Diary Ke Panne

शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

न्याय ?


कल जब इंटरव्यू के कुछ स्टूडेंट्स के साथ न्यायशब्द पर चर्चा चल रही थी तो ध्यान आया कि एलएलबी करने के दौरान जिस पहले अपराध को अपने प्रोफेसर से समझा था वो थी चोरी”.

 मुझे वो दिन आज तक याद है - आईपीसी की धारा 378 को उन्होंने एक समझाया और उदाहरण देते हुए कहा था कि मानलो तुम्हारी साइकिल कोई बिना तुम्हारी सहमति के बेईमानी से उठा कर ले जाए तो हम कहेंगे चोरी हुई. फिर उन्होंने ख़ुद ही पूछा बताओ चोरी के लिए क्या सज़ा होगी. मैंने खड़े होकर कहा सज़ा किसको ? बोले चोर को, देखो 379 में 3 साल की जेल हो सकती है मैंने 379 पढ़ा और लगभग चीखते हुए ही कहा और साइकिल का क्या होगा ? ये तो न्याय नहीं हुआ.. 379 में लिखा है चोरी करने वाले को 3 साल के लिए जेल में डाल दिया जायेगा और उससे जुर्माना भी वसूल किया जा सकेगा. लेकिन साइकिल का क्या ?? मुझे लगता है वहाँ लिखा होना चाहिए था कि चोरी गया सामान उसके मालिक को वापस दिलाया जायेगा या फिर चोर  को कहा जाएगा उसे वैसा ही सामान ख़रीद कर दे.

 मुझे आईपीसी में दिये गए दण्ड बिलकुल न्याय संगत नहीं लगे तबसे अब तक न्याय की सही परिभाषा तलाश कर रहा हूँ.. प्लेटो , सुकरात और अरस्तू अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में न्याय की बात करते हैं.

मैं न्याय को साध्य समझ रहा था लेकिन अक्षपाद गौतमन्याय को साधन बता रहे हैं. लिखते हैं नीयते विवक्षितार्थः अनेन इति न्याय:अर्थात् जिस साधन के द्वारा हम अपने विवक्षित तत्त्व के पास पहुँच जाते हैं (निर्णय के पास पहुँच जाते हैं या जिसे जानना चाह रहे हैं उस तक पहुँच जाते हैं) वही साधन न्याय है.

कुल मिलाकर मुझे लगता है न्याय की कोई भी सटीक व्याख्या मौजूद नहीं हैमैं खोज रहा हूँ आप भी ढूँढिये..

MJ
18-02-2024


ये सब तुम्हारा करम है आक़ा...

 



 

 

किताब को लिखा जाना और लिखने के बाद ठीक-ठीक प्रकाशित होना और उसके ऊपर प्रकाशन के 48 घंटों के भीतर अमेज़न रैंकिंग में नंबर 1 पर आ जाना और तीसरे दिन ही आउट ऑफ़ स्टॉक हो जाना ये सब दैवीय कृपा के बिना संभव नहीं.

 

देश भर के मीडिया हाउस ने किताब को लेकर उत्सुकता दिखाई है जो मन को प्रसन्नता देने वाला है.

 

मात्र छः माह पहले इस किताब को मूर्त रूप देने का विचार आया.. पब्लिशर से बात हुई उन्होंने उत्सुकता दिखाई और हम लग गये शामें ख़ाक करने में..

 

जब किताब छप कर आई तो विनीत भाई (पब्लिशर) का इरादा था कि इसकी लांचिंग नई दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में करेंगे और किताब का विमोचन सुप्रीम कोर्ट के किसी सिटिंग जज या कैबिनेट मिनिस्टर से करवाएँगे.. मेरे मन में इस बात को लेकर थोड़ा संकोच था कि सिटिंग जज या मिनिस्टर के होने के कारण किताब मीडिया रिपोर्टिंग का भाग बनेगी तो इसमें वो मज़ा आएगा नहीं, सोच ये थी कि किताब अपने कंटेंट के कारण चर्चा का विषय बने. वैसे भी मुझे नेता मंत्रियों के साथ फोटो खिंचवाने का बड़ा शौक़ नहीं लेकिन हाँ क़ानून का कोई विद्वान इसकी आलोचना या सराहना करे तो शिरोधार्य है.

 

बहरहाल तय ये हुआ कि मेरे स्टूडेंट्स के बीच ही इसका लॉंच हो और वो भी विधि के विद्वान भार्गव साब के हाथों से, फिर हम मीडिया को इसका प्रेस रिलीज़ भेज देंगे.

 

23 तारीख़ बुद्ध पूर्णिमा का दिन अनायास ही तय हो गया.. किताब मेरे प्यारे स्टूडेंट्स, समर्पित टीम और आदरणीय भार्गव साब की उपस्थिति में रिलीज़ की गई. मीडिया हाऊस को प्रेस रिलीज़ भेज दी गई.. और ये क्या! किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. लेकिन आप सभी को दुआओं से पहले ही दिन किताब अमेजन रैंकिंग में टॉप 5 पर ट्रेंड करने लगी और दूसरे दिन की समाप्ति तक नंबर एक पर.

 

"द प्रिंट" ने इस खबर को प्रमुखता से न्यूज़ में जगह दी और फिर बड़े न्यूज़ पोर्टल्स ने वहाँ से खबर उठा

ली. देखते ही देखते ये किताब लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई है.

 

बाबा फ़रीद में शब्दों में -

 

कोई सलीका है आरज़ू का,

न बन्दगी मेरी बन्दगी है

ये सब तुम्हारा करम है आक़ा

के बात अब तक बनी हुई है

 

एमजे

31.05.2024

 

 

 

किताब को लिखा जाना और लिखने के बाद ठीक-ठीक प्रकाशित होना और उसके ऊपर प्रकाशन के 48 घंटों के भीतर अमेज़न रैंकिंग में नंबर 1 पर आ जाना और तीसरे दिन ही आउट ऑफ़ स्टॉक हो जाना ये सब दैवीय कृपा के बिना संभव नहीं.

देश भर के मीडिया हाउस ने किताब को लेकर उत्सुकता दिखाई है जो मन को प्रसन्नता देने वाला है.

मात्र छः माह पहले इस किताब को मूर्त रूप देने का विचार आया.. पब्लिशर से बात हुई उन्होंने उत्सुकता दिखाई और हम लग गये शामें ख़ाक करने में..

जब किताब छप कर आई तो विनीत भाई (पब्लिशर) का इरादा था कि इसकी लांचिंग नई दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में करेंगे और किताब का विमोचन सुप्रीम कोर्ट के किसी सिटिंग जज या कैबिनेट मिनिस्टर से करवाएँगे.. मेरे मन में इस बात को लेकर थोड़ा संकोच था कि सिटिंग जज या मिनिस्टर के होने के कारण किताब मीडिया रिपोर्टिंग का भाग बनेगी तो इसमें वो मज़ा आएगा नहीं, सोच ये थी कि किताब अपने कंटेंट के कारण चर्चा का विषय बने. वैसे भी मुझे नेता मंत्रियों के साथ फोटो खिंचवाने का बड़ा शौक़ नहीं लेकिन हाँ क़ानून का कोई विद्वान इसकी आलोचना या सराहना करे तो शिरोधार्य है.

बहरहाल तय ये हुआ कि मेरे स्टूडेंट्स के बीच ही इसका लॉंच हो और वो भी विधि के विद्वान भार्गव साब के हाथों से, फिर हम मीडिया को इसका प्रेस रिलीज़ भेज देंगे.

23 तारीख़ बुद्ध पूर्णिमा का दिन अनायास ही तय हो गया.. किताब मेरे प्यारे स्टूडेंट्स, समर्पित टीम और आदरणीय भार्गव साब की उपस्थिति में रिलीज़ की गई. मीडिया हाऊस को प्रेस रिलीज़ भेज दी गई.. और ये क्या! किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. लेकिन आप सभी को दुआओं से पहले ही दिन किताब अमेजन रैंकिंग में टॉप 5 पर ट्रेंड करने लगी और दूसरे दिन की समाप्ति तक नंबर एक पर.

"द प्रिंट" ने इस खबर को प्रमुखता से न्यूज़ में जगह दी और फिर बड़े न्यूज़ पोर्टल्स ने वहाँ से खबर उठा ली. देखते ही देखते ये किताब लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई है.

बाबा फ़रीद में शब्दों में -

कोई सलीका है आरज़ू का, न बन्दगी मेरी बन्दगी है ये सब तुम्हारा करम है आक़ा के बात अब तक बनी हुई है

एमजे 31.05.2024


प्यारे स्टूडेंट्स

  





यूँ तो मुझे मेरा हर एक स्टूडेंट प्यारा है जिसका नाम याद रख सका हूँ वो भी और जिसका नाम ज़ेहन में नहीं है वो भी ॥ सैकड़ों कहानियाँ हैं स्टूडेंट्स से जुड़ी लेकिन आज इस एक स्टूडेंट की कहानी आप तक पहुँचाना चाहता हूँ ।।

पेशे से वो डॉक्टर है । बेहद गहरी बातें करता है।यहाँ नाम इसीलिए नहीं लिख रहा क्यूँकि कहता है अगर लोगों को पता चल गया कि मैं आपको जानता भी हूँ तो मुझे प्रिविलेज मिलने लगेगा और मैं ये नहीं चाहता।ऑफिस में मिलने आता है तो जूते बाहर उतारता है। बैठने को कहता हूँ तो कहता है बड़ी मुश्किल से आपके सामने खड़े होने का सामर्थ्य लेकर आया हूँ अब ना बैठाइये..खड़ा ही रहता है।

एक रोज़ मैंने उसे दो बजे मिलने का समय दियाऔर जो भी लोग आ रहे थे मैं सबसे मिल ही रहा था। बीच में लेक्चर्स भी थे तो शाम को 6:30 बजे फ्री हो पाया। घर जाने के लिए ऑफिस से निकाला तो देखा बाहर वो खड़ा था गाड़ी के पास। मैंने लगभग नाराज़ होते हुए कहा  दो बजे का टाईम दिया और और तुम अभी आ रहे हो, अब तो मेरे निकलने का समय हो गया….कल मिलते हैं।बड़े विनम्र भाव से उसने हाथ जोड़ते हुए कहा गुरु जी मैं तो ठीक दो बजे आ गया था बस आप व्यस्त थे तो आपको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा।मैंने क्षमा माँगने के भाव से कहा मेरे भाई चार घंटे से ज़्यादा का समय ख़राब हो गया तुम्हारा, एक बार रिसेप्शन पर बोल देते कि सर ने मिलने बुलाया है……”  कहता है मैं तो आपको धन्यवाद देना चाहता हूँ कि वेटिंग एरिया में बैठे- बैठे मेरी चार घंटे की पढ़ाई हो गई, मैं बुक्स लेकर आया था।

मैंने उसे स्नेह से गले लगा लिया और बोला चल गाड़ी में ही बैठ जा तुझे आगे ड्रॉप करता हूँ और थोड़ी देर बात भी हो जाएगी। मैंने सोचा कुछ विशेष बात करनी होगी या कोई समस्या लेकर आया होगा। गाड़ी ड्राइव करते हुए मैंने पूछा, “बताओ कैसे आना हुआ?”  कहता है, ”कोई विशेष प्रयोजन नहीं बस आपका आशीर्वाद लेने आया था।

फिर हमने थोड़ी इधर-उधर की बातें की…. एक ग़ज़ल उसने लिखी थी वो सुनाई और फिर मैंने पूछा बता तुझे कहाँ छोड़ दूँ?“ लगभग उसने नाराज़ होते हुए कहा, “जब छोड़ना ही है तो इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि कहाँ? आप तो कहीं भी छोड़ दो।कितनी गहरी बात ! तो ऐसे विद्वान स्टूडेंट्स हैं मेरे जिनसे सम्मान मिलता रहता है मुझे॥

कल गुरुपूर्णिमा के अवसर पर आप सभी मित्रों से विभिन्न माध्यमों से शुभकामना संदेश प्राप्त हुएशुक्रिया ॥ सुबह की शुरुआत भाई मयंक पटेल की हीरामणी से मुँह मीठा करके हुई और छत्तीसगढ़ से अंकिता की मम्मा ने नमकीन भेजा था मीठा और नमकीन दोनों एक साथ…. और इससे बढ़िया दिन की शुरुआत क्या ही हो सकती है ॥शाम एमपीपीएससी के स्टूडेंट्स के द्वारा सजाई गई थी, जहां हमने अपने कुछ विचार रखे और स्टूडेंट्स के विचारों से रूबरू हुए॥

दिन भर स्टूडेंट्स का आना जाना लगा रहा मंदाकिनी घर से खीर बना लाई, विशाखा ने पहली बार हॉस्टल में मेरे लिये कुछ पकाया , अनमोल गणपति ले आया तो अक्षत अपने हाथ की बनाई फूलों का गुलदस्ता लेकर आया, सुनीता गुलाब जामुन बना कर लाई, मोहित , पूजा, अक्षिता, निकिता, अश्विन, अफीफा, शिव, भूमिका, सोनाली, प्रतिभा, हिमांशी , रोहित , रवि , बलबीर , लव , राहुल राज , भागवत राणावत , राहुल , गोपाल, महावीर और बाक़ी सभी मित्र जिनकी, शुभकामनाएँ और गिफ्ट्स मुझ तक पहुँचे हैं उन सभी को अनेक धन्यवाद॥ आप सभी के स्वस्थ जीवन और उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ ॥

कईयों के साथ फोटो क्लिक नहीं हो पाये और कुछ के नाम मैं यहाँ मेंशन नहीं कर पाया आप सभी को आपके अथाह स्नेह के लिए जितना धन्यवाद दूँ कम है ॥

और हाँ, एक और बात…. गुरु होना तो बहुत बड़ी बात है, क्या पता मैं एक अच्छा शिक्षक भी बन पाया हूँ या नहीं। हाँ आप सबका मित्र होने में मुझे सुविधा है और और इसमें मैं सहज भी हूँ ॥

आपके इस मित्र की ओर से एक बार फिर गुरु पूर्णिमा की अनेक अनेक शुभकामनाएँ ॥ आपके गुरुजन की कृपा आप पर बनी रहे ॥

MJ
गुरु पूर्णिमा . २०२३

राम सम्वाद

 



कल टीवी जगत के ख्यात कलाकार अरुण गोविल जी को जब मैं एयरपोर्ट से लेकर आ रहा था तब उन्होंने बातों ही बातों में जो कुछ उन्हें एकेडमी या हमारे बारे में पता था उस पर चर्चा करनी शुरू कर दी॥ सुखद आश्चर्य था कि वे हम लोगों और हमारे काम को जान रहे थे॥

फिर जब विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने वाले अभ्यर्थियों के बारे में बात हुई तो उन्होंने जिज्ञासावश पूछा (यह प्रश्न साधारणतः हर एक जिज्ञासु विद्यार्थी के मन में होता है, तो सोचा यहाँ साझा करूँ) , “अगर शिक्षक किसी को पढ़ा कर आईएएस या जज बना सकता है तो वो ख़ुद क्यूँ नहीं बन जाता ?” बड़ा ही गंभीर प्रश्न है…..

तो मेरे देखे इस प्रश्न के दो उत्तर हो सकते हैं -

1) वे शिक्षक जो शिक्षक बनने के बाद भी कुछ और होने की इच्छा रखते हैं वो बन ही जाते हैं, आपने सुना ही होगा फ़लाँ कोचिंग के अमुक शिक्षक का भी सिलेक्शन हो गया, मायावती शिक्षक से मुख्यमंत्री तक बनीं और राधा कृष्णन तो शिक्षक से राष्ट्रपति भी बने ॥

2) फिर दूसरे वे हैं जो शिक्षक बन जाने के बाद कुछ और नहीं हो जाना चाहतेशिक्षक हो जाने में ही जीवन कि पूर्णता हो जैसे…. ऐसे में हम उन्हें श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में ही जानते हैं ॥ और हाँ फिर -

# हम कभी किसी कौटिल्य से नहीं पूछते कि वो क्यूँ मगध के राजा नहीं बन गए?

# हम कभी किसी विश्वामित्र से नहीं पूछते कि तुम जब स्वयं शस्त्र विद्या के ज्ञाता हो तो फिर तुम्हें क्यूँ राक्षसों से निपटने के लिए राम और लक्ष्मण की आवश्यकता है ?

# हम कभी किसी रमाकान्त आचरेकर से नहीं पूछते कि आप क्यूँ सचिन तेंदुलकर नहीं बने ?

तो शिक्षक का होना एक शून्य की तरह है, वो स्वयं में कुछ भी नहीं लेकिन जब वह किसी योग्य विद्यार्थी से मिलता है तो ये दोनों मिलकर कुछ और ही हो जाते हैं ॥ अगर विद्यार्थी 10 है तो शिक्षक का साथ उसे 100 बना देगा और वो पहले से ही 100 है तो 1000.

 MJ
02-07-2023


 

समोसा गाथा…




समोसा भारत में एक अतिलोकप्रिय व्यंजन है लेकिन इसकी उत्पत्ति को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि समोसा ईरान या मध्य पूर्वी व्यापारियों द्वारा भारत लाया गया होगा क्यूँकि ऐसी ही एक डिश ईरान में पाई जाती है.


फारसी में इसका नाम “संबुश्क” है. माना जाता है कि भारत आते-आते यही संबुश्क समोसा हो गया होगा। बिहार और पश्चिम बंगाल में इसे ही शिंगारा  कहा जाता है।


थोड़ा इतिहास में चलते हैं.. समोसे का जिक्र पहली बार 11

वीं सदी के इतिहासकार अबुल-फल बेहाकी के लेख में मिलता है

जिसमें उसने गजनी के दरबार में एक नमकीन चीज का जिक्र किया था जिसमें कीमा और मावे भरे होते थे। हालांकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि समोसे का आविष्कार भारत के उत्तरी क्षेत्र में हुआ होगा।


बहरहाल जो कुछ भी हो समोसा है तो लोकप्रिय और इंदौर शहर में इसे बघेली समोसे के नाम से पेश किया है रीवा के दो युवा भाइयों ने जिनका नाम है जय और विजय। वैसे मैं समोसे खाने का शौक़ीन नहीं हूँ लेकिन जब बघेली समोसे की बात आती है तो मैं इसे किसी भी समय खा सकता हूँ । आज बघेली समोसे को पूरे मध्य प्रदेश भर में लोकप्रिय बनाने वाले प्रिय भाई विजय का ऑफिस आना हुआ आप यशस्वी हों ऐसी कामना है ।


चलिए वापस लौटते हैं समोसा गाथा पर… समोसे का पहली बार ज़िक्र हिंदुस्तान की सरहद में मध्य कालीन युग के यात्री इब्न बतूता करते हैं. इब्न बतूता मोरक्को से थे और रेशम मार्ग से होते हुए तुग़लक़ साम्राज्य के समय भारत आये थे. इब्न बतूता ने अपने लेखन में समोसे जैसी चीज़ का ज़िक्र किया है. यानी 13वीं शताब्दी में पहली बार समोसे का ज़िक्र हमें किसी दस्तावेज में मिलता है. उसके बाद समोसे का ज़िक्र निमतनामा में होता है जो 1469 और 1500 के बीच लिखी गयी एक किताब है जिसमें उस वक़्त के खान पान का विस्तृत ज़िक्र है. उस समय गियास अल दीन खिलजी का पूरे मालवा में आधिपत्य था. ख़ास बात ये है कि इस किताब में 8 तरह के समोसों का ज़िक्र हुआ है लेकिन किसी में भी आलू की बात नहीं की गयी. यानी समोसे में नारियल, क्रीम, गोश्त और अन्य चीज़ों का खूब इस्तेमाल होता था. फिर इसका ज़िक्र आईने अकबरी में हुआ और आमिर खुसरो भी समोसे का ज़िक्र किया और वो बताते हैं कि समोसों में प्याज और गोश्त भरा जाता था और देसी घी में छाना जाता था. यानी समोसे तेल के बजाये देसी घी में भी छाने जाते रहे हैं.


 500 साल पहले और उसके बाद समोसों में बड़ा फ़र्क़ एक ये हुआ है कि हिन्दुस्तान में धीरे-धीरे समोसों में तेज़ और गरम मसालों का खूब इस्तेमाल होने लगा है जो ईरान और मध्य एशिया में नहीं होता था. बाद में इनमें हरी मिर्च का भी इस्तेमाल होने लगा.


जानकार कहते हैं कि समोसा रेशम मार्ग के ज़रिये हिन्दुस्तान आया. कहीं ये सम्बुसा कहा जाता था और कहीं समसा लेकिन शुरुआत के दौर में समोसों में गोश्त, पिस्ता और क्रीम जैसे खाद्य पदार्थों का ही इस्तेमाल किया जाता रहा होगा. खाद्य इतिहासकार पुष्पेश पंत का कहना हैं कि वैसे तो समोसा मध्य एशिया से आया है लेकिन वो अब उपमहाद्वीप का खाना बन चुका है. उनके अनुसार अब समोसे को विदेशी कहना ग़लत होगा.


पश्चिम बंगाल में समोसा शिंगारा है और हैदराबाद में लुक्मी, गोवा में इसको चामुकास बोला जाता है और कोलकाता के क्लब्स में ये कॉकटेल समोसा कहलाता है. इसमें दाल भी इस्तेमाल होती हैं और ये मीठे रूप में भी पकाया जाता है इसलिए समोसे का हिंदुस्तानीकरण पूरा हो चुका है.


✍️MJ

22-09-2023

अमेज़न और मैं

 



1994 वह साल था जब अमेज़न अपने शुरुआती दौर में था ये वो समय  था जब हम स्कूल में पढ़ते थे. इंटरनेट क्या होता है हमें उसकी कोई भनक नहीं थी लेकिन ठीक इसी समय के आस पास मेरे दिमाग़ में भी ऐसा ही एक विचार कौंध रहा था. अपने मित्र संजय के साथ मिलकर हमने फ़्रेंड्स सर्विसनाम की एक संस्था बनाई. ये साल 1999 था. कुछ वर्षों की प्लानिंग और कुछ पैसे इकट्ठा कर लेने के बाद हमने ख़ुद से लोगो डिज़ाइन कर लिया था और साथ ही एक ब्रोशर डिज़ाइन करके उसके पाँच हज़ार प्रिंट भी ले लिए थेइस समय तक अमेज़न केवल किताबें ही बीच रहा था जबकि अमेज़न के काम से अनजान हम लोगों ने वो सभी सेवाएँ देने का विचार बना लिया था जो अमेज़न के द्वारा बहुत बाद में शुरू की गई.

छत्तीसगढ़ के सुदूर जगदलपुर शहर में और आसपास के कॉलोनीज़ में हमने ये ब्रोशर बाँटे. पता दिया था मेरे घर का और कांटैक्ट नंबर में था हमारे ही घर का लैंडलाइन नंबर. हम, हर तरह का सामान घर पहुँच सेवा के साथ ही (पे ऑन डिलीवरी मोड पर) उपलब्ध करवाने का प्लान बना चुके थे. दिन भर घर के फ़ोन की घंटी बजने लगी. ऑर्डर्स मिलने लगे. हम ही डिलीवरी करने वाले थे. हम ही ऑर्डर लेने वाले. हमारे पास निवेश करने के लिए कोई जमा पूँजी भी तो नहीं थी. कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर और गुरुद्वारे में तबला बजाते हुए जो थोड़े से पैसे जमा किए थे उससे ही ये काम शुरू किया था. मेरे पिता सरकारी कर्मचारी थे और संजय के भी, और हमारे आइडियाज़ को वो फ़िज़ूल ही समझते थे.

काम को शुरू हुए कोई तीन चार रोज़ हुए होंगे और पापा ने मुझे बुलाकर ज़ोरदार डाँट लगाईबोले पढ़ाई में ध्यान लगाओ ये सब फ़िज़ूल के काम यहाँ नहीं होंगे. एक महान विचार बीज रूप में ही मर गया कभी वृक्ष नहीं बन पाया.

मुझे इस बात का कोई गिला नहीं बस आज अनायास ही अमेज़न के इस चित्र पर नज़र पड़ी और ये आलेख लिखने का मन कर गया ताकि आप सब से कह सकूँ कि अपने बच्चों और स्वयं के आइडियास पर भरोसा कीजिए और कुछ नहीं तो उनके साथ खड़े रहिए. क्या पता अगला जेफ़ बेजोस आपके घर पर ही हो और आपको पता ही नहीं..

️MJ

कर्मक्षेत्रे :




अष्टमी के दिन श्रीकृष्ण प्रवास पर थे चहूँ ओर कृष्णजन्मोत्सव मनाया जा रहा था… उत्सव का माहौल था… लौटकर द्वारिका आये तो देखा वहाँ एक दीप भी नहीं जला था.. रुक्मणी ने आश्चर्य से पूछा - क्या यहाँ किसी की मृत्यु तो नहीं हो गई है नाथ! जिसका शोक मनाया जा रहा है…क्यूँकि मातम का सा माहौल था.
कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले प्रिये, इसे ही दिया तले अंधेरा कहते हैं… तुम्हें क्या लगता है जब हम त्रेता में अयोध्या लौटे थे तो अयोध्या वासियों ने दिया जला कर हमारा स्वागत किया था? 

अरे ! बिलकुल भी नहीं वो तो हनुमान हमसे पहले वायुमार्ग से अयोध्या पहुँच गये और नगरवासियों को कहा कि दिये जलाकर स्वागत करो…. नहीं तो शायद तब भी इसी तरह का मातम ही देखने को मिलता. हंसते हुए बोले तब तो हमने बड़ा भाई होना चुना था तो छोटे भाइयों ने भी अपना भ्रातृ धर्म निभाते हुए स्वागत सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी और इस बार तो हमने भाई भी छोटा होना ही चुना है.

सोचने वाली बात है कि जिस अयोध्या के नाम पर सत्तारूढ़ दल को पूरे देश भर में वोट मिले अयोध्या में ही उसे 4000 वोट का मिल पाना “दिये के तले ही अंधेरा होता है” इस कहावत को चरितार्थ कर रहा है.
और दिये तले हमेशा ही अंधेरा रहेगा इसका कुछ नहीं किया जा सकता !

✍️एमजे
15-06-2024
जन्मदिन प्रवास से वापस लौटकर