का शहर... एक ऐसा शहर जहां अल्प वर्षा  के चलते पानी की किल्लत तो है लेकिन लोग पानी बेचने की जगह "जल सेवा" करना पसंद करते हैं..... एक ऐसा शहर जो विश्व की जानी मानी हस्तियों विशेषतः ब्रैडपिट, एंजेलिना जोली, बिल गेट्स आदि का favourite डेस्टिनेशन है, जोधपुर नाम से जाना जाता है .

                    जोधपुर राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। इसकी जनसंख्या 10 लाख के पार हो जाने के बाद इसे राजस्थान का दूसरा "महानगर" घोषित कर दिया गया था।  यह शहर थार के रेगिस्तान के बीच अपने ढेरों शानदार महलों, दुर्गों और मन्दिरों वाला प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी है। जोधपुर में रहने के दौरान इसे करीब से जानने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ. पुराने जोधपुर की संकरी गलियों में जो नीले मकानों से घिरे हुए हैं, बाइक  से और पैदल भी बहुत भटका हूँ .

                     वर्ष पर्यन्त चमकते सूर्य वाले मौसम के कारण इसे "सूर्य नगरी" भी कहा जाता है। यहां स्थित मेहरानगढ़ दुर्ग को घेरे हुए हजारों नीले मकानों के कारण इसे "ब्लू सिटी " के नाम से भी जाना जाता है । मकानों को नील रंग से पुतवाने का एक कारण ये बताया जाता है कि चूना एंटीबैक्टीरियल होता है और नीला रंग गर्मी के दिनों में ठंडक प्रदान करता है.

                   सूर्य नगरी के नाम से प्रसिद्ध जोधपुर शहर की पहचान यहां के महलों और पुराने घरों में लगे छितर के पत्थरों से होती है, पन्द्रहवी शताब्दी का विशालकाय मेहरानगढ़ दुर्ग , पथरीली चट्टान पहाड़ी पर, मैदान से 125 मीटर ऊंचाई पर विद्यमान है। आठ द्वारों व अनगिनत बुजों से युक्त यह शहर दस किलोमीटर लंबी ऊंची दीवार से घिरा है।

                 जोधपुर शहर की  उलझी हुई घुमावदार गलियाँ पटरियों पर लगी दुकानों से घिरी हैं। कलात्मक रूप से बनी हुई रंगबिरंगी पोशाकें पहने हुए लोगों को देखकर प्रतीत होता हैं कि जोधपुर की जीवनशैली असाधारण रूप से सम्मोहित करने वाली है। औरतें घेरदार लहंगा और आगे व पीछे के हिस्सों को ढकने वाली तीन चौथाई लंबाई की बांह वाली  जैकेट पहनती हैं। पुरूषों द्वारा पहनी हुई रंगीन पगड़ियाँ शहर में भी रंग बिखेर देती हैं। आमतौर से पहने जाने वाली ढ़ीली ढ़ाली और कसी, घुड़सवारी की पैंट जोधपुरी ने यहीं से अपना नाम पाया। जोधपुर के कपड़ों मैं जोधपुरी कोट पुरे भारत मे प्रसिद्ध है.

                     राजस्थान में जोधपुर शिक्षा के क्षेत्र मे बहुत आगे हैं। जोधपुर को "सी ए" की खान कहा जाता है। पूरे भारत मे सबसे ज्यादा सीए यहीं से निकलते है। शिक्षा के लिये यहां पर कई विकल्प मौजूद है। यहाँ विश्व प्रसिद्ध आईआईटी, नेशनल लॉ युनिवर्सिटी, एम्स, काजरी, आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय आदि स्थित है।

                   उत्कृष्ट हस्तशिल्पों के समृद्ध संग्रह का रंगीन प्रगर्शन देख कर जोधपुर के बाजारों में खरीददारी करना एक उत्साहपूर्ण अनुभव है। बंधेज का कपड़ा, कशीदाकारी वाले कपड़ेलकड़ी के बने विभिन्न सामान मखमल आदि की जूतियां, रेशम की दरियां, मकराना के संगमरमर से बने स्मृतिचिन्ह, उपयोगी व सजावटी वस्तुओं की विस्तृत किस्में आदि इन बाजारों में पाई जाती हैं। बड़े भैया की शादी में मैं यहाँ से राजपूती तलवार और शाही छाता ले गया था.

              जोधपुर को राजस्थान की न्यायिक राजधानी कहा जाता है, राजस्थान का उच्च न्यायालय भी जोधपुर में ही स्थित है। जोधपुर पुरे विश्व से जुड़ने के लिये अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी मौजुद है।

             मुख्य दर्शनीय स्थलों में मेहरानगढ़ दुर्ग, जसवंत थड़ा, उम्मैद महल, सरदार मार्केट, घंटा घर, राजकीय संग्राहलय, कायलाना झील आदि मन मोह लेने वाले हैं.

वाकई में जोधपुर अपने आप में एक बेमिसाल शहर है.......

 


          - मनमोहन जोशी “MJ”

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

सच्ची कमाई ...........

26-04-2017



            ट्रेन के वातानुकूलित डब्बे में लेटे-लेटे कुछ घंटे कैंब्रिज के प्रोफेसर स्टीवर्ट को सुनता रहा...फिर राहुल संकृत्यायन की किताब मेरी जीवन यात्रा पढने लगा..... फिर शंकर के भज गोविन्दम मूढ़ मते पर रजनीश को सुनता रहा.... घंटों के मौन के बाद सोचा कुछ लिखूं.

            मैं बहुत ही डाइवर्सिफाइड रीडर हूँ हर कुछ जानना समझना चाहता हूँ. इतना कुछ जानने और समझने के  लिए है कि ये जीवन छोटा मालूम पड़ताहै .... मैं घंटों अकेले बिता सकता हूँ बस मेरा लैपटॉप, सोनी का MP 3 प्लेयर  और kindle voyage  मेरे साथ हों या कुछ किताबें . और इन सब का आनंद रेल यात्रा में कई गुना हो जाता है .... देखता हूँ कि  कुछ  लोग ताश खेल रहे हैं,  कुछ लोग बच्चों को ये मत करो और वो मत करो की लगातार हिदायतें दे रहे हैं , बच्चों से ज्यादा irritating ये माता पिता ही हैं.
             
            शाम के 5 बज रहे हैं ... मैं पत्नी सहित जोधपुर के लिए सुबह 5 बजे घर से निकला हूँ पुरे बारह घंटे  बीत चुके हैं..... जोधपुर राजस्थान का एक खूबसूरत शहर है..... बचपन में राजस्थान के बारे में बहुत कुछ पढ़ा और सुना था . राजस्थान हमेशा से ही अवचेतन मन में बसा हुआ था.....वर्ष 2006 में मुझे प्रमोशन मिला और मैं असिस्टेंट ब्रांच मेनेजर के पोस्ट पर राजस्थान के खूबसूरत शहर उदयपुर पहुंचा (कभी उदयपुर के बारे में भी विस्तार से लिखा जाएगा ) और कुछ महीनों के भीतर ही ब्रांच मेनेजर के पद पर जोधपुर जाने का अवसर मिला....

            याद आता है 4th A रोड पर मेरा ऑफिस था और ब्रांच की खराब हालत को ठीक करने के लिए ही मुझे भेजा गया था,,,, उदयपुर से वॉल्वो की बस से मैं जोधपुर पहुंचा सुबह के चार बजे थे ....चौपासनी इलाके में कंपनी का फ्लैट था जहां पहले से ही  ग्राउंड फ्लोर पर मैनेजरियल स्टाफ रहता था... और फर्स्ट फ्लोर मेरे लिए आरक्षित था....

             काम करते हुए जोधपुर को बहुत नजदीक से देखा... बहुत कुछ सिखाया इस शहर ने .... कई कलाकारों से रूबरू होने का मौका भी दिया जिसमें उस्ताद जाकिर हुसैन, पं हरिप्रसाद चौरसिया, पं छन्नू  महाराज, शुभा मुद्गल , उस्ताद घुलाम अली जैसे विश्व के मूर्धन्य कलाकारों को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ तो वहीँ दूसरी ओर कविता और शेरो शायरी के सभी बड़े नामों को सुनने और उनसे मिलने का अवसर मिला इन सभी में मेरे प्रिय रहे कवि देवल आशीष..... जब भी देवल आशीष के शब्द कान में पड़ते हैं मेरा मन राजस्थान के रेतीले धोरों  में विचरने लगता है.....

              बहरहाल मुझे याद आता है एक बार मैं बीमार पड़ा. आंत में इन्फेक्शन होने के कारण मुझे भंडारी हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ा था . घर वालों को नहीं बताया, मुझे लगा की जब तक वो MP/ CG से आयेंगे तब तक तो मैं ठीक हो जाऊँगा.... सात दिन तक हॉस्पिटल में भर्ती  रहने के बाद आठवें दिन जब डॉक्टर ने डिस्चार्ज करने की बात कही तो मैंने पूछा था क्या कुछ दिन और नहीं रह सकता.....इसका कारण था मेरी टीम और मित्रों का प्रेम... 

विम्मी, नम्रता, भंवर सिंह, लीलाधर, वीरेंदर , एहतशाम, हेमंत, गोपाल, लक्ष्मी , यवनीत, भागवत, सतीश, ऋतुराज, राहुल, रीना , अर्चना, सुमित भावेश,  अयूब आदि मित्र मेरे जीवन का हिस्सा रहे हैं और मेरे राजस्थान प्रवास की सच्ची कमाई और बचत भी यही चंद लोग हैं......

             
 

                                     - मन मोहन जोशी “Mj

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

धर्म का शोर या शोर का धर्म

24-04-2017





               सोनू निगम के twit के बाद पिछले कुछ दिनों से ट्विटर, सोशल मीडिया व न्यूज़ चैनलों  पर एक ही खबर ट्रेंड कर रही है ..... लोग आपस में बहस कर रहे हैं की सोनू निगम ने ठीक बोला या ग़लत. एक मौलाना ने तो फतवा ही जारी कर दिया था की जो कोई सोनू निगम का सर मुंड कर लाएगा उसे वो दस लाख रुपये का इनाम देंगे आदि आदि आदि....

             मैंने सोचा था कि इस मुद्दे पर कुछ भी न लिखा जाएगा क्यूंकि पता नहीं कौन सी बात से किसी की धार्मिक भावना भड़क जाए .... फिर कुछ ऐसा घटा... कल की ही बात है एक  मित्र ने ई मेल के माध्यम से पूछा है कि अपने पूजा पाठ या अन्य धार्मिक कार्यों  से दूसरों के जीवन में खलल डालना क्या धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा है?? क्या भारत में असहिष्णुता  बढ़ी है ? क्या इन सब से इश्वर प्रसन्न होता है ? क्या सोनू निगम ने जो कुछ किया वो असहिष्णुता है?? आदि पर आप कुछ लिखिए ...

           मेरे देखे समाज वाकई असहिष्णु हुआ है लेकिन मेरा नज़रिया दूसरा है वस्तुतः सोनू निगम ने तो कुछ भी नहीं कहा ....... सैकड़ों वर्षों पहले ही जब की लाउड स्पीकर नहीं होते होंगे तब कबीर ने कहा था –
“कंकर पत्थर जोड़ कर मस्जिद लिया चुनाय ,
ता चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय.” 
अब इसे क्या कहेंगे ?

कबीर मेरे प्रिय हैं और पूजा पाठ की पद्धति के सम्बन्ध में वे और भी खूबसूरत बात कहते हैं :

सब रग तंत रबाब तन विरह बजावे नित्त्त,
और न कोई सुन सके कह साईं के चित्त ||

         कबीर कह रहे हैं की आराधना ऐसी हो जो भक्त और भगवान् के अलावा किसी और को सुनाई भी ना दे .... फिर किसी भी तथाकथित धार्मिक कार्य में ये शोर शराबा क्यूँ??

ये जानने से पहले कि क्या ये क्रियाकलाप धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा हैं ? ये जान लेना ज़रूरी है कि आखिर धर्म क्या है?

        धर्म संस्कृत भाषा का शब्द हैं जोकि धारण करने वाली धृ धातु से बना हैं। "धार्यते इति धर्म:" अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म हैं। अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म हैं। दूसरे शब्दों में यहभी कह सकते हैं की मनुष्य जीवन को उच्च व पवित्र बनाने वाली ज्ञानानुकुल जो शुद्ध सार्वजानिक मर्यादा पद्यति हैं वह धर्म हैं।

        जैमिनी के  मीमांसा दर्शन के दूसरे सूत्र के अनुसार- “ लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु गुणों और कर्मों में प्रवृति की प्रेरणा धर्म का लक्षण है।“

       वैदिक साहित्य में धर्म वस्तु के स्वाभाविक गुण तथा कर्तव्यों के अर्थों में भी आया हैं। जैसे जलाना और प्रकाश करना अग्नि का धर्म हैं और प्रजा का पालन और रक्षण राजा का धर्म हैं।

 मनु स्मृति के अनुसार-
“धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:,
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं ||
अर्थात: धैर्य,क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना, चोरी त्याग, शौच, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध धर्म के दस लक्षण हैं।

 महाभारत के अनुसार -
“धारणाद धर्ममित्याहु:,धर्मो धार्यते प्रजा:”
अर्थात -जो धारण किया जाये और जिससे प्रजाएँ धारण की हुई हैं वह धर्म हैं।

वैशेषिक दर्शन के कर्ता महा मुनि कणाद के अनुसार -
यतोअभयुद्य निश्रेयस सिद्धि: स धर्म:
अर्थात- जिससे अभ्युदय(लोकोन्नति) और निश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि होती हैं, वह धर्म हैं।

 स्वामी दयानंद सरस्वती  के अनुसार- जो पक्ष पात रहित न्याय सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार हैं उसी का नाम धर्म है और उससे विपरीत अधर्म हैं।

                    धर्म , सम्प्रदाय, पंथ आदि शब्दों पर एक पूरी किताब लिखी जा सकती है....


तो फिर क्या हिन्दू, मुस्लिम.... आदि धर्म हैं?? क्या किसी भी कार्य के लिए लाउड स्पीकर या DJ का प्रयोग वर्जित कर दिया जाना चाहिए?? क्या धर्म की आलोचना करने का अधिकार होना चाहिए ?? ये सारे क्रियाकालाप धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा हैं या नहीं के परे इन क्रियाकलापों को धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा होना चाहिए या नहीं ?? ये सारे प्रश्न चिंतन का विषय है. मेरे देखे किसी से भी राटा रटाया उत्तर लेने की बजाय सभी चिंतन करें और विभिन्न निष्कर्षों तक पहुंचें.

              एक विद्यार्थी का धर्म है विद्या अर्जन करना .... नए प्रश्न उठाना और उत्तर की खोज में लग जाना .. मेरे इस धर्म के पालन में तो मुझे सभी तरह के शोर शराबे से परेशानी है.

                                -मन मोहन जोशी “मन”

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

इसी बहाने ......

31 March 2017



                 आज सुबह का अखबार खोला तो एक खबर पर नज़र गई भारत वंशी निक्की हेली जो यू एन में अमेरिकी राजदूत हैं ने एक भाषण में कहा कि भारत में महिलाओं को बराबरी के अवसर नहीं मिलते हैं .. उन्होंने अपनी माँ का ज़िक्र करते हुए कहा कि उनकी माँ राजकौर रंधावा को केवल इस कारण जज बनने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि वह एक महिला थीं अन्यथा उनकी माँ को भारत की पहली महिला जज होने का गौरव प्राप्त हो जाता .

             हालांकि अखबार के अनुसार यह बात ग़लत है क्योंकि उनकी माता जी के देश छोड़ने से 21 वर्ष पहले ही श्रीमती अन्ना चान्डी को देश की पहली महिला जज बनने का गौरव हासिल हो चुका था.

            तो क्या न्यायपालिका में महिलाओं को बराबर का स्थान तब से मिला हुआ है???? सोचता हूँ जानकारी के खजाने से चिंतन की गहराई में झांकते हुए इस तथ्य की पड़ताल करूँ. भारतीय गणतंत्र के 68 वर्ष पूरे हो गए हैं. इतिहास के इन गौरवशाली68 वर्षों में , सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी तक एक भी महिला नहीं पहुँच पाई कैसे?. वर्तमान स्थिति के अनुसार, अगस्त 2022 तक, कोई स्त्री मुख्य न्यायाधीश नहीं बन  सकेगी.

            संविधान  लागू होने के लगभग 40 वर्षों बाद, फातिमा बीवी (6 अक्टूबर, 1989) सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं. वे 1992 में सेवानिवृत्त हो गईं. इसके बाद, सुजाता वी. मनोहररुमा पाल , ज्ञान सुधा मिश्रा , रंजना प्रकाश देसाई और आर. बानूमथि (2014) को सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश बनने का अवसर मिला. कुल मिला कर, 65 सालों में, 219 (41  पूर्व मुख्य न्यायाधीशों, 150 पूर्व न्यायाधीशों और 28 वर्तमान न्यायाधीशों) न्यायाधीशों में से केवल 6  महिलाएं थीं.

             सन 2000, जो माननीय सुप्रीम कोर्ट का स्वर्ण जयंती वर्ष था, में 29 जनवरी को, मुख्य न्यायाधीश ए.एस.आनंद द्वारा तीन नए न्यायमूर्तियों (डोरेस्वामी राजू, रूमा पाल और वाई.के.सभरवाल) को शपथ दिलाई जानी थी.  अचानक, ना जाने  क्यों, शपथग्रहण  की तारीख 29 की बजाय 28 जनवरी कर दी गई. शायद स्वर्ण जयंती समारोह की वजह से. डोरेस्वामी राजू और वाई.के.सभरवाल को 28 जनवरी को सुबह शपथ दिलाई गई और रूमा पाल को दोपहर बाद | बाद में पता चला कि डोरेस्वामी राजू और वाई.के.सभरवाल को समय रहते शपथग्रहण की तारीख में परिवर्तन की सूचना मिल गई परन्तु  रूमा पाल को नहीं मिली. और इसी देरी के चलते 2 जून 2006 को रुमा पाल मुख्या न्यायाधीश बने बिना ही सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति के रूप  रिटायर हो गयीं 

            रूमा पाल को समय से सूचना मिलने में इतनी देरी हुई कि देश की किसी बेटीको ना जाने कितने साल और देश का मुख्य न्यायाधीश बनने के लिए इंतज़ार करना होगा. शपथ लेने में कुछ घंटों की देरी से देश के न्यायिक इतिहास की धारा ही उलट गई. कहना कठिन है कि यह नियति थी या पितृसत्ता का षड्यंत्र’?

           जहाँ सर्वोच्च न्यायालय में यह स्थिति है, वहीं देश के अधिकाँश उच्च-न्यायालय अपनी प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीशका इंतज़ार कर रहें हैं. 9 फरवरी, 1959 को अन्ना चांडी  देश में किसी भी उच्च न्यायायलय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं जब उन्हें केरल उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाई गयी. इसके कई साल बाद, (30 मई, 1974) पी.जानकी अम्मा और के.के.उषा (1991) केरल उच्च न्यायालय की न्यायाधीश बनीं. लीला सेठ, दिल्ली उच्च न्यायालय की प्रथम महिला न्यायाधीश (25.7.1978) थीं, जो भारत में किसी भी उच्च-न्यायालय की प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश’ (हिमाचल, 1991) बनीं. सन 2013 में टी. मीना कुमारी को मेघालय उच्च न्यायालय , 2014 में जी. रोहिणी को दिल्ली उच्च न्यायालय और डॉक्टर मंजुला चेल्लुर को कलकत्ता उच्च-न्यायालय की प्रथम महिला  मुख्य न्यायाधीशबनने का गौरव प्राप्त हुआ. 

            देश भर के 24 उच्च न्यायालयों में अब तक नियुक्त महिला न्यायधीशों की संख्या 7 प्रतिशत से अधिक नहीं है. न्यायपालिका में महिला न्यायधीशों की कमी का एक कारण यह बताया जाता है कि वकालत के पेशे में ही महिलाओं की संख्या, पुरुषों के मुकाबले बहुत कम है. काश यही सही कारण हो.

        लेकिन  आश्चर्यजनक तथ्य यह  कि इन 68 वर्षों में भारत के कानून मंत्री (भीमराव  आम्बेडकर से लेकर शिवानन्द गौडा तक) व राष्ट्रीय विधि आयोग और राष्ट्रीय मानवाधीकार आयोग के अध्यक्ष पदों पर भी पुरुषों का ही कब्ज़ा बना हुआ है. भारत के अटोर्नी जनरल और सोलिसिटर जनरल का पद भी मानों पुरुषों के लिए आरक्षित रहा है. हाँ, कुछ समय पहले, इंदिरा जयसिंह को अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल बना कर, महिला सशक्तिकरण की जय-जयकार अवश्य की गई थी. मतलब यह कि सभी महत्वपूर्ण निर्णय-स्थलों पर पुरुषों का वर्चस्व रहा है.

        यही नहीं, वकीलों की अपनी संस्थाओं में भी महिला अधिवक्ताओं को हाशिये पर ही खड़ा रखा गया. बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया के अभी तक सभी अध्यक्ष (एम सी. सीतलवाड़ से लेकर मन्नन कुमार मिश्र तक) पुरुष ही रहे हैं.
 
        यहाँ उल्लेखनीय है कि रगीना गुहा के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय (1996) और सुधांशु बाला हजारा के मामले में पटना उच्च न्यायालय (1922) ने कहा था कि महिलायें कानून की डिग्री के बावजूद अधिवक्ता होने की अधिकारी नहीं हैं”. इस संदर्भ में ये दोनों ऐतिहासिक दस्तावेज पढने योग्य हैं. 

           24 अगस्त, 1921 को पहली बार इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कोर्नेलिया सोराबजी को वकालत करने की अनुमति दी थी. स्त्री अधिवक्ता अधिनियम, 1923 पारित कर अंततः  महिलाओं की इस अयोग्यताको समाप्त किया. इस हिसाब से देखें तो महिलाओं को वकालत के पेशे में सक्रिय भूमिका निभाते अभी 100 साल भी पूरे नहीं हुए हैं. सन 2021 में, जब इसकी शताब्दी  मनाई जाएगी, तब तक क्या यह विश्वास और उम्मीद की जा सकती है कि न्याय व्यवस्था में लिंग भेद नहीं होगा?

सोचें .........................रात के 11.30 बज रहे हैं मैं तो चला सोने.

                     - मन मोहन जोशी “Mj


                       

मंगलवार, 7 मार्च 2017

दादुर बोल रहे हों जब .......राजद्रोह बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.



            


         "दादुर बोल रहे हों जब, तब कोयल का चुप रहना ठीक ,
          भाग्य अंततः सागर हो, तो धीमे धीमे बहना ठीक |"
                                                                          -मध्यम 
            
             हाल ही में गुलमेहर विवाद और रामजस college  में जो कुछ घटा और उसके बाद ट्विटर पर जिस तरह से तथाकथित celebrities छिछालेदर करते नज़र आये, एक बार फिर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक बहस का मुद्दा बन गई है.... एक बात तो समझ लेने जैसी है कि हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 हमें विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है.... लेकिन कोई भी व्यक्ति देश के खिलाफ नहीं बोल सकता (धारा  124 a IPC में अपराध), किसी धर्म के खिलाफ नहीं बोला जा सकता (अध्याय 15 IPC में अपराध ), किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं बोला जा सकता ( धारा 499-500  में अपराध)..... इसका सीधा सा  अर्थ यह निकलता है की हमारी बोलने की स्वतंत्रता आत्यंतिक अर्थात पूर्ण नहीं है इस पर निर्बन्धन यानी रोक लगाई  जा सकती है .. ऐसा नहीं है की बोलने की आज़ादी है तो कुछ भी अनर्गल बोलते रहें.....

            फिर समय – समय पर कन्हैया कुमार, असीम त्रिवेदी, लेखिका अरुंधती रॉय, डॉक्टर विनायक आदि पर राजद्रोह का आरोप लगता रहा है और फिर एक बहस में समाज के दो वर्ग बाँट जाते हैं .... ग़ौरतलब है कि जब भी इस तरह का मामला प्रकाश में आता है तो देश में इस बात को लेकर एक बड़ी बहस होती है कि यदि वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हरेक व्यक्ति का संवैधानिक अधिकार है, तो फिर सरकार या नेताओं की आलोचना करना, सरकारी नीतियों या प्रशासनिक अधिकारियों की बुराई करना या देश के खिलाफ कुछ बोलना अपराध  क्यों और कैसे है? ऐसे में, कुछ लोग तो अतिउत्साह में संबंधित कानूनों को ही पूर्णतया अनावश्यक करार दे देते हैं। उनका तर्क होता है कि लोकतंत्र में विरोध करना या अपनी बात कहना जनता का बुनियादी हक है और लोकतंत्र की सार्थकता इसी से सिद्ध होती है। फिर जनता द्वारा निर्वाचित सरकार किस आधार पर अपने ही नागरिकों को देशद्रोही साबित करने हेतु औपनिवेशिक कानून का पोषण करती है, जबकि इस मामले में सरकार के तर्क में मुख्य चिंता उग्रवादियों, आतंकवादियों और किसी भी प्रकार के अतिवाद से उत्पन्न होने वाले खतरे से देश को बचाए रखने की होती है।

              दरअसल Indian penal code-1860 में देश द्रोह नाम का कोई अपराध है ही नहीं... sec 124 a में राजद्रोह नाम से अपराध है ...... राज द्रोह अर्थात राजा से द्रोह कौन सा राजा ?? वही जो ब्रिटेन में बैठ कर पूरी दुनिया पर अपनी हुकुमत चला रहा था .... आईपीसी की धारा “124 क” के अनुसार, "बोले या लिखे गए शब्दों या संकेतों द्वारा या दृश्य प्रस्तुति द्वारा जो कोई भी भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा या पैदा करने का प्रयत्न करेगा, असंतोष उत्पन्न करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, वह आजीवन कारावास या तीन वर्ष तक के कारावास से  और जुर्माने से  दंडित किया जाएगा।" 

स्पष्टिकरण: इस धारा में असंतोषशब्द के अंतर्गत अभक्ति (Disloyalty) और शत्रुता (Enmity) की सभी भावनाएँ आती हैं। किंतु घृणा, अवमान या असंतोष उत्तेजित किये बिना वैधानिक साधनों से सरकार की प्रशासनिक या अन्य प्रक्रिया के प्रति असंतोष प्रकट करने वाली टीका-टिप्पणियाँ अपराध नहीं मानी जाती हैं।

              अब प्रश्न यह उठता है कि Freedom of expression के अधिकार के तहत यदि सरकार के खिलाफ जनता को विरोध या विद्रोह के लिये उकसाया जाता है या गदर को प्रोत्साहित किया जाता है  जैसे, आए दिन कश्मीर या उत्तर-पूर्वी राज्यों में भारत सरकार के प्रति विरोधी स्वर उभरता है और कई दफा यह हिंसात्मक रूप ले लेता है। इसके अलावा, देश के विभिन्न हिस्सों में नक्सली या माओवादी ताकतें भी व्यवस्था विरोधी क्रियाकलापों के जरिये आंतरिक सुरक्षा के लिये गंभीर खतरा उत्पन्न करती हैं। ऐसे में, राजद्रोह को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखना और इसके लिये आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान करना क्या गलत है?

               शासन चाहे राजतंत्रात्मक हो अथवा औपनिवेशिक, संघात्मक हो अथवा साम्यवादी, हर प्रकार की व्यवस्था में शासन के खिलाफ आवाज उठाना दंडनीय अपराध माना जाता रहा है। भारत में भी प्राचीन और मध्यकाल में यह किसी-न-किसी रूप में मौजूद था। आधुनिक काल में, अंग्रेजी शासन के दौरान लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में प्रथम विधि आयोग (Law Commission) ने 1837 में जो कानूनी मसौदा  तैयार किया था, उसकी धारा 113 के अधीन राजद्रोह संबंधी कानूनी प्रावधान डाला गया। 1860 में भारतीय दंड संहिता बनाई गई तो धारा 113 को हटाकर राजद्रोह संबंधी प्रावधानों को धारा 124 A के अंतर्गत स्थान दिया क्यूंकि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश शासन को राजद्रोह संबंधी प्रावधानों को दंड के साथ अमल में लाना आवश्यक जान पड़ा। हिंसक बहावी आंदोलन को कुचलने में इस धारा का खूब इस्तेमाल किया गया। आगे 1898 में इस कानून में संशोधन किया गया। इस बीच नाट्य प्रदर्शन अधिनियम, 1876 और वर्नाकुलर प्रेस एक्ट, 1878 जैसे कानूनों ने भी भारतीय जनता की वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीनने का ही काम किया। औपनिवेशिक दौर में बने इस प्रकार के दमनकारी कानून जनविरोधी अंग्रेजी सत्ता की रक्षा के लिये बने थे। अंग्रेजों के खिलाफ बोलना या अंग्रेजी शासन पर किसी माध्यम से (प्रेस, भाषण, चित्र आदि द्वारा) सवाल उठाना दंडनीय अपराध था। फिर भी राष्ट्रभक्त लोगों ने यह खतरा मोल लिया और ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद की। बाल गंगाधर तिलक (1897) और महात्मा गांधी (1922) जैसे लोगों पर भी राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया। 

               जो प्रश्न बहस के दौरान तिलक ने अदालत में उठाया था, वह प्रश्न धारा 124 A को लेकर आज भी एक सार्वभौमिक प्रश्न है। तिलक ने पूछा था कि यह ब्रिटिश भारतीय सरकार के खिलाफ लोगों का राजद्रोह है या भारतीय लोगों के खिलाफ सरकार का देशद्रोह?

              पिछले दिनों मोदी सरकार ने कुछ पोर्न sights को ban कर दिया था तब भी देश के तथाकथित बुद्धिजिवियों  ने एक स्वर में इस कदम को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया था | मुझे समझ में नहीं आता की ऐसी sights पर क्या अभिव्यक्त किया जा रहा है और कैसे इन sights पर ban लगाने पर तथाकथित बुद्धिजिवी वर्ग की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन हो जाता है???

सोचें ..................................

              अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जहां बात आती है तो मुझे लगता है :

“ऐसी वैसी बातों से तो खामोशी ही बेहतर है , 
या फिर ऐसी बात करो जो ख़ामोशी से बेहतर है |”

                       -मन मोहन जोशी “मन”


सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

Flight Number 6E 708

19-February-2017



              स्वामी विवेकानंद एअरपोर्ट, माना, शाम 5.00 बजे ....... अनाउंसमेंट सुनाई पड़ती है की इंदौर के लिए उड़ान भरने वाले यात्री जो उड़ान संख्या 6E 708 से उड़ान भरने वाले हैं गेट नंबर 6 पर पहुँच जाएं...... मैं गेट नंबर 6 पर पहुँच गया हूँ.... सामने कुछ लोग हैं और पीछे भी लम्बी लाइन है.... पीछे से कुछ लड़कों के हंसने की आवाजें आ रही हैं... शायद कॉलेज का कोई ग्रुप है.... सामने एक लड़की को CISF का सिपाही रोक लेता है... पीछे से लड़कों का कमेंट आता है मैडम की स्पेशल चेकिंग चल रही है क्या ???... गार्ड कहता है कि आपके बैग में जो टैग लगा है उसमें सील नहीं लगी है आप सील लगवा आयें... फिर लड़कों का एक तीखा कमेंट और ज़ोरों से हंसने की आवाज़... मुझे नहीं पता की उस लड़की तक लड़कों की आवाज़ पहुंची या नहीं... मुझ तक तो पहुंची... मैं पीछे मुड़कर उनको घूरता हूँ... लड़कों के कमेंट तो बंद हो गए हैं लेकिन रूक-रूक कर उनकी जोर से हंसने की आवाजें आ रही हैं... मैं अपनी सीट पर पहुँच गया हूँ... सोचता हूँ इतनी टाइट सिक्यूरिटी और एअरपोर्ट जैसी जगह पर जो लड़के कमेंट करने से नहीं चूक रहे वो किसी एकांत गली में “बेंगलुरु” करने से भी नहीं चुकेंगे |

                    हम सबने पढ़ा है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवताः” मेरे मन में हमेशा प्रश्न उठता रहा है, तत्र क्यूँ रमन्ते देवता ??? देवता वहां क्यूँ निवास करते हैं जहां नारी की पूजा होती है ?? मुझे लगता है देवताओं को वहाँ होना चाहिए जहां नारी मात्र का अपमान हो रहा हो ताकि नारी के सम्मान की रक्षा की जा सके...
                    
                     बहरहाल क्या इन सबके पीछे कोई पुरुषवादी मानसिकता जैसी चीज़ है? मेरे देखे नहीं यहाँ सिर्फ एक ही सिद्धांत काम करता है वो है अधिक ताकतवर द्वारा कम ताकतवर को दबाने की कोशिश... अभी पुरुषों का वर्चश्व है तो महिलाओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है | जब महिलाओं का वर्चश्व होगा तो पुरुषों को परेशानियों का सामना करना पड़ेगा....सिंपल है| एक उदाहरण से समझते हैं..... हम जब बॉयज स्कूल में पढ़ते थे तब लड़कों का एक समूह किसी ऐसे लड़के को परेशान करने में लगा रहता था जो कमजोर है या जो किसी ग्रुप का भाग नहीं है..... लड़के कमेंट करने के लिए लड़कियों को ढूंढने नहीं जाते थे.... ये जो कम ताकतवर को दबाने या डराने की मानसिकता वाले लोग हैं ऐसे लोगों के बारे में  ही खलील जिब्रान ने कहा है कि इनके अंदर घास फूस भरा होता है | ऐसे लोगों को काक भगोड़े की संज्ञा दी है महान दार्शनिक ने | क्यूंकि डराने का काम तो काक भगोड़ा ही करता है....
  
                  आज कल टीवी पर एक विज्ञापन दिखाया जा रहा है जिसका पञ्च लाइन है जितनी ज्यादा महिलायें होंगी समाज उतना ज्यादा सुरक्षित होगा.... फिर एक ग़लत बात लोगों के दिमाग में डाली जा रही है..... मेरे देखे कोई भी व्यक्ति किसी लिंग, जाति, धर्म, भाषा, देश या समुदाय विशेष से आने के कारण  अच्छा या बुरा नहीं हो जाता.... उसका अच्छा या बुरा होना केवल उसकी मानसिकता पर निर्भर करता है | 

कहा भी गया है: “न सूरत बुरी है न सीरत बुरी है , बुरा है वही जिसकी नियत बुरी है.... 

                        -मन मोहन जोशी "मन"