Diary Ke Panne

शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

प्यारे स्टूडेंट्स

  





यूँ तो मुझे मेरा हर एक स्टूडेंट प्यारा है जिसका नाम याद रख सका हूँ वो भी और जिसका नाम ज़ेहन में नहीं है वो भी ॥ सैकड़ों कहानियाँ हैं स्टूडेंट्स से जुड़ी लेकिन आज इस एक स्टूडेंट की कहानी आप तक पहुँचाना चाहता हूँ ।।

पेशे से वो डॉक्टर है । बेहद गहरी बातें करता है।यहाँ नाम इसीलिए नहीं लिख रहा क्यूँकि कहता है अगर लोगों को पता चल गया कि मैं आपको जानता भी हूँ तो मुझे प्रिविलेज मिलने लगेगा और मैं ये नहीं चाहता।ऑफिस में मिलने आता है तो जूते बाहर उतारता है। बैठने को कहता हूँ तो कहता है बड़ी मुश्किल से आपके सामने खड़े होने का सामर्थ्य लेकर आया हूँ अब ना बैठाइये..खड़ा ही रहता है।

एक रोज़ मैंने उसे दो बजे मिलने का समय दियाऔर जो भी लोग आ रहे थे मैं सबसे मिल ही रहा था। बीच में लेक्चर्स भी थे तो शाम को 6:30 बजे फ्री हो पाया। घर जाने के लिए ऑफिस से निकाला तो देखा बाहर वो खड़ा था गाड़ी के पास। मैंने लगभग नाराज़ होते हुए कहा  दो बजे का टाईम दिया और और तुम अभी आ रहे हो, अब तो मेरे निकलने का समय हो गया….कल मिलते हैं।बड़े विनम्र भाव से उसने हाथ जोड़ते हुए कहा गुरु जी मैं तो ठीक दो बजे आ गया था बस आप व्यस्त थे तो आपको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा।मैंने क्षमा माँगने के भाव से कहा मेरे भाई चार घंटे से ज़्यादा का समय ख़राब हो गया तुम्हारा, एक बार रिसेप्शन पर बोल देते कि सर ने मिलने बुलाया है……”  कहता है मैं तो आपको धन्यवाद देना चाहता हूँ कि वेटिंग एरिया में बैठे- बैठे मेरी चार घंटे की पढ़ाई हो गई, मैं बुक्स लेकर आया था।

मैंने उसे स्नेह से गले लगा लिया और बोला चल गाड़ी में ही बैठ जा तुझे आगे ड्रॉप करता हूँ और थोड़ी देर बात भी हो जाएगी। मैंने सोचा कुछ विशेष बात करनी होगी या कोई समस्या लेकर आया होगा। गाड़ी ड्राइव करते हुए मैंने पूछा, “बताओ कैसे आना हुआ?”  कहता है, ”कोई विशेष प्रयोजन नहीं बस आपका आशीर्वाद लेने आया था।

फिर हमने थोड़ी इधर-उधर की बातें की…. एक ग़ज़ल उसने लिखी थी वो सुनाई और फिर मैंने पूछा बता तुझे कहाँ छोड़ दूँ?“ लगभग उसने नाराज़ होते हुए कहा, “जब छोड़ना ही है तो इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि कहाँ? आप तो कहीं भी छोड़ दो।कितनी गहरी बात ! तो ऐसे विद्वान स्टूडेंट्स हैं मेरे जिनसे सम्मान मिलता रहता है मुझे॥

कल गुरुपूर्णिमा के अवसर पर आप सभी मित्रों से विभिन्न माध्यमों से शुभकामना संदेश प्राप्त हुएशुक्रिया ॥ सुबह की शुरुआत भाई मयंक पटेल की हीरामणी से मुँह मीठा करके हुई और छत्तीसगढ़ से अंकिता की मम्मा ने नमकीन भेजा था मीठा और नमकीन दोनों एक साथ…. और इससे बढ़िया दिन की शुरुआत क्या ही हो सकती है ॥शाम एमपीपीएससी के स्टूडेंट्स के द्वारा सजाई गई थी, जहां हमने अपने कुछ विचार रखे और स्टूडेंट्स के विचारों से रूबरू हुए॥

दिन भर स्टूडेंट्स का आना जाना लगा रहा मंदाकिनी घर से खीर बना लाई, विशाखा ने पहली बार हॉस्टल में मेरे लिये कुछ पकाया , अनमोल गणपति ले आया तो अक्षत अपने हाथ की बनाई फूलों का गुलदस्ता लेकर आया, सुनीता गुलाब जामुन बना कर लाई, मोहित , पूजा, अक्षिता, निकिता, अश्विन, अफीफा, शिव, भूमिका, सोनाली, प्रतिभा, हिमांशी , रोहित , रवि , बलबीर , लव , राहुल राज , भागवत राणावत , राहुल , गोपाल, महावीर और बाक़ी सभी मित्र जिनकी, शुभकामनाएँ और गिफ्ट्स मुझ तक पहुँचे हैं उन सभी को अनेक धन्यवाद॥ आप सभी के स्वस्थ जीवन और उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ ॥

कईयों के साथ फोटो क्लिक नहीं हो पाये और कुछ के नाम मैं यहाँ मेंशन नहीं कर पाया आप सभी को आपके अथाह स्नेह के लिए जितना धन्यवाद दूँ कम है ॥

और हाँ, एक और बात…. गुरु होना तो बहुत बड़ी बात है, क्या पता मैं एक अच्छा शिक्षक भी बन पाया हूँ या नहीं। हाँ आप सबका मित्र होने में मुझे सुविधा है और और इसमें मैं सहज भी हूँ ॥

आपके इस मित्र की ओर से एक बार फिर गुरु पूर्णिमा की अनेक अनेक शुभकामनाएँ ॥ आपके गुरुजन की कृपा आप पर बनी रहे ॥

MJ
गुरु पूर्णिमा . २०२३

राम सम्वाद

 



कल टीवी जगत के ख्यात कलाकार अरुण गोविल जी को जब मैं एयरपोर्ट से लेकर आ रहा था तब उन्होंने बातों ही बातों में जो कुछ उन्हें एकेडमी या हमारे बारे में पता था उस पर चर्चा करनी शुरू कर दी॥ सुखद आश्चर्य था कि वे हम लोगों और हमारे काम को जान रहे थे॥

फिर जब विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने वाले अभ्यर्थियों के बारे में बात हुई तो उन्होंने जिज्ञासावश पूछा (यह प्रश्न साधारणतः हर एक जिज्ञासु विद्यार्थी के मन में होता है, तो सोचा यहाँ साझा करूँ) , “अगर शिक्षक किसी को पढ़ा कर आईएएस या जज बना सकता है तो वो ख़ुद क्यूँ नहीं बन जाता ?” बड़ा ही गंभीर प्रश्न है…..

तो मेरे देखे इस प्रश्न के दो उत्तर हो सकते हैं -

1) वे शिक्षक जो शिक्षक बनने के बाद भी कुछ और होने की इच्छा रखते हैं वो बन ही जाते हैं, आपने सुना ही होगा फ़लाँ कोचिंग के अमुक शिक्षक का भी सिलेक्शन हो गया, मायावती शिक्षक से मुख्यमंत्री तक बनीं और राधा कृष्णन तो शिक्षक से राष्ट्रपति भी बने ॥

2) फिर दूसरे वे हैं जो शिक्षक बन जाने के बाद कुछ और नहीं हो जाना चाहतेशिक्षक हो जाने में ही जीवन कि पूर्णता हो जैसे…. ऐसे में हम उन्हें श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में ही जानते हैं ॥ और हाँ फिर -

# हम कभी किसी कौटिल्य से नहीं पूछते कि वो क्यूँ मगध के राजा नहीं बन गए?

# हम कभी किसी विश्वामित्र से नहीं पूछते कि तुम जब स्वयं शस्त्र विद्या के ज्ञाता हो तो फिर तुम्हें क्यूँ राक्षसों से निपटने के लिए राम और लक्ष्मण की आवश्यकता है ?

# हम कभी किसी रमाकान्त आचरेकर से नहीं पूछते कि आप क्यूँ सचिन तेंदुलकर नहीं बने ?

तो शिक्षक का होना एक शून्य की तरह है, वो स्वयं में कुछ भी नहीं लेकिन जब वह किसी योग्य विद्यार्थी से मिलता है तो ये दोनों मिलकर कुछ और ही हो जाते हैं ॥ अगर विद्यार्थी 10 है तो शिक्षक का साथ उसे 100 बना देगा और वो पहले से ही 100 है तो 1000.

 MJ
02-07-2023


 

समोसा गाथा…




समोसा भारत में एक अतिलोकप्रिय व्यंजन है लेकिन इसकी उत्पत्ति को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि समोसा ईरान या मध्य पूर्वी व्यापारियों द्वारा भारत लाया गया होगा क्यूँकि ऐसी ही एक डिश ईरान में पाई जाती है.


फारसी में इसका नाम “संबुश्क” है. माना जाता है कि भारत आते-आते यही संबुश्क समोसा हो गया होगा। बिहार और पश्चिम बंगाल में इसे ही शिंगारा  कहा जाता है।


थोड़ा इतिहास में चलते हैं.. समोसे का जिक्र पहली बार 11

वीं सदी के इतिहासकार अबुल-फल बेहाकी के लेख में मिलता है

जिसमें उसने गजनी के दरबार में एक नमकीन चीज का जिक्र किया था जिसमें कीमा और मावे भरे होते थे। हालांकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि समोसे का आविष्कार भारत के उत्तरी क्षेत्र में हुआ होगा।


बहरहाल जो कुछ भी हो समोसा है तो लोकप्रिय और इंदौर शहर में इसे बघेली समोसे के नाम से पेश किया है रीवा के दो युवा भाइयों ने जिनका नाम है जय और विजय। वैसे मैं समोसे खाने का शौक़ीन नहीं हूँ लेकिन जब बघेली समोसे की बात आती है तो मैं इसे किसी भी समय खा सकता हूँ । आज बघेली समोसे को पूरे मध्य प्रदेश भर में लोकप्रिय बनाने वाले प्रिय भाई विजय का ऑफिस आना हुआ आप यशस्वी हों ऐसी कामना है ।


चलिए वापस लौटते हैं समोसा गाथा पर… समोसे का पहली बार ज़िक्र हिंदुस्तान की सरहद में मध्य कालीन युग के यात्री इब्न बतूता करते हैं. इब्न बतूता मोरक्को से थे और रेशम मार्ग से होते हुए तुग़लक़ साम्राज्य के समय भारत आये थे. इब्न बतूता ने अपने लेखन में समोसे जैसी चीज़ का ज़िक्र किया है. यानी 13वीं शताब्दी में पहली बार समोसे का ज़िक्र हमें किसी दस्तावेज में मिलता है. उसके बाद समोसे का ज़िक्र निमतनामा में होता है जो 1469 और 1500 के बीच लिखी गयी एक किताब है जिसमें उस वक़्त के खान पान का विस्तृत ज़िक्र है. उस समय गियास अल दीन खिलजी का पूरे मालवा में आधिपत्य था. ख़ास बात ये है कि इस किताब में 8 तरह के समोसों का ज़िक्र हुआ है लेकिन किसी में भी आलू की बात नहीं की गयी. यानी समोसे में नारियल, क्रीम, गोश्त और अन्य चीज़ों का खूब इस्तेमाल होता था. फिर इसका ज़िक्र आईने अकबरी में हुआ और आमिर खुसरो भी समोसे का ज़िक्र किया और वो बताते हैं कि समोसों में प्याज और गोश्त भरा जाता था और देसी घी में छाना जाता था. यानी समोसे तेल के बजाये देसी घी में भी छाने जाते रहे हैं.


 500 साल पहले और उसके बाद समोसों में बड़ा फ़र्क़ एक ये हुआ है कि हिन्दुस्तान में धीरे-धीरे समोसों में तेज़ और गरम मसालों का खूब इस्तेमाल होने लगा है जो ईरान और मध्य एशिया में नहीं होता था. बाद में इनमें हरी मिर्च का भी इस्तेमाल होने लगा.


जानकार कहते हैं कि समोसा रेशम मार्ग के ज़रिये हिन्दुस्तान आया. कहीं ये सम्बुसा कहा जाता था और कहीं समसा लेकिन शुरुआत के दौर में समोसों में गोश्त, पिस्ता और क्रीम जैसे खाद्य पदार्थों का ही इस्तेमाल किया जाता रहा होगा. खाद्य इतिहासकार पुष्पेश पंत का कहना हैं कि वैसे तो समोसा मध्य एशिया से आया है लेकिन वो अब उपमहाद्वीप का खाना बन चुका है. उनके अनुसार अब समोसे को विदेशी कहना ग़लत होगा.


पश्चिम बंगाल में समोसा शिंगारा है और हैदराबाद में लुक्मी, गोवा में इसको चामुकास बोला जाता है और कोलकाता के क्लब्स में ये कॉकटेल समोसा कहलाता है. इसमें दाल भी इस्तेमाल होती हैं और ये मीठे रूप में भी पकाया जाता है इसलिए समोसे का हिंदुस्तानीकरण पूरा हो चुका है.


✍️MJ

22-09-2023

अमेज़न और मैं

 



1994 वह साल था जब अमेज़न अपने शुरुआती दौर में था ये वो समय  था जब हम स्कूल में पढ़ते थे. इंटरनेट क्या होता है हमें उसकी कोई भनक नहीं थी लेकिन ठीक इसी समय के आस पास मेरे दिमाग़ में भी ऐसा ही एक विचार कौंध रहा था. अपने मित्र संजय के साथ मिलकर हमने फ़्रेंड्स सर्विसनाम की एक संस्था बनाई. ये साल 1999 था. कुछ वर्षों की प्लानिंग और कुछ पैसे इकट्ठा कर लेने के बाद हमने ख़ुद से लोगो डिज़ाइन कर लिया था और साथ ही एक ब्रोशर डिज़ाइन करके उसके पाँच हज़ार प्रिंट भी ले लिए थेइस समय तक अमेज़न केवल किताबें ही बीच रहा था जबकि अमेज़न के काम से अनजान हम लोगों ने वो सभी सेवाएँ देने का विचार बना लिया था जो अमेज़न के द्वारा बहुत बाद में शुरू की गई.

छत्तीसगढ़ के सुदूर जगदलपुर शहर में और आसपास के कॉलोनीज़ में हमने ये ब्रोशर बाँटे. पता दिया था मेरे घर का और कांटैक्ट नंबर में था हमारे ही घर का लैंडलाइन नंबर. हम, हर तरह का सामान घर पहुँच सेवा के साथ ही (पे ऑन डिलीवरी मोड पर) उपलब्ध करवाने का प्लान बना चुके थे. दिन भर घर के फ़ोन की घंटी बजने लगी. ऑर्डर्स मिलने लगे. हम ही डिलीवरी करने वाले थे. हम ही ऑर्डर लेने वाले. हमारे पास निवेश करने के लिए कोई जमा पूँजी भी तो नहीं थी. कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर और गुरुद्वारे में तबला बजाते हुए जो थोड़े से पैसे जमा किए थे उससे ही ये काम शुरू किया था. मेरे पिता सरकारी कर्मचारी थे और संजय के भी, और हमारे आइडियाज़ को वो फ़िज़ूल ही समझते थे.

काम को शुरू हुए कोई तीन चार रोज़ हुए होंगे और पापा ने मुझे बुलाकर ज़ोरदार डाँट लगाईबोले पढ़ाई में ध्यान लगाओ ये सब फ़िज़ूल के काम यहाँ नहीं होंगे. एक महान विचार बीज रूप में ही मर गया कभी वृक्ष नहीं बन पाया.

मुझे इस बात का कोई गिला नहीं बस आज अनायास ही अमेज़न के इस चित्र पर नज़र पड़ी और ये आलेख लिखने का मन कर गया ताकि आप सब से कह सकूँ कि अपने बच्चों और स्वयं के आइडियास पर भरोसा कीजिए और कुछ नहीं तो उनके साथ खड़े रहिए. क्या पता अगला जेफ़ बेजोस आपके घर पर ही हो और आपको पता ही नहीं..

️MJ

कर्मक्षेत्रे :




अष्टमी के दिन श्रीकृष्ण प्रवास पर थे चहूँ ओर कृष्णजन्मोत्सव मनाया जा रहा था… उत्सव का माहौल था… लौटकर द्वारिका आये तो देखा वहाँ एक दीप भी नहीं जला था.. रुक्मणी ने आश्चर्य से पूछा - क्या यहाँ किसी की मृत्यु तो नहीं हो गई है नाथ! जिसका शोक मनाया जा रहा है…क्यूँकि मातम का सा माहौल था.
कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले प्रिये, इसे ही दिया तले अंधेरा कहते हैं… तुम्हें क्या लगता है जब हम त्रेता में अयोध्या लौटे थे तो अयोध्या वासियों ने दिया जला कर हमारा स्वागत किया था? 

अरे ! बिलकुल भी नहीं वो तो हनुमान हमसे पहले वायुमार्ग से अयोध्या पहुँच गये और नगरवासियों को कहा कि दिये जलाकर स्वागत करो…. नहीं तो शायद तब भी इसी तरह का मातम ही देखने को मिलता. हंसते हुए बोले तब तो हमने बड़ा भाई होना चुना था तो छोटे भाइयों ने भी अपना भ्रातृ धर्म निभाते हुए स्वागत सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी और इस बार तो हमने भाई भी छोटा होना ही चुना है.

सोचने वाली बात है कि जिस अयोध्या के नाम पर सत्तारूढ़ दल को पूरे देश भर में वोट मिले अयोध्या में ही उसे 4000 वोट का मिल पाना “दिये के तले ही अंधेरा होता है” इस कहावत को चरितार्थ कर रहा है.
और दिये तले हमेशा ही अंधेरा रहेगा इसका कुछ नहीं किया जा सकता !

✍️एमजे
15-06-2024
जन्मदिन प्रवास से वापस लौटकर

शनिवार, 15 जनवरी 2022

सुर्खरू होता है इंसां, ठोकरें खाने के बाद (ग़ज़लनामा भाग -3)


(भाग -2 से आगे .....)

तो मैं इन दिनों लगातार संस्मरण ही लिख रहा हूँ ऐसा इसीलिए कि हाल ही के अनुभव सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देना बड़ी समझदारी नहीं । फिर मैं ऐसी बातें ही यहां पोस्ट करना चाहता हूँ जिसे पढ़कर पाठक गण को भी कुछ अनंदभूति हो... 

वैसे वर्तमान जीवन के अनुभव भी समय समय पर यहाँ आते रहेंगे...

बहरहाल बात 97 -98 की ही है युवा वय का मैं और मेरे साथ मेरा प्रेम संगीत। एक ग़ज़ल कंपेटीशन में मिलना हुआ भाई "भारती" जी से।। लंबा पूरा कद, बड़ी आंखें, घुंघराले लंबे बाल और उर्दू के शब्दों का कमाल उच्चारण, बेहतरीन हारमोनियम वादक और मुझे छोटे भाई की तरह प्रेम करने वाले... मुझे "मनु" कहकर पुकारते थे वो, मुझसे उम्र में काफी बड़े ( वैसे मैंने उनसे कभी उनकी उम्र, वैवाहिक जीवन या कमाई के बारे में कुछ भी नहीं पूछा)।

तो पहली ग़ज़ल जो उनसे सुनी वो पंकज उधास साहब की गाई हुई ग़ज़ल थी... एक-एक मिसरा लाजवाब... एक एक शेर कमाल । बोल थे :

"ला पिला दे साकिया ,पैमाना पैमाने के बाद 
होश की बातें करूँगा , होश में आने के बाद 

दिल मेरा लेने की खातिर मिन्नतें क्या क्या न की 
कैसे नज़रें फेर ली, मतलब निकल जाने के बाद 

वक़्त सारी ज़िन्दगी में, दो ही गुज़रे है कठिन 
एक तेरे आने से पहले , एक तेरे जाने के बाद 

सुर्खरू होता है इंसां, ठोकरें खाने के बाद 
रंग लाती है हीना, पत्थर पे पिस जाने के बाद "

इसके बाद तो बैठकों का सिलसिला चल पड़ा। वो पंकज उधास, चंदन दास और अहमद मोहम्मद हुसैन को ही गाते थे।। उनकी रूहानी आवाज़ में ग़ज़ल सुनना कमाल का सुकून देता था।।

मैंने पंकज उधास और चंदन दास साहब को जितना भी सुना भारती जी के मुख से ही सुना कभी कोई कैसेट या CD नहीं खरीदी।

मुझे लगता था ये आदमी एक दिन बहुत ही बड़ा कलाकार बनेगा।

 लगातार उनका हमारे घर आना जाना कुछ समय तक बना रहा  फिर अचानक से वो एक दिन गायब हो गए... मुझे न तो उनका घर पता था और न ही उनका कोई लैंड लाइन फ़ोन नंबर था। ढूंढता भी तो कहाँ।

फिर कई साल बीतने के बाद  एक रोज़ किसी शादी की बारात में मैंने कीबोर्ड की धुन सूनी और उस धुन में जानी पहचानी खुशबू सूंघ कर मैं पहुंचा उस की बोर्ड बजाने वाले के पास।।

देखता क्या हूँ ये तो वही महान कालाकार है बारात में बैंड का हिस्सा बना हुआ है , शरीर सूख चूका , रंग झुलस गया है और आदमी परेशान दिखाई पड़ रहा है।।

मैंने पास जाकर बात करने की कोशिश की लेकिन बारात की भीड़ में और शायद काम में मशगूल होने के कारण कुछ बात नहीं हो पाई मुझे लगा शायद ये पहचानना नहीं चाह रहे लेकिन मुझे देख कर उनकी आंखों में एक चमक तो आ ही गई थी।

बात हुई तो बताया कि उन्होंने ग़ज़ल गाना छोड़ दिया है। कुछ छोटे मोटे काम करके गुज़ारा कर रहे हैं।। मैन कहा घर आइएगा बैठकर कुछ प्लान करते हैं। और फिर उनसे दोबारा आज तलक मिलना नहीं हुआ।। खुद्दार इंसान की यही पहचान है खुशियां बांटता है और ग़म पी जाता है।।

समय की मार और मुफलिसी इंसान को जो न कराए वो थोड़ा है। एक महान ग़ज़ल गायक पता नहीं आज किस स्थिति में है।। उम्मीद करता हूँ कि जीवन के किसी मोड़ पर उनसे मुलाक़ात होगी।।

मेरे देखे समाज की यह महती ज़िम्मेदारी है कि अपने आस पास के कालाकारों को सहेजें।। ध्यान रहे दुनियां ऐसे लोगों से ही खूबसूरत है।।

फ़िराक़ याद आते हैं:

"माना ज़ि‍न्दगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी

ख़ुदा को पा गया वायज़, मगर है
ज़रूरत आदमी को आदमी की

मिला हूँ मुस्कुरा कर उससे हर बार
मगर आँखों में भी थी कुछ नमी-सी"


✍️MJ

मंगलवार, 11 जनवरी 2022

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख (ग़ज़लनामा भाग 2)


तो बात है साल 97 की, तब मैं तबला बजाता था और खूब ही बजाता था । संगीत ही मेरी दुनियां थी। पढ़ने लिखने के अलावा दूसरा काम तबला बजाना और क्रिकेट खेलना था।

एक रोज़ निशा देशपांडे जी का फ़ोन आया (तब लैंडलाइन फोन ही हुआ करते थे) कहा कि एक कम्पटीशन में पार्टिसिपेट करना है क्या तुम मेरे साथ संगत करोगे ? मैंने हामी भर दी।

शाम को घर पहुंचा तो पूरी टीम बैठी हुई थी। तबले पर मेरी जगह खाली थी। जहां मैं बिना किसी के कुछ बोले ही जम गया।।

ग़ज़ब के सुरों के साथ जो ग़ज़ल कानों में पड़ी वो अहमद फ़राज़ साहब की ग़ज़ल थी :-

"रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएंगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ"


एक एक शब्द सीधे कानों से उतर कर ज़ेहन में पैवस्त हो गए और मैं उत्सुक था मेहदी हसन साहब को जानने के लिए । वो इंटरनेट का ज़माना नहीं था। इंटरनेट धीरे धीरे पैर पसार ही रह था।।

जानने का स्रोत केवल किताबें ही थी या ऑडियो कैसेट या कोई बड़े बुज़ुर्ग। सबसे पहले फ़राज़ साहब की "मेरी ग़ज़लें मेरी नज़्में" खरीद कर पफह डाली और निशा जी से ही मेहदी साहब की ऑडियो कैसेट ले ली।

कुछ दिन इन दोनों के खुमार में ही डूब रहा और फिर दिन आया कंपीटिशन का ।। 

जगदलपुर शहर के रोटरी भवन में कार्यक्रम का आयोजन था जहां मुझे कुछ और ग़ज़ल गायकों को सुनने का मौका मिला जिनमें से एक थे राकेश भारती। जो ग़ज़ल उन्होंने गाई उसके एक शेर पर मेरा दिल अटक गया बोल थे :

"वक्त सारी जिंदगी में दो ही गुजरे हैं कठिन,
इक तेरे आने से पहले, इक तेरे आने के बाद।"

अहा क्या कमाल। कमाल।कमाल.... अब मुझे उत्सुकता थी इस आदमी और उस ग़ज़ल को जानने की.... 

क्रमशः....

PS : बता दूं कि निशा जी विजयी घोषित की गईं और भारती जी उपविजेता रहे।। :)

सोमवार, 10 जनवरी 2022

ग़ज़लनामा (भाग -1)


ग़ज़लों की दुनिया से शुरूआती मुलाक़ात घर पर ही हुई . बड़े भाई साहब जगजीत सिंह को सुनते थे और आते जाते कानों में ग़ज़ल पड़ती रहती थी ।। लेकिन पहले पहल जिस ग़ज़ल  को ठीक से सूना और समझा वो मेंहदी हसन साहब की गाई हुई ग़ज़ल थी जिसे अहमद फ़राज़ साहब ने लिखा था....  बोल थे-

"रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आआ

 फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिये आ

माना के मुहब्बत का छुपाना है मुहब्बत

चुपके से किसी रोज़ जताने के लिये आ

जैसे तुझे आते हैं, न आने के बहाने

ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिये आ "

एक-एक शेर एक-एक मिसरा अद्भुत।।

ग़ज़ल क्या है? इस विषय पर बड़ी चर्चा हो सकती है लेकिन जैसा कि किसी शायर ने कहा है... कही गई बात का सीधे दिल पे असर हो तो ग़ज़ल होती है. यानी ग़ज़ल केवल शिल्प नहीं है इसमें कथ्य का होना भी ज़रूरी है.  तकनीकी रूप से ग़ज़ल काव्य की वह विधा है जिसका हर शे'र अपने आप में पूर्ण होता है । हर शे'र का अपना अलग विषय हो सकता है. लेकिन एक विषय पर भी गज़ल कही जा सकती  है जिसे ग़ज़ले- मुसल्सल कहते हैं।

आज इस आलेख के माध्यम से हम ग़ज़ल की बारीकियों को समझने का प्रयास करते हैं वैसे मैं पहले  ही ये स्पष्ट कर दूं कि मैं न तो अरूज़ी हूं (ग़ज़ल के तमाम असूलों की जानकारी को अरूज़ कहते हैं और जानने वाले अरूज़ी) और न ही ग़ज़लकार हूँ.....हाँ इस बात का दावा ज़रूर कर सकता हूँ कि मै साहित्य की इस विधा का  प्रेमी हूँ... जगजीत सिंह से लेकर महँदी हसन तक और ग़ुलाम अली से लेकर चंदन दास तक को सुना है और गुना है। जगजीत सिंह , पकज उधास और अहमद मोहम्मद हुसैन को सामने बैठकर सुनने का भी अवसर मिला है।  इन दिनों मल्लिका ए  ग़ज़ल, बेगम अख्तर साहिबा की दुनियां में हूँ ।।

बहरहाल ग़ज़ल को समझने के लिये इसके अंगों को जानना ज़रूरी है... अगर आपको कुछ बारीकियों के साथ , राग , ताल और शब्द के अर्थ भी पता हों तो ग़ज़ल सुनने का मज़ा कई गुना हो जाता है ।। कुछ महत्वपूर्ण शब्दावली -

मतला: ग़ज़ल के पहले शे'र को मतला कहते हैं. मतले के दोनो मिसरों मे काफ़िया और रदीफ़ का इस्तेमाल किया जाता है।

मक़्ता : ग़ज़ल का अंतिम शे'र जिसमे शायर अपना उपनाम(तखल्लुस)  लिखता है मक़्ता कहलाता है।

शे'र: दो पंक्तियों से मिलकर एक शे'र बनता है। दो पंक्तियों में ही अगर पूरी बात इस तरह कह दी जाये कि तकनीकी रूप से दोनों पदों के वज्‍़न समान हों तो कहा जाता है कि शेर हुआ।

मिसरा:  शे'र कि पंक्पतियाँ स्वतंत्र  रूप से मिसरा कहलाती हैं. शे'र की पहली  पंक्ति  'मिसरा ऊला' और दूसरी  'मिसरा सानी' कहलाती है ।  मिसरा ऊला पुन: दो भागों मे विभक्त होती है प्रथमार्ध को मुख्य (सदर) और उत्तरार्ध को दिशा (उरूज) कहा जाता है। "मिसरा सानी" के भी दो भाग होते हैं। प्रथम भाग को आरंभिक (इब्तिदा) तथा द्वितीय भाग को अंतिका (ज़र्ब) कहते हैं। अर्थात दो मिसरे ('मिसरा उला' + 'मिसरा सानी') मिल कर एक शे'र बनते हैं। 

कता :  चार मिसरों से मिलकर एक क़ता बनता है जो एक ही विषय पर हों।

रदीफ : रदीफ पूरी ग़ज़ल में स्थिर रहती है। ये एक या दो शब्दों से मिल कर बनती है और मतले मे दो बार मिसरे के अंत मे और शे'र मे दूसरे मिसरे के अंत मे ये पूरी ग़ज़ल मे प्रयुक्त हो कर एक जैसी ही रहती है  बदलती नहीं। ज़रूरूई नहीं की हर ग़ज़ल में रदीफ़ हो बिना रदीफ़ के भी ग़ज़ल हो सकती है जिसे गैर-मरद्दफ़ ग़ज़ल कहा जाता है. एक प्यारी सी रदीफ़ वाली ग़ज़ल देखें जिसे अमजद इस्लाम अमजद साहब ने लिखा है-

"कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा 

वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा 

वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं 

दिल-ए-बे-ख़बर मिरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा"

इस ग़ज़ल में "उसे भूल जा" रदीफ़ का प्रयोग किया गया है।।

काफ़िया : इसे एक तरह का तुक कह सकते हैं ।। जिसमें मतले के दोनों मिसरों के आखिरी अक्षर और हर शेर का आखिरी एकाधिक अक्षर समान होते हैं जैसे  बशीर बद्र साहब की एक प्यारी ग़ज़ल देखें: 

 "सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है

बा-वज़ू हो के भी छूते हुए डर लगता है 

मैं तिरे साथ सितारों से गुज़र सकता हूँ

कितना आसान मोहब्बत का सफ़र लगता है

मुझ में रहता है कोई दुश्मन-ए-जानी मेरा

ख़ुद से तन्हाई में मिलते हुए डर लगता है

बुत भी रक्खे हैं नमाज़ें भी अदा होती हैं

दिल मेरा दिल नहीं अल्लाह का घर लगता है

ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं

पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है"

इसमें "डर", "सफर", "घर" , "सर" ये सब काफिये हैं और "लगता है" रदीफ़ है 

 बहर: इसे एक तरह का फ़ारसी मीटर, ताल या लय कह सकते हैं  जो अरकानों की एक विशेष तरक़ीब से बनती है.

अरकान: फ़ारसी भाषाविदों ने आठ अरकान ढूँढे हैं और उनको एक नाम दिया है जो आगे चलकर बहरों का आधार बने।  रुक्न का बहुबचन है अरकान.बहरॊ की लम्बाई या वज़्न इन्ही से मापा जाता है। 

क्रमश:.......

PS: रात के एक बजे गए हैं इसे लिखते हुए ।। कुछ करेक्शन्स करके सुबह ही पोस्ट करूँगा... पढ़ कर कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं कि आप इस विषय पर और पढ़ना चाहेंगे क्या।। इसके तीन चार भाग और लिखने का मन है।।

09.01.2022
01.05 am

गुरुवार, 6 जनवरी 2022

रिजल्ट का दिन


हाल ही में MPPSC मुख्य परीक्षा के रिजल्ट घोषित हुए जल्द ही सिविल जज मुख्य परीक्षा के रिजल्ट भी आने वाले हैं और हर महीने किसी न एग्जाम के रिजल्ट आते ही रहते हैं. जैसा कि हमेशा ही होता है सफल प्रतिभागियों की संख्या असफल प्रतिभागियों से कम ही होती है.... इसका कारण यह है कि पद संख्या से प्रतिभागियों की संख्या हमेशा ही कई गुना ज्यादा होती होती है.

देखता हूँ कि कीमती जीवन केवल परीक्षा की तैयारी और सिलेबस पूरा करने में खर्च हो रहा है. उस पर तुर्रा यह की ये दौड़ कभी ख़त्म नहीं होती. जो जिस पद को प्राप्त कर चुका है वह उससे संतुष्ट नहीं है, बड़े पद की चाह रखता है गोया कि “दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, जो मिल जाए वो मिट्टी है, जो खो जाए वो सोना है.”

            मेरे देखे युवाओं को आत्ममंथन की आवश्यकता है. ये ठीक है कि सफल व्यक्ति को सभी सलाम करते हैं. सभी सफलता पाना चाहते हैं. लेकिन सफलता का अर्थ क्या है ? क्या कोई परीक्षा पास कर लेना? कुछ बन जाना ? बहुत सारे पैसे कमा लेना ? या विख्यात होना ?..... तय करना होगा .

           फिर उन लोगों का क्या जो असफल हो गए हैं? उनकी संख्या तो कहीं ज्यादा है. ये वर्ग उचित मार्गदर्शन न मिलने के कारण निराशा व हताशा में चला जाता है. इनमें से अधिकतर के पास कोई कौशल नहीं होता, तो ढंग की नौकरी मिलने के आसार भी ख़त्म हो जाते हैं. 

लेकिन युवा वर्ग को यह ध्यान रखना चाहिए कि युवा ही वायु हैं, हर चीज़ का रूख मोड़ने की शक्ति रखता है युवा. मैं अपने लेक्चर्स में हमेशा यही कहता हूँ कि कोई परीक्षा तुम्हारी क्षमताओं को नहीं तय कर सकती. तुममें असीम शक्ति है उसे पहचानो. तुम  इस विराट अस्तित्व का भाग ही नहीं हो बल्कि तुम ही विराट अस्तित्व हो. तुम सागर में एक बूँद नहीं हो तुम ही सागर हो.

        मैं अक्सर कहता रहता हूँ नदी क्यूँ मैली नहीं होती? क्योंकि वह बहती रहती है. पानी अपने मार्ग में आने वाले चट्टानों का सीना कैसे चीर देती है. क्योंकि वह निरंतर आगे बढती रहती है. पानी का एक बिन्दु झरने से नदी, नदी से महानदी और महानदी से समुद्र क्यों बन जाता है? क्योंकि वह बहता है. इसलिए हे जीवन! तुम रुको मत, बहते रहो. जीवन में कुछ असफलताएं आती हैं तो आती रहें, तुम उनसे घबराओ मत. उन्हें लांघकर दुगनी मेहनत करते चलो. बहते रहना और चलते रहना  ही  तो जीवन है. अगर असफलता से घबरा कर रुक गए तो उसी तरह सड़ जाओगे जिस तरह रुका हुआ पानी सड़ जाता है. अपने आपको इतना मज़बूत बनाओ की भाग्य की छाती पर लात रख कर मंज़िल तक पहुँच  सको.

          असफलता  कहती है कि सबक अभी बाकी है, जिन्दगी अभी तराश रही है, प्राण-शक्ति के इम्तिहान अभी बाकी हैं.मंजिलें अभी दूर हैं और रस्ते पुकार रहे हैं. असफलता में से अनुभव का “अ” निचोड़ लो फिर देखो विशुद्ध सफलता ही बचेगी. इस बात को गांठ बांध लो।।

✍️MJ

सोमवार, 3 जनवरी 2022

जनवरी और पिकनिक



जनवरी का मतलब पिकनिक और पिकनिक का मतलब जनवरी.... तो जनाब ये पिकनिक का क्या मतलब है? दोस्तों और परिवार जनों के साथ इकट्ठा होना, कहीं रमणीय स्थल पर जाना , खाना और घूमना।।

दिसंबर का महीना मेरे जीवन में केवल प्लानिंग का ही महीना होता था। स्कूली दिनों में होता ये था कि मेरे पास अलग -अलग ग्रुप हुआ करते थे या कहना बेहतर होगा कि मैं कई ग्रुप का सदस्य होता था ।। जैसे - संगीत सीखने जाता था तो वहां के मित्रों का एक ग्रुप, ट्यूशन के मित्रों का एक ग्रुप, स्कूल के पढ़ने वाले फ्रेंड्स का एक ग्रुप और  नहीं पढ़ने वाले मित्रों का एक ग्रुप🤐.

मेरे दोस्तों में हमेशा ही सभी उम्र के लोग शामिल रहे हैं मुझसे बहुत बड़े भी और बहुत छोटे भी...लड़के भी और लड़कियां भी। इसका मूल कारण शायद यही हो कि मैंने मित्रता में और शायद जीवन मे भी कभी भेद भाव नहीं किया, किसी को भी नहीं करना चाहिए।।

तो साल का शुरुआती हफ्ता हमेशा पिकनिकों से भरा होता था कम से कम तीन से चार पिकनिक।

 सभी पिकनिक यूं तो यादगार होती थी लेकिन साल 97 का पिकनिक कुछ ज़्यादा ही यादगार रहा। हुआ ये कि संगीत स्कूल वाले ग्रुप के साथ कैलाश गुफा जाने का प्लान बना (कांगेर घाटी नेशनल पार्क में स्थित है यह गुफा)। हम सभी संगीत साधक अपने शिक्षकों संध्या दीदी और रामदास सर के साथ सुबह तड़के ही चल दिये कांगेर घाटी की ओर।

कांगेर घाटी राष्ट्रीयउद्यान का नाम कांगेर नदी के नाम पर पड़ा  है, जो इसकी लंबाई में बहती है। कांगेर घाटी लगभग 200 वर्ग किलोमीटर में फैला है । जिसने 1982 में एक राष्ट्रीय उद्यान की स्थिति प्राप्त की। ऊँचे पहाड़ , गहरी घाटियाँ, विशाल पेड़ और मौसमी जंगली फूलों एवं वन्यजीवन की विभिन्न प्रजातियों के लिए यह अनुकूल जगह है । 


कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान एक मिश्रित नम पर्णपाती प्रकार के वनों का एक विशिष्ट मिश्रण है जिसमे साल ,सागौन , टीक और बांस के पेड़ बहुतायत में है। यहाँ की सबसे लोकप्रिय पक्षी की प्रजाति जो अपनी मानव आवाज के साथ सभी को मंत्रमुग्ध करती हैं वह बस्तर मैना है। राज्य पक्षी, बस्तर मैना, एक प्रकार का हिल माइन (ग्रुकुला धर्मियोसा) है, जो मानव आवाज का अनुकरण करने में सक्षम है। जंगल दोनों प्रवासी और निवासी पक्षियों का घर है।

वन्यजीवन और पौधों के अलावा, यह राष्ट्रीय उद्यान तीन असाधारण गुफाओं का घर है- कुटुम्बसर, कैलाश और दंडक-स्टेलेग्माइट्स और स्टैलेक्टसाइट्स के आश्चर्यजनक भूगर्भीय संरचनाओं के लिए प्रसिद्ध है। राष्ट्रीय उद्यान ड्रिपस्टोन और फ्लोस्टोन के साथ भूमिगत चूना पत्थर की गुफाओं की उपस्थिति के लिए जाना जाता है। स्टेलेग्माइट्स और स्टैलेक्टसाइट्स का गठन अभी भी बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय उद्यान में गुफा, वन्यजीवन की विभिन्न प्रजातियों के लिए आश्रय प्रदान करते हैं। राष्ट्रीय उद्यान के पूर्वी हिस्से में स्थित भैंसाधार में रेतीले तट देखे जाते हैं जहां मगरमच्छ (क्रोकोड्लस पालस्ट्रिस) इसका उपयोग मूलभूत उद्देश्यों के लिए करते हैं।

बहरहाल हम बात कर रहे थे पिकनिक टू कैलाश के बारे में ।। तो हम सुबह समय पर निकल गए और गुफा भी घूम आए । लेकिन इससे पहले की गुफा से बाहर निकल कर मैदानी इलाके तक पहुंचते जहां हमें खाना पकाना और खाना था , तेज़ बारिश शुरू हो गई। हमारी गाड़ी जंगल के बीच फंस गई और हम सब बेतहाशा भीगने लगे । 

"ढलता सूरज , फैला जंगल, रस्ता गुम,                         हमसे पूछो कैसा आलम होता है? "  *

हम घने जंगल मे एक दिशा में चलते रहे । शाम घिर आई थी और जल्द ही रात होने वाली थी। हमने दिन भर से कुछ भी नहीं खाया था और पूरी तरह से भीग गए थे लेकिन चल रहे थे । ये नेशनल पार्क जंगली जानवरों का घर था और हमारे साथ लड़कियां और  महिलाएं भी थीं।।

 रात घिरते ही अचानक घने जंगल के बीच हमें एक झोपड़ी दिखाई देती है।। हम सब उसमें समा जाते हैं और ये जानकर अच्छा लगता है कि ड्राइवर ने गाड़ी से डीज़ल का कंटेनर निकाल कर रख लिया था और हम साथ कुछ पैक्ड स्नेक्स भी ले आये थे।। बड़ी मुश्किल से आग जलाई जाती है।। रात के 10 बज रहे हैं बारिश थमने का नाम नहीं ले रही । कुछ लोग बीमार हो गए हैं बुखार और उल्टी।। लग रहा था  अब हम लोग बचेंगे नहीं । सबकी बात सुनते हुए आग तापते कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।।

उस समय मोबाईल फ़ोन नहीं हुआ करते थे कि किसी को फ़ोन करके मदद मंगा सकें । लग रहा था हम लोग अब बचेंगे नहीं ॥ कई तरह के ख़्याल दिमाग़ में दौड़ रहे थे मैं सोच रहा था काश कहीं से पापा आ जाएँ, वो मेरे सूपर हीरो जो थे लगता था कुछ भी कर सकते हैं ॥ और ये सब सोचते सोचते नींद आ गई॥

सपने में देखा की पापा कई गाड़ियाँ लेकर हमें ढूँढने निकल पड़े हैं … और हमें ढूँढ भी लिया है मेरे कानों में ज़ोर से उनकी आवाज़ पड़ी । एक दमदार आवाज़ जिसमें प्रेम की पुकार थी । झोपड़ी की गीली ज़मीन पर लेटा हुआ मैं आँख खोलता हूँ तो क्या पाता हूँ कि रात के अंतिम प्रहर में पापा सामने खड़े हैं मैं उनसे लिपट जाता हूँ ॥ पापा बहुत सारा कुछ खाने का लाए हैं चोकलेट मिठाइयाँ, केक , ब्रेड वग़ैरह वग़ैरह और ये अब हक़ीक़त में हो रहा है .. हाँ ये सपना नहीं ॥ पापा कई गाड़ियों में हमें बचाने आए थे हम सब बच गए हैं ॥

और एक शानदार पिकनिक समाप्त होती है ॥

✍️MJ




रविवार, 2 जनवरी 2022

Don't look up

02 -jan -2022 
शाम 6.00 बजे


कैसा हो अगर आपको पता चले कि ठीक 6 माह बाद पृथ्वी से एक बड़ा सा कॉमेट टकराएगा और पूरी पृथ्वी तबाह हो जाने वाली है?? क्या आपकी दिनचर्या ठीक वैसी ही होगी जैसी अभी है?? या कुछ बदल जाएगा?

आज एक कमाल की  फ़िल्म देखी Don't Look Up जिसका सेंट्रल आईडिया यही है ।। एडम मैके कि इस फ़िल्म में जेनिफर लॉरेंस केट डीबीएस्की के किरदार में हैं जो अपनी PhD कर रही हैं लिओनोर्दो डिकॉप्रियो के अंडर जो डॉक्टर रैंडल मैंडी बने हैं (एस्ट्रोनॉमर)।


अपनी रिसर्च के दौरान केट पाती हैं कि एवेरेस्ट के आकार का एक कॉमेट बहुत तेज़ गति से पृथ्वी की कक्षा की ओर बढ़ा चला आ रहा है और इस खोज के चलते ही कॉमेट का नाम उसकी खोज कर्ता के नाम पर "डीबीएस्की" रख दिया जाता है ।।


 अपने प्रोफेसर के साथ मिलकर वो गणना करती है तो पता चलता है कि अधिक से अधिक छः माह में ये कॉमेट पृथ्वी से टकरा जाएगा । दोनों की हालत खराब हो जाती है। उनके लिए बाकी सारी बातें जैसे एग्जाम में किसके क्या मार्क्स आए हैं , रिलेशनशिप में क्या हो रहा है, कौन चीफ जस्टिस बनने वाला है वगैरह वगैरह बेमानी हो जाती हैं।।


फ़िल्म को देखते हुए मैं सोचने लगा कि क्या ये बात हममें से हर एक के लिए सही नहीं है? क्या हम सब जल्द ही विदा नहीं हो जाने वाले।। ये पृथ्वी कितने साल रहेगी ये हमें नहीं  पता लेकिन ये तो 100℅ तय है कि आने वाले पचास सौ सालों में इस ब्लॉग को लिखने वाला , पढ़ने वाले और नहीं पढ़ने वाले भी विदा हो जाएंगे ।।

जॉन एलिया साहब ने कहीं लिखा है:

कितनी दिलकश हो तुम, कितना दिल-जू हूँ मैं
क्या सितम है कि हम लोग भी मर जाएंगे

बस अगर ये ख्याल दिल में रहे कि जीवन क्षणिक है तो आस पास घटने वाली हर घटना बेमानी हो जाएगी और नन चियोनो की तरह एक ही झटके में निर्वाण हाथ जोड़े सामने खड़ा होगा।। 

एक क्षण को ये ख्याल ठीक से समझ आ गया तो एक क्षण में पूरा जीवन बदल सकता है।।

मेरे देखे इस दुनिया में जानने योग्य केवल दो ही चीजें हैं मनुष्य मन भीतर और अनंत ब्रह्मांड बाहर।। इन दोनों का चिंतन अध्ययन और मनन करते रहें फिर जीवन में घटने वाली छोटी बड़ी बातें विचलित नहीं कर सकेंगी ।। ऐसी घटनाओं के सामने आने पर हम भी  मुस्कुरा ही उठेंगेऔर कहेंगे "परवा ईल्ले"।।

-MJ


पुनश्च : पिछले कुछ वर्षों में ब्लॉग पर कम ही एक्टिव रहा हूँ ।। थोड़ा बहुत फेसबुक पर लिखता रहा ।। अब यहां बने रहने का मन है।।


गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

किताबें और मैं





आज कई दिनों बाद इस प्लेटफार्म पर वापस लौटा हूँ... पिछला एक वर्ष यहाँ कुछ भी नहीं लिखा.. आखिरी आलेख 29 अप्रैल को लिखा था जब हैदराबाद कि सुखद यात्रा से लौटा था एक ऐसी यात्रा जो जीवन भर याद रहेगी.

 लेकिन ऐसा नहीं है कि लिखता नहीं रहा हूँ. पिछले वर्ष कुल जमा मेरी लिखी चार किताबें प्रकाशित हुईं...एक मित्र कि प्रेरणा से you tube पर लगातार विडियो डालता रहा. स्वयं के साथ कई सुखद यात्राएं की, जिनके बारे में समय समय पर लिखता रहूँगा. कुछ एक रिसर्च पेपर भी लिख डाले जिनको मालिक की मर्जी से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में जगह मिली. ऑक्सफ़ोर्ड हो आया. वस्तुतः जीवन इतना तेज गतिमान रहा कि यहाँ आने के लिए समय नहीं निकाल पाया.

जैसा किसी ने कहा है लिखना स्याही नहीं लहू मांगता है.. लेकिन मेरे देखे डायरी या संस्मरण लिखना बीते हुए समय को फिर से जीने के सामान है.     
    
तो आज के इस आलेख में बात करेंगे किताबों के बारे में.... किताबों से पहले पहल परिचय दादी की अलमारी से हुआ. उनके पास धार्मिक किताबों का संग्रह था... रामायण , गीता , रामचरित मानस और भी कई तरह कि किताबें. खैर इन किताबों को पढ़ा तो बहुत बाद में लेकिन हाँ रामचरित मानस शायद पहली किताब होगी, स्कूल की किताबों के अलावा जिसे पढ़ा था.

गर्मी कि छुट्टियों में हम ढेरों कॉमिक्स और नोवेल्स पढ़ते थे और लगातार पढ़ते रहते थे.. कॉमिक्स किराए पर लाये जाते थे जिनमें नंदन, चंदामामा, इंद्रजाल कॉमिक्स, मोटू पतलू , अमर चित्रकथा, चाचा चौधरी, पिंकी, बिल्लू, डोगा , परमाणु , सुपर कमांडो ध्रुव , नागाराज , तौसी , भोकाल,  बांकेलाल और न जाने क्या - क्या.

 क्यूंकि हम भाई इन्हें किराये पर लाते थे तो निश्चित समय में पढ़कर वापस करना होता था. शायद यहीं से नियत समय में पढ़ने  कि आदत लगी होगी ऐसा मालूम पड़ता है.

मुझे याद आता है कक्षा ग्यारह तक आते-आते बहुत कुछ नहीं पढ़ा था.. कक्षा बारह में पुस्तकों के प्रति रुचि जागी और इसका बाड़ा श्रेय श्री अनिल हर्जपाल जी को जाता है. अनिल भैया हमें फिजिक्स और मैथ्स पढ़ाते थे. उनके पास विज्ञान की किताबों का एक बड़ा संग्रह था.... यहाँ से पढने के प्रति रुचि जागी.

मेरी रुचि किस तरह कि किताबों में थी कभी तय नहीं कर पाया... ताऊ जी कि मृत्यु के बाद जीवन असार मालूम पड़ने लगा था.. बहुत कुछ जानने का मन करता था.... हज़ारों प्रश्न अनुत्तरित थे और लगता था जैसे किताबें इनका उत्तर देंगी.. सो मैं किताबों कि और मुड़ गया.

फिर तो जो कुछ मिला पढने लग गया. राजकमल प्रकाशन कि किताब घर योजना का सदस्य बना, एक स्थानीय पुस्ताकलय कि मेम्बरशिप ले ली, और मित्र मोहित कि दुकान से भी किताबें खरीद लाता. इस क्रम में रामधारी सिंह दिनकर’, निराला, प्रसाद, महादेवी, बच्चन, अज्ञेय, नागार्जुन आदि को पढ़ गया. बौद्ध और जैन दर्शन और भारतीय दर्शन पर कई किताबें पढ़ डालीं ...

फिर मिलना हुआ संतोष गंजीर भैया से उनके जरिये ओशो साहित्य से परिचय हुआ और मित्र राकेश साहू से मिलकर उपनिषदों  और वेदों को देखने और पढने का अवसर मिला.
  
एक बार भोपाल आना हुआ था और वहाँ से सेकंड हैण्ड बुक्स एकदम कम दाम में मिल गए...  लगा जैसे कि खजाना हाथ लग गया ऐसी ऐसी किताबें खरीद लीं जिनका नाम भी नहीं सुना था इनमें कबीर, फरीद , दुष्यंत, ग़ालिब, मीर, फ़ैज़ और फ़िराक़ तक शामिल थे. रदरफोर्ड का फिजिक्स और हाथरस से प्रकाशित संगीत पर कई किताबों के साथ ही पहली बार विदेशी लेखों कि रचनाएँ खरीदीं जिनमें टॉलस्टॉय , चेखव और गोर्की प्रमुख हैं...

जब KINDLE भारत में लॉन्च हुआ तो उसका वॉयेज खरीद लिया था लगभग तीन हज़ार किताबों के साथ आया था वो... लेकिन उसके साथ अब तक ठीक से दोस्ती हो नहीं पाई है... प्रिंटेड वर्शन हाथ में लेकर पढना  ही सुख देता है....

कानून कि किताबों के अलावा इन दिनों कई तरह कि किताबें पढ़ रहा हूँ... लगता है जैसे ये जीवन इन सबको पढ़ जाने के लिए कम पड़ेगा..
  
मेरा जीवन किताबों और उनके लेखकों का ऋणी है ... जीवन को देखने का नजरिया दिया है किताबों ने , जीवन को समझने कि बुद्धि दी है किताबों ने वस्तुतः जीवन को जीवन ही दिया है किताबों ने. 

आज विश्व पुस्तक दिवस के उपलक्ष्य में इतना ही... 

 - मन मोहन जोशी