Diary Ke Panne

रविवार, 10 सितंबर 2017

"न चौर हार्यम न च राज हार्यम" - शिक्षा का अधिकार


10 September 2017


                कल रात TV पर एक फिल्म देख रहा था जिसकी समीक्षा दैनिक भास्कर में कभी पढ़ी थी... फिल्म का नाम था हिंदी मीडियम. फिल्म में शीर्षक भूमिका में इरफ़ान खान हैं. इरफान मेरे फेवरेट एक्टर हैं. इरफ़ान की "पान सिंह तोमर  और लाइफ ऑफ़ पाई दर्शनीय फ़िल्में हैं... जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है.

               बहरहाल दिल्ली में रहने वाले एक अमीर परिवार की कहानी के जरिये लेखक और निर्देशक साकेत चौधरी ने दिखाया है कि अंग्रेजी बोलने वालों को "क्लासी"  माना जाता है और हिंदी बोलने वालों को दोयम दर्जा दिया जाता है... जबकि मेरे देखे भाषा केवल सम्प्रेषण का माध्यम है... बाबा राम देव को कौन दोयम दर्जे का मानता है?? अटल बिहारी बाजपाई को किसने दोयम दर्जे का कहा है ?? मनमोहन सिंह और राहुल गांधी किसे क्लासी लगते हैं ?? अर्थात भाषा किसी को "क्लासी" नहीं बनाती, "कर्म" बनाता है.   

              अच्छे स्कूलों में एडमिशन की मारामारी हर शहर की परेशानी है.  स्कूलों में दाखिले का मुद्दा तो हर बार मीडिया की बड़ी हेडलाइंस बनता रहा है. मुट्ठी भर कॉन्वेंट स्कूलों की थोड़ी सी सीट्स के लिए कैसे डोनेशन, सिफारिश और कोटे का खेल होता है उसी स्टोरी को लेकर ये फिल्म आगे बढ़ती है. मेरे देखे केंद्र और राज्य सरकारों की असफलता के मानक हैं ये प्राइवेट स्कूल्स. अपनी असफलता को ढंकने के लिए ही केंद्र सरकार 2009  में शिक्षा का अधिकार क़ानून लेकर आई... इस क़ानून के प्रावधान कहीं से कहीं तक शिक्षा को बढ़ावा देने वाले नहीं दिखते...

               इस अप्रैल में शिक्षा अधिकार कानून लागू हुए सात साल पूरे हो चुके हैं. एक अप्रैल 2010 को "शिक्षा का अधिकार कानून 2009"  पूरे देश में लागू किया गया था. इसी के साथ ही भारत उन  देशों की जमात में शामिल हो गया था, जो अपने देश के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा  उपलब्ध कराने के लिए कानूनन जबावदेह हैं.

                भारत ने शिक्षा के अधिकार को लेकर एक लम्बा सफ़र तय किया है, इसीलिए इससे बुनियादी शिक्षा में बदलाव को लेकर व्यापक उम्मीदें भी जुड़ी थीं. लेकिन इस अधिनियम के लागू होने के सात वर्षों के बाद भी हमें कोई बड़ा परिवर्तन देखने को नहीं मिला है. लक्ष्य रखा गया था कि 31 मार्च 2015 तक देश के 6 से 14 साल तक के सभी बच्चों तक बुनियादी शिक्षा पहुंचा दी जाएगी और इस दिशा में आ रही सभी रुकावटों को दूर कर लिया जाएगा. लेकिन यह डेडलाइन बीत जाने के बाद अभी तक ऐसा नहीं हो सका है और हम लक्ष्य से बहुत दूर हैं.

                अभी भी देश के 92 प्रतिशत स्कूल, इस कानून के सभी मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं. केवल 45 प्रतिशत स्कूल ही प्रति 30 बच्चों पर एक टीचर होने का अनुपात पूरा करते हैं. पूरे देश में अभी भी लगभग 7 करोड़ से भी ज्यादा बच्चे प्राथमिक शिक्षा से बेदख़ल हैं. 2013-14 की एक रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा के अधिकार कानून के मापदंड़ों को पूरा करने के लिए अभी भी 12 से 14 लाख शिक्षकों की आवश्यकता है. आरटीई फोरम की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 51.51, छत्तीसगढ़ में 29.98, असम में 11.43, हिमाचल में 9.01, उत्तर प्रदेश में 27.99, पश्चिम बंगाल में 40.50फीसदी शिक्षक प्रशिक्षित नहीं हैं. इसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है. और जो शिक्षक हैं उनकी गुणवत्ता पर भी प्रश्न चिन्ह है....

               सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा लगातार जारी रिपोर्ट शिक्षा में घटती गुणवत्ता की तरफ हमारा ध्यान खीचते हैं. रिपोर्ट बताते हैं कि किस तरह से छठीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को कक्षा एक और दो के स्तर की भाषायी कौशल एवं गणित की समझ नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि कहीं शिक्षा का अधिकार कानून मात्र बच्चों को स्कूल में प्रवेश कराने और स्कूलों में बुनियादी सुविधायें उपलब्ध कराने का कानून तो साबित नहीं हो रहा है ?  यह कहना गलत नहीं होगा कि इस दौरान सरकारों ने सिर्फ नामांकन, अधोसंरचना और पच्चीस प्रतिशत रिजर्वेशन पर जोर दिया है. पढाई की गुणवत्ता को लगातार नजरअंदाज किया गया है. 

                मध्य प्रदेश के सन्दर्भ में बात करें तो, डाइस रिर्पोट 2013-14  के अनुसार प्रदेश के शासकीय प्राथमिक शालाओं में शिक्षकों का औसत 2.5 है, जो कि देश में सबसे खराब है. म.प्र. के प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों के लगभग एक लाख पद रिक्त हैं. 5295 विद्यालय ऐसे हैं, जहां शिक्षक ही नहीं हैं, जबकि 17 हजार 972  शालायें केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रही हैं.

               एक रिपोर्ट के अनुसार 2009 में मध्य प्रदेश की शासकीय शालाओं में कक्षा 5 के 76 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ लेते थे, लेकिन 2014 की रिर्पोट यह में घट कर 27.8 प्रतिशत हो गई है. अगर बच्चों में घटाव तथा भाग देने की स्थिति को देखें तो 2009 में शासकीय शालाओं में कक्षा 3 के 66.7 प्रतिशत बच्चे घटाव तथा भाग देने के सवाल हल कर लेते थे, जबकि 2014 में यह दर घट कर 5.7 प्रतिशत हो गई.

               एक तरफ उपरोक्त स्थितियां हैं, तो दूसरी तरफ जिस तरह से `शिक्षा अधिकार कानूनको लागू किया जा रहा है. उनसे भी कुछ समस्याएं निकल कर आ रही है. मेरे देखे  यह मात्र प्रशासनिक लापरवाही या सरकारों की उदासीनता का मसला नहीं है. कानून में भी कई  नीतिगत समस्याएं हैं. अगर इन समस्याओं को दूर कर लिया जाए जाए, तो हालत में कुछ सुधार की उम्मीद की जा सकती है.

              पहला मुद्दा है शिक्षकों की संख्या और योग्यता. शिक्षा अधिकार कानून में इसके लिए  विशेष प्रावधान तय किए गए हैं, किन्तु इन प्रावधानों का पालन नही हो पा रहा है. यहां कई स्तर के शिक्षक मौजूद हैं, जिन्हें सहायक शिक्षक, अध्यापक संवर्ग, शिक्षा कर्मी और संविदा शिक्षक के नाम से जाना जाता है. इस सबंध में विशेष वित्तीय प्रावधान लागू करते हुए पूर्णकालिक शिक्षकों की नियुक्ति किए जाने की आवश्यकता है.

             दूसरा मुद्दा शिक्षा के अधिकार कानून की सीमाओं से सम्बंधित है,जैसे इस कानून में छः साल तक के आयु वर्ग के बच्चों की कोई बात नहीं कही गई है, यानी बच्चों के प्री-एजुकेशन को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है.

            तीसरा मुद्दा अनिवार्य शिक्षा या शिक्षा के सामान अवसर के तहत सिर्फ प्राइवेट स्कूलों में 25 फीसदी सीटों पर कमजोर आय वर्ग के बच्चों के आरक्षण की व्यवस्था की गई है. इससे सरकारी शालाओं में पढ़ने वालों का भी पूरा जोर प्राइवेट स्कूलों की ओर हो गया है. यह एक तरह से गैर बराबरी और शिक्षा के बाजारीकरण को बढ़ावा देता है. जिनके पास थोड़ा-बहुत पैसा आ जाता है वे भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर हैं, लेकिन जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर हैं उन्हें भी इस ओर प्रेरित किया जा रहा है.

                देश के विभिन्न राज्यों में भी सरकारी स्कूलों को बंद करके सरकारें ही शिक्षा के इस निजीकरण की प्रक्रिया को मजबूत बना रही है. नेशनल कोलिएशन फॉर एजुकेशन की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में 17120 महाराष्ट्र 14 हजार, गुजरात 13 हजार, कर्नाटका 12 हजार और आंध्रप्रदेश में 5 हजार स्कूलों को बंद किया जा चुका है. कुछ अन्य राज्यों में भी सरकारी स्कूलें बंद की गई हैं और की जा रही हैं.

                  इससे पहले सन 1993 में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक क्रांतिकारी फैसले से तत्कालीन सरकार को जगाया. न्यायालय ने कहा कि संविधान में जीवन के अधिकार का अर्थ तो तभी है जब व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार मिला हो. इस फैसले के तहत सरकार को 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा का अधिकार देना आवश्यक था. मजबूर होकर कांग्रेस सरकार ने "सैकिया कमेटी" का गठन किया जिसने 1997 में संविधान में उपयुक्त बदलाव करने का सुझाव दिया.

                  सन 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने संविधान में उपयुक्त बदलाव कर 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया. साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता, अध्यापकों के वेतनमान, आदि अन्य सुविधाओं के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता से बचा गया. यहाँ तक की बच्चों की शिक्षा के लिए अभिभावकों का  मूल कर्त्तव्य बनाकर जिम्मेवार ठहराया गया.

                  किसी भी देश का शिक्षा क्षेत्र व्यवसाय के अलावा भी बहुत कुछ होता है. संयुक्त राष्ट्र ने 1948 के मानव अधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा पत्र में शिक्षा के अधिकार को एक मानव अधिकार घोषित किया गया है. वैसे स्वर्गीय गोपाल कृष्ण गोखले ने 18 मार्च 1910 में ही भारत में "मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा" के प्रावधान के लिए ब्रिटिश विधान परिषद् के समक्ष प्रस्ताव रखा था, जो निहित स्वार्थों के विरोध के चलते अंततः ख़ारिज हो गया.

                 एक सुभाषित के अनुसार शिक्षा या विद्या सर्वश्रेष्ठ संपत्ति है जिसे चुराया नहीं जा सकता, इसका भाइयों में बंटवारा नहीं होता, सरकार इस पर GST नहीं लगा सकती, यह भारकारी भी नहीं होता और खर्च करने पर लगातार बढ़ता ही जाता है :

"न चौर हार्यम न च राज हार्यम,
न भ्रात्रभाज्यम न च भारकारी ।
व्यये कृते वर्धते नित्यं,
विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम् ।।"



                                  -       मनमोहन जोशी “Mj”



बुधवार, 6 सितंबर 2017

जातस्य ही ध्रुवो मृत्यु....



06 September 2017 

                  देखो हमारी कॉलोनी में कौन आया है... सुबह श्रीमती जी ने आवाज़ देकर उठाया... आँख मलता हुआ उठता हूँ कौन आया है भई ?? कौवा आया है अभी एक दिखा था और एक ऊपर छत पर बैठा है देखो, वो कौवे को दिखाते हुए कहती है... हम्म, मैं कहता हूँ, इसका मतलब न्यू रानी बाग़ का ईको सिस्टम ठीक है क्यूंकि पुरे इंदौर शहर में कौवे नहीं दीखते... वो  कहती है कौवे का दिखना इसलिए भी खास है क्यूंकि आज से पितृ पक्ष शुरू हो रहा है और कहते हैं की पितृ गण कौवे के रूप में आते हैं.

                    बात चल ही रही थी की ऑफिस से कॉल आता है, “सर, शेर सिंग (ऑफिस का चौकीदार) बेहोश हो गया है”... मैं कहता हूँ उसे हॉस्पिटल ले जाओ मैं थोड़ी देर में आता हूँ.. जल्दबाजी में नहाने जाता हूँ... जैसे ही बाथ रूम से बाहर आता हूँ फ़ोन की घंटी बजनी शुरू हो जाती है... एक कॉल मैंने मिस कर दिया है... फिर से कॉल आ रहा है... मित्र सुनील तिवारी लाइन पर हैं कहते हैं शेर सिंह नहीं रहा... तुरंत गुर्जर हॉस्पिटल में आ जाओ.

                     मैं जल्दी से कपड़े पहन कर निकल जाता हूँ ... कल ही तो मिला था शेर सिंह, हमेशा की तरह हँसता हुआ... कल मिला तो बोला- सर, आज शिक्षक दिवस है आशीर्वाद दीजिये.और आज वो हमारे बीच नहीं है.... यही है जीवन की क्षणिकता.

अटल जी की कविता के कुछ शब्द याद आ रहे हैं :

" जो कल थे,
वे आज नहीं हैं।
जो आज हैं,
वे कल नहीं होंगे।
होने, न होने का क्रम,
इसी तरह चलता रहेगा,
हम हैं, हम रहेंगे,
यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।
सत्य क्या है?
होना या न होना?
या दोनों ही सत्य हैं?
जो है, उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।
मुझे लगता है कि
होना-न-होना एक ही सत्य के
दो आयाम हैं,
शेष सब समझ का फेर,
बुद्धि के व्यायाम हैं।"

                         मुझे याद आता है, मृत्यु से मेरा परिचय बहुत पुराना है. किशोर से युवा होते हुए कई लोगों की मृत्यु को करीब से देखा. दादी, नाना , नानी, बाबा (ताऊ जी) उनमें ख़ास थे... और इन सबमें भी बाबा मेरे सबसे करीब थे जिनके  जाने के बाद मैं कई रातों तक नहीं सोया...  मुझे नींद में लगता जैसे वो मुझे पुकार रहे हैं बब्बू”.... यही वो नाम था जिससे वो मुझे पुकारते थे. उनकी मृत्यु गाँव के कुँए में डूब कर हुई थी... वहाँ से उनकी लाश दूसरे दिन निकाली जा सकी थी...मृत्यु से दो दिन पहले किसी बात पर झगड़ कर वो गाँव जा रहे थे... उनके झगडे से होने वाले कोलाहल से मैं परेशान था... जाने से पहले मुझसे मिलने आये कहा गाँव जा रहा हूँ ये पैसे कितने हैं गिन दो, जो गाडी वाले को देना है वो अलग कर दो और बाकी पैसा अलग... मैंने वैसा कर दिया... लेकिन ठीक से बात नहीं की.. वो बोले मैं जा रहा हूँ अब वापस नहीं आऊंगा... मैंने बैठे ही बैठे कहा था ठीक है मत आना... और वो चले गए कभी ना आने के लिए...

                      वो कहते थे कि बब्बूमेरा भगवान् है... मैं भाइयों में सबसे छोटा था खेल में अक्सर मेरी हार होती थी. लेकिन अगर वो खेल के बीच में आ जाएँ तो मेरा संबल कई गुना हो जाता था क्यूंकि वो कहते, तुम इसको हरा ही नहीं सकते भले मैं हार रहा होऊं, वो कहते थे यही जीतेगा... 

                     उनके जाने के पश्चात्  मैंने लगातार  मृत्यु और उसके रहस्य को जानने की कोशिशें की... पुट्टपर्ती के सत्य साईं बाबा के पास (जब वो जीवित थे )  आश्रम में एक माह रहा. रजनीश की मैं "मृत्यु सीखता हूँ" और "कठोपनिषद"  कई बार पढ़ी... मृत्यु के पार”, “आत्मा रहस्य” , “गरुड़ पुराणऔर न जाने कितनी ही किताबें पढ़ डालीं... भगवद्गीता  पढता रहता हूँ जिससे रहस्य कुछ खुलता हुआ सा मालूम पड़ता है.....

एक बात तय है जो जन्मा है वो मरेगा.. जो बना है वो मिटेगा... इसीलिए जब भी किसी से मिलें ऐसे मिलें जैसे अंतिम बार मिल रहे हों... प्रेम पूर्वक , श्रद्धा पूर्वक... श्रीकृष्ण कहते हैं :

“ जातस्य ही ध्रुवो मृत्युध्रुवम् जन्म मृतस्य च |
 तस्माद् अपरिहार्येर्थेन त्वम् शोचितुमर्हसि ||” 

अर्थात: “ जो जन्म लेता हैउसकी मृत्यु अवश्य होती है । और मृत्यु के बाद जन्म अवश्य होता है । जिसमें कोई परिवर्तन न हो सके ऐसी यह कुदरती व्यवस्था है । अतः किसी की मृत्यु पर शोक करना तेरे लिए उचित नहीं है । 
   
                  जो भी हो मेरे देखे जीवन की खूबसूरती मृत्यु से है... कमाल यह है की जाने का समय तय नहीं है... और उस पर तुर्रा यह की सब कुछ यहीं छोड़ कर जाना है... सब कुछ मतलब सब कुछ!!!!!


                                     - मनमोहन जोशी " Mj" 

विध्वंस और निर्माण जिसकी गोद में खेलते हैं......


                                                       05 September 2017


                रात के 10 बज कर 55  मिनट हो रहे हैं... आज दो कारणों से दिन विशेष रहा एक तो गणपति जी  की विदाई, अनंत चौदस के रूप में और दूसरा शिक्षक दिवस... मेरे कई कार्य रूपों में से एक महत्वपूर्ण रूप शिक्षक का भी है.

              शिक्षण कार्य कब से कर रहा हूँ ठीक ठीक याद कर पाना कठिन है.... लेकिन याद आता है कि जब मैं कक्षा 5 में पढता था , श्री गुप्ते सर हमारे क्लास टीचर हुआ करते थे और वो मेथमेटिक्स पढ़ाते  थे..... अक्सर वो क्लास मेरे भरोसे छोड़ जाते थे कि ये वाला चैप्टर मन मोहन समझा देगा..... या हिंदी वाली मैडम ये कह कर क्लास के बाहर चली जाती थी की प्रश्नोत्तर लिखवा देना.... फिर मैंने जैसे ही स्कूल की पढ़ाई पूरी की और बीएससी में दाखिला लिया, खुद का कोचिंग इंस्टिट्यूट MM Tutorials शुरू कर लिया था...... लगभग 6 वर्ष फाइनेंसियल  सेक्टर में जॉब करने के बाद  वापस से एजुकेशन फील्ड ज्वाइन करना शायद मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन निर्णयों में से एक रहा है......

             कौटिल्य ने कहा है, “शिक्षा और शिक्षक दोनों ही साधारण नहीं होते .. विध्वंस और निर्माण दोनों शिक्षक की गोद में खेलते हैं ”.  शिक्षण-कार्य की प्रक्रिया का विधिवत अध्ययन शिक्षाशास्त्र या शिक्षणशास्त्र  कहलाता है. शिक्षण एक सजीव गतिशील प्रक्रिया है. इसमें अध्यापक और शिक्षार्थी के मध्य अन्त:क्रिया होती रहती है और सम्पूर्ण अन्त:क्रिया किसी लक्ष्य की ओर उन्मुख होती है. शिक्षक और शिक्षार्थी शिक्षाशास्त्र के आधार पर एक दूसरे के व्यक्तित्व से लाभान्वित और प्रभावित होते रहते हैं और यह प्रभाव किसी विशिष्‍ट दिशा की और स्पष्ट रूप से अभिमुख होता है. बदलते समय के साथ सम्पूर्ण शिक्षा-चक्र गतिशील है. उसकी गति किस दिशा में हो रही है? कौन प्रभावित हो रहा है? इस दिशा का लक्ष्य निर्धारण शिक्षाशास्त्र करता है.

              प्रत्येक शिक्षक की हार्दिक इच्छा होती है कि उसका शिक्षण प्रभावपूर्ण हो. इसके लिये शिक्षक को कई बातों को जानकर उन्हे व्यवहार में लाना पड़ता है, जैसे -  आरम्भ कहां से करना है , कैसे करना है , छात्र इसमें रुचि ले रहे हैं या नहीं , अर्जित ज्ञान को छात्रों  के लिये उपयोगी कैसे बनाया जाय, आदि.
शिक्षण के अनेक सिद्धांत प्रतिपादित किये गए है जैसे :

1. क्रिया द्वारा सीखने का सिद्धान्त
2. जीवन से सम्बद्धता का सिद्धान्त
3. कार्य कारण का सिद्धान्त
4. चुनाव का सिद्धान्त
5. विभाजन का सिद्धान्त
6 . पुनरावृत्ति का सिद्धान्त

कुछ शिक्षा शास्त्रियों ने शिक्षण के सूत्र भी प्रतिपादित किये हैं जिनमें से कुछ विशेष जो मुझे प्रिय हैं इस प्रकार हैं :

1. ज्ञात से अज्ञात की ओर चलो
2. सरल से कठिन की ओर चलो
3. स्थूल से सूक्ष्म की ओर चलो
4. अनुभव से तर्क की ओर चलो
5. पूर्ण से अंश की ओर चलो
6. विश्लेषण से संश्लेषण की ओर चलो

             साधारणतः शिक्षक और गुरु को एक ही अर्थ में लिया जाता है लेकिन मेरे देखे गुरु ज्यादा व्यापक व सम्मान पूर्ण शब्द है. शिक्षक की तुलना में कहीं बड़ा. वस्तुतः शिक्षक और शिक्षार्थी में मात्रा या जानकारी का ही भेद होता है जबकि गुरु और शिष्य में गुण का. गुरु गीता नामक ग्रंथ में विस्तार से गुरु का महत्व और महिमा पर चर्चा की गई है . इसके रचयिता वेद व्यास माने जाते हैं..... वास्तव में यह स्कन्द पुराण का एक भाग है जिसमें कुल 352  श्लोक हैं.

              वेद व्यास ने बड़ी सहजता से  शिव -पार्वती के संवाद के माध्यम से  गुरु कौन है?  उसका महत्व क्या है? कौन गुरु हो सकता है? उसकी कैसी महिमा है?, शिष्य की योग्यता, उसकी मर्यादा, व्यवहार, अनुशासन आदि प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा की है .... मेरे देखे इसे बीएड या एमएड  के पाठ्यक्रम में जोड़ा जाना चाहिए...

                गुरु गीता में विभिन्न प्रकार के गुरुओं का वर्णन है जैसे - 'सूचक गुरु', 'वाचक गुरु', बोधक गुरु', 'निषिद्ध गुरु', 'विहित गुरु', 'परम गुरु' आदि.

गुरुगीता के 34 वें श्लोक के अनुसार :

गुकारश्चान्धकारस्तु रुकारस्तन्निरोधकृत् |
अन्धकारविनाशित्वात् गुरुरित्यभिधीयते
 ||

अर्थात :गु कार अंधकार है और उसको दूर करनेवा ल रु कार है. जो अज्ञानता के अन्धकार को नष्ट कर दे वही गुरु है.

                                             - मनमोहन जोशी "Mj"

शनिवार, 26 अगस्त 2017

रोम जलता रहा .........




                       रोम के बारे में कहा जाता है कि जब पूरा रोम जल रहा था, तब सत्तासीन मूर्ख सम्राट नीरो बाँसुरी बजा रहा था. 1453 (ईसा पूर्व) यूरोप के रोम नगर में केन्द्रित एक साम्राज्य था. रोमन साम्राज्य में अलग-अलग स्थानों पर लातिन और यूनानी भाषाएँ बोली जाती थी और सन् 130 में इसने ईसाई धर्म को राजधर्म घोषित कर दिया था. यह विश्व के सबसे विशाल साम्राज्यों में से एक था. ऑक्टेवियन ने जूलियस सीज़र के सभी संतानों को मार दिया. इसके बाद ऑक्टेवियन को रोमन सीनेट ने ऑगस्टस का नाम दिया. ऑगस्टस के बाद टाइबेरियस सत्तारूढ़ हुआ और उसके बाद  कैलिगुला आया जिसकी सन् 41 में हत्या कर दी गई फिर परिवार का एक मात्र वारिस क्लाउडियस शासक बना.  इसके  बाद नीरो का शासन आया जिसके शासन काल में रोम पूरी तरह से बर्बाद हो गया और नीरो अपनी भोग विलासिता में व्यस्त रहा  .....
                        
                       यह घटना कहावतों में बदल चुकी है. लेकिन ऐसा नहीं हैं कि नीरो, रोम और अकेले रोम में ही पैदा होते हों. नीरो तो समान परिस्थिति वाले किसी भी देशकाल में पैदा हो सकता है. मनोहर खट्टर को हरियाणा का नीरो ही कहना उचित होगा.... जिस तरह से हरियाणा जलता रहा और पहले से यह पता होने के बावजूद कि निर्णय गुरमीत (बाबा और राम रहीम कहने में मुझे आपत्ति है इसीलिए केवल गुरमीत) के खिलाफ आने की स्थिति में माहौल बिगड़ सकता है... यह सब होने दिया गया ... मनोहर खट्टर नीरो से भी आगे निकल गए....

                        अभी 15 अगस्त को ही जब गुरमीत का जन्मदिन था, के  समारोह में मनोहर खट्टर की पूरी कैबिनेट उसे जन्मदिन की बधाई देने पहुंची और राज्य सरकार की ओर से रुपये 51 लाख भेंट में दिए. हद तो ये है की ये सारे संगठन टैक्स के दायरे में भी नहीं आते ... प्रश्न उठता है कि एक पंथ निरपेक्ष राज्य का मुख्य मंत्री किसी तथाकथित आरोपी बाबा के चरणों में जनता का पैसा रख आया और सब चुप्पी साधे हुए हैं.   

                        कुछ लोग मनोहर खट्टर के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. लेकिन इससे भी क्या होगा??  क्या हमारे पास मनोहर खट्टर का कोई विकल्प है? कांग्रेस हो या बीजेपी सभी सत्ताधीश इस ढोंगी बाबा के सामने हाथ पसारे खड़े रहे हैं... क्या न्याय पालिका के शासन जैसी कोई व्यवस्था हो सकती है?? क्या सत्ता, न्याय पालिका को कुछ समय के लिए सौंपी जा सकती है?? कई प्रश्न हैं जिनके उत्तर तलाशने होंगे....

                      इस पुरे मामले में सीबीआई ने 7 पीड़ित महिलाओं (जो यौन शोषण का शिकार हुई थी) के बयानों के आधार पर मामला बनाया था जिसमें से पांच, धमकियों और दबावों के आगे टूट गईं. लेकिन दो महिलायें पीछे नहीं हटी और उनकी 15 वर्षों की लड़ाई की परिणीती आखिर उनके जीत के रूप में हुई.... दोनों शक्ति स्वरूपा महिलाओं को प्रणाम ....

                      दूसरी महती भूमिका न्याय पालिका ने निभाई .... हाई कोर्ट लगातार मामले पर नज़र बनाए हुए था और सीबीआई के विशेष न्यायाधीश श्री जगदीप सिंह ने साहस के साथ मामले की सुनवाई की और निर्णय तक पहुंचे......  Do you understand section 144? हाई कोर्ट के जज ने सख्त लहजे में हरियाणा के DGP से पूछा. Yes your honour, DGP ने जवाब दिया..  हाई कोर्ट जज ने टिप्पणी की, अगर धारा 144  लागू है तो फिर ये लाखों लोग पंचकुला में कैसे इकट्ठे हो गए 

                    क्या हुआ होगा जब गुरमीत सिंह अपने काफिले के साथ कोर्ट के लिए रवाना हुआ होगा... लाखों लोगों व सरकारों का खुला समर्थन, विभिन्न मठाधीशों व केंद्र की सरकार का मौन समर्थन उसके साथ था. वहीँ एक साधारण जज एक असाधारण कार्य के लिए किस दृढ़ता से तैयार हुआ होगा? बिना किसी काफिले के वह अपने ऑफिस पहुंचा होगा.... उसकी मनः स्थिति क्या रही होगी?? कितने दबावों से वह गुजरा होगा?? रात भर नींद आई होगी या नहीं ??? जो निर्णय दिया उससे उसके अद्वितीय साहस का पता चलता है..... हमने साहस और वीरता के बहुत ही क्षुद्र प्रतिमान गढ़ रखे हैं. बहरहाल लगातार सख्त होते हाई कोर्ट और सीबीआई के स्पेशल कोर्ट ने अपने निर्णय से न्याय का गर्भपात होने से बचा लिया... अब इंतज़ार है सजा सुनाये जाने के दिन का ... देखना ये है कि न्याय होता है या  होते हुए दीखता भी है .....
    
                     न्याय के संबंध में शुरुआती विवरण प्राचीन यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो की पुस्तक रिपब्लिकमें मिलता है. प्लेटो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक रिपब्लिकमें विभिन्न व्यक्तियों के मध्य हुए लम्बे संवादों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि हमारा न्याय से सरोकार होना चाहिए. रिपब्लिक के केंद्रीय प्रश्न व उपशीर्षक न्याय से ही सम्बंधित हैं, जिनमें वह न्याय की स्थापना हेतु व्यक्तियों के कर्तव्य-पालन पर जोर देते हैं.

                     प्लेटो कहते हैं कि मनुष्य की आत्मा के तीन मुख्य तत्त्व हैं – 1) तृष्णा  2) साहस 3) बुद्धि. यदि किसी व्यक्ति की आत्मा में इन सभी तत्वों को समन्वित कर दिया जाए तो वह मनुष्य न्यायी बन जाएगा। ये तीनों गुण कुछेक मात्रा में सभी मनुष्यों में पाए जाते हैं लेकिन प्रत्येक मनुष्य में इन तीनों गुणों में से किसी एक गुण की प्रधानता रहती है। न्यायाधीश में ये तीनों ही गुण होने चाहिए. फिलहाल न्यायाधीश श्री जगदीप सिंह इस परिभाषा में खरे उतरते नजर आ रहे हैं.....

                                         मनमोहन जोशी "Mj"

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

गजाननं भूतगणाधिसेवितम् - घरेलु गणेशोत्सव


"गजाननं भूतगणाधिसेवितम् ,कपित्थ-जम्बू-फल-चारु-भक्षणम् |
उमासुतं शोक-विनाश-कारकम्
,नमामि विघ्नेश्वर-पाद-पङ्कजम् ||"

            वैसे तो बचपन में सभी त्यौहार हमें प्रिय थे (अभी भी हैं) लेकिन गणेशोत्सव उन सबमें प्रमुख था...... मैं विभिन्न प्रबंधकीय पदों पर रहा हूँ और प्रबंधन में मास्टर्स डिग्री भी की है. लेकिन लगता है की प्रबंधन का जो प्रैक्टिकल नॉलेज गणेशोत्सव के प्रबंधन में बचपन में मिला वही अभी तक काम आ रहा है.... MBA की पढाई के दौरान जो सैद्धांतिक जानकारी मिली उसके बीज बचपन में बोये जा चुके थे .

            गणेशोत्सव की तैयारियां बहुत ही पहले से शुरू हो जाती थी... एक उच्च शक्ति प्राप्त कमिटी का गठन किया जाता था जिसका नाम होता था “घरेलु गणेश उत्सव समिति” अध्यक्ष होते थे बड़े भैया और वो ही अन्य पदों का बंटवारा करते थे...... हम चंदे से लेकर स्पोंसर तक का प्रबंध कर लेते थे.... गणेश विग्रह के स्पोंसर होते थे पापा, प्रसाद मम्मी तैयार कर देती थी, और सजावटी सामान के स्पोंसर होते थे बाबा ( ताऊ जी ) .....

           हमारा गणेश उत्सव “पोला” से शुरू होता था और अनंत चौदस तक चलता था (शायद भारत का सबसे लम्बा चलने वाला गणेशोत्सव).

           गणपति के जन्म के सम्बन्ध में अनेक आख्यान पढ़े हैं . गीता प्रेस गोरख पुर द्वारा प्रकाशित गणेश अंक गणेश जी के बारे में सम्पूर्ण प्रकाश डालता है . एक अप्रचलित आख्यान के अनुसार शनि की दृष्टि पड़ने से शिशु गणेश का सिर जल कर भस्म हो गया. 'मेरा पुत्र!' जगदम्बा का स्नेह रोष में परिणत हो गया. पुत्र का शव देखकर माता कैसे शान्त रहे.  दुःखी पार्वती से ब्रह्मा ने कहा जिसका सिर सर्वप्रथम मिले उसे गणेश के सिर पर लगा दो. देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की.  एक गजराज का नवजात शिशु मिला उस समय. उसी का मस्तक पाकर वह बालक गजानन हो गया. अपने अग्रज कार्तिकेय के साथ संग्राम में  एक दाँत टूट गया और तबसे गणेश जी एकदन्त हैं।

           गणेश भारत के अति प्राचीन देवता हैं। ऋग्वेद व यजुर्वेद में गणपति शब्द का उल्लेख मिलता है । अनेक पुराणों में गणेश की विरुदावली वर्णित है। पौराणिक हिन्दू धर्म में शिव परिवार के देवता के रूप में गणेश का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

           पद्म पुराण के अनुसार एक बार श्री पार्वती जी ने अपने शरीर के मैल से एक पुरुषाकृति बनायी, जिसका मुख हाथी के समान था। फिर उस आकृति को उन्होंने गंगा में डाल दिया। गंगाजी में पड़ते ही वह आकृति विशालकाय हो गयी। पार्वती जी ने उसे पुत्र कहकर पुकारा। देव समुदाय ने उन्हें गांगेय कहकर सम्मान दिया और ब्रह्मा जी ने उन्हें गणों का आधिपत्य प्रदान करके गणेश नाम दिया।

           लिंग पुराण के अनुसार एक बार देवताओं ने भगवान शिव की उपासना करके उनसे सुरद्रोही दानवों के दुष्टकर्म में विघ्न उपस्थित करने के लिये वर माँगा। आशुतोष शिव ने 'तथास्तु' कहकर देवताओं को संतुष्ट कर दिया। समय आने पर गणेश जी का प्राकट्य हुआ। उनका मुख हाथी के समान था और उनके एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे में पाश था।

            पंच देवोपासना में भगवान गणपति प्रमुख  हैं। प्रत्येक कार्य का प्रारम्भ 'श्रीगणेश' अर्थात उनके स्मरण-वन्दन से ही होता है। उनकी नैष्ठिक उपासना करने वाला सम्प्रदाय भी था। दक्षिण भारत में भगवान गणपति की उपासना बहुत धूम-धाम से होती है। 'कलौ चण्डीविनायकौ।' जिन लोगों को कोई भौतिक सिद्धि चाहिये, वे इस युग में गणेश जी को शीघ्र प्रसन्न कर पाते हैं। मंगलमूर्ति सिद्धिसदन बहुत अल्पश्रम से द्रवित होते हैं।

          पहले  हम हिंदी वर्णमाला की किताब में “गणेश” के “ग” पढ़ते थे कालांतर में गणेश को सांप्रदायिक कहकर पाठ्य पुस्तक से हटा दिया गया और उनकी जगह बच्चे पढने लगे “गधे” का “ग". परसाई जी ने कहीं लिखा है कि इस बदलाव से यह बोध होता है कि गणेश साम्प्रदायिक हैं और गधे सेक्युलर .....

                        - मन मोहन जोशी Mj”

 


गुरुवार, 24 अगस्त 2017

निजता का अधिकार : ऐसी भी अदालत है जो रूह परखती है...



               आज कल इतना कुछ घट रहा है (निजी जीवन और देश काल में भी) कि लिखने को बहुत कुछ है...आज सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार पर अपना बहु प्रतीक्षित फैसला सुना दिया. मेरे लिए ये निर्णय यूँ ख़ास है कि मैं लगातार इस मुद्दे पर लिखता और बोलता रहा हूँ... जस्टिस खेहर सिंह कुछ ही दिनों में रिटायर होने वाले हैं, लगता है वो, जाने से पहले सारे विवादित मामले निपटा कर जाना चाहते  हैं.....

                              बहरहाल निजता के अधिकार का मुद्दा केंद्र सरकार की तमाम समाज कल्याण योजनाओं का लाभ हासिल करने के लिए आधार को अनिवार्य करने संबंधी कदम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान उठा था.

               केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह सवाल उठा कर सबको चौंका दिया कि क्या निजता का अधिकार मूल अधिकार है ? यह सवाल इसलिए भी व्यर्थ है, क्योंकि सुप्रीमकोर्ट ने अपनी कई व्याख्याओं में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकारों के तहत माना है | केंद्र सरकार  “आधार”  को अनिवार्य करने के  चक्कर में तरह - तरह की दलीलें दिए जा रही है.

                   केंद्र सरकार की ओर से “ आधार “ को आधार प्रदान करने के लिए बहस करते हुए अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि संविधान निजता के अधिकार को मान्यता नहीं देता. उन्होंने इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट को उन फैसलों पर पुनर्विचार करने को कहा जिनमें निजता के अधिकार को मूल अधिकार के तौर पर परिभाषित किया गया है. उल्लेखनीय है कि बिना संसद की मंज़ूरी और शीर्ष अदालत की मुहर के UPA सरकार ने “आधार” को लागू करने की हड़बड़ी दिखाई और उसी सरपट चाल को मोदी सरकार भी पकड़े हुए है. जबकि इसी वर्ष 16 मार्च को सुप्रीमकोर्ट इसकी अनिवार्यता पर रोक लगा चुकी है.

                हद तो ये है कि  कुछ ईष्ट देवों के अतिरिक्त जानवरों के भी आधार कार्ड  बन चुके हैं और कुछ सीनियर सिटीजन के हाथ के निशान घिस जाने या कैमरे पर न आने के कारण उनके “आधार” बनाने से इन्कार कर दिया गया है.

               शुरू में तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने सात जुलाई को कहा कि आधार से जुड़े सारे मुद्दों पर वृहद पीठ को ही फैसला करना चाहिए और मुख्य न्यायमूर्ति  इस संबंध में संविधान पीठ गठित करने के लिए कदम उठाएंगे. इसके बाद, मुख्य न्यायमूर्ति  के सामने इसका उल्लेख किया गया तो उन्होंने इस मामले में सुनवाई के लिये पांच सदस्यीय संविधान पीठ गठित की थी.

               हालांकि, पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 18 जुलाई को कहा कि इस मुद्दे पर नौ सदस्यीय संविधान पीठ विचार करेगी. संविधान पीठ के सामने विचारणीय सवाल था कि क्या निजता के अधिकार को संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार घोषित किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट की छह और आठ सदस्यीय पीठ द्वारा क्रमश: खड़ग  सिंह (1962 )और एम पी शर्मा (1954) के मामलों में में दी गयी व्यवस्थाओं की विवेचना के लिए नौ सदस्यीय संविधान पीठ गठित करने का फैसला किया गया.

                मुख्य न्यायमूर्ति  की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने इस सवाल पर तीन सप्ताह के दौरान करीब छह दिन तक सुनवाई की थी. सुनवाई के दौरान निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल करने के पक्ष और विरोध में दलीलें दी गईं. संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस आर के अग्रवाल, जस्टिस आर एफ नरिमन, जस्टिस ए एम सप्रे, जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल थे.

                 संविधान पीठ ने दो अगस्त को फैसला सुरक्षित रखते हुये सार्वजनिक दायरे में आयी निजी सूचना के संभावित दुरूपयोग को लेकर चिंता व्यक्त की थी और कहा था कि मौजूदा प्रौद्योगिकी के दौर में निजता के संरक्षण की अवधारणा एक हारी हुयी लडाई है. इससे पहले, 19 जुलाई को सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की थी कि निजता का अधिकार मुक्म्मल नहीं हो सकता और सरकार के पास इस पर उचित प्रतिबंध लगाने के कुछ अधिकार हो सकते हैं.

                 अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने दलील दी कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकारों के दायरे में नहीं आता  क्योंकि वृहद पीठ के फैसले हैं कि यह सिर्फ न्यायिक व्यवस्थाओं के माध्यम से विकसित एक सामान्य कानूनी अधिकार है. केन्द्र ने भी निजता को एक अनिश्चित और अविकसित अधिकार बताया था

                 इस दौरान न्यायालय ने भी सभी सरकारी और निजी प्रतिष्ठानों से निजी सूचनाओं को साझा करने के डिजिटल युग के दौर में निजता के अधिकार से जुडे अनेक सवाल पूछे . इस बीच, याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि निजता का अधिकार, “जीने की स्वतंत्रता” के अधिकार में ही समाहित है.  

                निजता को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा दिलाने के खिलाफ अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल, वरिष्ठ अधिवक्ता सीए सुंदरम और राकेश द्विवेदी और अडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बहस की। इन वकीलों ने निजता को मौलिक अधिकार बनाए जाने की वकालत कर रहे गोपाल सुब्रमण्यम, कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, सजन पवय्या, आनन्द ग्रोवर और मीनाक्षी अरोरा का विरोध किया।

                अनुभवी और दिग्गज वकीलों के पेश होने के बाद अर्घ्य सेनगुप्ता और गोपाल शंकरनारायणन ने बहस की। हल्की-फुल्की वकालत पृष्ठभूमि की वजह से जिरह के लिए उन्हें केवल 15 मिनट का समय दिया गया था। लेकिन इन युवा वकीलों ने जिस तरह से देश के बाहर निजता के अधिकार की संवैधानिक स्थिति का विश्लेषण किया, खासकर अमेरिका में निजता के अधिकार पर गहराई से प्रकाश डाला, उससे कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। जब दोनों ने अपने कोटे का समय खत्म कर लिया तो जस्टिस नरीमन ने कहा कि दोनों युवा वकीलों ने उम्मीद से कहीं ज्यादा शानदार वकालत की। निजता के संवैधानिक दर्जा देने के पक्षकार सुब्रमण्यन जैसे ही जवाब देने के लिए उठे, जस्टिस नरीमन ने उनसे कहा कि पहले इन युवा वकीलों को बधाई दीजिए।

                 अमेरिका में निजता के अधिकार को लेकर लम्बा आन्दोलन चला है ....अमेरिकी अदालतों ने इस अधिकार की रक्षा 19 वीं सदी के अंत तक नहीं की क्योंकि कॉमन लॉ ने इसे मान्यता नहीं दी थी. इसे मान्यता तब मिली जब चार्ल्स वारेन तथा लूई ब्रैंडाइस ने हार्वाड लॉ रिव्यू (1890) में एक ऐतिहासिक लेख लिखा- “द राइट टू प्राइवेसी”. निजता के अधिकार से संबंधित सैकड़ों मामले अमेरिकी अदालतों के समक्ष आये.  पहली बार इस मामले में न्यूयॉर्क अपीलेट कोर्ट ने रॉबर्सन बनाम रोचेस्टर फोल्डिंग बॉक्स कम्पनी (1908 )  में इस पर विचार किया और प्रतिवादी को इस अधिकार के उल्लंघन के लिए दोषी करार दिया।

                    फिर ग्रिसवर्ल्ड मामले (1965)  में जस्टिस डगलस ने कहा कि भले ही बिल ऑफ राइट्स में इस अधिकार का स्पष्ट उल्लेख नहीं है लेकिन निजता का अधिकार  अन्य अधिकारों में निहित है । जस्टिस डगलस को ही निजता के अधिकार को मूल अधिकार के रूप में स्थापित करने का श्रेय जाता है.

                    शंकरनारायणन ने कोर्ट में कहा कि अगर निजता को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया तो सभी सोशल नेटवर्किंग साइट्स को यूजर्स से निजी जानकारी लेने से प्रतिबंधित कर दिया जाएगा क्योंकि सोशल प्लैटफॉर्म और यूजर्स के बीच निजता का अनुबंध होगा।

                     सेनगुप्ता ने कहा, किसी व्यक्ति की कुछ करने या ना करने की स्वतंत्रता ही निजता है। निजता कई मायनों में असीमित है। अमेरिका जैसे विकसित देश में निजता को संवैधानिक दर्जा दिया गया है, फिर भी वहां सुप्रीम कोर्ट ने अबॉर्शन और एलजीबीटी जैसे अधिकारों की वैधता की जांच करने के लिए 'राइट टु प्रिवेसी' को हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया है।
                    सभी दलीलों को सुनने के उपरांत संविधान पीठ ने निजता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिले प्राण और देह की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत एक मौलिक अधिकार घोषित किया है. यानी अब किसी की निजी जानकारी पर सरकार का हक नहीं होगा. सर्वोच्‍च अदालत की 9 जजों की बेंच ने इस पर मामले पर एक मत से फैसला सुनाया. आधार से जुड़े मामले में कोर्ट बाद में सुनवाई करेगी.

                    सुप्रीम कोर्ट के एक के बाद एक शानदार निर्णयों को पढ़ कर “आलोक” जी का एक शेर याद आता है:

“ऐसी भी अदालत है जो रूह परखती है,
महदूद नहीं रहती वो सिर्फ़ बयानों तक. “ 


                                 - मनमोहन जोशी "Mj"